आञ्जनेय मंगल अष्टक स्तोत्र

कपिश्रेष्ठाय शूराय सुग्रीवप्रियमन्त्रिणे ।
जानकीशोकनाशाय आञ्जनेयाय मङ्गलम् ।।1।।

मनोवेगाय उग्राय कालनेमिविदारिणे ।
लक्ष्मणप्राणदात्रे च आञ्जनेयाय मङ्गलम् ।।2।।

महाबलाय शान्ताय दुर्दण्डीबन्धमोचन ।
मैरावणविनाशाय आञ्जनेयाय मङ्गलम् ।।3।।

पर्वतायुधहस्ताय रक्षःकुलविनाशिने ।
श्रीरामपादभक्ताय आञ्जनेयाय मङ्गलम् ।।4।।

विरक्ताय सुशीलाय रुद्रमूर्तिस्वरूपिणे ।
ऋषिभिः सेवितायास्तु आञ्जनेयाय मङ्गलम् ।।5।।

दीर्घबालाय कालाय लङ्कापुरविदारिणे ।
लङ्कीणीदर्पनाशाय आञ्जनेयाय मङ्गलम् ।।6।।

नमस्तेऽस्तु ब्रह्मचारिन् नमस्ते वायुनन्दन ।
नमस्ते गानलोलाय आञ्जनेयाय मङ्गलम् ।।7।।

प्रभवाय सुरेशाय शुभदाय शुभात्मने ।
वायुपुत्राय धीराय आञ्जनेयाय मङ्गलम् ।।8।।

आञ्जनेयाष्टकमिदं यः पठेत् सततं नरः ।
सिद्ध्यन्ति सर्वकार्याणि सर्वशत्रुविनाशनम् ।।9।।

श्लोक 1
कपियों में श्रेष्ठ, अत्यंत पराक्रमी, सुग्रीव के प्रिय मंत्री, और जानकी माता के शोक का नाश करने वाले आञ्जनेय को मंगल हो।
अर्थ: जो वानरों में सर्वश्रेष्ठ हैं, वीरता के प्रतीक हैं, सुग्रीव के विश्वसनीय सलाहकार हैं और माता सीता के दुःख को दूर करने वाले हैं, उन हनुमान जी का कल्याणकारी स्मरण हो।

श्लोक 2
मन की गति से भी तेज, उग्र रूप वाले, कालनेमि का वध करने वाले और लक्ष्मण के प्राणों के रक्षक आञ्जनेय को मंगल हो।
अर्थ: जो मन से भी अधिक वेगवान हैं, दुष्टों के लिए भयंकर हैं, कालनेमि का संहार किया और लक्ष्मण जी को जीवनदान दिया, ऐसे हनुमान जी का मंगल हो।

श्लोक 3
महाबली, शांत स्वभाव वाले, कठोर बंधनों से छुड़ाने वाले और मैरावण का विनाश करने वाले आञ्जनेय को मंगल हो।
अर्थ: जिनमें अपार शक्ति है, परंतु भीतर से अत्यंत शांत हैं, जो भक्तों को संकट और बंधनों से मुक्त करते हैं और मैरावण का वध किया, उन हनुमान जी का मंगल हो।

श्लोक 4
हाथ में पर्वत को अस्त्र की तरह धारण करने वाले, राक्षस कुल का नाश करने वाले और श्रीराम के चरणों के अनन्य भक्त आञ्जनेय को मंगल हो।
अर्थ: जिन्होंने संजीवनी पर्वत को उठाया, राक्षसों का संहार किया और जो श्रीराम के चरणों में पूर्ण समर्पित भक्त हैं, ऐसे हनुमान जी को मंगल हो।

श्लोक 5
वैराग्ययुक्त, सुशील, रुद्र स्वरूप और ऋषियों द्वारा पूजित आञ्जनेय को मंगल हो।
अर्थ: जो आसक्ति से रहित हैं, उत्तम आचरण वाले हैं, शिव के अंश रूप हैं और जिनकी सेवा ऋषि-मुनि भी करते हैं, उन हनुमान जी का मंगल हो।

श्लोक 6
दीर्घ बल वाले, काल समान प्रबल, लंका पुरी को ध्वस्त करने वाले और लंकिनी के अभिमान को चूर्ण करने वाले आञ्जनेय को मंगल हो।
अर्थ: जिनकी शक्ति असीम है, जो समय के समान प्रभावशाली हैं, जिन्होंने लंका में उत्पात मचाया और लंकिनी का घमंड तोड़ा, उन हनुमान जी का मंगल हो।

श्लोक 7
हे ब्रह्मचारी, हे वायु पुत्र, आपको नमस्कार है। भजन और गान में आनंद लेने वाले आञ्जनेय को मंगल हो।
अर्थ: जो आजीवन ब्रह्मचारी हैं, पवनदेव के पुत्र हैं और श्रीराम के नाम-संकीर्तन में आनंदित रहते हैं, उन हनुमान जी को प्रणाम और मंगल हो।

श्लोक 8
समस्त शक्तियों के स्रोत, देवताओं के भी ईश्वर, शुभ फल देने वाले, पवित्र आत्मा, वायु पुत्र और धैर्यवान आञ्जनेय को मंगल हो।
अर्थ: जो दिव्य शक्ति के अधिष्ठाता हैं, मंगलकारी हैं, शुद्ध आत्मा हैं और अटल धैर्य के धनी हैं, उन हनुमान जी का मंगल हो।

श्लोक 9
जो मनुष्य इस आञ्जनेय अष्टकम् का नित्य पाठ करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं और सभी शत्रुओं का नाश होता है।
अर्थ: जो व्यक्ति श्रद्धा से इसका नियमित पाठ करता है, उसके कार्य सफल होते हैं और विरोधी शक्तियाँ स्वयं दूर हो जाती हैं।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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