सुब्रह्मण्य भुजंग स्तोत्र

1.

सदा बालरूपाऽपि विघ्नाद्रिहन्त्री

महादन्तिवक्त्राऽपि पञ्चास्यमान्या।

विधीन्द्रादिमृग्या गणेशाभिधा मे

विधत्तां श्रियं काऽपि कल्याणमूर्तिः।।

अर्थ: जो सदा बालरूप होने पर भी विघ्नों के पर्वत को नष्ट करने वाले हैं, हाथी के मुख वाले होने पर भी पञ्चमुख (भगवान शिव) द्वारा सम्मानित हैं, तथा ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता जिन्हें खोजते रहते हैं, वे अनिर्वचनीय कल्याणमूर्ति श्री गणेश मुझे संपत्ति और ऐश्वर्य प्रदान करें।

 

2.

न जानामि शब्दं न जानामि चार्थं

न जानामि पद्यं न जानामि गद्यम्।

चिदेका षडास्या हृदि द्योतते मे

मुखान्निःसरन्ते गिरश्चापि चित्रम्।।

अर्थ: मैं न शब्द जानता हूँ, न अर्थ जानता हूँ, न पद्य (कविता) जानता हूँ और न गद्य। मेरे हृदय में केवल एक षड्मुख (छह मुखों वाली) चैतन्य ज्योति प्रकाशित हो रही है, जिससे आश्चर्यजनक रूप से मेरे मुख से स्वयं ही ये काव्यमयी वाणियाँ निकल रही हैं।

 

3.

मयूराधिरूढं महावाक्यगूढं

मनोहारिदेहं महच्चित्तगेहम्।

महीदेवदेवं महावेदभावं

महादेवबालं भजे लोकपालम्।।

अर्थ: जो मयूर (मोर) पर सवार हैं, जो वेदों के महावाक्यों के गूढ़ अर्थ हैं, जिनका शरीर मनमोहक है, जो पवित्र अंतःकरण (महान चित्त) में निवास करते हैं, जो देवताओं के भी देवता हैं, जो महान वेदों के सार हैं और जो महादेव के पुत्र हैं, उन लोकों के रक्षक (कार्तिकेय) को मैं भजता हूँ।

 

4.

यदा सन्निधानं गता मानवा मे

भवाम्भोधिपारं गतास्ते तदैव।

इति व्यञ्जयन् सिन्धुतीरे य आस्ते

तमीडे पवित्रं पराशक्तिपुत्रम्।।

अर्थ: "जो मनुष्य मेरे समीप आते हैं, वे उसी क्षण भवसागर (संसार रूपी समुद्र) को पार कर लेते हैं।" मानो ऐसा संदेश देते हुए जो समुद्र के किनारे (तिरुचेन्दूर में) विराजमान हैं, उन पराशक्ति के पवित्र पुत्र (स्कन्द) की मैं स्तुति करता हूँ।

 

5.

यथाब्धेस्तरङ्गा लयं यान्ति तुङ्गा-

स्तथैवापदः सन्निधौ सेवतां मे।

इतीवोर्मिपङ्क्तीर्नृणां दर्शयन्तं

सदा भावये हृत्सरोजे गुहं तम्।।

अर्थ: "जैसे समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरें उसी समुद्र में लीन हो जाती हैं, वैसे ही मेरे समीप मेरी सेवा करने वालों की सारी विपत्तियाँ लीन (नष्ट) हो जाती हैं।" मानो मनुष्यों को समुद्र की लहरों की पंक्ति दिखाकर यह समझाते हुए विराजमान, उन भगवान गुह का मैं सदा अपने हृदय रूपी कमल में ध्यान करता हूँ।

 

6.

गिरौ मन्निवासे नरा येऽधिरूढा-

स्तदा पर्वते राजते तेऽधिरूढाः।

इतीव ब्रुवन्गन्धशैलाधिरूढः

स देवो मुदे मे सदा षण्मुखोऽस्तु।।

अर्थ: "जो मनुष्य मेरे निवास स्थान इस पर्वत पर चढ़ते हैं, वे मानो साक्षात् शिव के कैलाश (रजत) पर्वत पर ही चढ़ जाते हैं।" मानो ऐसा कहते हुए जो गन्धमादन पर्वत पर विराजमान हैं, वे भगवान षन्मुख सदा मेरे आनंद का कारण बनें।

 

7.

महाम्भोधितीरे महापापचोरे

मुनीन्द्रानुकूले सुगन्धाख्यशैले।

गुहायां वसन्तं स्वभासा लसन्तं

जनार्तिं हरन्तं श्रयामो गुहं तम्।।

अर्थ: जो विशाल समुद्र के तट पर, बड़े-बड़े पापों को हरने वाले, मुनियों के अनुकूल सुगन्ध (गन्धमादन) नामक पर्वत की गुफा में निवास करते हैं, जो अपनी ही कांति से सुशोभित हैं और भक्तों के दुखों का नाश करते हैं, उन भगवान गुह की हम शरण लेते हैं।

 

8.

लसत्स्वर्णगेहे नृणां कामदोहे

सुमस्तोमसञ्छन्नमाणिक्यमञ्चे।

समुद्यत्सहस्रार्कतुल्यप्रकाशं

सदा भावये कार्तिकेयं सुरेशम्।।

अर्थ: जो मनुष्यों की सभी कामनाएं पूर्ण करने वाले हैं, जो चमकते हुए स्वर्ण भवन में, पुष्पों से ढके हुए माणिक्य (रत्न) जड़ित पलंग पर विराजमान हैं, और जिनका प्रकाश उदित होते हुए सहस्रों सूर्यों के समान है, उन देवदेवेश्वर कार्तिकेय का मैं सदा ध्यान करता हूँ।

 

9.

रणद्धंसके मञ्जुलेऽत्यन्तशोणे

मनोहारिलावण्यपीयूषपूर्णे।

मनःषट्पदो मे भवक्लेशतप्तः

सदा मोदतां स्कन्द ते पादपद्मे।।

अर्थ: हे स्कन्द! आपके चरण कमल, जिनमें बजते हुए नूपुर (पायल) हैं, जो अत्यंत सुंदर और लाल वर्ण के हैं, तथा जो मनोहर लावण्य रूपी अमृत से परिपूर्ण हैं; संसार के दुखों से संतप्त मेरा मन रूपी भौंरा सदा आपके उन चरण-कमलों में ही आनंद प्राप्त करे।

 

10.

सुवर्णाभदिव्याम्बरैर्भासमानां

क्वणत्किङ्किणीमेखलाशोभमानाम्।

लसद्धेमपट्टेन विद्योतमानां

कटिं भावये स्कन्द ते दीप्यमानाम्।।

अर्थ: हे स्कन्द! जो स्वर्ण के समान आभा वाले दिव्य वस्त्रों से सुशोभित है, जिस पर बजती हुई किंकिणियों (घंटियों) वाली करधनी शोभायमान है, और जो चमकते हुए स्वर्ण पट्ट (सोने की पेटी) से प्रकाशमान है, मैं आपकी उस दीप्तिमान कटि (कमर) का ध्यान करता हूँ।

 

11.

पुलिन्देशकन्याघनाभोगतुङ्ग-

स्तनालिङ्गनासक्तकाश्मीररागम्।

नमस्यामहं तारकारे तवोरः

स्वभक्तावने सर्वदा सानुरागम्।।

अर्थ: हे तारकासुर के शत्रु! भीलराज की कन्या (श्री वल्ली) के पूर्ण वक्षस्थल के आलिंगन से जिस पर कुमकुम (केसर) का अनुराग लगा हुआ है, और जो अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा प्रेम से भरा रहता है, मैं आपके उस वक्षस्थल को प्रणाम करता हूँ।

 

12.

विधौ कॢप्तदण्डान् स्वलीलाधृताण्डा-

न्निरस्तेभशुण्डान् द्विषत्कालदण्डान्।

हतेन्द्रारिषण्डाञ्जगत्राणशौण्डान्

सदा ते प्रचण्डान् श्रये बाहुदण्डान्।।

अर्थ: जिन्होंने विधाता (ब्रह्मा जी) को दंडित किया, जो अपनी लीला से ही ब्रह्मांडों को धारण किए हुए हैं, जो ऐरावत हाथी की सूंड को नीचा दिखाने वाले हैं, जो शत्रुओं के लिए साक्षात् यमराज का दंड हैं, जो राक्षसों के समूह का नाश करने वाले हैं और जो जगत की रक्षा करने में अत्यंत निपुण हैं, मैं सदा आपकी उन प्रचंड भुजाओं की शरण लेता हूँ।

 

13.

सदा शारदाः षण्मृगाङ्का यदि स्युः

समुद्यन्त एव स्थिताश्चेत्समन्तात्।

सदा पूर्णबिम्बाः कलङ्कैश्च हीना-

स्तदा त्वन्मुखानां ब्रुवे स्कन्द साम्यम्।।

अर्थ: हे स्कन्द! यदि शरत्काल के छह पूर्ण चंद्रमा, बिना किसी कलंक (दाग) के, सभी दिशाओं में एक साथ उदित होकर सदा के लिए आकाश में स्थित हो जाएँ, केवल तभी मैं कह सकता हूँ कि वे चंद्रमा आपके छह मुखों की समानता कर सकते हैं।

 

14.

स्फुरन्मन्दहासैः सहंसानि चञ्च-

त्कटाक्षावलीभृङ्गसङ्घोज्ज्वलानि।

सुधास्यन्दिबिम्बाधराणीशसूनो

तवालोकये षण्मुखाम्भोरुहाणि।।

अर्थ: हे ईश्वर (शिव) के पुत्र! जिन मुखों पर मंद मुसकान रूपी श्वेत हंस विराजमान हैं, जो चंचल कटाक्ष (तिरछी नज़रों) रूपी भ्रमरों की पंक्ति से उज्ज्वल हैं, और जिनके बिंब फल जैसे लाल होंठों से अमृत टपकता है, मैं आपके उन छह मुख रूपी कमलों का दर्शन करता हूँ।

 

15.

विशालेषु कर्णान्तदीर्घेष्वजस्रं

दयास्यन्दिषु द्वादशस्वीक्षणेषु।

मयीषत्कटाक्षः सकृत्पातितश्चे-

द्भवेत्ते दयाशील का नाम हानिः।।

अर्थ: हे दयाशील! कानों तक फैले हुए, अत्यंत विशाल और निरंतर दया बरसाने वाले आपके बारह नेत्रों में से यदि एक की भी थोड़ी सी कृपादृष्टि मुझ पर एक बार पड़ जाए, तो भला आपकी क्या हानि होगी? 

 

16.

सुताङ्गोद्भवो मेऽसि जीवेति षड्धा

जपन्मन्त्रमीशो मुदा जिघ्रते यान्।

जगद्भारभृद्भ्यो जगन्नाथ तेभ्यः

किरीटोज्ज्वलेभ्यो नमो मस्तकेभ्यः।।

अर्थ: "हे पुत्र! तुम मेरे अंग से उत्पन्न हुए हो, चिरंजीवी हो" - ऐसा मंत्र छह बार जपते हुए भगवान शिव प्रसन्नतापूर्वक जिन मस्तिष्कों को सूंघते हैं, और जो संपूर्ण जगत का भार धारण किए हुए हैं, हे जगन्नाथ! मुकुटों से जगमगाते हुए आपके उन छह मस्तिष्कों को मैं प्रणाम करता हूँ।

 

17.

स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिराम-

श्चलत्कुण्डलश्रीलसद्गण्डभागः।

कटौ पीतवासाः करे चारुशक्तिः

पुरस्तान्ममास्तां पुरारेस्तनूजः।।

अर्थ: जो चमकते हुए रत्नों के बाजूबंद और हारों से मनोहर लग रहे हैं, जिनके गालों पर हिलते हुए कुंडलों की शोभा जगमगा रही है, जिनकी कमर पर पीताम्बर है और हाथ में सुंदर 'शक्ति' (भाला) है, वे त्रिपुरारी शिव के पुत्र मेरे सम्मुख उपस्थित हों।

 

18.

इहायाहि वत्सेति हस्तान्प्रसार्या-

ह्वयत्यादराच्छङ्करे मातुरङ्कात्।

समुत्पत्य तातं श्रयन्तं कुमारं

हराश्लिष्टगात्रं भजे बालमूर्तिम्।।

अर्थ: "हे वत्स! यहाँ आओ," ऐसा कहकर भगवान शंकर जब अपने हाथ फैलाकर माता (पार्वती) की गोद से प्रेमपूर्वक बुलाते हैं, तब उछलकर पिता के पास जाने वाले और भगवान शिव द्वारा आलिंगन किए गए उन बालस्वरूप स्कन्द का मैं भजन करता हूँ।

 

19.

कुमारेशसूनो गुह स्कन्द सेना-

पते शक्तिपाणे मयूराधिरूढ।

पुलिन्दात्मजाकान्त भक्तार्तिहारिन्

प्रभो तारकारे सदा रक्ष मां त्वम्।।

अर्थ: हे कुमार! हे शिवपुत्र! हे गुह! हे स्कन्द! हे देव-सेनापति! हे शक्ति धारण करने वाले! हे मयूर वाहन! हे भीलराज-पुत्री वल्ली के स्वामी! हे भक्तों के दुख हरने वाले! हे प्रभो! हे तारकासुर के शत्रु! आप सदा मेरी रक्षा करें।

 

20.

प्रशान्तेन्द्रिये नष्टसंज्ञे विचेष्टे

कफोद्गारिवक्त्रे भयोत्कम्पिगात्रे।

प्रयाणोन्मुखे मय्यनाथे तदानीं

द्रुतं मे दयालो भवाग्रे गुह त्वम्।।

अर्थ: हे दयालु गुह! जब मेरी इन्द्रियाँ शांत हो जाएँ, चेतना लुप्त हो जाए, शरीर सुन्न हो जाए, मुख से कफ निकलने लगे, भय से शरीर कांपने लगे, और मैं इस संसार से विदा होने वाला अनाथ हो जाऊँ, तब उस अंतिम समय में आप शीघ्र मेरे सामने आकर खड़े हो जाना।

 

21.

कृतान्तस्य दूतेषु चण्डेषु कोपा-

द्दहच्छिन्द्धि भिन्द्धीति मां तर्जयत्सु।

मयूरं समारुह्य मा भैरिति त्वं

पुरः शक्तिपाणिर्ममायाहि शीघ्रम्।।

अर्थ: जब यमराज के भयंकर दूत क्रोध से भरकर मुझे "इसे जलाओ, काटो, चीर डालो" कहकर डरा रहे हों, तब आप अपने मयूर पर सवार होकर, हाथ में शक्ति (भाला) लिए, "डरो मत" कहते हुए शीघ्र मेरे सामने आ जाना।

 

22.

प्रणम्यासकृत्पादयोस्ते पतित्वा

प्रसाद्य प्रभो प्रार्थयेऽनेकवारम्।

न वक्तुं क्षमोऽहं तदानीं कृपाब्धे

न कार्यान्तकाले मनागप्युपेक्षा।।

अर्थ: हे प्रभो! मैं आपके चरणों में बार-बार गिरकर और प्रणाम करके आपको प्रसन्न करते हुए अनेक बार यह प्रार्थना करता हूँ कि हे कृपासिंधु! उस अंतिम समय में मैं कुछ भी बोलने में समर्थ नहीं रहूँगा, इसलिए मेरे अंतकाल में मेरी तनिक भी उपेक्षा (अनदेखी) मत करना।

 

23.

सहस्राण्डभोक्ता त्वया शूरनामा

हतस्तारकः सिंहवक्त्रश्च दैत्यः।

ममान्तर्हृदिस्थं मनःक्लेशमेकं

न हंसि प्रभो किं करोमि क्व यामि।।

अर्थ: हे प्रभो! आपने सहस्रों ब्रह्मांडों को भोगने वाले 'शूरपद्म' नामक दैत्य, तारकासुर और सिंहमुख वाले भयंकर राक्षस का भी वध कर दिया। फिर आप मेरे अंतर्मन में बैठे हुए केवल एक 'मानसिक क्लेश' (अज्ञान/दुख) को नष्ट क्यों नहीं करते? मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ?

 

24.

अहं सर्वदा दुःखभारावसन्नो

भवान् दीनबन्धुस्त्वदन्यं न याचे।

भवद्भक्तिरोधं सदा कॢप्तबाधं

ममाधिं द्रुतं नाशयोमासुत त्वम्।।

अर्थ: मैं सदा दुखों के भार से दबा रहता हूँ और आप दीनों के बंधु हैं। इसलिए मैं आपके अतिरिक्त किसी और से याचना नहीं करता। हे उमापुत्र! मेरी भक्ति में रुकावट डालने वाले और सदा पीड़ा देने वाले मेरे मानसिक दुखों को आप शीघ्र नष्ट करें।

 

25.

अपस्मारकुष्ठक्षयार्शः प्रमेह-

ज्वरोन्मादगुल्मादिरोगा महान्तः।

पिशाचाश्च सर्वे भवत्पत्रभूतिं

विलोक्य क्षणात्तारकारे द्रवन्ते।।

अर्थ: हे तारकासुर के शत्रु! अपस्मार (मिर्गी), कुष्ठ (कोढ़), क्षय (टीबी), बवासीर, प्रमेह, ज्वर, उन्माद (पागलपन), गुल्म आदि बड़े-बड़े भयंकर रोग तथा सभी पिशाच - आपके पत्तों में दी गई भस्म (विभूति) को देखकर ही क्षण भर में भाग जाते हैं।

 

26.

दृशि स्कन्दमूर्तिः श्रुतौ स्कन्दकीर्ति-

र्मुखे मे पवित्रं सदा तच्चरित्रम्।

करे तस्य कृत्यं वपुस्तस्य भृत्यं

गुहे सन्तु लीना ममाशेषभावाः।।

अर्थ: मेरी आँखों में सदा स्कन्द की मूर्ति बसी रहे, मेरे कानों में स्कन्द की कीर्ति गूंजे, मेरे मुख में सदा उनका पवित्र चरित्र रहे। मेरे हाथ उनके कार्य (सेवा) में लगे रहें, मेरा शरीर उनका दास बना रहे, और मेरे सभी भाव भगवान गुह में ही लीन रहें।

 

27.

मुनीनामुताहो नृणां भक्तिभाजा-

मभीष्टप्रदाः सन्ति सर्वत्र देवाः।

नृणामन्त्यजानामपि स्वार्थदाने

गुहाद्देवमन्यं न जाने न जाने।।

अर्थ: मुनियों या भक्ति करने वाले मनुष्यों की इच्छा पूरी करने वाले देवता तो सर्वत्र मिल जाते हैं, परंतु मुझ जैसे अत्यंत अधम (निचले स्तर के) मनुष्यों को भी उनका मनचाहा फल देने वाले, भगवान गुह के अतिरिक्त किसी अन्य देवता को मैं नहीं जानता, मैं नहीं जानता।

 

28.

कलत्रं सुता बन्धुवर्गः पशुर्वा

नरो वाऽथ नारी गृहे ये मदीयाः।

यजन्तो नमन्तः स्तुवन्तो भवन्तं

स्मरन्तश्च ते सन्तु सर्वे कुमार।।

अर्थ: हे कुमार! मेरी पत्नी, पुत्र, बंधु-बांधव, पशु, तथा मेरे घर में जो भी स्त्री-पुरुष हैं, वे सभी सदा आपकी ही पूजा करने वाले, आपको प्रणाम करने वाले, आपकी स्तुति करने वाले और आपका ही स्मरण करने वाले बनें।

 

29.

मृगाः पक्षिणो दंशका ये च दुष्टा-

स्तथा व्याधयो बाधका ये मदङ्गे।

भवच्छक्तितीक्ष्णाग्रभिन्नाः सुदूरे

विनश्यन्तु ते चूर्णितक्रौञ्जशैल।।

अर्थ: हे क्रौंच पर्वत को चूर-चूर करने वाले! जो दुष्ट जंगली जानवर, पक्षी, या डसने वाले जीव हैं, और जो बीमारियां मेरे शरीर को पीड़ा दे रही हैं, वे सभी आपकी 'शक्ति' (भाले) के तीखे अग्रभाग से बिंधकर बहुत दूर जाकर नष्ट हो जाएं।

 

30.

जनित्री पिता च स्वपुत्रापराधं

सहेते न किं देवसेनाधिनाथ।

अहं चातिबालो भवान् लोकतातः

क्षमस्वापराधं समस्तं महेश।।

अर्थ: हे देवसेनापति! क्या माता और पिता अपने पुत्र के अपराधों को सहन नहीं करते? (अवश्य करते हैं)। मैं अत्यंत नादान बालक हूँ और आप संपूर्ण लोकों के पिता हैं। हे महान ईश्वर! आप मेरे सभी अपराधों को क्षमा करें।

 

31.

नमः केकिने शक्तये चापि तुभ्यं

नमश्छाग तुभ्यं नमः कुक्कुटाय।

नमः सिन्धवे सिन्धुदेशाय तुभ्यं

पुनः स्कन्दमूर्ते नमस्ते नमोऽस्तु।।

अर्थ: आपके मयूर को नमस्कार है, आपकी शक्ति (भाले) को नमस्कार है, आपके वाहन बकरे को नमस्कार है, आपके ध्वज के मुर्गे को नमस्कार है। समुद्र को नमस्कार है और उस समुद्र तट वाले स्थान (तिरुचेन्दूर) को नमस्कार है। हे स्कन्दमूर्ति! आपको बारंबार नमस्कार है, नमस्कार है।

 

32.

जयानन्दभूमञ्जयापारधाम-

ञ्जयामोघकीर्ते जयानन्दमूर्ते।

जयानन्दसिन्धो जयाशेषबन्धो

जय त्वं सदा मुक्तिदानेशसूनो।।

अर्थ: हे आनंद स्वरूप! आपकी जय हो। हे अपार तेज वाले! आपकी जय हो। हे अचूक कीर्ति वाले! आपकी जय हो। हे आनंदमूर्ति! आपकी जय हो। हे आनंद के सागर! आपकी जय हो। हे सबके बंधु! आपकी जय हो। हे मुक्तिदाता शिवपुत्र! आपकी सदा जय हो।

 

33.

भुजङ्गाख्यवृत्तेन कॢप्तं स्तवं यः

पठेद्भक्तियुक्तो गुहं सम्प्रणम्य।

सुपुत्रान् कलत्रं धनं दीर्घमायु-

र्लभेत्स्कन्दसायुज्यमन्ते नरः सः।।

अर्थ: 'भुजंगप्रयात' नामक छन्द में रचे गए इस स्तोत्र का जो भी मनुष्य भगवान गुह (कार्तिकेय) को प्रणाम करके भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह उत्तम पुत्र, पत्नी, धन और दीर्घायु प्राप्त करता है, और अंत में भगवान स्कन्द के सायुज्य (उन्हीं में लीन हो जाना / मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।

सदा बालरूपाऽपि विघ्नाद्रिहन्त्री
महादन्तिवक्त्राऽपि पञ्चास्यमान्या।
विधीन्द्रादिमृग्या गणेशाभिधा मे
विधत्तां श्रियं काऽपि कल्याणमूर्तिः।
न जानामि शब्दं न जानामि चार्थं
न जानामि पद्यं न जानामि गद्यम्।
चिदेका षडास्या हृदि द्योतते मे
मुखान्निःसरन्ते गिरश्चापि चित्रम्।
मयूराधिरूढं महावाक्यगूढं
मनोहारिदेहं महच्चित्तगेहम्।
महीदेवदेवं महावेदभावं
महादेवबालं भजे लोकपालम्।
यदा सन्निधानं गता मानवा मे
भवाम्भोधिपारं गतास्ते तदैव।
इति व्यञ्जयन् सिन्धुतीरे य आस्ते
तमीडे पवित्रं पराशक्तिपुत्रम्।
यथाब्धेस्तरङ्गा लयं यान्ति तुङ्गा-
स्तथैवापदः सन्निधौ सेवतां मे।
इतीवोर्मिपङ्क्तीर्नृणां दर्शयन्तं
सदा भावये हृत्सरोजे गुहं तम्।
गिरौ मन्निवासे नरा येऽधिरूढा-
स्तदा पर्वते राजते तेऽधिरूढाः।
इतीव ब्रुवन्गन्धशैलाधिरूढः
स देवो मुदे मे सदा षण्मुखोऽस्तु।
महाम्भोधितीरे महापापचोरे
मुनीन्द्रानुकूले सुगन्धाख्यशैले।
गुहायां वसन्तं स्वभासा लसन्तं
जनार्तिं हरन्तं श्रयामो गुहं तम्।
लसत्स्वर्णगेहे नृणां कामदोहे
सुमस्तोमसञ्छन्नमाणिक्यमञ्चे।
समुद्यत्सहस्रार्कतुल्यप्रकाशं
सदा भावये कार्तिकेयं सुरेशम्।
रणद्धंसके मञ्जुलेऽत्यन्तशोणे
मनोहारिलावण्यपीयूषपूर्णे।
मनःषट्पदो मे भवक्लेशतप्तः
सदा मोदतां स्कन्द ते पादपद्मे।
सुवर्णाभदिव्याम्बरैर्भासमानां
क्वणत्किङ्किणीमेखलाशोभमानाम्।
लसद्धेमपट्टेन विद्योतमानां
कटिं भावये स्कन्द ते दीप्यमानाम्।
पुलिन्देशकन्याघनाभोगतुङ्ग-
स्तनालिङ्गनासक्तकाश्मीररागम्।
नमस्यामहं तारकारे तवोरः
स्वभक्तावने सर्वदा सानुरागम्।
विधौ कॢप्तदण्डान् स्वलीलाधृताण्डा-
न्निरस्तेभशुण्डान् द्विषत्कालदण्डान्।
हतेन्द्रारिषण्डाञ्जगत्राणशौण्डान्
सदा ते प्रचण्डान् श्रये बाहुदण्डान्।
सदा शारदाः षण्मृगाङ्का यदि स्युः
समुद्यन्त एव स्थिताश्चेत्समन्तात्।
सदा पूर्णबिम्बाः कलङ्कैश्च हीना-
स्तदा त्वन्मुखानां ब्रुवे स्कन्द साम्यम्।
स्फुरन्मन्दहासैः सहंसानि चञ्च-
त्कटाक्षावलीभृङ्गसङ्घोज्ज्वलानि।
सुधास्यन्दिबिम्बाधराणीशसूनो
तवालोकये षण्मुखाम्भोरुहाणि।
विशालेषु कर्णान्तदीर्घेष्वजस्रं
दयास्यन्दिषु द्वादशस्वीक्षणेषु।
मयीषत्कटाक्षः सकृत्पातितश्चे-
द्भवेत्ते दयाशील का नाम हानिः।
सुताङ्गोद्भवो मेऽसि जीवेति षड्धा
जपन्मन्त्रमीशो मुदा जिघ्रते यान्।
जगद्भारभृद्भ्यो जगन्नाथ तेभ्यः
किरीटोज्ज्वलेभ्यो नमो मस्तकेभ्यः।
स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिराम-
श्चलत्कुण्डलश्रीलसद्गण्डभागः।
कटौ पीतवासाः करे चारुशक्तिः
पुरस्तान्ममास्तां पुरारेस्तनूजः।
इहायाहि वत्सेति हस्तान्प्रसार्या-
ह्वयत्यादराच्छङ्करे मातुरङ्कात्।
समुत्पत्य तातं श्रयन्तं कुमारं
हराश्लिष्टगात्रं भजे बालमूर्तिम्।
कुमारेशसूनो गुह स्कन्द सेना-
पते शक्तिपाणे मयूराधिरूढ।
पुलिन्दात्मजाकान्त भक्तार्तिहारिन्
प्रभो तारकारे सदा रक्ष मां त्वम्।
प्रशान्तेन्द्रिये नष्टसंज्ञे विचेष्टे
कफोद्गारिवक्त्रे भयोत्कम्पिगात्रे।
प्रयाणोन्मुखे मय्यनाथे तदानीं
द्रुतं मे दयालो भवाग्रे गुह त्वम्।
कृतान्तस्य दूतेषु चण्डेषु कोपा-
द्दहच्छिन्द्धि भिन्द्धीति मां तर्जयत्सु।
मयूरं समारुह्य मा भैरिति त्वं
पुरः शक्तिपाणिर्ममायाहि शीघ्रम्।
प्रणम्यासकृत्पादयोस्ते पतित्वा
प्रसाद्य प्रभो प्रार्थयेऽनेकवारम्।
न वक्तुं क्षमोऽहं तदानीं कृपाब्धे
न कार्यान्तकाले मनागप्युपेक्षा।
सहस्राण्डभोक्ता त्वया शूरनामा
हतस्तारकः सिंहवक्त्रश्च दैत्यः।
ममान्तर्हृदिस्थं मनःक्लेशमेकं
न हंसि प्रभो किं करोमि क्व यामि।
अहं सर्वदा दुःखभारावसन्नो
भवान् दीनबन्धुस्त्वदन्यं न याचे।
भवद्भक्तिरोधं सदा कॢप्तबाधं
ममाधिं द्रुतं नाशयोमासुत त्वम्।
अपस्मारकुष्ठक्षयार्शः प्रमेह-
ज्वरोन्मादगुल्मादिरोगा महान्तः।
पिशाचाश्च सर्वे भवत्पत्रभूतिं
विलोक्य क्षणात्तारकारे द्रवन्ते।
दृशि स्कन्दमूर्तिः श्रुतौ स्कन्दकीर्ति-
र्मुखे मे पवित्रं सदा तच्चरित्रम्।
करे तस्य कृत्यं वपुस्तस्य भृत्यं
गुहे सन्तु लीना ममाशेषभावाः।
मुनीनामुताहो नृणां भक्तिभाजा-
मभीष्टप्रदाः सन्ति सर्वत्र देवाः।
नृणामन्त्यजानामपि स्वार्थदाने
गुहाद्देवमन्यं न जाने न जाने।
कलत्रं सुता बन्धुवर्गः पशुर्वा
नरो वाऽथ नारी गृहे ये मदीयाः।
यजन्तो नमन्तः स्तुवन्तो भवन्तं
स्मरन्तश्च ते सन्तु सर्वे कुमार।
मृगाः पक्षिणो दंशका ये च दुष्टा-
स्तथा व्याधयो बाधका ये मदङ्गे।
भवच्छक्तितीक्ष्णाग्रभिन्नाः सुदूरे
विनश्यन्तु ते चूर्णितक्रौञ्जशैल।
जनित्री पिता च स्वपुत्रापराधं
सहेते न किं देवसेनाधिनाथ।
अहं चातिबालो भवान् लोकतातः
क्षमस्वापराधं समस्तं महेश।
नमः केकिने शक्तये चापि तुभ्यं
नमश्छाग तुभ्यं नमः कुक्कुटाय।
नमः सिन्धवे सिन्धुदेशाय तुभ्यं
पुनः स्कन्दमूर्ते नमस्ते नमोऽस्तु।
जयानन्दभूमञ्जयापारधाम-
ञ्जयामोघकीर्ते जयानन्दमूर्ते।
जयानन्दसिन्धो जयाशेषबन्धो
जय त्वं सदा मुक्तिदानेशसूनो।
भुजङ्गाख्यवृत्तेन कॢप्तं स्तवं यः
पठेद्भक्तियुक्तो गुहं सम्प्रणम्य।
सुपुत्रान् कलत्रं धनं दीर्घमायु-
र्लभेत्स्कन्दसायुज्यमन्ते नरः सः।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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