
Lyrics:
शक्तिस्वरूपाय शरोद्भवाय
शक्रार्चितायाथ शचीस्तुताय।
शमाय शम्भुप्रणवार्थदाय
शकाररूपाय नमो गुहाय।।1।।
रणन्मणिप्रोज्ज्वलमेखलाय
रमासनाथप्रणवार्थदाय।
रतीशपूज्याय रविप्रभाय
रकाररूपाय नमो गुहाय।।2।।
वराय वर्णाश्रमरक्षकाय
वरत्रिशूलाभयमण्डिताय।
वलारिकन्यासुकृतालयाय
वकाररूपाय नमो गुहाय।।3।।
नगेन्द्रकन्येश्वरतत्त्वदाय
नगाधिरूढाय नगार्चिताय।
नगासुरघ्नाय नगालयाय
नकाररूपाय नमो गुहाय।।4।।
भवाय भर्गाय भवात्मजाय
भस्मायमानाद्भुतविग्रहाय।
भक्तेष्टकामप्रदकल्पकाय
भकाररूपाय नमो गुहाय।।5।।
वल्लीवलारातिसुतार्चिताय
वराङ्गरागाञ्चितविग्रहाय।
वल्लीकराम्भोरुहमर्दिताय
वकाररूपाय नमो गुहाय।।6।।
Meaning:
Verse 1
शक्तिस्वरूपाय शरोद्भवाय
शक्रार्चितायाथ शचीस्तुताय।
शमाय शम्भुप्रणवार्थदाय
शकाररूपाय नमो गुहाय।।1।।
यह श्लोक भगवान गुह, जिन्हें कार्तिकेय या सुब्रह्मण्य भी कहा जाता है, के 'श' कार स्वरूप को नमन करता है। उन्हें 'शक्तिस्वरूपाय' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे स्वयं शक्ति के मूर्त रूप हैं। वे केवल शिव-पार्वती के पुत्र ही नहीं, बल्कि उस आदिशक्ति के ही एक अंश हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का संचालन करती है। उनका जन्म ही आसुरी शक्तियों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था, इसलिए वे शक्ति के प्रतीक हैं। 'शरोद्भवाय' का अर्थ है शर अर्थात् सरकंडों के वन में उत्पन्न होने वाले। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के तीसरे नेत्र से निकली छः अग्नि चिंगारियों को गंगा ने सरकंडों के वन में स्थापित कर दिया था, जहाँ से कुमार कार्तिकेय का जन्म हुआ। यह उनके दिव्य और अलौकिक जन्म का सूचक है।
उन्हें 'शक्रार्चिताय' और 'शचीस्तुताय' भी कहा गया है, जिसका तात्पर्य है कि वे देवराज इंद्र (शक्र) द्वारा पूजित और इंद्राणी (शची) द्वारा स्तुत हैं। तारकासुर के आतंक से त्रस्त देवताओं की रक्षा के लिए ही उनका प्राकट्य हुआ था। देवताओं के सेनापति के रूप में उन्होंने असुरों का संहार किया, इसलिए इंद्र और सभी देवता उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उनकी पूजा और स्तुति करते हैं। 'शमाय' विशेषण उन्हें शांति और संयम का प्रतीक बताता है। यद्यपि वे एक महान योद्धा हैं, तथापि उनका स्वरूप परम शांत है। उनका शौर्य विनाश के लिए नहीं, अपितु शांति की स्थापना के लिए है। इस स्तोत्र का सबसे महत्वपूर्ण विशेषण 'शम्भुप्रणवार्थदाय' है, जिसका अर्थ है भगवान शम्भु (शिव) को प्रणव अर्थात 'ॐ' का अर्थ बताने वाले। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, बालक मुरुगन ने अपने पिता भगवान शिव को भी प्रणव मंत्र के गूढ़ अर्थ का उपदेश देकर उनके गुरु की भूमिका निभाई थी। यह घटना उनकी परम ज्ञानी और तत्त्वदर्शी स्वरूप को दर्शाती है। ऐसे 'श' कार स्वरूप भगवान गुह को मेरा नमन है।
Verse 2
रणन्मणिप्रोज्ज्वलमेखलाय
रमासनाथप्रणवार्थदाय।
रतीशपूज्याय रविप्रभाय
रकाररूपाय नमो गुहाय।।2।।
यह श्लोक भगवान कार्तिकेय के 'र' कार स्वरूप का वंदन करता है। प्रथम पंक्ति में 'रणन्मणिप्रोज्ज्वलमेखलाय' का उल्लेख है, जिसका अर्थ है कि वे ऐसी करधनी (मेखला) धारण करते हैं जो बजते हुए मणियों से अत्यधिक देदीप्यमान है। यह उनके राजसी और ऐश्वर्यशाली स्वरूप का वर्णन है। उनके आभूषणों की ध्वनि मात्र से नकारात्मक शक्तियाँ दूर हो जाती हैं और वातावरण में दिव्यता का संचार होता है। यह उनके अप्रतिम सौंदर्य और तेज को भी दर्शाता है, जो भक्तों के मन को आकर्षित करता है।
'रमासनाथप्रणवार्थदाय' एक अत्यंत गहन अर्थ वाला विशेषण है। इसका अर्थ है रमा के नाथ अर्थात भगवान विष्णु को प्रणव (ॐ) का अर्थ प्रदान करने वाले। यह भगवान कार्तिकेय की सर्वोच्च ज्ञान की स्थिति को प्रकट करता है, जहाँ वे न केवल अपने पिता शिव, बल्कि सृष्टि के पालक भगवान विष्णु के भी गुरु पद पर आसीन होते हैं। यह दर्शाता है कि तत्वज्ञान में वे त्रिदेवों के समकक्ष हैं। 'रतीशपूज्याय' का अर्थ है रति के पति, कामदेव द्वारा पूजित। पौराणिक संदर्भ के अनुसार, भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म कर दिए जाने के पश्चात, कार्तिकेय की कृपा से ही कामदेव को पुनर्जीवन और रति को उनका साथ प्राप्त हुआ था। इसलिए कामदेव और रति श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करते हैं। 'रविप्रभाय' कहकर उनके तेज की तुलना करोड़ों सूर्यों के प्रकाश से की गई है। उनका तेज अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। जो भक्त उनके इस तेजोमय स्वरूप का ध्यान करते हैं, उनके जीवन से सभी प्रकार के अंधकार मिट जाते हैं। ऐसे 'र' कार स्वरूप भगवान गुह को मैं प्रणाम करता हूँ।
Verse 3
वराय वर्णाश्रमरक्षकाय
वरत्रिशूलाभयमण्डिताय।
वलारिकन्यासुकृतालयाय
वकाररूपाय नमो गुहाय।।3।।
यह श्लोक भगवान गुह के 'व' कार स्वरूप को समर्पित है। उन्हें 'वराय' कहा गया है, जिसका अर्थ है सर्वश्रेष्ठ अथवा वरदान देने वाले। वे अपने भक्तों को इच्छित फल प्रदान करने वाले हैं और सभी देवों में श्रेष्ठ हैं। 'वर्णाश्रमरक्षकाय' का अर्थ है कि वे वर्णाश्रम धर्म के रक्षक हैं। वे सामाजिक और आध्यात्मिक व्यवस्था को बनाए रखते हैं तथा यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी अपने-अपने धर्म का पालन करें। यह उनके लोकपालक और धर्मसंस्थापक स्वरूप को दर्शाता है, जो समाज में संतुलन और मर्यादा बनाए रखता है।
'वरत्रिशूलाभयमण्डिताय' का अर्थ है कि वे वर देने वाले त्रिशूल और अभय मुद्रा से सुशोभित हैं। उनका त्रिशूल भक्तों के तीनों प्रकार के ताप (आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक) को नष्ट करता है और उन्हें वरदान प्रदान करता है। उनकी अभय मुद्रा भक्तों को सभी प्रकार के भयों से मुक्त करती है और उन्हें सुरक्षा का आश्वासन देती है। यह उनके करुणामय और शक्तिशाली स्वरूप का प्रतीक है। 'वलारिकन्यासुकृतालयाय' एक महत्वपूर्ण पौराणिक संदर्भ प्रस्तुत करता है। 'वल' नामक असुर के शत्रु इंद्र हैं, और उनकी कन्या देवसेना हैं। इस विशेषण का अर्थ है कि वे देवसेना के शुभ कर्मों के आश्रय हैं। देवसेना ने भगवान कार्तिकेय को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, और उनके पुण्य के फलस्वरूप भगवान ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। यह दर्शाता है कि भगवान सुब्रह्मण्य सच्ची भक्ति और पुण्य कर्मों का सम्मान करते हैं। ऐसे 'व' कार स्वरूप भगवान गुह को मेरा प्रणाम है।
Verse 4
नगेन्द्रकन्येश्वरतत्त्वदाय
नगाधिरूढाय नगार्चिताय।
नगासुरघ्नाय नगालयाय
नकाररूपाय नमो गुहाय।।4।।
यह श्लोक भगवान सुब्रह्मण्य के 'न' कार स्वरूप की वंदना करता है। उन्हें 'नगेन्द्रकन्येश्वरतत्त्वदाय' कहा गया है, जिसका अर्थ है पर्वतराज (हिमालय) की कन्या (पार्वती) के ईश्वर (शिव) को तत्वज्ञान का उपदेश देने वाले। यह पुनः उस प्रसिद्ध घटना का स्मरण कराता है जहाँ कुमार कार्तिकेय ने प्रणव मंत्र 'ॐ' के रहस्य का ज्ञान स्वयं अपने पिता भगवान शिव को दिया था। यह उनकी सर्वोच्च ज्ञान की अवस्था और गुरु स्वरूप को प्रतिष्ठित करता है, जो उन्हें 'स्वामीनाथ' (गुरु स्वामी) की उपाधि दिलाता है।
'नगाधिरूढाय' का अर्थ है पर्वत पर आरूढ़ होने वाले। भगवान कार्तिकेय का निवास पर्वतों पर माना जाता है, विशेषकर दक्षिण भारत में उनके अनेक प्रसिद्ध मंदिर पर्वतों की चोटियों पर स्थित हैं। पर्वत स्थिरता, ऊँचाई और तपस्या का प्रतीक है। पर्वत पर निवास करना उनके तपस्वी और ऊर्ध्वमुखी आध्यात्मिक चेतना का द्योतक है। 'नगार्चिताय' का अर्थ है पर्वतों द्वारा पूजित। प्रकृति के स्थिर और विशाल प्रतीक, पर्वत भी उनकी दिव्यता के समक्ष नतमस्तक हैं। इसका एक और अर्थ यह हो सकता है कि वे नगरवासियों या स्थिर रहने वाले मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं। 'नगासुरघ्नाय' का अर्थ है पर्वत रूपी असुर का वध करने वाले। यह क्रौंच नामक असुर के संहार का संकेत है, जो एक पर्वत का रूप धारण कर लेता था और ऋषियों-मुनियों को कष्ट देता था। भगवान ने अपने भाले से उस असुर का विनाश कर धर्म की रक्षा की। 'नगालयाय' का अर्थ है पर्वत जिनका घर है। यह उनके निवास स्थान को इंगित करता है और यह भी बताता है कि वे भक्तों के लिए एक अचल आश्रय के समान हैं। ऐसे 'न' कार स्वरूप भगवान गुह को मेरा नमन है।
Verse 5
भवाय भर्गाय भवात्मजाय
भस्मायमानाद्भुतविग्रहाय।
भक्तेष्टकामप्रदकल्पकाय
भकाररूपाय नमो गुहाय।।5।।
यह श्लोक भगवान कार्तिकेय के 'भ' कार स्वरूप को नमन करता है। इस श्लोक में भगवान शिव के अनेक प्रसिद्ध नामों का प्रयोग उनके पुत्र के लिए किया गया है, जो शिव और कार्तिकेय की अभिन्नता को दर्शाता है। 'भवाय' का अर्थ है जो स्वयं अस्तित्व का स्रोत है या जो भव (संसार) के रूप में प्रकट होता है। 'भर्गाय' का अर्थ है जो पापों का नाश करने वाला तेज है। यह शब्द गायत्री मंत्र में सूर्य और शिव के तेज के लिए प्रयुक्त होता है और यहाँ कार्तिकेय को उसी दिव्य तेज से युक्त बताया गया है। 'भवात्मजाय' का स्पष्ट अर्थ है भव अर्थात शिव के पुत्र। यह उनके और भगवान शिव के बीच पुत्र-पिता के पवित्र संबंध को दर्शाता है।
'भस्मायमानाद्भुतविग्रहाय' का अर्थ है भस्म से सुशोभित अद्भुत स्वरूप वाले। अपने पिता भगवान शिव के समान, कुमार कार्तिकेय भी अपने शरीर पर पवित्र भस्म धारण करते हैं। भस्म वैराग्य, पवित्रता और इस नश्वर संसार की अंतिम वास्तविकता का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि वे परम वैराग्यवान और भौतिक आसक्तियों से परे हैं। 'भक्तेष्टकामप्रदकल्पकाय' उन्हें भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान बताता है। कल्पवृक्ष एक ऐसा दिव्य वृक्ष है जो किसी भी इच्छा को तुरंत पूरा कर देता है। उसी प्रकार, भगवान कार्तिकेय अपने शरणागत भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं। यह उनकी उदारता और भक्त-वत्सलता को प्रकट करता है। ऐसे 'भ' कार स्वरूप भगवान गुह को मैं प्रणाम करता हूँ।
Verse 6
वल्लीवलारातिसुतार्चिताय
वराङ्गरागाञ्चितविग्रहाय।
वल्लीकराम्भोरुहमर्दिताय
वकाररूपाय नमो गुहाय।।6।।
यह श्लोक भगवान गुह के दूसरे 'व' कार स्वरूप का स्तवन करता है, जो 'शरवणभव' मंत्र के अंतिम अक्षर का प्रतीक है। इस श्लोक में उनकी दोनों पत्नियों, वल्ली और देवसेना, के साथ उनके प्रेमपूर्ण संबंध का सुंदर वर्णन है। 'वल्लीवलारातिसुतार्चिताय' का अर्थ है कि वे वल्ली और वल असुर के शत्रु इंद्र की पुत्री देवसेना, दोनों के द्वारा पूजित हैं। देवसेना जहाँ देवों की शक्ति का प्रतीक हैं और उनका विवाह पारंपरिक रूप से हुआ, वहीं वल्ली एक शिकारी की पुत्री हैं और वे प्रेम तथा भक्ति का प्रतीक हैं। भगवान कार्तिकेय दोनों को समान रूप से स्वीकार करते हैं, जो यह दर्शाता है कि वे पद या कुल नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति और प्रेम को महत्व देते हैं।
'वराङ्गरागाञ्चितविग्रहाय' का अर्थ है कि उनका दिव्य शरीर श्रेष्ठ और सुगंधित लेपों से सुशोभित है। यह उनके सौंदर्य और अलौकिक आकर्षण को दर्शाता है। उनके शरीर पर लगे अंगराग भक्तों के मन को सांसारिक विषयों से हटाकर अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यह उनके दिव्य और मनोहर रूप का काव्यात्मक वर्णन है। 'वल्लीकराम्भोरुहमर्दिताय' एक अत्यंत मधुर भाव को प्रकट करता है। इसका अर्थ है, जिनके चरण वल्ली के कमल रूपी हाथों से दबाए जाते हैं। यह भगवान के प्रति वल्ली के अनन्य प्रेम, भक्ति और सेवा भाव को दर्शाता है। यह भगवान और भक्त के बीच के घनिष्ठ और व्यक्तिगत संबंध का प्रतीक है, जहाँ भगवान अपने भक्त को इतना स्नेह देते हैं कि वे उसकी सेवा को स्वीकार करते हैं। यह उनकी सहजता और प्रेममय स्वरूप को उजागर करता है। ऐसे 'व' कार स्वरूप भगवान गुह को मेरा नमस्कार है।