श्री संकट मोचन हनुमान अष्टक

श्री संकट मोचन हनुमान अष्टक

Verse 1
बाल समय रवि भक्षि लियो तब तीनहूं लोक भयो अंधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी विनती तब छांडि दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।
इस छंद का शाब्दिक अर्थ यह है कि अपने बाल्यकाल में आपने उगते हुए सूर्य को निगल लिया था जिसके कारण तीनों लोकों में घोर अंधकार छा गया था। इस अचानक आए संकट से पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया और कोई भी इस भारी विपत्ति को टालने में सक्षम नहीं था। तब सभी देवी-देवताओं ने आकर आपसे अत्यंत विनम्र प्रार्थना की जिसके बाद आपने सूर्य को मुक्त कर दिया और संसार का यह बड़ा कष्ट दूर किया। हे वानर श्रेष्ठ इस जगत में ऐसा कौन है जो आपके संकटमोचन नाम को नहीं जानता।
पौराणिक कथाओं के अनुसार शिशु हनुमान ने एक बार लाल चमकते हुए सूर्य को कोई मीठा और पका हुआ फल समझ लिया था। उनकी इस मासूम लेकिन असाधारण लीला के कारण ब्रह्मांडीय संतुलन बिगड़ गया था। देवताओं के अनुरोध और इंद्र के वज्र प्रहार के बाद उन्होंने सूर्य को उगला जिसके बाद सभी देवताओं ने उन्हें असीमित शक्तियों का विशेष वरदान दिया।
दार्शनिक रूप से देखा जाए तो सूर्य ज्ञान और प्रकाश का सबसे बड़ा स्रोत है। सूर्य को निगलने की क्षमता यह दर्शाती है कि हनुमान जी की चेतना ब्रह्मांडीय ज्ञान से भी अधिक विशाल है। अंधकार अज्ञानता का प्रतीक है और देवताओं की प्रार्थना सच्ची भक्ति की ओर इशारा करती है। संकटमोचन उपाधि यह स्पष्ट करती है कि पूर्ण समर्पण से ही आत्मा सांसारिक बंधनों और घोर संकटों से मुक्ति पा सकती है।

Verse 2
बालि की त्रास कपीस बसै गिरिजात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि शाप दियो तब चाहिये कौन विचार विचारो।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के शोक निवारो।
इस पद्यांश का शाब्दिक अर्थ यह है कि अपने बड़े भाई बालि के प्राणघातक भय से वानरराज सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर निवास करते थे और हमेशा किसी रक्षक की राह देखते थे। मतंग ऋषि द्वारा बालि को दिए गए शाप के कारण सुग्रीव वहां पूर्ण रूप से सुरक्षित थे इसलिए इसमें अधिक सोचने की कोई आवश्यकता नहीं थी। हे महाप्रभु आपने ही एक साधारण ब्राह्मण का रूप धारण करके भगवान श्रीराम को सुग्रीव से मिलाया और अपने सच्चे सेवक के सभी दुखों का अंत कर दिया।
पौराणिक संदर्भ में बालि ने सुग्रीव का राज्य और पत्नी छीनकर उसे निष्कासित कर दिया था। सुग्रीव ने उस पर्वत पर शरण ली जहां ऋषि के शाप के कारण बालि नहीं आ सकता था। जब राम और लक्ष्मण सीता माता की खोज में वन में भटक रहे थे तब हनुमान जी ने एक विप्र का वेश धरकर उनकी परीक्षा ली थी। भगवान को पहचानते ही उन्होंने राम और सुग्रीव की परम मित्रता करवाई।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सुग्रीव एक सामान्य जीव का प्रतीक है जो बालि रूपी अहंकार और भौतिक इच्छाओं से भयभीत रहता है। पर्वत एक उच्च आध्यात्मिक स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है जहां जीव शांति के लिए शरण लेता है। हनुमान जी यहां एक सच्चे गुरु की भूमिका निभाते हैं जो ब्राह्मण या ज्ञानी का रूप धारण कर भटके हुए जीव का सीधा संपर्क परमेश्वर से करवाते हैं जिससे जीव के सारे सांसारिक शोक हमेशा के लिए मिट जाते हैं।

Verse 3
अंगद के संग लेन गए सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौं हम सों जु बिना सुधि लाए इहां पगु धारो।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया सुधि प्राण उबारो।
इस श्लोक में बताया गया है कि आप युवराज अंगद और अन्य वानरों के साथ माता सीता की खोज में दक्षिण दिशा की ओर गए थे। उस समय सुग्रीव ने अत्यंत कठोर चेतावनी दी थी कि जो भी बिना सीता का पता लगाए वापस लौटेगा उसे प्राणदंड दिया जाएगा। खोजते हुए जब सभी वानर विशाल समुद्र के तट पर पहुंचकर बुरी तरह थक गए और निराश हो गए तब आपने ही सीता माता की खबर लाकर सबके प्राणों की रक्षा की थी।
कथा के अनुसार सुग्रीव ने वानरों की टोलियां सभी दिशाओं में भेजी थीं। दक्षिण की ओर गई टोली जब महासागर के पास पहुंची तो उनके पास समय समाप्त हो चुका था और आगे जाने का कोई भी मार्ग नहीं था। मृत्यु के भय और निराशा के बीच जांबवान ने हनुमान जी को उनकी सोई हुई शक्तियों की याद दिलाई। इसके बाद हनुमान जी ने एक सौ योजन लंबा समुद्र लांघा और लंका पहुंचकर माता सीता का पता लगाया।
दार्शनिक दृष्टि से यह विशाल और अथाह समुद्र हमारे जन्म और मृत्यु के अंतहीन सांसारिक चक्र का बहुत बड़ा प्रतीक है। वानरों की थकान और निराशा उस आम साधक की स्थिति को दर्शाती है जो अपने स्वयं के सीमित प्रयासों से ईश्वर को पाने में विफल रहता है। हनुमान जी असीम ईश्वरीय कृपा और दृढ़ संकल्प के प्रतीक हैं जो माया रूपी सागर को पार करके जीवात्मा को परमात्मा की शांति और आशा का दिव्य संदेश देते हैं।

Verse 4
रावण त्रास दई सिय को तब राक्षस सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय असोक सों आगिसु दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
इस पंक्ति का अर्थ है कि जब दुष्ट रावण ने सीता माता को अत्यधिक भयभीत किया और डराया तब आपने वहां मौजूद राक्षसियों को युक्ति से समझाकर माता का गहरा दुख कम किया। उसी समय हे हनुमान महाप्रभु आपने वाटिका में जाकर बड़े-बड़े और भयंकर राक्षसों का वध कर दिया। जब सीता जी अत्यंत निराश होकर अशोक वृक्ष से जलने के लिए अग्नि मांग रही थीं तब आपने प्रभु श्रीराम की अंगूठी गिराकर उनके सभी दुखों को हमेशा के लिए दूर कर दिया।
लंका की अशोक वाटिका में माता सीता रावण और राक्षसियों के निरंतर मनोवैज्ञानिक और मानसिक प्रहार झेल रही थीं। रावण के जाने के बाद हनुमान जी ने अक्षय कुमार जैसे महारथियों और वाटिका के रक्षकों का संहार किया। जब सीता माता राम के वियोग में अपने प्राण त्यागने के लिए पेड़ से आग की याचना कर रही थीं ठीक उसी पल हनुमान जी ने पेड़ के ऊपर से श्रीराम की निशानी के रूप में उनकी अंगूठी नीचे गिरा दी।
आध्यात्मिक गहराई में देखा जाए तो सीता जी उस शुद्ध जीवात्मा का प्रतीक हैं जो रावण रूपी अज्ञान और अहंकार के चंगुल में फंसी हुई है। राक्षसियां सांसारिक कुविचारों और वासनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। अशोक वृक्ष का अर्थ है जहां कोई शोक न हो लेकिन भौतिक संसार में सच्चा सुख नहीं मिलता। हनुमान जी एक ईश्वरीय दूत या सच्चे गुरु हैं जो प्रभु की मुद्रिका रूपी दिव्य नाम या ज्ञान प्रदान करते हैं जिससे आत्मा की निराशा दूर होती है।

Verse 5
बान लग्यो उर लछिमन के तब प्राण तजे सुत रावण मारो।
लै गृह वैद्य सुखेन समेत तबै गिरि द्रोन सुबीर उपारो।
आनि संजीवनि हाथ दई तब लछिमन के तुम प्राण उबारो।
इन पंक्तियों का अर्थ यह है कि जब रावण के पुत्र मेघनाद ने युद्ध में लक्ष्मण जी के हृदय पर घातक बाण मारा तब वे अपने प्राण त्यागने की अत्यंत निकट स्थिति में आ गए। उस कठिन समय में आप लंका से वैद्य सुषेण को उनके घर सहित उठा लाए और फिर वीरों के निवास स्थान द्रोणागिरी पर्वत को ही जड़ से उखाड़ लाए। आपने स्वयं संजीवनी बूटी लाकर वैद्य के हाथों में दी और इस प्रकार लक्ष्मण जी के बहुमूल्य प्राणों की रक्षा की।
रामायण के भीषण युद्ध कांड में मेघनाद ने वीर लक्ष्मण पर अमोघ शक्ति का प्रयोग किया था जिससे वे मृत्यु शय्या पर पहुंच गए थे। उपचार के लिए हनुमान जी अत्यंत तीव्र गति से लंका से सुषेण वैद्य को लाए। वैद्य ने हिमालय से सूर्योदय से पूर्व संजीवनी बूटी लाने को कहा। समय की कमी और बूटी पहचानने में असमर्थता के कारण हनुमान जी ने पूरा का पूरा पर्वत ही उठा लिया और सही समय पर लौटकर लक्ष्मण का जीवन बचाया।
दार्शनिक रूप से लक्ष्मण जी निस्वार्थ सेवा निरंतर भक्ति और वैराग्य के सर्वोच्च प्रतीक हैं। मेघनाद का बाण अज्ञानता और माया का वह घातक प्रहार है जो अच्छे-अच्छे साधकों की चेतना को मूर्छित कर देता है। संजीवनी बूटी उस जाग्रत ईश्वरीय ज्ञान और चेतना की प्रतीक है जो मृतप्राय आत्मा में पुनः प्राण फूंक देती है। हनुमान जी का पर्वत उठाना यह सिद्ध करता है कि सच्ची और निष्काम भक्ति असंभव को भी संभव कर सकती है।

Verse 6
रावन युद्ध अजान कियो तब नाग कि फांस सबै सिर डारो।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेश तब हनुमान जु बन्धन काटि के त्रास निवारो।
इस पद्यांश का अर्थ है कि जब रावण के पक्ष ने अज्ञानतावश और छल से युद्ध किया तो उन्होंने सभी के सिर पर नागपाश नामक भयंकर फंदा डाल दिया। भगवान श्री राम और उनके साथ पूरी वानर सेना मूर्छित और मोहग्रस्त हो गई जिससे एक बहुत बड़ा और भारी संकट उत्पन्न हो गया। तब हे हनुमान आपने पक्षियों के राजा गरुड़ को बुलाकर उन जहरीले बंधनों को कटवाया और सभी को इस महाभय से पूरी तरह मुक्त किया।
महाकाव्य के अनुसार रावण के पुत्र इंद्रजीत ने मायावी युद्ध का सहारा लेते हुए राम और लक्ष्मण पर नागपाश नामक अस्त्र छोड़ दिया था। यह अस्त्र जहरीले सांपों से बना था जिसने दोनों भाइयों को कसकर बांध लिया। सारी वानर सेना गहरे शोक में डूब गई। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए हनुमान जी ने तुरंत भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का स्मरण किया। गरुड़ के आते ही सांप डरकर भाग गए और प्रभु बंधन मुक्त हो गए।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नागपाश हमारी सांसारिक आसक्ति गहरे मोह अहंकार और जन्म-मृत्यु के जहरीले बंधनों का सटीक प्रतीक है। राम का इसमें बंधना प्रकृति और कर्म के नियमों का सम्मान करना दर्शाता है। गरुड़ देव उच्च आध्यात्मिक विवेक और जाग्रत चेतना के प्रतीक हैं। हनुमान जी द्वारा गरुड़ को बुलाना यह सिखाता है कि जब जीव माया के बंधनों में बुरी तरह फंस जाता है तब उसे गुरु के माध्यम से उच्च ईश्वरीय चेतना का आह्वान करना चाहिए।

Verse 7
बंधु समेत जबे अहिरावण लै रघुनाथ पाताल सिधारो।
देविहिं पूजि भली विधि सों बलि देऊ सबै मिलि मंत्र बिचारो।
जाय सहाय भयो तबही अहिरावण सैन्य समेत संहारो।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि जब मायावी अहिरावण भगवान श्रीराम और उनके भाई लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें पाताल लोक ले गया। वहां उसने अपनी कुलदेवी की भली-भांति पूजा की और अपने साथियों के साथ मिलकर दोनों भाइयों की बलि देने का अत्यंत क्रूर षड्यंत्र रचा। ठीक उसी समय आप उनके सच्चे सहायक बनकर वहां पहुंचे और आपने उस क्रूर अहिरावण का उसकी पूरी सेना सहित सर्वनाश कर दिया।
कथा के अनुसार रावण के कहने पर पाताल के राजा अहिरावण ने विभीषण का रूप धरकर सोते हुए राम और लक्ष्मण का हरण कर लिया था। उसका मुख्य उद्देश्य अपनी देवी के सामने दोनों की बलि चढ़ाना था। हनुमान जी अपने प्रभु की खोज में पाताल पहुंचे। वहां उन्होंने मकरध्वज को हराया और अहिरावण की मृत्यु का गुप्त रहस्य जाना। हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण कर एक साथ पांच दिशाओं में जल रहे दीपकों को बुझाया और अहिरावण का वध कर दिया।
दार्शनिक रूप से पाताल लोक मनुष्य के अवचेतन मन की सबसे गहरी और अंधकारमयी परतों का प्रतीक है जहां हमारे छिपे हुए डर और आदिम प्रवृत्तियां निवास करती हैं। बलि देने का विचार शुद्ध आत्मा को अहंकार द्वारा नष्ट करने का प्रयास है। हनुमान जी का पंचमुखी रूप धारण करना हमारी पांचों इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण और जाग्रत चेतना का प्रतीक है। यह प्रसंग बताता है कि अज्ञानता के गहरे अंधकार को केवल ईश्वरीय ज्ञान के प्रकाश से ही नष्ट किया जा सकता है।

Verse 8
काज किए बड़ देवन के तुम वीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसे नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछ संकट होय हमारो।
इस छंद का शाब्दिक अर्थ है कि हे वीर महाप्रभु जरा विचार करके देखिए कि आपने देवताओं के कितने बड़े-बड़े और असंभव कार्य पूरे किए हैं। फिर मुझ जैसे एक साधारण और गरीब भक्त का ऐसा कौन सा छोटा सा संकट है जिसे आपके द्वारा नहीं टाला जा सकता। हे महान प्रभु हनुमान मेरे जीवन में जो भी छोटे या बड़े संकट और कष्ट हैं कृपया उन्हें शीघ्र अति शीघ्र पूरी तरह दूर कर दीजिए।
यह श्लोक महाकवि तुलसीदास जी की अत्यंत भावपूर्ण और व्यक्तिगत प्रार्थना है। अष्टक के पिछले सभी छंदों में हनुमान जी द्वारा सूर्य को निगलने से लेकर रावण की सेना के संहार तक के महान कार्यों का वर्णन किया गया है। कवि तर्क देते हैं कि जिस भगवान ने बड़े-बड़े देवताओं वानरों और स्वयं भगवान राम के भारी संकटों का निवारण किया है उसके लिए एक सामान्य मनुष्य के सांसारिक कष्टों को दूर करना अत्यंत ही सरल कार्य है।
आध्यात्मिक स्तर पर यह श्लोक पूर्ण आत्म-समर्पण और शरणागति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। साधक अपने अहंकार को त्यागकर स्वयं को ईश्वरीय शक्ति के सामने अत्यंत तुच्छ और असहाय मानता है। यहां संकट का अर्थ केवल सांसारिक परेशानियां नहीं हैं बल्कि जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसे रहने की आध्यात्मिक पीड़ा भी है। भक्त हनुमान जी से प्रार्थना करता है कि वे अपनी कृपा दृष्टि से उसकी आत्मा को इस अज्ञानता के संकट से मुक्त करें।

Verse 9
लाल देह लाली लसे अरु धरि लाल लंगूर।
बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि सूर।
इस अंतिम दोहे का शाब्दिक अर्थ यह है कि आपका दिव्य शरीर लाल रंग का है जो अत्यंत सुंदर और तेजस्वी लग रहा है और आपकी लंबी पूंछ भी लाल रंग की ही है। आपका शरीर इंद्र के वज्र के समान अत्यंत कठोर और अजेय है जो भयानक राक्षसों का सर्वनाश करने वाला है। ऐसे महान और शूरवीर वानर की सदा जय हो जय हो जय हो।
पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान जी ने एक बार माता सीता को अपनी मांग में लाल सिंदूर लगाते हुए देखा था। जब उन्हें पता चला कि ऐसा करने से प्रभु श्रीराम की आयु बढ़ती है और वे प्रसन्न होते हैं तो हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर लाल सिंदूर पोत लिया था। इसी कारण उन्हें लाल रंग अत्यंत प्रिय है। उनका वज्र जैसा शरीर सूर्य को निगलने के बाद देवराज इंद्र द्वारा दिए गए वरदान का परिणाम है जिससे उन पर किसी भी अस्त्र-शस्त्र का कोई प्रभाव नहीं होता।
दार्शनिक रूप से लाल रंग ब्रह्मांडीय ऊर्जा जीवन शक्ति और निस्वार्थ प्रेम की पवित्रता का परम प्रतीक है। शरीर पर सिंदूर लगाना भगवान के प्रति संपूर्ण समर्पण और बिना किसी शर्त के की गई भक्ति को दर्शाता है

 

बाल समय रवि भक्षि लियो तब तीनहूं लोक भयो अंधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी विनती तब छांडि दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।
बालि की त्रास कपीस बसै गिरिजात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि शाप दियो तब चाहिये कौन विचार विचारो।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के शोक निवारो।
अंगद के संग लेन गए सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौं हम सों जु बिना सुधि लाए इहां पगु धारो।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया सुधि प्राण उबारो।
रावण त्रास दई सिय को तब राक्षस सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय असोक सों आगिसु दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
बान लग्यो उर लछिमन के तब प्राण तजे सुत रावण मारो।
लै गृह वैद्य सुखेन समेत तबै गिरि द्रोन सुबीर उपारो।
आनि संजीवनि हाथ दई तब लछिमन के तुम प्राण उबारो।
रावन युद्ध अजान कियो तब नाग कि फांस सबै सिर डारो।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेश तब हनुमान जु बन्धन काटि के त्रास निवारो।
बंधु समेत जबे अहिरावण लै रघुनाथ पाताल सिधारो।
देविहिं पूजि भली विधि सों बलि देऊ सबै मिलि मंत्र बिचारो।
जाय सहाय भयो तबही अहिरावण सैन्य समेत संहारो।
काज किए बड़ देवन के तुम वीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसे नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछ संकट होय हमारो।
लाल देह लाली लसे अरु धरि लाल लंगूर।
बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि सूर।

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