
नारद उवाच-
देवेश श्रोतुमिच्छामि ब्रह्मन् वागीश तत्त्वतः।
सुब्रह्मण्यस्य कवचं कृपया वक्तुमर्हसि।
'नारद जी ने कहा - हे देवेश! हे ब्रह्मन्! हे वाणी के स्वामी (वागीश)! मैं आपसे तत्त्वपूर्वक (यथार्थ रूप में) सुनना चाहता हूँ। कृपया आप मुझे श्री सुब्रह्मण्य का कवच कहने की कृपा करें।'
'इस श्लोक में देवर्षि नारद, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना कर रहे हैं। नारद जी जिज्ञासु हैं और भगवान कार्तिकेय (सुब्रह्मण्य) के उस गुप्त कवच को जानना चाहते हैं जो सुरक्षा और शक्ति प्रदान करता है। यहाँ ब्रह्मा जी को 'वागीश' कहा गया है, जिसका अर्थ है वाणी के स्वामी, क्योंकि वे वेदों और ज्ञान के स्रोत हैं।'
ब्रह्मोवाच -
महर्षे शृणु मद्वाक्यं बहुना किं तवानघ।
मन्त्राश्च कोटिशः सन्ति शम्भुविष्ण्वादिदेवताः।
'ब्रह्मा जी ने कहा - हे महर्षि! हे पाप रहित (अनघ) नारद! मेरे वचनों को सुनो, बहुत कहने से क्या लाभ? शम्भु (शिव), विष्णु आदि देवताओं के करोड़ों मंत्र विद्यमान हैं।'
'ब्रह्मा जी यहाँ भूमिका बाँध रहे हैं। वे नारद जी को 'अनघ' कहते हैं, जिसका अर्थ है जिसने कभी पाप न किया हो, यह दर्शाता है कि यह ज्ञान केवल शुद्ध आत्मा को ही दिया जा सकता है। वे बताते हैं कि संसार में अनगिनत मंत्र हैं, लेकिन वे अब कुछ विशेष बताने जा रहे हैं।'
सहस्रनाम्नां कोट्यश्च ह्यङ्गन्यासाश्च कोटिशः।
उपमन्त्रास्त्वनेके च कोटिशः सन्ति नारद।
'सहस्रनाम (हजारों नाम वाले स्तोत्र) भी करोड़ों हैं और अंगन्यास भी करोड़ों प्रकार के हैं। हे नारद! उपमंत्र भी अनेक और करोड़ों की संख्या में हैं।'
'यहाँ 'न्यास' का अर्थ है शरीर के विभिन्न अंगों में देवताओं को स्थापित करने की तांत्रिक प्रक्रिया। ब्रह्मा जी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सामान्य पूजा पद्धतियाँ और मंत्र तो बहुत हैं, जो सुलभ हैं।'
मालामन्त्राः कोटिशश्च ह्यश्वमेधफलप्रदाः।
कुमारकवचं दिव्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।
'अश्वमेध यज्ञ का फल देने वाले माला-मंत्र भी करोड़ों हैं। (किंतु) यह 'कुमार कवच' अत्यंत दिव्य है और भोग (सांसारिक सुख) तथा मोक्ष (मुक्ति) दोनों फलों को देने वाला है।'
'यहाँ तुलना की गई है। अन्य मंत्र अश्वमेध यज्ञ जैसा महान पुण्य दे सकते हैं, लेकिन यह कवच उससे भी बढ़कर है क्योंकि यह 'भुक्ति' (इस लोक के सुख) और 'मुक्ति' (परलोक में मोक्ष) दोनों एक साथ प्रदान करता है। इसे 'दिव्य' कहा गया है, यानी यह साधारण नहीं, अलौकिक है।'
सर्वसम्पत्करं श्रीमद्वज्रसारसमन्वितम्।
सर्वात्मके शम्भुपुत्रे मतिरस्त्यत्र किं तव।
'यह कवच समस्त सम्पत्तियां प्रदान करने वाला, शोभायमान और वज्र के समान अत्यंत कठोर (अभेद्य) सार से युक्त है। (हे नारद!) सर्वात्मा शम्भु-पुत्र (कार्तिकेय) में तुम्हारी बुद्धि/भक्ति है, इससे बढ़कर और क्या बात हो सकती है?'
'कवच को 'वज्रसार' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह वज्र की तरह मजबूत सुरक्षा घेरा बनाता है जिसे कोई शस्त्र नहीं भेद सकता। ब्रह्मा जी नारद की भक्ति की प्रशंसा करते हैं कि उनका मन भगवान शिव के पुत्र में लगा है।'
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि भक्तोऽसि त्वं महामते।
यस्येदं शरजं जन्म यदि वा स्कन्द एव च।
तेनैव लभ्यते चैतत्कवचं शङ्करोदितम्।
'हे महामते! तुम धन्य हो, तुम कृतकृत्य (सफल जीवन वाले) हो और तुम ही सच्चे भक्त हो। जिसका जन्म सरकंडों के वन (श रवण) से हुआ है अथवा जो स्वयं स्कन्द ही है, उसी के द्वारा यह शंकर (शिव) द्वारा कहा गया कवच प्राप्त किया जा सकता है।'
'इसका भाव यह है कि यह कवच अत्यंत दुर्लभ है। यह भगवान शिव द्वारा प्रकट किया गया था। इसे प्राप्त करने का अधिकार केवल उसे है जो स्कन्द (कार्तिकेय) का अनन्य भक्त हो। 'शरजं जन्म' भगवान कार्तिकेय के जन्म की कथा की ओर संकेत करता है, जब वे सरकंडों के वन में प्रकट हुए थे।'
ऋषिश्छन्दो देवताश्च कार्याः पूर्ववदेव च।
ध्यानं तु ते प्रवक्ष्यामि येन स्वामिमयो भवेत्।
'(इस कवच के) ऋषि, छंद और देवता का न्यास पूर्ववत (विधि अनुसार) करना चाहिए। अब मैं तुम्हें इसका 'ध्यान' बताता हूँ, जिसके द्वारा साधक स्वामी (कार्तिकेय) मय (एकाकार) हो जाता है।'
'किसी भी मंत्र के पाठ से पहले 'विनियोग' और 'न्यास' की परंपरा है। ब्रह्मा जी कहते हैं कि अब वे उस स्वरूप का वर्णन करेंगे जिसका ध्यान करने से भक्त भगवान सुब्रह्मण्य के साथ तदाकार हो जाता है।'
ओङ्काररूपिणं देवं सर्वदेवात्मकं प्रभुम्।
देवसेनापतिं शान्तं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्।
'वे ओंकार स्वरूप हैं, सभी देवताओं की आत्मा (स्वरूप) हैं, समर्थ प्रभु हैं, देवताओं की सेना के सेनापति हैं, शांत स्वरूप हैं और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव (त्रिमूर्ति) के ही स्वरूप हैं।'
'यहाँ कार्तिकेय को केवल एक देवता नहीं बल्कि परब्रह्म (ओंकार) माना गया है। वे 'देवसेनापति' हैं अर्थात असुरों के विरुद्ध देवताओं के रक्षक हैं। साथ ही, वे त्रिगुणातीत और त्रिमूर्ति का सम्मिलित रूप हैं।'
भक्तप्रियं भक्तिगम्यं भक्तानामार्तिभञ्जनम्।
भवानीप्रियपुत्रं च महाभयनिवारकम्।
'वे भक्तों के प्रिय हैं, केवल भक्ति द्वारा ही प्राप्त (गम्य) होने योग्य हैं, भक्तों के दुखों (आर्ति) का नाश करने वाले हैं। वे माता भवानी (पार्वती) के प्रिय पुत्र हैं और महान भय का निवारण करने वाले हैं।'
'यहाँ भगवान के करुणामय रूप का वर्णन है। 'भक्तिगम्यं' का अर्थ है कि उन्हें ज्ञान या योग की अपेक्षा प्रेम और भक्ति से आसानी से पाया जा सकता है। वे 'महाभय' यानी मृत्यु या संसार के सबसे बड़े डर को भी दूर करते हैं।'
शङ्करं सर्वलोकानां शङ्करात्मानमव्ययम्।
सर्वसम्पत्प्रदं वीरं सर्वलोकैकपूजितम्।
'वे समस्त लोकों का कल्याण (शंकर) करने वाले हैं, शिव के आत्मस्वरूप हैं और अविनाशी (अव्यय) हैं। वे सभी प्रकार की सम्पदा देने वाले, वीर और समस्त लोकों द्वारा पूजित एकमात्र देव हैं।'
'शब्द 'शंकर' का अर्थ है 'शं करोति इति शंकरः' (जो कल्याण करता है)। यहाँ कार्तिकेय को ही शंकर कहा गया है क्योंकि वे शिव के ही अंश हैं। 'अव्यय' का अर्थ है जिसका कभी क्षय या नाश न हो।'
एवं ध्यात्वा महासेनं कवचं वज्रपञ्जरम्।
पठेन्नित्यं प्रयत्नेन त्रिकालं शुद्धिसंयुतः।
'इस प्रकार महासेन (विशाल सेना वाले कार्तिकेय) का ध्यान करके, इस 'वज्रपंजर' नामक कवच का नित्य प्रयत्नपूर्वक, पवित्र होकर तीनों काल (सुबह, दोपहर, शाम) पाठ करना चाहिए।'
'यहाँ विधि बताई गई है। पहले बताए गए स्वरूप का मानसिक ध्यान करना अनिवार्य है। इस कवच का नाम 'वज्रपंजर' (हीरे का पिंजरा) भी है, जो इसकी अभेद्यता दर्शाता है।'
सत्यज्ञानप्रदं दिव्यं सर्वमङ्गलदायकम्।
अस्य श्रीसुब्रह्मण्यकवचस्तोत्रमहामन्त्रस्य परब्रह्म-ऋषिः।
देवी गायत्री छन्दः। प्रसन्नज्ञानसुब्रह्मण्यो देवता। ॐ बीजम्।
श्रीं शक्तिः। सौं कीलकम्। प्रसन्नज्ञानसुब्रह्मण्यप्रसादसिद्ध्यर्थे
जपे विनियोगः।
'यह कवच सत्य और ज्ञान प्रदान करने वाला, दिव्य और सभी मंगलों को देने वाला है।
विनियोग: इस श्री सुब्रह्मण्य कवच स्तोत्र महामंत्र के ऋषि परब्रह्म हैं। छंद देवी गायत्री है। देवता प्रसन्न-ज्ञान-सुब्रह्मण्य हैं। 'ॐ' बीज है। 'श्रीं' शक्ति है। 'सौं' कीलक है। श्री प्रसन्न-ज्ञान-सुब्रह्मण्य की प्रसन्नता और सिद्धि प्राप्त करने के लिए जप में इसका विनियोग (उपयोग) किया जाता है।'
'यह तांत्रिक विधि का हिस्सा है। ऋषि वह है जिसने मंत्र को देखा/प्रकट किया। छंद मंत्र की लय है। बीज, शक्ति और कीलक मंत्र को जाग्रत करने और उसके फल को नियंत्रित करने वाली कुंजियाँ हैं।'
श्रीसुब्रह्मण्याय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
शक्तिधराय तर्जनीभ्यां नमः।
षण्मुखाय मध्यमाभ्यां नमः।
षट्त्रिंशत्कोणसंस्थिताय अनामिकाभ्यां नमः।
सर्वतोमुखाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
तारकान्तकाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
एवं हृदयादिन्यासः। भूर्भुवस्सुवरोम् इति दिग्बन्धः।
'श्री सुब्रह्मण्य को नमस्कार (अंगूठों में), शक्तिधर को नमस्कार (तर्जनी उंगलियों में), षण्मुख को नमस्कार (मध्यमा उंगलियों में), 36 कोणों में स्थित रहने वाले को नमस्कार (अनामिका उंगलियों में), सब ओर मुख वाले को नमस्कार (कनिष्ठा उंगलियों में), तारकासुर का अंत करने वाले को नमस्कार (करतल और करपृष्ठ में)। इसी प्रकार हृदयादि न्यास करें। 'भूर्भुवस्सुवरोम्' कहकर दसों दिशाओं का बंधन करें।'
'यह 'करन्यास' है। अपनी उंगलियों में देवता की शक्ति स्थापित करना ताकि साधक का शरीर मंत्रमय हो जाए। 'षट्त्रिंशत्कोण' (36 कोण) संभवतः श्रीचक्र या सुब्रह्मण्य यंत्र की ज्यामिति या 36 तत्त्वों का संकेत है।'
ध्यानम् -
षड्वक्त्रं शिखिवाहनं त्रियनं चित्राम्बरालङ्कृतं
शक्तिं वज्रमयीं त्रिशूलमभयं खेटं धनुश्चक्रकम्।
पाशं कुक्कुटमङ्कुशं च वरदं दोर्भिर्दधानं सदा
ध्यायामीप्सितसिद्धये शिवसुतं स्कन्दं सुराराधितम्।
'मैं अपनी मनोकामनाओं की सिद्धि के लिए शिवपुत्र, देवताओं द्वारा पूजित स्कन्द का ध्यान करता हूँ, जिनके छह मुख हैं, जो मोर (शिखि) पर सवार हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो विचित्र (रंग-बिरंगे) वस्त्रों से अलंकृत हैं। जो अपने हाथों (भुजाओं) में वज्रमयी शक्ति (वेल), त्रिशूल, अभय मुद्रा, ढाल (खेट), धनुष, चक्र, पाश, मुर्गा (कुक्कुट), अंकुश और वरद मुद्रा धारण किए हुए हैं।'
'यह सगुण रूप का विस्तृत ध्यान है। उनके हाथों में स्थित आयुध उनके विभिन्न शक्तियों के प्रतीक हैं। मुर्गा (कुक्कुट) उनके ध्वज में होता है और जागृति का प्रतीक है।'
द्विषड्भुजं षण्मुखमम्बिकासुतं
कुमारमादित्यसमानतेजसम्।
वन्दे मयूरासनमग्निसम्भवं
सेनान्यमद्याहमभीष्टसिद्धये।
'मैं अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए आज उनका वंदन करता हूँ, जिनकी बारह (दो गुना छह) भुजाएं हैं, छह मुख हैं, जो अंबिका (पार्वती) के पुत्र हैं, कुमार हैं, सूर्य (आदित्य) के समान जिनका तेज है, जो मयूर (मोर) के आसन पर विराजमान हैं, जो अग्नि से प्रकट हुए हैं और जो देवसेनापति हैं।'
'यहाँ भगवान के 'अग्निसम्भव' होने का उल्लेख है, क्योंकि पौराणिक कथाओं में शिवजी का तेज अग्निदेव ने धारण किया था, जिससे बाद में कार्तिकेय का जन्म हुआ। 'कुमार' नाम उनके चिर-यौवन को दर्शाता है।'
गाङ्गेयं वह्निगर्भं शरवणजनितं ज्ञानशक्तिं कुमारं
ब्रह्मेशानामरेड्यं गुहमचलसुतं रुद्रतेजः स्वरूपम्।
सोनान्यं तारकघ्नं सकलभयहरं कार्तिकेयं षडास्यं
सुब्रह्मण्यं मयूरध्वजरथसहितं देवदेवं नमामि।
'मैं उन देवों के देव सुब्रह्मण्य को नमन करता हूँ जो गांगेय (गंगा पुत्र) हैं, वह्निगर्भ (अग्नि से उत्पन्न) हैं, शरवण (सरकंडों के वन) में जन्मे हैं, ज्ञानशक्ति स्वरूप हैं, कुमार हैं, ब्रह्मा और ईश (शिव) आदि देवताओं द्वारा स्तुति योग्य हैं। जो गुह (हृदय गुफा में रहने वाले) हैं, अचलसुत (पर्वतराज की पुत्री पार्वती के पुत्र) हैं, रुद्र के तेज स्वरूप हैं, सेनापति हैं, तारकासुर का वध करने वाले हैं, समस्त भय हरने वाले हैं, कार्तिकेय (कृत्तिकाओं के पुत्र) हैं, छह मुख वाले हैं और मयूर ध्वज वाले रथ के साथ हैं।'
'इस श्लोक में कार्तिकेय के जन्म की पूरी यात्रा और उनके विभिन्न नामों का समावेश है। उन्हें 'ज्ञानशक्ति' कहा गया है क्योंकि उनका मुख्य शस्त्र 'वेल' (शक्ति) ब्रह्मज्ञान का प्रतीक है।'
कनककुण्डलमण्डितषण्मुखं वनजराजिविराजितलोचनम्।
निशितशस्त्रशरासनधारिणं शरवणोद्भवमीशसुतं भजे।
'मैं उन ईश-पुत्र (शिव पुत्र) को भजता हूँ जिनके छह मुख सोने के कुंडलों से सुशोभित हैं, जिनके नेत्र कमल (वनज) की पंक्तियों की तरह सुंदर हैं, जो तीक्ष्ण शस्त्र और धनुष धारण करते हैं और जो शरवण (सरकंडों के वन) से उत्पन्न हुए हैं।'
'यह सौंदर्य वर्णन है। योद्धा रूप (तीक्ष्ण शस्त्र) के साथ-साथ उनके सौम्य रूप (कमल नयन, स्वर्ण कुंडल) का भी चित्रण है।'
अथ कवचम्।
सुब्रह्मण्यः शिरः पातु शिखां पातु शिवात्मजः।
शिवः पातु ललाटं मे भ्रूमध्यं क्रौञ्चदारणः।
'अब कवच (प्रारंभ होता है):
सुब्रह्मण्य मेरे सिर की रक्षा करें। शिव के पुत्र (शिवात्मज) मेरी शिखा की रक्षा करें। शिव (कल्याण स्वरूप स्कन्द) मेरे माथे की रक्षा करें। क्रौञ्च पर्वत को विदीर्ण करने वाले (क्रौञ्चदारण) मेरे दोनों भौंहों के मध्य भाग की रक्षा करें।'
'यहाँ से शरीर के अंगों की सुरक्षा का विधान शुरू होता है। 'क्रौञ्चदारण' नाम इसलिए आया क्योंकि उन्होंने अपनी शक्ति से क्रौञ्च पर्वत (जो एक असुर का रूप था) को भेद दिया था।'
भुवौ पातु कुमारो मे नेत्रे पातु त्रिनेत्रकः।
पायाद्गौरीसुतः श्रोत्रे गण्डयुग्मं हरात्मजः।
'कुमार मेरी दोनों भौंहों की रक्षा करें। तीन नेत्रों वाले (त्रिनेत्रक) मेरी आँखों की रक्षा करें। गौरी पुत्र मेरे कानों की रक्षा करें और हर (शिव) के पुत्र (हरात्मज) मेरे दोनों गालों की रक्षा करें।'
'कार्तिकेय भी अपने पिता शिव की तरह त्रिनेत्र धारी माने जाते हैं, इसलिए यहाँ उन्हें 'त्रिनेत्रक' कहा गया है।'
दक्षनासापुटद्वारं प्राणरूपी महेश्वरः।
सर्वदेवात्मकः पातु जिह्वां सारस्वतप्रदः।
'महेश्वर स्वरूप प्राणरूपी भगवान मेरे दाहिने नासाछिद्र (नाक के द्वार) की रक्षा करें। सभी देवताओं के स्वरूप और सरस्वती (विद्या) प्रदान करने वाले (सारस्वतप्रद) मेरी जीभ की रक्षा करें।'
'जीभ (वाणी) की रक्षा के लिए उन्हें 'सारस्वतप्रद' कहा गया है क्योंकि सुब्रह्मण्य को ब्रह्मविद्या का गुरु माना जाता है। प्राण वायु नाक से चलती है, इसलिए वहाँ प्राणरूपी रूप का आह्वान है।'
दन्तान् रक्षतु देवेशः तालुयुग्मं शिवात्मजः।
देवसेनापतिः पातु चुबुकं चाद्रिजासुतः।
'देवेश मेरे दाँतों की रक्षा करें। शिवात्मज मेरे दोनों तालुओं की रक्षा करें। देवसेनापति मेरी ठोड़ी (चिबुक) की रक्षा करें और अद्रिजा (पर्वत-पुत्री पार्वती) के सुत भी ठोड़ी की रक्षा करें।'
'अद्रिजासुत का अर्थ है पर्वत (हिमालय) की बेटी का बेटा। शरीर के सूक्ष्म अंगों तक की सुरक्षा यहाँ मांगी गई है।'
पार्वतीनन्दनः पातु द्वावोष्ठौ मम सर्वदा।
षण्मुखो मे मुखं पातु सर्वदेवशिखामणिः।
'पार्वती नंदन मेरे दोनों होठों की सदा रक्षा करें। षण्मुख (छह मुख वाले) मेरे मुख की रक्षा करें, जो सभी देवताओं में शिरोमणि हैं।'
'मुख के लिए षण्मुख का आह्वान किया गया है, जो प्रतीकात्मक समानता दर्शाता है।'
सिंहगर्वापहन्ता मे ग्रीवां पातु सनातनः।
तारकासुरसंहन्ता कण्ठं दुष्टान्तकोऽवतु।
'सिंघ के गर्व को भी हरने वाले (अत्यंत पराक्रमी) मेरी गर्दन (ग्रीवा) की रक्षा करें। सनातन देव, तारकासुर का संहार करने वाले और दुष्टों का अंत करने वाले मेरे कंठ की रक्षा करें।'
'गर्दन और कंठ जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। यहाँ उनके उग्र रूपों (दुष्टान्तक, तारकासुरसंहन्ता) का आह्वान किया गया है ताकि कोई भी शत्रु प्राण न ले सके।'
सुभुजो मे भुजौ पातु स्कन्धमग्निसुतो मम।
सन्धियुग्मं गुहः पातु करौ मे पातु पावनः।
'सुंदर भुजाओं वाले (सुभुज) मेरी दोनों भुजाओं की रक्षा करें। अग्निपुत्र मेरे कंधों (स्कन्ध) की रक्षा करें। गुह मेरे दोनों संधियों (जोड़ों) की रक्षा करें और पावन (पवित्र) रूप मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें।'
'यहाँ 'स्कन्ध' शब्द का प्रयोग कंधे के लिए हुआ है और देवता का नाम भी 'स्कन्द' है, जो एक शाब्दिक सौंदर्य है।'
कराङ्गुलीः श्रीकरोऽव्यात् सुररक्षणदीक्षितः।
वक्षःस्थलं महासेनः तारकासुरसूदनः।
'श्री (लक्ष्मी/समृद्धि) प्रदान करने वाले (श्रीकर) मेरी हाथ की उंगलियों की रक्षा करें। जो देवताओं की रक्षा के लिए दीक्षित (संकल्पित) हैं, वे (श्रीकर) रक्षा करें। महासेन, जो तारकासुर का नाश करने वाले हैं, मेरे वक्षस्थल (छाती) की रक्षा करें।'
'हाथों से ही हम कर्म करते हैं और धन (श्री) कमाते हैं, इसलिए उंगलियों की रक्षा 'श्रीकर' रूप से कराई गई है।'
कुक्षिं पातु सदा देवः सुब्रह्मण्यः सुरेश्वरः।
उदरं पातु रक्षोहा नाभिं मे विश्वपालकः।
'सुरेश्वर (देवताओं के ईश्वर) देव सुब्रह्मण्य सदा मेरी कोख (कुक्षि) की रक्षा करें। राक्षसों को मारने वाले (रक्षोहा) मेरे पेट (उदर) की रक्षा करें और विश्वपालक मेरी नाभि की रक्षा करें।'
'नाभि शरीर का केंद्र है और पोषण का स्रोत है, इसलिए 'विश्वपालक' रूप से उसकी रक्षा की प्रार्थना है।'
लोकेशः पातु पृष्ठं मे कटिं पातु धराधरः।
गुह्यं जितेन्द्रियः पातु शिश्नं पातु प्रजापतिः।
'लोकों के स्वामी (लोकेश) मेरी पीठ की रक्षा करें। धरा को धारण करने वाले (धराधर) मेरी कमर (कटि) की रक्षा करें। जितेन्द्रिय (इंद्रियों को जीतने वाले) मेरे गुदा भाग (गुह्य अंग) की रक्षा करें और प्रजापति (संतान के स्वामी) मेरे लिंग (शिश्न) की रक्षा करें।'
'गुह्य अंगों और प्रजनन अंगों की रक्षा के लिए 'जितेन्द्रिय' और 'प्रजापति' जैसे उपयुक्त नामों का चयन किया गया है, जो ब्रह्मचर्य और सृजन दोनों के संतुलन का प्रतीक है।'
अण्डद्वयं महादेव ऊरुयुग्मं सदा मम।
सर्वभूतेश्वरः पातु जानुयुग्ममघापहः।
'महादेव मेरे दोनों अंडकोशों की और सदा मेरी दोनों जांघों (ऊरु) की रक्षा करें। सर्वभूतेश्वर (सभी जीवों के स्वामी) और पापों का नाश करने वाले (अघापह) मेरे दोनों घुटनों की रक्षा करें।'
'शरीर का निचला हिस्सा गति और स्थिरता का प्रतीक है।'
जङ्घे मे विश्वभुक्पातु गुल्फौ पातु सनातनः।
वल्लीश्वरः पातु मम मणिबन्धौ महाबलः।
'विश्व का भरण/भोग करने वाले (विश्वभुक्) मेरी दोनों पिंडलियों (जंघाओं के नीचे का भाग) की रक्षा करें। सनातन देव मेरे दोनों टखनों (गुल्फ) की रक्षा करें। महाबली वल्लीश्वर (देवी वल्ली के पति) मेरे दोनों मणिबंधों (टखनों/कलाई के जोड़ों) की रक्षा करें।'
'वल्ली भगवान कार्तिकेय की पत्नी हैं जो इच्छा शक्ति (इच्छा शक्ति) की प्रतीक हैं। उनका नाम लेकर रक्षा मांगना सांसारिक जीवन में सुरक्षा देता है।'
पातु वल्लीपतिः पादौ पादपृष्ठं महाप्रभुः।
पादाङ्गुलीः श्रीकरो मे इन्द्रियाणि सुरेश्वरः।
'वल्लीपति मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें। महाप्रभु मेरे पैरों के ऊपरी भाग (पादपृष्ठ) की रक्षा करें। श्रीकर मेरे पैरों की उंगलियों की और सुरेश्वर मेरी समस्त इंद्रियों की रक्षा करें।'
'इस प्रकार सिर से लेकर पैर तक (आपाद-मस्तक) शरीर के हर अंग को कवच से ढक दिया गया है।'
त्वचं महीपतिः पातु रोमकूपांस्तु शाङ्करिः।
षाण्मातुरः सदा पातु सर्वदा च हरप्रियः।
'महीपति (पृथ्वी के स्वामी) मेरी त्वचा की रक्षा करें। शंकर पुत्र (शांकरि) मेरे रोमकूपों की रक्षा करें। छह माताओं वाले (षाण्मातुर - छह कृत्तिकाओं ने उन्हें दूध पिलाया था) और शिवजी के प्रिय (हरप्रिय) सदा सर्वदा मेरी रक्षा करें।'
'शरीर के बाहरी आवरण (त्वचा) और सूक्ष्म छिद्रों की भी रक्षा मांगी गई है।'
कार्तिकेयस्तु शुक्लं मे रक्तं शरवणोद्भवः।
वाचं वागीश्वरः पातु नादं मेऽव्यात्कुमारकः।
'कार्तिकेय मेरे वीर्य (शुक्ल) की रक्षा करें। शरवणोद्भव मेरे रक्त की रक्षा करें। वाणी के ईश्वर (वागीश्वर) मेरी वाणी की रक्षा करें और कुमारक मेरे नाद (स्वर/ध्वनि) की रक्षा करें।'
'यह आंतरिक धातुओं (रक्त, वीर्य) और सूक्ष्म शक्तियों (वाणी, नाद) की सुरक्षा है।'
पूर्वस्यां दिशि सेनानीर्मां पातु जगदीश्वरः।
आग्नेय्यामग्निदेवश्च क्रतुरूपी परात्परः।
'जगदीश्वर सेनानी (सेनापति) पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें। अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व) में अग्निदेव स्वरूप और यज्ञ (क्रतु) रूपी परात्पर प्रभु मेरी रक्षा करें।'
'अब दिशाओं का बंधन (दिग्बंध) शुरू होता है। अग्नि कोण के लिए अग्नि स्वरूप कार्तिकेय का आह्वान उचित है।'
दक्षिणस्यामुग्ररूपः सर्वपापविनाशनः।
खड्गधारी च नैरृत्यां सर्वरक्षोनियामकः।
'दक्षिण दिशा में उग्र रूप वाले और सभी पापों का नाश करने वाले मेरी रक्षा करें। नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में खड्ग (तलवार) धारण करने वाले और सभी राक्षसों को नियंत्रित करने वाले मेरी रक्षा करें।'
'दक्षिण दिशा यम की है और नैऋत्य राक्षसों की, इसलिए यहाँ 'उग्र रूप' और 'खड्गधारी' रूपों का प्रयोग सुरक्षा के लिए किया गया है।'
पश्चिमास्यां दिशि सदा जलाधारो जितेन्द्रियः।
वायव्यां प्राणरूपोऽव्यान्महासेनो महाबलः।
'पश्चिम दिशा में सदा जल को धारण करने वाले (जलाधार) और जितेन्द्रिय मेरी रक्षा करें। वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में प्राणरूप, महाबली महासेन मेरी रक्षा करें।'
'वायव्य दिशा वायु की है, अतः वहाँ 'प्राणरूप' का आह्वान है।'
उत्तरस्यां दिशि सदा निधिकर्ता स पातु माम्।
शम्भुपुत्रः सदा पातु दिश्यैशान्यां महाद्युतिः।
'उत्तर दिशा में निधियों (खजाने) के स्वामी (निधिकर्ता) मेरी सदा रक्षा करें। ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में महान कांति वाले (महाद्युति) शम्भुपुत्र सदा मेरी रक्षा करें।'
'उत्तर दिशा कुबेर (धन) की है, इसलिए 'निधिकर्ता' का प्रयोग हुआ है। ईशान दिशा शिव की है, इसलिए 'शम्भुपुत्र' का।'
ऊर्ध्वं ब्रह्मपतिः पातु चतुर्मुखनिषेवितः।
अधस्तात्पातु विश्वात्मा सदा ब्रह्माण्डभृत्परः।
'ऊपर की ओर, चार मुखों वाले ब्रह्मा जी द्वारा सेवित ब्रह्मपति (ब्रह्म ज्ञान के स्वामी) मेरी रक्षा करें। नीचे की ओर विश्वात्मा और ब्रह्मांड को धारण करने वाले परम प्रभु सदा मेरी रक्षा करें।'
'दसों दिशाओं (8 क्षैतिज + ऊपर + नीचे) की सुरक्षा पूरी हुई।'
मध्यं पातु महासेनः शूरसंहारकृत्सदा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं स्कन्दः पातु सदा मम।
'मध्य भाग की रक्षा शूरपद्म (असुर) का संहार करने वाले महासेन सदा करें। स्कन्द मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की सदा रक्षा करें।'
'बाहरी दिशाओं के बाद अब अंतःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार) की सुरक्षा की जा रही है।'
गङ्गातीरनिवासी मामादियामे सदाऽवतु।
मध्ययामे सुरश्रेष्ठस्तृतीये पातु शाम्भवः।
'गंगा के तट पर निवास करने वाले (कार्तिकेय) दिन के पहले प्रहर (आदियाम) में सदा मेरी रक्षा करें। दूसरे (मध्य) प्रहर में देवताओं में श्रेष्ठ (सुरश्रेष्ठ) और तीसरे प्रहर में शम्भुपुत्र (शाम्भव) मेरी रक्षा करें।'
'अब काल (समय) के अनुसार सुरक्षा मांगी जा रही है। दिन को प्रहरों में बांटा गया है।'
दिनान्ते लोकनाथो मां पुर्वरात्र्यां पुरारिजः।
अर्धरात्रे महायोगी निशान्ते कालरूपधृत्।
'दिन के अंत (सायंकाल) में लोकनाथ, रात्रि के पहले भाग में त्रिपुरारी (शिव) के पुत्र (पुरारिज) मेरी रक्षा करें। आधी रात (अर्धरात्रि) में महायोगी और रात के अंत (ब्रह्म मुहूर्त) में काल का रूप धारण करने वाले मेरी रक्षा करें।'
'रात के समय खतरे अधिक होते हैं, इसलिए 'महायोगी' और 'कालरूपधृत्' जैसे शक्तिशाली रूपों का आह्वान है।'
मृत्युञ्जयः सर्वकालमन्तस्तु शिखिवाहनः।
बहिः स्थितं शक्तिधरः पातु मां योगिपूजितः।
'मृत्यु को जीतने वाले (मृत्युंजय) सब समय (सर्वकाल) मेरी रक्षा करें। अंदर (अंतःकरण में) मयूर वाहन (शिखिवाहन) रक्षा करें। बाहर स्थित मुझे शक्ति (वेल) धारण करने वाले और योगियों द्वारा पूजित प्रभु रक्षा करें।'
'अंदर और बाहर, हर समय की पूर्ण सुरक्षा।'
सर्वत्र मां सदा पातु योगविद्यो निरञ्जनः।
पातु मां पञ्चभूतेभ्यः पञ्चभूतात्मकस्तदा।
'योग विद्या को जानने वाले, दोषरहित (निरंजन) प्रभु सर्वत्र और सदा मेरी रक्षा करें। पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का ही स्वरूप धारण करने वाले वे प्रभु उन पंचभूतों से होने वाले उपद्रवों से मेरी रक्षा करें।'
'प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए यह प्रार्थना है।'
तिष्ठन्तमग्निभूः पातु गच्छन्तं शूरसूदनः।
विशाखोऽव्याच्छयानं मां निषण्णं तु सुरेश्वरः।
'खड़े रहते समय अग्नि से उत्पन्न (अग्निभू) मेरी रक्षा करें। चलते समय शूरपद्म का वध करने वाले (शूरसूदन) रक्षा करें। सोते समय विशाख मेरी रक्षा करें और बैठे हुए (निषण्ण) होने पर सुरेश्वर रक्षा करें।'
'विशाख, स्कन्द का ही एक नाम/रूप है। हर शारीरिक अवस्था में सुरक्षा मांगी गई है।'
मार्गे मे नीलकण्ठश्च शैलदुर्गेषु नायकः।
अरण्यदेशे दुर्गे चाभयं दद्याद्भयापहः।
'रास्ते में नीलकंठ (मयूर) वाले प्रभु और पर्वतीय दुर्गम स्थानों में नायक मेरी रक्षा करें। जंगल (अरण्य) और कठिन स्थानों (दुर्ग) में भय को दूर करने वाले (भयापह) मुझे अभय प्रदान करें।'
'यात्रा, वन गमन और पहाड़ों में सुरक्षा के लिए प्रार्थना।'
भार्यां पुत्रप्रदः पातु पुत्रान् रक्षेत् हरात्मजः।
पशून् रक्षेन्महातेजा धनं धनपतिर्मम।
'पुत्र देने वाले (पुत्रप्रद) मेरी पत्नी की रक्षा करें। शिवपुत्र (हरात्मज) मेरे पुत्रों की रक्षा करें। महातेजस्वी मेरे पशुओं की रक्षा करें और धनपति (कुबेर स्वरूप/स्वामी) मेरे धन की रक्षा करें।'
'परिवार और संपत्ति की सुरक्षा।'
राजराजार्चितः पातु ह्रस्वदेहं महाबलः।
जीवनं पातु सर्वेशो महामणिविभूषणः।
'राजाओं के राजा (कुबेर या सम्राट) द्वारा पूजित (राजराजार्चित) मेरे छोटे/नश्वर शरीर (ह्रस्वदेह) की रक्षा करें। महाबली, सर्वेश और महामणियों के आभूषण पहनने वाले मेरे जीवन की रक्षा करें।'
सूर्योदये तु मां सर्वो ह्यश्विन्याद्याश्च तारकाः।
मेषाद्या राशयश्चैव प्रभवाद्याश्च वत्सराः।
'सूर्योदय के समय 'सर्व' (सब कुछ स्वरूप) मेरी रक्षा करें। अश्विनी आदि (27) नक्षत्र, मेष आदि (12) राशियाँ और प्रभव आदि (60) संवत्सर (वर्ष) भी मेरी रक्षा करें (या मेरे अनुकूल हों)।'
'अब ज्योतिषीय ग्रहों और काल गणनाओं से सुरक्षा मांगी जा रही है।'
अयने द्वे षडृतवो मासाश्चैत्रमुखास्तथा।
शुक्लकृष्णौ तथा पक्षौ तिथयः प्रतिपन्मुखाः।
'दो अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन), छह ऋतुएं, चैत्र आदि महीने, शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्ष, तथा प्रतिपदा आदि तिथियां...'
'समय के सभी विभाजनों को कवच में शामिल किया गया है।'
अहोरात्रे च यामादि मुहूर्ता घटिकास्तथा।
कलाः काष्ठादयश्चैव ये चान्ये कालभेदकाः।
ते सर्वे गुणसम्पन्नाः सन्तु सौम्यास्तदाज्ञया।
'...दिन-रात, प्रहर, मुहूर्त, घड़ी, कला, काष्ठा आदि और जो भी अन्य काल के भेद हैं, वे सब भगवान स्कन्द की आज्ञा से गुणकारी और सौम्य (शांतिपूर्ण) हो जाएं।'
'यह प्रार्थना है कि समय (काल) का कोई भी बुरा प्रभाव भक्त पर न पड़े।'
ये पक्षिणो महाक्रूराः उरगाः क्रूरदृष्टयः।
उलूकाः काकसङ्घाश्च श्येनाः कङ्कादिसंज्ञकाः।
शुकाश्च सारिकाश्चैव गृध्राः कङ्का भयानकाः।
ते सर्वे स्कन्ददेवस्य खड्गजालेन खण्डिताः।
शतशो विलयं यान्तु भिन्नपक्षा भयातुराः।
'जो महाक्रूर पक्षी हैं, क्रूर दृष्टि वाले सांप हैं, उल्लू, कौओं के झुंड, बाज, कंक आदि नाम वाले पक्षी, तोते, मैना, गिद्ध और भयानक कंक पक्षी हैं - वे सब स्कन्द देव की तलवार के समूह (खड्ग जाल) से कटकर, पंख टूटने पर भयभीत होकर सैकड़ों टुकड़ों में नष्ट हो जाएं।'
'यह अपशकुन करने वाले या हमला करने वाले प्राणियों से रक्षा है।'
ये द्रव्यहारिणश्चैव ये च हिंसापरा द्विषः।
ये प्रत्यूहकरा मर्त्या दुष्टमर्त्या दुराशयाः।
दुष्टा भूपालसन्दोहाः ये भूभारकराः सदा।
कायविघ्नकरा ये च ये खला दुष्टबुद्धयः।
'जो द्रव्य (धन) हरने वाले हैं, जो हिंसा करने वाले शत्रु हैं, जो बाधा (प्रत्यूह) डालने वाले मनुष्य हैं, जो दुष्ट और बुरी नीयत वाले लोग हैं। जो दुष्ट राजाओं के समूह पृथ्वी पर भार बने हुए हैं, जो शरीर को कष्ट/विघ्न पहुँचाने वाले हैं और जो दुष्ट बुद्धि वाले खल (नीच) हैं...'
'मानवीय शत्रुओं और बाधाओं की सूची।'
ये च मायाविनः क्रूराः सर्वद्रव्यापहारिणः।
ये चापि दुष्टकर्माणो म्लेच्छाश्च यवनादयः।
नित्यं क्षुद्रकरा ये च ह्यस्मद्बाधाकराः परे।
'...जो मायावी और क्रूर हैं, जो सब कुछ लूट लेने वाले हैं, जो दुष्ट कर्म करने वाले, म्लेच्छ और यवन आदि हैं (अर्थात विधर्मी/असंस्कारी आक्रांता)। जो नित्य क्षुद्र कर्म (जादू-टोना) करने वाले हैं और जो दूसरे लोग हमें बाधा पहुँचाते हैं...'
'समाज विरोधी और तांत्रिक बाधा पहुँचाने वालों का उल्लेख।'
दानवा ये महादैत्याः पिशाचा ये महाबलाः।
शाकिनीडाकिनीभेदाः वेताला ब्रह्मराक्षसाः।
'...जो दानव हैं, महादैत्य हैं, महाबली पिशाच हैं। शाकिनी और डाकिनी के विभिन्न भेद, वेताल और ब्रह्मराक्षस हैं...'
'प्रेत योनि और आसुरी शक्तियों का वर्णन।'
कूष्माण्डभैरवाद्या ये कामिनी मोहिनी तथा।
अपस्मारग्रहा ये च रक्तमांसभुजो हि ये।
'...कूष्माण्ड और भैरव आदि गण, कामिनी और मोहिनी (लुभाने वाली शक्तियां), अपस्मार (मृगी/दौरे) पैदा करने वाले ग्रह/भूत और जो रक्त तथा मांस खाने वाले हैं...'
'यहाँ 'अपस्मार' एक रोग भी है और एक राक्षस भी, जिससे मानसिक और शारीरिक नियंत्रण खो जाता है।'
गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा ये च देवस्य योनयः।
ये च प्रेताः क्षेत्रपालाः ये विनायकसंज्ञकाः।
'...गंधर्व, अप्सराएं, सिद्ध और जो भी देव योनियाँ हैं। जो प्रेत हैं, क्षेत्रपाल हैं और जो विनायक नाम से जाने जाने वाले विघ्नकारी गण हैं...'
'यहाँ विनायक का अर्थ गणेश नहीं, बल्कि विघ्न डालने वाले गणों के वर्ग से है।'
महामेषा महाव्याघ्रा महातुरगसंज्ञकाः।
महागोवृषसिंहाद्याः सैन्धवा ये महागजाः।
'...विशाल मेंढ़े, बड़े बाघ, बड़े घोड़े, बड़े बैल और सिंह आदि, सैंधव (घोड़े/पशु) और विशाल हाथी...'
'जंगली और शक्तिशाली जानवरों से रक्षा।'
वानराः शुनका ये च वराहा वनचारिणः।
वृकोष्ट्रखरमार्जाराः ये चातिक्षुद्रजन्तवः।
'...बंदर, कुत्ते, वन में घूमने वाले सूअर, भेड़िये, ऊंट, गधे, बिल्लियाँ और जो अत्यंत छोटे जीव (कीड़े-मकोड़े) हैं...'
अगाधभूता भूताङ्गग्रहग्राह्यप्रदायकाः।
ज्वालामालाश्च तडितो दुरात्मानोऽतिदुःखदाः।
'...अगाध (गहरे) भूत, शरीर को जकड़ने वाले ग्रह, अग्नि की लपटें (ज्वालामाला), बिजलियाँ और जो अत्यंत दुख देने वाली दुरात्माएं हैं...'
नानारोगकरा ये च क्षुद्रविद्या महाबलाः।
मन्त्रयन्त्रसमुद्भूताः तन्त्रकल्पितविग्रहाः।
'...जो नाना प्रकार के रोग पैदा करने वाले हैं, जो महाबली क्षुद्र विद्याएं (काला जादू) हैं। जो मंत्र और यंत्र से उत्पन्न बाधाएं हैं और तंत्र द्वारा बनाए गए पुतले/विग्रह हैं...'
'तांत्रिक अभिचार कर्म (मारण प्रयोग) से रक्षा।'
ये स्फोटका महारोगाः वातिकाः पैत्तिकाश्च ये।
सन्निपातश्लेष्मकाश्च महादुःखकरास्तथा।
'...जो फोड़े-फुंसी (स्फोटक) आदि महारोग हैं। जो वात, पित्त और कफ (सन्निपात) के प्रकोप से होने वाले अत्यंत दुखदाई रोग हैं...'
'आयुर्वेदिक दोषों से उत्पन्न बीमारियों से रक्षा।'
माहेश्वरा वैष्णवाश्च वैरिञ्चाश्च महाज्वराः।
चातुर्थिकाः पाक्षिकाश्च मासषाण्मासिकाश्च ये।
सांवत्सरा दुर्निवार्या ज्वराः परमदारुणाः।
'...माहेश्वर, वैष्णव और वैरिञ्च (ब्रह्मा संबंधी) महाज्वर (बुखार)। चौथे दिन आने वाले (चातुर्थिक), पक्ष में आने वाले, महीने या छह महीने में आने वाले, या साल भर रहने वाले, जो निवारण करने में कठिन और अत्यंत भयानक ज्वर हैं...'
'प्राचीन चिकित्सा में विभिन्न प्रकार के ज्वरों (Fevers) को देवताओं के कोप या समय चक्र से जोड़ा जाता था।'
सृष्टका ये महोत्पाता ये जाग्रत्स्वप्नदूषकाः।
ये ग्रहाः क्रूरकर्तारो ये वा बालग्रहादयः।
'...जो प्राकृतिक उत्पाद (भूकंप आदि) हैं, जो जागते हुए या सपने में दोष उत्पन्न करते हैं। जो क्रूर कर्म करने वाले ग्रह हैं या जो बच्चों को सताने वाले बालग्रह आदि हैं...'
महाशिनो मांसभुजो मनोबुद्धीन्द्रियापहाः।
स्फोटकाश्च महाघोराः चर्ममांसादिसम्भवाः।
'...जो बहुत खाने वाले (महाशिनो), मांस खाने वाले और मन, बुद्धि तथा इंद्रियों का हरण करने वाले हैं। जो चमड़ी और मांस में होने वाले महाघोर फोड़े-फुंसी आदि रोग हैं...'
दिवाचोरा रात्रिचोरा ये सन्ध्यासु च दारुणाः।
जलजाः स्थलजाश्चैव स्थावरा जङ्गमाश्च ये।
'...जो दिन में चोरी करते हैं, जो रात में चोरी करते हैं और जो संध्या के समय भयानक होते हैं। जो जल में उत्पन्न, स्थल में उत्पन्न, स्थिर या चलने वाले जीव हैं...'
विषप्रदाः कृत्रिमाश्च मन्त्रतन्त्रक्रियाकराः।
मारणोच्चाटनोन्मूलद्वेषमोहनकारिणः।
'...जो विष देने वाले हैं, बनावटी (कृत्रिम) विष देने वाले हैं, मंत्र-तंत्र की क्रिया करने वाले हैं। जो मारण (जान से मारना), उच्चाटन (खदेड़ना), उन्मूलन (जड़ से उखाड़ना), विद्वेषण (लड़ाई करवाना) और मोहन (वश में करना) आदि कर्म करने वाले हैं...'
'षट्कर्म (तांत्रिक जादू) के दुष्प्रभावों का वर्णन।'
गरुडाद्याः पक्षिजाता उद्भिदश्चाण्डजाश्च ये।
कूटयुद्धकरा ये च स्वामिद्रोहकराश्च ये।
'...गरुड़ आदि पक्षी जाति, उद्भिज (धरती फोड़कर निकलने वाले) और अंडज (अंडे से जन्म लेने वाले)। जो कूट युद्ध (छल कपट से युद्ध) करने वाले हैं और जो स्वामी से द्रोह करने वाले हैं...'
क्षेत्रग्रामहरा ये च बन्धनोपद्रवप्रदाः।
मन्त्रा ये विविधाकाराः ये च पीडाकरास्तथा।
'...जो खेत और गांव को नष्ट/हड़प करने वाले हैं, जो बंधन और उपद्रव देने वाले हैं। जो विविध प्रकार के मंत्र और पीड़ा देने वाली शक्तियां हैं...'
यो चोक्ता ये ह्यनुक्ताश्च भूपातालान्तरिक्षगाः।
ते सर्वे शिवपुत्रस्य कवचोत्तारणादिह।
सहस्रधा लयं यान्तु दूरादेव तिरोहिताः।
'...जो कहे गए हैं और जो नहीं कहे गए हैं (जिनका नाम नहीं लिया गया), जो पृथ्वी, पाताल और अंतरिक्ष में विचरने वाले हैं - वे सब शिवपुत्र (सुब्रह्मण्य) के इस कवच के पाठ/उच्चारण मात्र से, दूर से ही तिरोहित (गायब) होकर हजारों टुकड़ों में नष्ट (लय) हो जाएं।'
'यह कवच का अंतिम कमांड (आदेश) है कि ज्ञात और अज्ञात सभी खतरे भगवान की शक्ति से नष्ट हो जाएं।'
फलश्रुतिः।
इत्येतत्कवचं दिव्यं षण्मुखस्य महात्मनः।
सर्वसम्पत्प्रदं नृणां सर्वकायार्थसाधनम्।
'फलश्रुति (लाभ):
इस प्रकार यह महात्मा षण्मुख का दिव्य कवच मनुष्यों को सभी प्रकार की संपत्ति देने वाला और सभी कार्यों व उद्देश्यों को सिद्ध करने वाला है।'
सर्ववश्यकरं पुण्यं पुत्रपौत्रप्रदायकम्।
रहस्यातिरहस्यं च गुह्याद्गुह्यतरं महत्।
'यह सबको वश में करने वाला, पुण्य देने वाला, पुत्र और पौत्र प्रदान करने वाला है। यह रहस्य से भी अति रहस्यमय और गोपनीय से भी अत्यंत गोपनीय व महान है।'
सर्वेदेवप्रियकरं सर्वानन्दप्रदायकम्।
अष्टैश्वर्यप्रदं नित्यं सर्वरोगनिवारणम्।
'यह सभी देवताओं को प्रिय लगने वाला, सब प्रकार का आनंद देने वाला, आठों प्रकार के ऐश्वर्य (अष्टसिद्धि) देने वाला और नित्य सभी रोगों का निवारण करने वाला है।'
अनेन सदृशं वर्म नास्ति ब्रह्माण्डगोलके।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं शृणु पुत्र महामुने।
'इस कवच (वर्म) के समान पूरे ब्रह्मांड के गोले में दूसरा कोई कवच नहीं है। हे पुत्र! हे महामुने! यह सत्य है, सत्य है और पुनः सत्य है, इसे सुनो।'
'तीन बार 'सत्य' कहने का अर्थ है कि इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं होना चाहिए।'
एकवारं जपन्नित्यं मुनितुल्यो भविष्यति।
त्रिवारं यः पठेन्नित्यं गुरुध्यानपरायणः।
स एव षण्मुखः सत्यं सर्वदेवात्मको भवेत्।
'जो नित्य एक बार इसका जप करता है, वह मुनि के समान हो जाएगा। जो गुरु का ध्यान करते हुए नित्य तीन बार इसका पाठ करेगा, वह साक्षात् षण्मुख (स्कन्द) स्वरूप और सर्वदेवमय हो जाएगा, यह सत्य है।'
पठतां यो भेदकृत्स्यात् पापकृत्स भवेद्ध्रुवम्।
कोटिसङ्ख्यानि वर्माणि नानेन सदृशानि हि।
'जो पाठ करने वालों में भेद (अंतर/निंदा) करता है, वह निश्चित ही पापी होता है। करोड़ों कवच भी इसके समान नहीं हैं।'
कल्पवृक्षसमं चेदं चिन्तामणिसमं मुने।
सकृत्पठनमात्रेण महापापैः प्रमुच्यते।
'हे मुने! यह कल्पवृक्ष (इच्छा पूरी करने वाला पेड़) के समान है और चिंतामणि (मनचाहा देने वाली मणि) के समान है। केवल एक बार पाठ करने मात्र से मनुष्य महापापों से मुक्त हो जाता है।'
सप्तवारं पठेद्यस्तु रात्रौ पश्चिमदिङ्मुखः।
मण्डलान्निगडग्रस्तो मुच्यते न विचारणा।
'जो व्यक्ति रात्रि में पश्चिम दिशा की ओर मुख करके सात बार इसका पाठ करता है, वह एक मंडल (लगभग 48 दिन) के भीतर ही बेड़ियों (बंधन/जेल) से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई विचार (संदेह) नहीं है।'
'यह कारावास या किसी भी कठिन बंधन से मुक्ति का उपाय है।'
विद्वेषी च भवेद्वश्यः पठनादस्य वै मुने।
कृत्रिमाणि च सर्वाणि नश्यन्ति पठनाद्ध्रुवम्।
यं यं च याचते कामं तं तमाप्नोति पूरुषः।
'हे मुने! इसके पाठ से द्वेष रखने वाला (शत्रु) भी वश में हो जाता है। सभी प्रकार के कृत्रिम (जादू-टोना) प्रयोग पाठ करने से निश्चित ही नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जिस-जिस कामना की याचना करता है, उसे प्राप्त कर लेता है।'
नित्यं त्रिवारं पठनात्खण्डयेच्छत्रुमण्डलम्।
दशवारं जपन्नित्यं त्रिकालज्ञो भवेन्नरः।
'नित्य तीन बार पाठ करने से शत्रु समूह का नाश (खंडन) हो जाता है। नित्य दस बार जप करने से मनुष्य त्रिकालज्ञ (भूत, भविष्य, वर्तमान जानने वाला) हो जाता है।'
इन्द्रस्येन्द्रत्वमेतेन ब्रह्मणो ब्रह्मताऽभवत्।
चक्रवर्तित्वमेतेन सर्वेषां चैव भूभृताम्।
'इसी के प्रभाव से इंद्र को इंद्र पद और ब्रह्मा को ब्रह्म पद प्राप्त हुआ। सभी राजाओं को चक्रवर्ती सम्राट का पद इसी से मिला।'
'यह अतिशयोक्ति अलंकार है जो स्तोत्र की महत्ता बताने के लिए प्रयोग किया जाता है।'
वज्रसारतमं चैतत्कवचं शिवभाषितम्।
पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापहरं परम्।
'यह शिव द्वारा कहा गया कवच वज्र से भी अधिक कठोर/श्रेष्ठ है। इसे पढ़ने वालों और सुनने वालों के भी सभी पापों को हरने वाला यह परम साधन है।'
गुरुपूजापरो नित्यं कवचं यः पठेदिदम्।
मातुः स्तन्यं पुनः सोऽपि न पिबेन्मुनिसत्तम।
'जो गुरु पूजा में तत्पर होकर नित्य इस कवच का पाठ करता है, हे मुनिसत्तम! वह फिर से माता का दूध नहीं पीता (अर्थात उसका पुनर्जन्म नहीं होता, उसे मोक्ष मिलता है)।'
कुमारकवचं चेदं यः पठेत्स्वामिसन्निधौ।
सकृत्पठनमात्रेण स्कन्दसायुज्यमाप्नुयात्।
'जो इस कुमार कवच का पाठ भगवान स्वामी (कार्तिकेय) के सन्निधि (मूर्ति/मंदिर के पास) में करता है, वह केवल एक बार के पाठ से ही स्कन्द का सायुज्य (मोक्ष का एक प्रकार जिसमें भक्त देवता में लीन हो जाता है) प्राप्त कर लेता है।'
सेनानीरग्निभूः स्कन्दस्तारकारिर्गुणप्रियः।
षाण्मातुरो बाहुलेयः कृत्तिकाप्रियपुत्रकः।
मयूरवाहनः श्रीमान् कुमारः क्रौञ्चदारणः।
विशाखः पार्वतीपुत्रः सुब्रह्मण्यो गुहस्तथा।
षोडशैतानि नामानि शृणुयात् श्रावयेत्सदा।
तस्य भक्तिश्च मुक्तिश्च करस्थैव न संशयः।
'1. सेनानी, 2. अग्निभू, 3. स्कन्द, 4. तारकारि, 5. गुणप्रिय, 6. षाण्मातुर, 7. बाहुलेय, 8. कृत्तिकाप्रियपुत्रक, 9. मयूरवाहन, 10. श्रीमान्, 11. कुमार, 12. क्रौञ्चदारण, 13. विशाख, 14. पार्वतीपुत्र, 15. सुब्रह्मण्य और 16. गुह।
जो इन सोलह नामों को सदा सुनता है या सुनाता है, भक्ति और मुक्ति उसके हाथ में ही स्थित है, इसमें कोई संशय नहीं है।'
'ये 16 नाम कार्तिकेय के सबसे शक्तिशाली नाम माने गए हैं।'
गोमूत्रेण तु पक्त्वान्नं भुक्त्वा षण्मासतो मुने।
सहस्रं मूलमन्त्रं च जप्त्वा नियमतन्त्रितः।
सप्तविंशतिवारं तु नित्यं यः प्रपठेदिदम्।
वायुवेगमनोवेगौ लभते नात्र संशयः।
'हे मुने! जो व्यक्ति नियमों में बंधकर, गोमूत्र में पकाए गए अन्न का भोजन करके, छह महीने तक मूल मंत्र का एक हजार जप करे और नित्य इस कवच का 27 बार पाठ करे, वह वायु के समान वेग और मन के समान गति (सिद्धियां) प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।'
'यह एक कठोर तंत्र साधना है जिसका उल्लेख यहाँ विशेष सिद्धियों के लिए किया गया है।'
य एवं वर्षपर्यन्तं पूजयेद्भक्तिसंयुतः।
ब्रह्मलोकं च वैकुण्ठं कैलासं समवाप्स्यति।
'जो इस प्रकार भक्ति युक्त होकर एक वर्ष तक पूजा/पाठ करता है, वह ब्रह्मलोक, वैकुंठ और कैलाश को प्राप्त कर लेता है।'
तस्मादनेन सदृशं कवचं भुवि दुर्लभम्।
यस्य कस्य न वक्तव्यं सर्वथा मुनिसत्तम।
'इसलिए इस कवच के समान पृथ्वी पर दूसरा कवच दुर्लभ है। हे मुनिसत्तम! इसे जिस किसी को (अयोग्य व्यक्ति को) नहीं बताना चाहिए।'
पठन्नित्यं च पूतात्मा सर्वसिद्धिमवाप्स्यति।
सुब्रह्मण्यस्य सायुज्यं सत्यं च लभते ध्रुवम्।
'नित्य इसका पाठ करने वाला पवित्र आत्मा होकर सभी सिद्धियां प्राप्त कर लेता है और निश्चित रूप से सत्य ही वह सुब्रह्मण्य का सायुज्य (मोक्ष/एकाकार) प्राप्त करता है।'
'यहाँ कवच का समापन होता है, जिसमें अंतिम फल मोक्ष बताया गया है।'
नारद उवाच-
देवेश श्रोतुमिच्छामि ब्रह्मन् वागीश तत्त्वतः।
सुब्रह्मण्यस्य कवचं कृपया वक्तुमर्हसि।
ब्रह्मोवाच -
महर्षे शृणु मद्वाक्यं बहुना किं तवानघ।
मन्त्राश्च कोटिशः सन्ति शम्भुविष्ण्वादिदेवताः।
सहस्रनाम्नां कोट्यश्च ह्यङ्गन्यासाश्च कोटिशः।
उपमन्त्रास्त्वनेके च कोटिशः सन्ति नारद।
मालामन्त्राः कोटिशश्च ह्यश्वमेधफलप्रदाः।
कुमारकवचं दिव्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्।
सर्वसम्पत्करं श्रीमद्वज्रसारसमन्वितम्।
सर्वात्मके शम्भुपुत्रे मतिरस्त्यत्र किं तव।
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि भक्तोऽसि त्वं महामते।
यस्येदं शरजं जन्म यदि वा स्कन्द एव च।
तेनैव लभ्यते चैतत्कवचं शङ्करोदितम्।
ऋषिश्छन्दो देवताश्च कार्याः पूर्ववदेव च।
ध्यानं तु ते प्रवक्ष्यामि येन स्वामिमयो भवेत्।
ओङ्काररूपिणं देवं सर्वदेवात्मकं प्रभुम्।
देवसेनापतिं शान्तं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्।
भक्तप्रियं भक्तिगम्यं भक्तानामार्तिभञ्जनम्।
भवानीप्रियपुत्रं च महाभयनिवारकम्।
शङ्करं सर्वलोकानां शङ्करात्मानमव्ययम्।
सर्वसम्पत्प्रदं वीरं सर्वलोकैकपूजितम्।
एवं ध्यात्वा महासेनं कवचं वज्रपञ्जरम्।
पठेन्नित्यं प्रयत्नेन त्रिकालं शुद्धिसंयुतः।
सत्यज्ञानप्रदं दिव्यं सर्वमङ्गलदायकम्।
अस्य श्रीसुब्रह्मण्यकवचस्तोत्रमहामन्त्रस्य परब्रह्म-ऋषिः।
देवी गायत्री छन्दः। प्रसन्नज्ञानसुब्रह्मण्यो देवता। ॐ बीजम्।
श्रीं शक्तिः। सौं कीलकम्। प्रसन्नज्ञानसुब्रह्मण्यप्रसादसिद्ध्यर्थे
जपे विनियोगः।
श्रीसुब्रह्मण्याय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
शक्तिधराय तर्जनीभ्यां नमः।
षण्मुखाय मध्यमाभ्यां नमः।
षट्त्रिंशत्कोणसंस्थिताय अनामिकाभ्यां नमः।
सर्वतोमुखाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
तारकान्तकाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
एवं हृदयादिन्यासः। भूर्भुवस्सुवरोम् इति दिग्बन्धः।
ध्यानम् -
षड्वक्त्रं शिखिवाहनं त्रियनं चित्राम्बरालङ्कृतं
शक्तिं वज्रमयीं त्रिशूलमभयं खेटं धनुश्चक्रकम्।
पाशं कुक्कुटमङ्कुशं च वरदं दोर्भिर्दधानं सदा
ध्यायामीप्सितसिद्धये शिवसुतं स्कन्दं सुराराधितम्।
द्विषड्भुजं षण्मुखमम्बिकासुतं
कुमारमादित्यसमानतेजसम्।
वन्दे मयूरासनमग्निसम्भवं
सेनान्यमद्याहमभीष्टसिद्धये।
गाङ्गेयं वह्निगर्भं शरवणजनितं ज्ञानशक्तिं कुमारं
ब्रह्मेशानामरेड्यं गुहमचलसुतं रुद्रतेजः स्वरूपम्।
सोनान्यं तारकघ्नं सकलभयहरं कार्तिकेयं षडास्यं
सुब्रह्मण्यं मयूरध्वजरथसहितं देवदेवं नमामि।
कनककुण्डलमण्डितषण्मुखं वनजराजिविराजितलोचनम्।
निशितशस्त्रशरासनधारिणं शरवणोद्भवमीशसुतं भजे।
अथ कवचम्।
सुब्रह्मण्यः शिरः पातु शिखां पातु शिवात्मजः।
शिवः पातु ललाटं मे भ्रूमध्यं क्रौञ्चदारणः।
भुवौ पातु कुमारो मे नेत्रे पातु त्रिनेत्रकः।
पायाद्गौरीसुतः श्रोत्रे गण्डयुग्मं हरात्मजः।
दक्षनासापुटद्वारं प्राणरूपी महेश्वरः।
सर्वदेवात्मकः पातु जिह्वां सारस्वतप्रदः।
दन्तान् रक्षतु देवेशः तालुयुग्मं शिवात्मजः।
देवसेनापतिः पातु चुबुकं चाद्रिजासुतः।
पार्वतीनन्दनः पातु द्वावोष्ठौ मम सर्वदा।
षण्मुखो मे मुखं पातु सर्वदेवशिखामणिः।
सिंहगर्वापहन्ता मे ग्रीवां पातु सनातनः।
तारकासुरसंहन्ता कण्ठं दुष्टान्तकोऽवतु।
सुभुजो मे भुजौ पातु स्कन्धमग्निसुतो मम।
सन्धियुग्मं गुहः पातु करौ मे पातु पावनः।
कराङ्गुलीः श्रीकरोऽव्यात् सुररक्षणदीक्षितः।
वक्षःस्थलं महासेनः तारकासुरसूदनः।
कुक्षिं पातु सदा देवः सुब्रह्मण्यः सुरेश्वरः।
उदरं पातु रक्षोहा नाभिं मे विश्वपालकः।
लोकेशः पातु पृष्ठं मे कटिं पातु धराधरः।
गुह्यं जितेन्द्रियः पातु शिश्नं पातु प्रजापतिः।
अण्डद्वयं महादेव ऊरुयुग्मं सदा मम।
सर्वभूतेश्वरः पातु जानुयुग्ममघापहः।
जङ्घे मे विश्वभुक्पातु गुल्फौ पातु सनातनः।
वल्लीश्वरः पातु मम मणिबन्धौ महाबलः।
पातु वल्लीपतिः पादौ पादपृष्ठं महाप्रभुः।
पादाङ्गुलीः श्रीकरो मे इन्द्रियाणि सुरेश्वरः।
त्वचं महीपतिः पातु रोमकूपांस्तु शाङ्करिः।
षाण्मातुरः सदा पातु सर्वदा च हरप्रियः।
कार्तिकेयस्तु शुक्लं मे रक्तं शरवणोद्भवः।
वाचं वागीश्वरः पातु नादं मेऽव्यात्कुमारकः।
पूर्वस्यां दिशि सेनानीर्मां पातु जगदीश्वरः।
आग्नेय्यामग्निदेवश्च क्रतुरूपी परात्परः।
दक्षिणस्यामुग्ररूपः सर्वपापविनाशनः।
खड्गधारी च नैरृत्यां सर्वरक्षोनियामकः।
पश्चिमास्यां दिशि सदा जलाधारो जितेन्द्रियः।
वायव्यां प्राणरूपोऽव्यान्महासेनो महाबलः।
उत्तरस्यां दिशि सदा निधिकर्ता स पातु माम्।
शम्भुपुत्रः सदा पातु दिश्यैशान्यां महाद्युतिः।
ऊर्ध्वं ब्रह्मपतिः पातु चतुर्मुखनिषेवितः।
अधस्तात्पातु विश्वात्मा सदा ब्रह्माण्डभृत्परः।
मध्यं पातु महासेनः शूरसंहारकृत्सदा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं स्कन्दः पातु सदा मम।
गङ्गातीरनिवासी मामादियामे सदाऽवतु।
मध्ययामे सुरश्रेष्ठस्तृतीये पातु शाम्भवः।
दिनान्ते लोकनाथो मां पुर्वरात्र्यां पुरारिजः।
अर्धरात्रे महायोगी निशान्ते कालरूपधृत्।
मृत्युञ्जयः सर्वकालमन्तस्तु शिखिवाहनः।
बहिः स्थितं शक्तिधरः पातु मां योगिपूजितः।
सर्वत्र मां सदा पातु योगविद्यो निरञ्जनः।
पातु मां पञ्चभूतेभ्यः पञ्चभूतात्मकस्तदा।
तिष्ठन्तमग्निभूः पातु गच्छन्तं शूरसूदनः।
विशाखोऽव्याच्छयानं मां निषण्णं तु सुरेश्वरः।
मार्गे मे नीलकण्ठश्च शैलदुर्गेषु नायकः।
अरण्यदेशे दुर्गे चाभयं दद्याद्भयापहः।
भार्यां पुत्रप्रदः पातु पुत्रान् रक्षेत् हरात्मजः।
पशून् रक्षेन्महातेजा धनं धनपतिर्मम।
राजराजार्चितः पातु ह्रस्वदेहं महाबलः।
जीवनं पातु सर्वेशो महामणिविभूषणः।
सूर्योदये तु मां सर्वो ह्यश्विन्याद्याश्च तारकाः।
मेषाद्या राशयश्चैव प्रभवाद्याश्च वत्सराः।
अयने द्वे षडृतवो मासाश्चैत्रमुखास्तथा।
शुक्लकृष्णौ तथा पक्षौ तिथयः प्रतिपन्मुखाः।
अहोरात्रे च यामादि मुहूर्ता घटिकास्तथा।
कलाः काष्ठादयश्चैव ये चान्ये कालभेदकाः।
ते सर्वे गुणसम्पन्नाः सन्तु सौम्यास्तदाज्ञया।
ये पक्षिणो महाक्रूराः उरगाः क्रूरदृष्टयः।
उलूकाः काकसङ्घाश्च श्येनाः कङ्कादिसंज्ञकाः।
शुकाश्च सारिकाश्चैव गृध्राः कङ्का भयानकाः।
ते सर्वे स्कन्ददेवस्य खड्गजालेन खण्डिताः।
शतशो विलयं यान्तु भिन्नपक्षा भयातुराः।
ये द्रव्यहारिणश्चैव ये च हिंसापरा द्विषः।
ये प्रत्यूहकरा मर्त्या दुष्टमर्त्या दुराशयाः।
दुष्टा भूपालसन्दोहाः ये भूभारकराः सदा।
कायविघ्नकरा ये च ये खला दुष्टबुद्धयः।
ये च मायाविनः क्रूराः सर्वद्रव्यापहारिणः।
ये चापि दुष्टकर्माणो म्लेच्छाश्च यवनादयः।
नित्यं क्षुद्रकरा ये च ह्यस्मद्बाधाकराः परे।
दानवा ये महादैत्याः पिशाचा ये महाबलाः।
शाकिनीडाकिनीभेदाः वेताला ब्रह्मराक्षसाः।
कूष्माण्डभैरवाद्या ये कामिनी मोहिनी तथा।
अपस्मारग्रहा ये च रक्तमांसभुजो हि ये।
गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा ये च देवस्य योनयः।
ये च प्रेताः क्षेत्रपालाः ये विनायकसंज्ञकाः।
महामेषा महाव्याघ्रा महातुरगसंज्ञकाः।
महागोवृषसिंहाद्याः सैन्धवा ये महागजाः।
वानराः शुनका ये च वराहा वनचारिणः।
वृकोष्ट्रखरमार्जाराः ये चातिक्षुद्रजन्तवः।
अगाधभूता भूताङ्गग्रहग्राह्यप्रदायकाः।
ज्वालामालाश्च तडितो दुरात्मानोऽतिदुःखदाः।
नानारोगकरा ये च क्षुद्रविद्या महाबलाः।
मन्त्रयन्त्रसमुद्भूताः तन्त्रकल्पितविग्रहाः।
ये स्फोटका महारोगाः वातिकाः पैत्तिकाश्च ये।
सन्निपातश्लेष्मकाश्च महादुःखकरास्तथा।
माहेश्वरा वैष्णवाश्च वैरिञ्चाश्च महाज्वराः।
चातुर्थिकाः पाक्षिकाश्च मासषाण्मासिकाश्च ये।
सांवत्सरा दुर्निवार्या ज्वराः परमदारुणाः।
सृष्टका ये महोत्पाता ये जाग्रत्स्वप्नदूषकाः।
ये ग्रहाः क्रूरकर्तारो ये वा बालग्रहादयः।
महाशिनो मांसभुजो मनोबुद्धीन्द्रियापहाः।
स्फोटकाश्च महाघोराः चर्ममांसादिसम्भवाः।
दिवाचोरा रात्रिचोरा ये सन्ध्यासु च दारुणाः।
जलजाः स्थलजाश्चैव स्थावरा जङ्गमाश्च ये।
विषप्रदाः कृत्रिमाश्च मन्त्रतन्त्रक्रियाकराः।
मारणोच्चाटनोन्मूलद्वेषमोहनकारिणः।
गरुडाद्याः पक्षिजाता उद्भिदश्चाण्डजाश्च ये।
कूटयुद्धकरा ये च स्वामिद्रोहकराश्च ये।
क्षेत्रग्रामहरा ये च बन्धनोपद्रवप्रदाः।
मन्त्रा ये विविधाकाराः ये च पीडाकरास्तथा।
यो चोक्ता ये ह्यनुक्ताश्च भूपातालान्तरिक्षगाः।
ते सर्वे शिवपुत्रस्य कवचोत्तारणादिह।
सहस्रधा लयं यान्तु दूरादेव तिरोहिताः।
फलश्रुतिः।
इत्येतत्कवचं दिव्यं षण्मुखस्य महात्मनः।
सर्वसम्पत्प्रदं नृणां सर्वकायार्थसाधनम्।
सर्ववश्यकरं पुण्यं पुत्रपौत्रप्रदायकम्।
रहस्यातिरहस्यं च गुह्याद्गुह्यतरं महत्।
सर्वेदेवप्रियकरं सर्वानन्दप्रदायकम्।
अष्टैश्वर्यप्रदं नित्यं सर्वरोगनिवारणम्।
अनेन सदृशं वर्म नास्ति ब्रह्माण्डगोलके।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं शृणु पुत्र महामुने।
एकवारं जपन्नित्यं मुनितुल्यो भविष्यति।
त्रिवारं यः पठेन्नित्यं गुरुध्यानपरायणः।
स एव षण्मुखः सत्यं सर्वदेवात्मको भवेत्।
पठतां यो भेदकृत्स्यात् पापकृत्स भवेद्ध्रुवम्।
कोटिसङ्ख्यानि वर्माणि नानेन सदृशानि हि।
कल्पवृक्षसमं चेदं चिन्तामणिसमं मुने।
सकृत्पठनमात्रेण महापापैः प्रमुच्यते।
सप्तवारं पठेद्यस्तु रात्रौ पश्चिमदिङ्मुखः।
मण्डलान्निगडग्रस्तो मुच्यते न विचारणा।
विद्वेषी च भवेद्वश्यः पठनादस्य वै मुने।
कृत्रिमाणि च सर्वाणि नश्यन्ति पठनाद्ध्रुवम्।
यं यं च याचते कामं तं तमाप्नोति पूरुषः।
नित्यं त्रिवारं पठनात्खण्डयेच्छत्रुमण्डलम्।
दशवारं जपन्नित्यं त्रिकालज्ञो भवेन्नरः।
इन्द्रस्येन्द्रत्वमेतेन ब्रह्मणो ब्रह्मताऽभवत्।
चक्रवर्तित्वमेतेन सर्वेषां चैव भूभृताम्।
वज्रसारतमं चैतत्कवचं शिवभाषितम्।
पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापहरं परम्।
गुरुपूजापरो नित्यं कवचं यः पठेदिदम्।
मातुः स्तन्यं पुनः सोऽपि न पिबेन्मुनिसत्तम।
कुमारकवचं चेदं यः पठेत्स्वामिसन्निधौ।
सकृत्पठनमात्रेण स्कन्दसायुज्यमाप्नुयात्।
सेनानीरग्निभूः स्कन्दस्तारकारिर्गुणप्रियः।
षाण्मातुरो बाहुलेयः कृत्तिकाप्रियपुत्रकः।
मयूरवाहनः श्रीमान् कुमारः क्रौञ्चदारणः।
विशाखः पार्वतीपुत्रः सुब्रह्मण्यो गुहस्तथा।
षोडशैतानि नामानि शृणुयात् श्रावयेत्सदा।
तस्य भक्तिश्च मुक्तिश्च करस्थैव न संशयः।
गोमूत्रेण तु पक्त्वान्नं भुक्त्वा षण्मासतो मुने।
सहस्रं मूलमन्त्रं च जप्त्वा नियमतन्त्रितः।
सप्तविंशतिवारं तु नित्यं यः प्रपठेदिदम्।
वायुवेगमनोवेगौ लभते नात्र संशयः।
य एवं वर्षपर्यन्तं पूजयेद्भक्तिसंयुतः।
ब्रह्मलोकं च वैकुण्ठं कैलासं समवाप्स्यति।
तस्मादनेन सदृशं कवचं भुवि दुर्लभम्।
यस्य कस्य न वक्तव्यं सर्वथा मुनिसत्तम।
पठन्नित्यं च पूतात्मा सर्वसिद्धिमवाप्स्यति।
सुब्रह्मण्यस्य सायुज्यं सत्यं च लभते ध्रुवम्।