
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जस जो दायक फल चारि ।
इस छंद का शाब्दिक अर्थ है कि मैं अपने गुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ और परिष्कृत करके श्री रघुनाथ जी के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ जो जीवन के चार मुख्य फल धर्म अर्थ काम और मोक्ष को प्रदान करने वाला है। यहाँ मन की तुलना दर्पण से की गई है क्योंकि जिस प्रकार एक गंदे दर्पण में अपना चेहरा स्पष्ट नहीं दिखता उसी प्रकार वासनाओं और अहंकार से भरे मन में ईश्वर का दर्शन संभव नहीं है। गुरु की कृपा वह माध्यम है जो इस अज्ञान की धूल को हटाकर बुद्धि को प्रकाशित करती है।
दार्शनिक रूप से यहाँ पुरुषार्थ चतुष्टय का उल्लेख है जो भारतीय जीवन पद्धति के चार आधार स्तंभ माने जाते हैं। गुरु को सर्वोपरि स्थान देना भारतीय ज्ञान परंपरा की विशेषता है क्योंकि गुरु ही शिष्य को भौतिक जगत से पार ले जाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। रघुबर बिमल जस का गान करने का उद्देश्य केवल भक्ति नहीं बल्कि चित्त की शुद्धि भी है। यहाँ रज या धूल का प्रयोग अत्यंत सार्थक है जो साधक की विनम्रता और समर्पण का प्रतीक है। जब साधक स्वयं को गुरु के चरणों की धूल के समान सूक्ष्म बना लेता है तभी वह परम पद का अधिकारी बनता है।
बुद्धि हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार । बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार ।
इस पद्य का अर्थ है कि स्वयं को बुद्धिहीन और असमर्थ जानकर मैं पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ और उनसे प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे बल बुद्धि और विद्या प्रदान करें तथा मेरे सभी दुखों और मानसिक दोषों का निवारण करें। भक्त यहाँ अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट करता है। हनुमान जी को शक्ति और बुद्धि का समन्वय माना गया है इसलिए वे ही इन गुणों को प्रदान करने में सक्षम हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यहाँ कलेश और बिकार शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। योग दर्शन में पाँच प्रकार के क्लेश अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश बताए गए हैं जिन्हें दूर करने की प्रार्थना यहाँ की गई है। पवनकुमार शब्द वायु तत्व की प्रधानता को दर्शाता है जो हमारे प्राणों का आधार है। हनुमान जी की भक्ति का अर्थ है अपने प्राणों को अनुशासित करना जिससे स्वाभाविक रूप से शारीरिक बल मानसिक बुद्धि और आत्मिक विद्या का विकास होता है। यह प्रार्थना साधक के अहंकार को नष्ट कर उसे दिव्य शक्ति से जोड़ती है।
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । जय कपीश तिहुँ लोक उजागर ॥१।
के लिए भी प्रयोग होता है परंतु हनुमान जी को समस्त वानर जाति का आध्यात्मिक स्वामी माना गया है। तिहुँ लोक उजागर का अर्थ है
इसका अर्थ है कि ज्ञान और गुणों के अथाह सागर श्री हनुमान जी की जय हो। तीनों लोकों स्वर्ग पृथ्वी और पाताल में अपनी महिमा का प्रकाश फैलाने वाले वानरों के ईश्वर आपकी जय हो। यहाँ सागर शब्द हनुमान जी की अनंत गहराई और असीमित ज्ञान को सूचित करता है। वे न केवल बलशाली हैं अपितु वे व्याकरण और शास्त्रों के ज्ञाता भी हैं जो उनकी विद्वता को दर्शाता है।
पौराणिक संदर्भ में कपीश शब्द सुग्रीव और बाली कि उनकी कीर्ति केवल मृत्युलोक तक सीमित नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। दार्शनिक रूप से हनुमान जी को बुद्धिमानों में अग्रगण्य माना गया है क्योंकि उनके पास सत्व गुण की प्रधानता है। यह छंद भक्त के भीतर ज्ञान की ज्योति जलाने और उसे संसार के अंधकार से बाहर निकालने की प्रेरणा देता है।
राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥२॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि आप भगवान राम के दूत हैं और अतुलनीय शक्ति के निवास स्थान हैं। आपको माता अंजनी के पुत्र और पवनपुत्र के नाम से जाना जाता है। यहाँ अतुलित बल धामा विशेषण यह स्पष्ट करता है कि हनुमान जी की शक्ति की तुलना किसी अन्य से नहीं की जा सकती क्योंकि उनका बल स्वयं परमात्मा की सेवा में समर्पित है। वे केवल बल के स्वामी ही नहीं बल्कि उसके आश्रय भी हैं।
पौराणिक रूप से पवनपुत्र होने के कारण उनके पास वायु की गति और शक्ति विद्यमान है। आध्यात्मिक स्तर पर हनुमान जी को प्राण शक्ति का अवतार माना जाता है। अंजनीपुत्र कहकर उनके वात्सल्य और मातृ-भक्ति के पक्ष को उजागर किया गया है। राम दूत शब्द उनकी सबसे बड़ी पहचान है क्योंकि उन्होंने अपने अस्तित्व को पूरी तरह से राम के चरणों में समर्पित कर दिया था। यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति अहंकार त्याग कर ईश्वर का यंत्र बन जाता है तो वह अनंत शक्ति का स्रोत बन जाता है।
महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥३॥
इसका अर्थ है कि आप महान वीर और पराक्रमी हैं तथा आपका शरीर वज्र के समान शक्तिशाली है। आप दुर्बुद्धि को दूर करने वाले और श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करने वालों के साथी हैं। बजरंगी शब्द वज्रांग का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है जिसका शरीर इंद्र के वज्र जैसा कठोर हो। यह उनकी शारीरिक और मानसिक दृढ़ता का परिचायक है जो किसी भी बाधा को नष्ट करने में सक्षम है।
दार्शनिक रूप से कुमति और सुमति हमारे भीतर के नकारात्मक और सकारात्मक विचारों के प्रतीक हैं। हनुमान जी का सान्निध्य मनुष्य के भीतर के विकारों को नष्ट कर उसे विवेक और सद्बुद्धि की ओर ले जाता है। यहाँ संगी शब्द अत्यंत मधुर है जो यह बताता है कि हनुमान जी केवल एक देवता नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में हमारे चरित्र का मार्गदर्शन करते हैं। उनके पराक्रम का उद्देश्य सदैव धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश रहा है जो साधक को आंतरिक संघर्षों में विजयी बनाता है।
कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥४॥
इसका अर्थ है कि हनुमान जी का वर्ण सुवर्ण के समान चमकता हुआ है और वे सुंदर वस्त्रों में सुशोभित हैं। उनके कानों में सुंदर कुंडल हैं और उनके बाल घुंघराले हैं। कंचन बरन उनकी दिव्यता और ओज का प्रतीक है क्योंकि सोना कभी मलिन नहीं होता। यह उनकी ब्रह्मचर्य की शक्ति और तपस्या से उत्पन्न आभा को दर्शाता है जो भक्तों के मन को आकर्षित करती है।
आध्यात्मिक अर्थ में कानों के कुंडल का अर्थ है निरंतर वेदों और सत्य वचनों का श्रवण करना। कुंचित केश उनकी यौवन और ऊर्जा का संकेत देते हैं। सुबेसा शब्द उनके सौम्य और मर्यादित रूप को प्रकट करता है। यद्यपि वे एक वानर रूप में हैं किंतु उनका यह दिव्य स्वरूप देवताओं को भी विस्मित करने वाला है। यह वर्णन भक्त को भगवान के साकार रूप के ध्यान में मदद करता है जिससे चित्त की एकाग्रता बढ़ती है और भक्ति प्रगाढ़ होती है।
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ छाजै ॥५॥
इस छंद का अर्थ है कि आपके एक हाथ में वज्र और दूसरे में विजय की ध्वजा सुशोभित है। आपके कंधे पर मूँज घास का बना जनेऊ अत्यंत शोभनीय लग रहा है। वज्र उनकी अपराजेय शक्ति और दुष्टों के दमन का प्रतीक है जबकि ध्वजा धर्म की विजय और उनके राम भक्त होने की पहचान है। जनेऊ उनकी ब्राह्मणोचित मर्यादा और आध्यात्मिक अनुशासन को दर्शाता है।
पौराणिक संदर्भ में मूँज का जनेऊ उपनयन संस्कार के दौरान धारण किया जाता है जो यह सिद्ध करता है कि हनुमान जी केवल बलवान ही नहीं बल्कि शास्त्रों के ज्ञाता और अनुशासित ब्रह्मचारी भी हैं। उनके हाथ में गदा और ध्वज का होना बल और यश के संतुलन को प्रकट करता है। यह स्वरूप साधक को यह सिखाता है कि शक्ति का उपयोग सदैव धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए। हनुमान जी का यह श्रृंगार उनकी वीरता और विद्वता का एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
शंकर स्वयं केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥६॥
इसका अर्थ है कि आप भगवान शंकर के ही साक्षात अवतार हैं और केसरी के पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। आपका तेज और ऐश्वर्य इतना महान है कि सारा संसार आपकी वंदना करता है। हनुमान जी को भगवान शिव का ग्यारहवाँ रुद्र अवतार माना जाता है जो उनकी असीम संहारक और रक्षक शक्तियों का आधार है। शंकर स्वयं कहकर उनकी सर्वोपरि सत्ता और दिव्यता की पुष्टि की गई है।
दार्शनिक रूप से शिव कल्याण के देवता हैं और हनुमान जी शिव के उस अंश का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सेवा भाव से परिपूर्ण है। केसरीनंदन शब्द उनके पार्थिव जन्म और पितृ भक्ति को जोड़ता है। उनका तेज सूर्य के समान प्रखर है जिसने एक बार सूर्य को ही निगलने का प्रयास किया था। सारा जगत उन्हें नमन करता है क्योंकि वे संकटमोचन हैं। यह पद हनुमान जी की उस व्यापक शक्ति को संबोधित करता है जो ब्रह्मांड के कण-कण में विद्यमान शिव तत्व का ही विस्तार है।
बिद्यावान गुणी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥७॥
इसका अर्थ है कि आप अत्यंत विद्वान गुणी और चतुर हैं तथा भगवान राम के कार्यों को करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। यहाँ चातुर शब्द का अर्थ कपट नहीं बल्कि वह विवेक है जिससे वे कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेते हैं। वे चारों वेदों और व्याकरण के ज्ञाता हैं इसलिए उन्हें विद्यावान कहा गया है। उनके पास सभी अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियाँ हैं फिर भी वे सेवा के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।
आध्यात्मिक संदेश यह है कि मात्र ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है जब तक वह ज्ञान सेवा में न लगाया जाए। हनुमान जी का चरित्र निस्वार्थ कर्मयोग का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। राम काज उनके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है जो यह दर्शाता है कि एक सच्चे भक्त का जीवन केवल अपने ईश्वर की इच्छा पूर्ति के लिए होता है। उनकी आतुरता आलस्य के अभाव और अटूट उत्साह का प्रतीक है। यह प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति सचेत और सक्रिय रहने की शिक्षा देता है।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि आप भगवान राम के चरित्र की कथा सुनने के बहुत प्रेमी हैं और आपके मन में सदैव श्री राम माता सीता और लक्ष्मण जी का वास रहता है। रसिया शब्द उनके गहरे अनुराग को दर्शाता है। कहा जाता है कि जहाँ भी राम कथा होती है वहाँ हनुमान जी अदृश्य रूप में उपस्थित होकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से उसका श्रवण करते हैं। यह भक्ति की पराकाष्ठा है।
दार्शनिक रूप से यह श्रवण भक्ति का महत्व बताता है जो भक्ति मार्ग का पहला सोपान है। प्रभु का चरित्र उनके कानों का रस है। उनके हृदय में राम सीता और लक्ष्मण का निवास करना उनके अनन्य प्रेम का प्रतीक है जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई भेद नहीं रह जाता। हनुमान जी का यह गुण सिखाता है कि ईश्वर की कथाओं में आनंद लेना ही वास्तव में मन को एकाग्र करने का सबसे सरल मार्ग है। वे केवल राम के भक्त ही नहीं बल्कि उनके परिवार के रक्षक और आत्मिक अंग भी हैं।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥९॥
इसका अर्थ है कि आपने बहुत ही छोटा रूप धारण करके माता सीता को दर्शन दिए और फिर अत्यंत विशाल और विकराल रूप धारण करके लंका को जलाकर भस्म कर दिया। यह उनकी अणिमा और महिमा जैसी सिद्धियों पर नियंत्रण को प्रकट करता है। सूक्ष्म रूप उनकी विनम्रता और सावधानी का परिचय है जो उन्होंने लंका में प्रवेश के समय और सीता माता के समक्ष अपना विश्वास जीतने के लिए अपनाया था।
बिकट रूप उनके उस रुद्र रूप का प्रदर्शन है जो अधर्म और अन्याय के विनाश के लिए आवश्यक था। पौराणिक संदर्भ में लंका दहन रावण के अहंकार के अंत की शुरुआत थी। आध्यात्मिक रूप से यह बताता है कि एक ज्ञानी पुरुष को परिस्थितियों के अनुसार अपने स्वरूप और व्यवहार को बदलने की कला आनी चाहिए। जहाँ विनम्रता की आवश्यकता हो वहाँ सूक्ष्म और जहाँ दुष्टों का संहार करना हो वहाँ विशाल बन जाना ही वीरता है। हनुमान जी का यह चरित्र विपरीत स्थितियों में संतुलन बनाए रखने की शक्ति देता है।
भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचंद्र के काज सँवारे ॥१०॥
इसका अर्थ है कि आपने भीम के समान अत्यंत विशाल और शक्तिशाली रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और भगवान श्री रामचंद्र जी के सभी अधूरे कार्यों को पूरा किया। यहाँ भीम शब्द उनकी असाधारण शारीरिक शक्ति और निर्भीकता को सूचित करता है। उन्होंने न केवल युद्ध में शत्रुओं का विनाश किया बल्कि राम जी के दूत के रूप में हर कदम पर उनकी सहायता की और धर्म की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई।
सांस्कृतिक संदर्भ में सँवारे शब्द का अर्थ है संवारना या व्यवस्थित करना जो यह दर्शाता है कि राम के कार्यों में जो भी बाधाएं आईं हनुमान जी ने उन्हें अपनी बुद्धि और बल से सुगम बना दिया। आध्यात्मिक रूप से असुर हमारे भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों जैसे काम क्रोध और लोभ के प्रतीक हैं जिनका विनाश हनुमान जी की कृपा से ही संभव है। यह छंद भक्त को आश्वस्त करता है कि यदि वह हनुमान जी की शरण में है तो उसके जीवन के सभी जटिल कार्य सहजता से सिद्ध हो जाएंगे और वह लक्ष्य को प्राप्त करेगा।
लाय सँजीवनि लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥
इस चौपाई का अर्थ है कि जब युद्ध में मेघनाद की शक्ति से लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे तब आप संजीवनी बूटी लेकर आए और उनके प्राणों की रक्षा की। इस महान कार्य से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान श्री रामचंद्र जी ने आपको अपने हृदय से लगा लिया। यह प्रसंग हनुमान जी की कार्यकुशलता और उनके अटूट सेवा भाव का उत्कृष्ट उदाहरण है। लक्ष्मण जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है और उनके प्राण बचाकर हनुमान जी ने न केवल एक भाई की रक्षा की बल्कि धर्म युद्ध की नींव को भी सुरक्षित रखा।
दार्शनिक रूप से यहाँ लक्ष्मण जी चेतना के प्रतीक हैं और संजीवनी वह आध्यात्मिक ऊर्जा है जो मूर्छित चेतना को पुनः जाग्रत करती है। श्रीरघुबीर का उन्हें हृदय से लगाना यह दर्शाता है कि जब भक्त अपने स्वामी के प्रिय पात्रों की सेवा करता है तो वह स्वतः ही ईश्वर के हृदय में स्थान पा लेता है। यहाँ हरषि शब्द भगवान के उस वात्सल्य और आनंद को प्रकट करता है जो एक भक्त के समर्पण को देखकर उत्पन्न होता है। यह छंद हमें संकट के समय धैर्य और पुरुषार्थ के साथ कार्य करने की प्रेरणा देता है।
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई । तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई ॥१२।
इसका शाब्दिक अर्थ है कि श्री रामचंद्र जी ने आपकी बहुत अधिक प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे मेरे छोटे भाई भरत के समान ही प्रिय हो। भगवान राम के लिए भरत त्याग और प्रेम के सर्वोच्च आदर्श थे इसलिए हनुमान जी की तुलना भरत से करना उनके प्रति राम जी के अनन्य प्रेम और सम्मान को सिद्ध करता है। हनुमान जी ने कभी स्वयं को स्वामी से श्रेष्ठ नहीं माना किंतु उनकी निस्वार्थ सेवा ने उन्हें स्वामी के भाई का दर्जा दिला दिया। यहाँ रघुपति शब्द राम जी की मर्यादा और उनके न्यायपूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाता है।
आध्यात्मिक स्तर पर यह पद भक्ति की उस अवस्था को बताता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का भेदभाव समाप्त हो जाता है। भरतहिं सम भाई कहना यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर की दृष्टि में जन्म या रक्त का संबंध उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि प्रेम और शरणागति का भाव। हनुमान जी ने अपनी शक्ति और बुद्धि को पूरी तरह राम जी के चरणों में अर्पित कर दिया था। यह चौपाई साधक को यह सिखाती है कि विनम्रता और सेवा के माध्यम से मनुष्य दिव्य गुणों को प्राप्त कर सकता है और परमात्मा का अत्यंत निकटवर्ती बन सकता है।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥१३॥
इसका अर्थ है कि भगवान राम ने हनुमान जी को गले लगाते हुए कहा कि हजार मुख वाले शेषनाग भी तुम्हारे यश का गान करते हैं। श्रीपति यानी लक्ष्मी के स्वामी भगवान विष्णु के अवतार श्री राम ने इस प्रकार कहकर हनुमान जी की महिमा को अनंत बताया। यहाँ सहस बदन शब्द शेषनाग की उस क्षमता को दर्शाता है जहाँ वे निरंतर ईश्वर की महिमा गाते रहते हैं फिर भी हनुमान जी के गुणों का वर्णन समाप्त नहीं होता। यह हनुमान जी की असीमित कीर्ति का परिचायक है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है।
दार्शनिक रूप से यहाँ श्रीपति शब्द का प्रयोग अत्यंत सार्थक है क्योंकि यह राम जी को सर्वशक्तिमान परमात्मा के रूप में प्रतिष्ठित करता है। जब साक्षात ईश्वर किसी को कंठ लगाते हैं तो वह जीव समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। यह छंद यह भी संकेत देता है कि हनुमान जी का चरित्र इतना महान है कि दिव्य शक्तियाँ भी उनकी प्रशंसा करने में स्वयं को असमर्थ पाती हैं। यह भक्त की महिमा का गान है जिसे स्वयं भगवान गा रहे हैं। यह स्थिति उस पूर्णता की है जहाँ भक्त का अस्तित्व परमात्मा के अस्तित्व में विलीन हो जाता है और वह स्वयं पूजनीय बन जाता है।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा । नारद सारद सहित अहीशा ॥१४॥
इस चौपाई में उन महान व्यक्तित्वों और देवताओं की सूची दी गई है जो हनुमान जी की महिमा का गुणगान करते हैं। सनक सनंदन सनातन और सनत्कुमार जैसे ऋषि ब्रह्मा जी स्वयं मुनीश्वर नारद मुनि देवी सरस्वती और शेषनाग सभी आपके यश के गायक हैं। यह दर्शाता है कि हनुमान जी की प्रसिद्धि केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं है बल्कि सूक्ष्म और दिव्य लोकों में भी उतनी ही प्रतिष्ठित है। सारद यानी ज्ञान की देवी सरस्वती का उल्लेख यह बताता है कि ज्ञान का सर्वोच्च शिखर भी हनुमान जी की भक्ति के आगे नतमस्तक है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यहाँ अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतीकों का मेल है। सनकादिक वैराग्य के प्रतीक हैं ब्रह्मा सृजन के नारद भक्ति के और सरस्वती ज्ञान की। जब ये सभी किसी का गुणगान करते हैं तो इसका अर्थ है कि उस व्यक्तित्व में वैराग्य ज्ञान सृजन और भक्ति का पूर्ण सामंजस्य है। हनुमान जी इन सभी गुणों के पुंज हैं। अहीशा यानी शेषनाग जो पृथ्वी को धारण करते हैं वे भी हनुमान जी की शक्ति का लोहा मानते हैं। यह छंद सिद्ध करता है कि हनुमान जी की भक्ति समस्त आध्यात्मिक मार्गों का मिलन बिंदु है जहाँ ऋषि और देवता एक स्वर में प्रार्थना करते हैं।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते ॥१५॥
इसका अर्थ है कि यमराज कुबेर और दसों दिशाओं के रक्षक यानी दिक्पाल भी हनुमान जी की महिमा के सामने मौन हैं। यहाँ तक कि बड़े-बड़े कवि और विद्वान भी आपके यश का पूर्ण वर्णन करने में सक्षम नहीं हैं। जम मृत्यु के देवता हैं और कुबेर धन के देवता हैं। इन दोनों पर विजय प्राप्त करना या इनके द्वारा सम्मानित होना यह दर्शाता है कि हनुमान जी समय और संपत्ति दोनों के बंधनों से ऊपर हैं। कबि और कोबिद जैसे शब्दों का प्रयोग उनकी उस विराटता को बताने के लिए किया गया है जो तर्क और भाषा की सीमा से परे है।
पौराणिक संदर्भ में हनुमान जी ने यमराज के दंड को भी चुनौती दी थी और कुबेर की लंका को जलाने में अपनी शक्ति दिखाई थी। दार्शनिक रूप से यह पद बताता है कि मानवीय बुद्धि और शब्द ब्रह्म के उस स्वरूप को पूरी तरह नहीं पकड़ सकते जिसका प्रतिनिधित्व हनुमान जी करते हैं। जब दसों दिशाओं के रक्षक ही उनकी शरण में हों तो साधारण मनुष्य की क्या बिसात। यह छंद भक्त को समर्पण और श्रद्धा की गहराई में ले जाता है जहाँ उसे यह अनुभव होता है कि हनुमान जी की कृपा अनंत है और उसे केवल भाव के माध्यम से ही महसूस किया जा सकता है।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज-पद दीन्हा ॥१६॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि आपने सुग्रीव पर बहुत बड़ा उपकार किया उन्हें भगवान राम से मिलाया और उन्हें उनका खोया हुआ राज्य वापस दिलाया। सुग्रीव अपने भाई बाली के भय से ऋष्यमूक पर्वत पर छिपे हुए थे और हनुमान जी ने ही अपनी बुद्धिमत्ता से उनकी मित्रता राम जी से कराई थी। यह घटना हनुमान जी की कूटनीतिक चतुरता और मित्रता निभाने की अद्भुत क्षमता को दर्शाती है। वे न केवल एक भक्त हैं बल्कि एक महान मार्गदर्शक और सहायक भी हैं जो दीन-दुखियों का उद्धार करते हैं।
आध्यात्मिक रूप से यहाँ सुग्रीव जीवात्मा का प्रतीक हैं जो संसार के भय से ग्रस्त है और हनुमान जी गुरु के प्रतीक हैं। जिस प्रकार गुरु शिष्य को परमात्मा से मिलाता है उसी प्रकार हनुमान जी ने सुग्रीव को राम से मिलाया। राज-पद दीन्हा का अर्थ है कि जब जीव ईश्वर से जुड़ जाता है तो उसे अपने आत्मिक ऐश्वर्य की प्राप्ति हो जाती है। यह चौपाई हमें सिखाती है कि यदि हम हनुमान जी का आश्रय लेते हैं तो वे हमें भी हमारे जीवन के कठिन संघर्षों से बाहर निकालकर ईश्वर की शरण तक पहुँचा सकते हैं। यहाँ उपकार शब्द उनकी करुणा और निस्वार्थ सहायता का प्रतीक है।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना । लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥१७॥
इस चौपाई का अर्थ है कि विभीषण ने आपकी सलाह और मंत्र को स्वीकार किया जिसके परिणाम स्वरूप वे लंका के राजा बने और यह बात सारा संसार जानता है। जब विभीषण रावण द्वारा अपमानित होकर शरण की तलाश में थे तब हनुमान जी ने ही उन्हें राम जी की शरण में जाने का सही परामर्श दिया था। यह उनकी दूरदर्शिता और सत्य के प्रति उनकी निष्ठा को उजागर करता है। लंकेश्वर बनना विभीषण के लिए केवल राज्य की प्राप्ति नहीं थी बल्कि अधर्म के विनाश के बाद धर्म के राज्य की स्थापना थी।
दार्शनिक रूप से मंत्र का अर्थ है सही विचार या मार्गदर्शन। विभीषण ने हनुमान जी के वचनों पर विश्वास किया जो यह दर्शाता है कि एक सच्चा परामर्शदाता जीवन की दिशा बदल सकता है। सब जग जाना यह सिद्ध करता है कि हनुमान जी की कृपा से प्राप्त फल शाश्वत और जगत प्रसिद्ध होता है। यहाँ हनुमान जी की उस शक्ति का वर्णन है जिससे वे रंक को राजा बना सकते हैं। यह पद हमें यह शिक्षा देता है कि सत्संग और सही मार्गदर्शन में ही जीवन की सार्थकता है और हनुमान जी ही वे सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक हैं जो हमें सही मार्ग पर ले जा सकते हैं।
जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥
इसका अर्थ है कि सूर्य जो कि हजारों युगों और योजनों की दूरी पर स्थित है आपने उसे एक मीठा फल समझकर निगल लिया था। यह हनुमान जी के बाल्यकाल की एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है जहाँ उन्होंने अपनी भूख मिटाने के लिए आकाश में चमकते सूर्य को फल समझ लिया था। यह उनके असीम साहस अदम्य उत्साह और उनकी जन्मजात दिव्य शक्तियों का परिचायक है। एक छोटे से बालक द्वारा सूर्य को वश में कर लेना यह बताता है कि वे सामान्य जीव नहीं बल्कि ईश्वरीय ऊर्जा के पुंज हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से इस चौपाई में सूर्य की पृथ्वी से दूरी का जो अनुमान दिया गया है वह आधुनिक खगोल विज्ञान के काफी निकट है जो तुलसीदास जी की सूक्ष्म दृष्टि को दर्शाता है। आध्यात्मिक रूप से सूर्य बुद्धि और प्रकाश का प्रतीक है। हनुमान जी द्वारा उसे आत्मसात करना यह दर्शाता है कि उन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड के ज्ञान और तेज को अपने भीतर समाहित कर लिया है। मधुर फल शब्द उनकी मासूमियत और ईश्वर की माया के प्रति उनके सरल दृष्टिकोण को प्रकट करता है। यह छंद हमें सिखाता है कि अटूट इच्छाशक्ति और साहस के बल पर कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि भगवान राम की अंगूठी को अपने मुख में दबाकर आपने विशाल समुद्र को लांघ लिया और इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका जा रहे थे तब राम जी ने अपनी पहचान के रूप में उन्हें अपनी मुद्रिका दी थी। सौ योजन के समुद्र को पार करना किसी भी साधारण प्राणी के लिए असंभव था किंतु हनुमान जी के लिए यह अत्यंत सहज था क्योंकि उनके पास राम नाम की शक्ति और प्रभु का विश्वास था। अचरज नाहीं शब्द उनके प्रति भक्त की अटूट श्रद्धा को प्रकट करता है।
दार्शनिक रूप से मुद्रिका ईश्वर के नाम या तारक मंत्र का प्रतीक है। जब साधक के मुख में ईश्वर का नाम होता है तो वह संसार रूपी भवसागर को आसानी से पार कर सकता है। समुद्र बाधाओं और वासनाओं का प्रतीक है जिसे केवल प्रभु की कृपा से ही लांघा जा सकता है। हनुमान जी ने यह सिद्ध किया कि यदि उद्देश्य पवित्र हो और प्रभु पर विश्वास हो तो बड़ी से बड़ी भौगोलिक और मानसिक बाधाएं तुच्छ हो जाती हैं। यह चौपाई आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश देती है जो हर असंभव कार्य को सुगम बना देती है।
दुर्गम काज जगत के जे ते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते ॥२०॥
इसका अर्थ है कि संसार में जितने भी कठिन और असंभव कार्य हैं वे आपकी कृपा मात्र से अत्यंत सुगम और सरल हो जाते हैं। यहाँ दुर्गम शब्द उन बाधाओं की ओर संकेत करता है जिन्हें पार करना मानवीय क्षमता से परे लगता है। हनुमान जी को संकटमोचन कहा गया है जिसका अर्थ ही यही है कि वे समस्त संकटों का निवारण करने वाले हैं। अनुग्रह का अर्थ है दैवीय कृपा जो तब प्राप्त होती है जब भक्त का समर्पण पूर्ण होता है। यह पद हनुमान जी की उस व्यापक शक्ति की पुष्टि करता है जो हर स्थिति में सहायक है।
आध्यात्मिक रूप से यह चौपाई यह विश्वास दिलाती है कि मनुष्य के जीवन में कोई भी दुख या समस्या इतनी बड़ी नहीं है जिसे हनुमान जी की भक्ति से दूर न किया जा सके। सुगम शब्द यह बताता है कि उनकी कृपा मिलते ही परिस्थितियां अपने आप अनुकूल होने लगती हैं। यहाँ जगत के जे ते कहने का तात्पर्य है कि चाहे वह लौकिक समस्या हो या पारलौकिक हनुमान जी हर क्षेत्र में उद्धारकर्ता हैं। यह छंद भक्त के मन से भय को निकालता है और उसे एक मानसिक सुरक्षा का अनुभव कराता है कि उसका रक्षक अत्यंत समर्थ और दयालु है।
राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥
इस चौपाई का शाब्दिक अर्थ है कि आप भगवान श्री राम के द्वार के रक्षक हैं और आपकी अनुमति के बिना कोई भी उनके दरबार में प्रवेश नहीं कर सकता है। यहाँ द्वार केवल भौतिक प्रवेश द्वार नहीं है बल्कि ईश्वर तक पहुँचने का आध्यात्मिक मार्ग है। हनुमान जी को राम भक्ति का द्वार माना गया है क्योंकि उनके माध्यम से ही राम जी की कृपा प्राप्त की जा सकती है। जिस प्रकार एक रक्षक अनधिकृत व्यक्तियों को रोकता है उसी प्रकार हनुमान जी केवल उन्हीं को प्रवेश देते हैं जो सच्चे और समर्पित होते हैं।
पौराणिक संदर्भ में जब राम जी स्वर्ग सिधार रहे थे तब हनुमान जी ने उनके आदेश का पालन करते हुए यमराज को भी प्रवेश से रोका था। दार्शनिक रूप से यह पद गुरु के महत्व को दर्शाता है जो साधक और परमात्मा के बीच एक कड़ी का कार्य करते हैं। हनुमान जी वह शक्ति हैं जो हमारे मन को परिष्कृत कर उसे ईश्वर के सम्मुख खड़ा होने योग्य बनाती है। बिना वैराग्य और सेवा भाव के जो हनुमान जी के गुण हैं राम तत्व की प्राप्ति असंभव है। यह छंद हमें सिखाता है कि भक्ति के पथ पर मर्यादा और अनुशासन अत्यंत आवश्यक है।
सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना । तुम रक्षक काहू को डर ना ॥२२॥
इसका अर्थ है कि जो भी आपकी शरण में आता है वह सभी प्रकार के सुखों को प्राप्त करता है। जब आप रक्षक के रूप में साथ होते हैं तो किसी भी प्रकार का भय शेष नहीं रह जाता। यहाँ सुख केवल भौतिक संपदा नहीं बल्कि वह आंतरिक शांति है जो ईश्वर के सान्निध्य में मिलती है। हनुमान जी की शरण में जाने का अर्थ है अपने अहंकार को त्याग कर उनकी शक्ति पर पूर्ण विश्वास करना। शरणागति का यह भाव भक्त को निर्भय बना देता है क्योंकि उसे पता है कि उसका रक्षक अत्यंत शक्तिशाली है।
दार्शनिक रूप से यह पद प्रपत्ति या पूर्ण आत्मसमर्पण के सिद्धांत को रेखांकित करता है। भय तब तक रहता है जब तक मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है लेकिन जैसे ही वह हनुमान जी जैसी ईश्वरीय शक्ति पर निर्भर हो जाता है उसके सभी मानसिक और बाहरी भय समाप्त हो जाते हैं। रक्षक काहू को डर ना का अर्थ है कि काल और मृत्यु का भय भी हनुमान जी के भक्त को विचलित नहीं कर सकता। यह चौपाई साधक को मानसिक दृढ़ता प्रदान करती है और उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करती है क्योंकि हनुमान जी अभय प्रदान करने वाले देवता हैं।
आपन तेज सम्हारो आपे । तीनौं लोक हाँक ते काँपे ॥२३॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि आपके तेज और वेग को केवल आप ही संभाल सकते हैं क्योंकि आपकी एक हुंकार मात्र से तीनों लोक कांपने लगते हैं। यहाँ तेज शब्द हनुमान जी की उस आध्यात्मिक ऊर्जा और शक्ति को दर्शाता है जो ब्रह्मांडीय स्तर की है। उनकी शक्ति इतनी विशाल है कि यदि वे इसे पूरी तरह प्रकट कर दें तो संसार उसे सहन नहीं कर पाएगा। उनकी हाँक यानी गर्जना अधर्म के विनाश और धर्म के जागरण का प्रतीक है जो जड़ और चेतन दोनों में स्पंदन पैदा करती है।
पौराणिक रूप से हनुमान जी को वायु पुत्र और शिव का अंश माना गया है जिनकी शक्ति असीमित है। दार्शनिक स्तर पर यह पद प्राण शक्ति की महत्ता को बताता है। जिस प्रकार वायु संपूर्ण जगत को संचालित करती है उसी प्रकार हनुमान जी के भीतर की प्राण ऊर्जा तीनों लोकों को नियंत्रित करती है। यह छंद हमें बताता है कि शक्ति का असली गुण उसे नियंत्रित रखने में है। हनुमान जी अनंत बल के स्वामी होने के बावजूद अत्यंत शांत और मर्यादित रहते हैं जो एक आदर्श व्यक्तित्व का लक्षण है। उनकी गर्जना का भय केवल दुष्टों के लिए है जबकि भक्तों के लिए यह सुरक्षा का आश्वासन है।
भूत पिशाच निकट नहीं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥
इसका अर्थ है कि जहाँ भी महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया या जपा जाता है वहाँ भूत प्रेत और नकारात्मक शक्तियाँ पास भी नहीं आ सकतीं। यहाँ भूत और पिशाच केवल काल्पनिक जीव नहीं हैं बल्कि हमारे भीतर के नकारात्मक विचार भय वासनाएं और मानसिक विकार हैं। हनुमान जी का नाम एक दिव्य मंत्र की तरह कार्य करता है जो वातावरण और चित्त की अशुद्धियों को नष्ट कर देता है। महावीर शब्द उनकी उस वीरता को प्रकट करता है जिसने समस्त नकारात्मकताओं पर विजय प्राप्त की है।
आध्यात्मिक रूप से नाम की ध्वनि में एक विशेष कंपन होता है जो साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना देता है। जब हम महावीर का स्मरण करते हैं तो हमारे भीतर साहस का संचार होता है जिससे अज्ञान का अंधकार छंट जाता है। यह चौपाई विशेष रूप से उन लोगों के लिए प्रेरणादायक है जो मानसिक अवसाद या अज्ञात भय से ग्रस्त हैं। नाम सुनावै का अर्थ यह भी है कि उनके गुणों का श्रवण मात्र ही मनुष्य को पवित्र कर देता है। यह पद श्रद्धा की शक्ति और नाम संकीर्तन के महत्व को प्रतिपादित करता है जिससे बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥२५॥
इस चौपाई का अर्थ है कि हनुमान जी के नाम का निरंतर जाप करने से सभी प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं और सारी पीड़ाएं दूर हो जाती हैं। यहाँ रोग केवल शारीरिक व्याधियां नहीं बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक बीमारियाँ भी हैं। निरंतर जाप शब्द की महत्ता यह है कि भक्ति में निरंतरता होनी चाहिए तभी वह फलदायी होती है। हनुमत बीरा उनकी शक्ति और दयालुता का संबोधन है जो अपने भक्त के कष्टों को हरने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से निरंतर मंत्र जाप हमारे स्नायु तंत्र को शांत करता है और जीवनी शक्ति को बढ़ाता है। हनुमान जी प्राणों के देवता हैं इसलिए उनकी साधना से शरीर के भीतर के प्राणों का प्रवाह संतुलित होता है जिससे रोगों का निवारण होता है। पौराणिक कथाओं में उन्होंने अपनी शक्ति से कई बार देवताओं और मनुष्यों के प्राणों की रक्षा की है। यह छंद विश्वास दिलाता है कि यदि कोई भक्त एकाग्रता और विश्वास के साथ उनका स्मरण करता है तो उसे शारीरिक आरोग्य और मानसिक शांति अवश्य प्राप्त होती है। यह चिकित्सा और प्रार्थना के सुंदर संगम का प्रतीक है।
संकट तें हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावैं ॥२६॥
इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति मन वचन और कर्म से हनुमान जी का ध्यान करता है हनुमान जी उसे हर प्रकार के संकट से मुक्त कर देते हैं। यहाँ मन क्रम बचन का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसे त्रिकरण शुद्धि कहा जाता है। इसका अर्थ है कि केवल दिखावे की भक्ति नहीं बल्कि विचारों वाणी और कार्यों में हनुमान जी के प्रति समर्पण होना चाहिए। जब साधक का अंतःकरण और बाह्य आचरण एक हो जाता है तब वह ईश्वरीय सहायता का पात्र बनता है।
दार्शनिक रूप से संकट हमारी अपनी गलतियों या प्रारब्ध के परिणाम होते हैं जिन्हें हनुमान जी की कृपा से काटा जा सकता है। ध्यान लगाना एकाग्रता की पराकाष्ठा है जहाँ भक्त अपने अस्तित्व को भूलकर केवल हनुमान जी में खो जाता है। हनुमान जी संकटमोचन हैं जिनका जन्म ही दूसरों की सहायता के लिए हुआ है। यह चौपाई सिखाती है कि भक्ति एक समग्र जीवन पद्धति है। यदि हम अपने आचरण को शुद्ध रखें और हनुमान जी का ध्यान करें तो जीवन के कठिन से कठिन समय में भी वे हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं और हमें हर दुख से बाहर निकालते हैं।
सब पर राम राय सिरताजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि भगवान श्री राम सभी राजाओं के राजा और सर्वश्रेष्ठ स्वामी हैं और आपने उनके सभी कार्यों को सफलतापूर्वक संपन्न किया है। राम राय सिरताजा कहकर राम जी की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार किया गया है। हनुमान जी साक्षात शक्ति होने के बावजूद सदैव राम जी के सेवक के रूप में ही अपनी पहचान बनाए रखते हैं। यह उनके अहंकार रहित सेवा भाव का प्रतीक है जो यह सिद्ध करता है कि सच्ची महानता समर्पण में है न कि प्रभुत्व जमाने में।
सांस्कृतिक संदर्भ में यह पद बताता है कि हनुमान जी राम जी के दाहिने हाथ की तरह थे जिन्होंने सीता की खोज से लेकर लंका विजय तक हर कठिन कार्य को साधा। दार्शनिक रूप से राम जी आत्मा के प्रतीक हैं और हनुमान जी सेवा और कर्म के। जब कर्म पूरी तरह आत्मा की इच्छा के अनुरूप होता है तो वह सफल होता है। यहाँ साजा शब्द का अर्थ है संवारना या पूर्णता प्रदान करना। हनुमान जी ने राम जी के कार्यों को न केवल किया बल्कि उन्हें सुंदरता और गरिमा के साथ पूरा किया। यह छंद हमें अपने स्वामी या लक्ष्य के प्रति पूर्ण निष्ठा रखने की प्रेरणा देता है।
और मनोरथ जो कोइ लावै । तासु अमित जीवन फल पावै ॥२८॥
इसका अर्थ है कि इसके अतिरिक्त भी यदि कोई भक्त अपने मन में कोई अन्य इच्छा या मनोरथ लेकर आता है तो हनुमान जी की कृपा से उसे ऐसा फल प्राप्त होता है जिसकी कोई सीमा नहीं है। अमित जीवन फल का तात्पर्य उस आनंद और सफलता से है जो मनुष्य की अपेक्षाओं से कहीं अधिक है। हनुमान जी को कल्पवृक्ष के समान माना गया है जो अपने शरणागत की हर जायज मुराद पूरी करते हैं। वे केवल मोक्ष ही नहीं बल्कि लौकिक उन्नति भी प्रदान करने वाले हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह पद बताता है कि ईश्वर की शरण में जाने पर मनुष्य को केवल वही नहीं मिलता जो वह मांगता है बल्कि वह भी मिलता है जो उसके लिए वास्तव में कल्याणकारी है। मनोरथ शब्द हृदय की गहरी इच्छाओं को सूचित करता है। हनुमान जी अंतर्यामी हैं और वे भक्त के मन की शुद्धता को देखकर उसे फल देते हैं। यह चौपाई भक्त को धैर्य रखने और विश्वास बनाए रखने की शिक्षा देती है कि उसकी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाएगी। उनकी कृपा असीमित है और वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का द्वार खोलती है।
चारिउ जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥
इस चौपाई का अर्थ है कि हनुमान जी का प्रताप और उनकी महिमा चारों युगों सत्युग त्रेता द्वापर और कलियुग में विद्यमान है। उनकी कीर्ति संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है और वह ज्ञान के प्रकाश की तरह सबको आलोकित करती है। हनुमान जी को अष्ट चिरंजीवियों में से एक माना गया है जिसका अर्थ है कि वे समय की सीमाओं से परे हैं और हर युग में वे जीवित जागृत देवता के रूप में भक्तों की सहायता के लिए उपलब्ध रहते हैं। जगत उजियारा उनके उस ज्ञान को दर्शाता है जो अज्ञान के अंधेरे को दूर करता है।
पौराणिक रूप से त्रेता में वे राम के साथ थे द्वापर में वे भीम और अर्जुन की सहायता के लिए उपस्थित थे और कलियुग में वे नाम संकीर्तन के आधार हैं। दार्शनिक रूप से यह उनकी शाश्वत उपस्थिति का प्रतीक है। प्रताप शब्द उनके आध्यात्मिक बल और तेज को प्रकट करता है जो कभी कम नहीं होता। यह छंद भक्त को यह विश्वास दिलाता है कि हनुमान जी प्राचीन काल के कोई पौराणिक चरित्र मात्र नहीं हैं बल्कि वे आज भी उतने ही प्रभावशाली और सक्रिय हैं। उनकी भक्ति सदैव प्रासंगिक है और वह हर युग के मनुष्य को दिशा दिखाने में सक्षम है।
साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥३०॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि आप सज्जन पुरुषों और संतों की रक्षा करने वाले हैं और दुष्टों या असुरों का नाश करने वाले हैं। आप भगवान श्री राम के अत्यंत प्रिय हैं। साधु संत यहाँ केवल भगवा वस्त्रधारी नहीं बल्कि वे सभी लोग हैं जो धर्म और सत्य के मार्ग पर चलते हैं। असुर निकंदन का अर्थ है उन शक्तियों को नष्ट करना जो समाज और मन में अशांति फैलाती हैं। राम दुलारे शब्द उनके और राम जी के बीच के उस प्रेम और स्नेह को दर्शाता है जो अद्वितीय है।
आध्यात्मिक रूप से हनुमान जी सत्व गुण के रक्षक और तमस के विनाशक हैं। वे भक्तों के लिए कोमल हैं लेकिन धर्म के शत्रुओं के लिए अत्यंत कठोर। उनकी यह दोहरी भूमिका समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है। राम जी का दुलारा होना यह सिद्ध करता है कि हनुमान जी ने अपने चरित्र से परमात्मा के प्रेम को जीत लिया है। यह चौपाई हमें सज्जनता अपनाने और बुराई का विरोध करने का साहस प्रदान करती है। यह भक्त को सुरक्षा का बोध कराती है कि यदि वह सत्य के मार्ग पर है तो स्वयं हनुमान जी उसके रक्षक बनकर खड़े हैं।
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता । अस बर दीन्ह जानकी माता ॥३१॥
इसका अर्थ है कि आप आठों सिद्धियों और नौ निधियों को प्रदान करने वाले स्वामी हैं। आपको यह विशेष वरदान माता जानकी यानी सीता जी ने दिया है कि आप अपनी प्रसन्नता से किसी को भी ये दिव्य निधियाँ और शक्तियाँ दे सकते हैं। अष्ट सिद्धियाँ—अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व—वे अलौकिक क्षमताएं हैं जिनसे मनुष्य प्रकृति के नियमों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। नौ निधियाँ कुबेर की वे संपत्तियाँ हैं जो सांसारिक ऐश्वर्य और सुख का प्रतीक मानी जाती हैं।
पौराणिक प्रसंग के अनुसार, जब हनुमान जी ने लंका की अशोक वाटिका में माता सीता को श्री राम का संदेश सुनाया और उनकी व्याकुलता को दूर किया, तब माता अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने हनुमान जी की अटूट भक्ति और सेवा से प्रभावित होकर उन्हें यह अधिकार दिया कि वे न केवल स्वयं इन शक्तियों के स्वामी रहेंगे, बल्कि भक्तों को इन्हें बाँटने में भी समर्थ होंगे। यह वरदान उनकी निस्वार्थ सेवा का पुरस्कार था। जानकी माता का यह आशीर्वाद हनुमान जी को ब्रह्मांड के सबसे उदार और शक्तिशाली देवताओं में स्थापित करता है।
दार्शनिक रूप से, यह चौपाई सिद्ध करती है कि हनुमान जी की भक्ति से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की पूर्णता प्राप्त होती है। वे केवल संकटमोचन ही नहीं, बल्कि साधक को सर्वांगीण संपन्नता प्रदान करने वाले कल्पवृक्ष हैं। 'दाता' शब्द उनकी करुणा को दर्शाता है, जो अपने भक्त की पात्रता देखकर उसे संसार की सबसे दुर्लभ वस्तु भी प्रदान कर सकते हैं। यह पद हमें सिखाता है कि जब हम ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होते हैं, तो प्रकृति की सभी शक्तियाँ हमारे अधीन हो जाती हैं और हम दूसरों के कल्याण के निमित्त बन जाते हैं।
राम रसायन तुम्हरे पासा । सादर हौ रघुपति के दासा ॥३२॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि आपके पास राम-नाम रूपी वह दिव्य रसायन या औषधि है जो जीवन के सभी दुखों और जन्म-मरण के चक्र को समाप्त करने वाली है। आप अत्यंत आदर के साथ सदैव श्री रघुनाथ जी के सेवक बने रहते हैं। रसायन उसे कहते हैं जो शरीर को निरोग और अमर बना दे, और हनुमान जी के लिए राम का नाम ही वह परम औषधि है। 'सादर' शब्द उनकी विनम्रता को प्रकट करता है, जो असीम शक्तियों का स्वामी होने के बावजूद स्वयं को केवल एक दास के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं।
पौराणिक और आध्यात्मिक संदर्भ में हनुमान जी को राम-भक्ति का प्रतीक माना गया है। उन्होंने सिद्ध किया है कि राम-नाम में वह शक्ति है जो बड़े से बड़े संकट को टाल सकती है। वे इस रसायन को निरंतर अपने हृदय में धारण किए रहते हैं और जो भी उनकी शरण में आता है, वे उसे भी इस भक्ति-रस का पान कराते हैं। रघुपति के दास के रूप में उनकी पहचान उनके अहंकार रहित व्यक्तित्व की पराकाष्ठा है। यह पद उनकी सेवा भावना को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है, जो किसी भी सिद्धि या शक्ति से बढ़कर है।
दार्शनिक दृष्टिकोण से, 'राम रसायन' का अर्थ है वह ज्ञान का सार जो मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। यह रसायन वासनाओं के जहर को नष्ट कर मन को पवित्र बनाता है। हनुमान जी का 'दासा' होना यह सिखाता है कि सच्ची मुक्ति और शांति केवल ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण में ही निहित है। यह चौपाई साधक को यह संदेश देती है कि राम-नाम का निरंतर अभ्यास ही जीवन की सभी व्याधियों का एकमात्र और अचूक उपचार है। जब भक्त के पास यह रसायन होता है, तो वह संसार के प्रपंचों से मुक्त होकर आनंद का अनुभव करता है।
तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥
इस चौपाई का अर्थ है कि आपके भजन या आपकी आराधना करने से भक्त को भगवान श्री राम की प्राप्ति सुलभ हो जाती है और उसके अनेक जन्मों के संचित दुख और कष्ट समाप्त हो जाते हैं। हनुमान जी को प्रभु राम तक पहुँचने का सबसे सुगम मार्ग माना गया है। 'बिसरावै' शब्द का अर्थ है भूल जाना या मिटा देना, जो यह संकेत देता है कि हनुमान जी की कृपा से साधक का प्रारब्ध बदल जाता है और वह पुराने पापों के प्रभाव से मुक्त होकर शांति का अनुभव करता है।
पौराणिक मान्यता है कि राम जी ने स्वयं कहा था कि जो हनुमान का भक्त है, वह मेरा प्रिय है। हनुमान जी भक्त और भगवान के बीच एक सेतु की तरह हैं। जन्म-जन्म के दुखों का उल्लेख हिंदू दर्शन के पुनर्जन्म के सिद्धांत को दर्शाता है, जहाँ जीव अपने कर्मों के कारण बार-बार दुख के चक्र में फंसता है। हनुमान जी की भक्ति उस चक्र को तोड़ने की शक्ति रखती है। वे साधक के मन को इतना शुद्ध कर देते हैं कि उसमें साक्षात परमात्मा का वास हो जाता है।
आध्यात्मिक रूप से, यह पद साधना के महत्व को रेखांकित करता है। हनुमान जी की स्तुति करने से साधक के भीतर साहस और वैराग्य पैदा होता है, जो उसे संसार की माया से ऊपर उठाकर ईश्वर की ओर प्रेरित करता है। राम को पाने का अर्थ है सत्य और आनंद की प्राप्ति। यह चौपाई हमें विश्वास दिलाती है कि यदि हम हनुमान जी के गुणों का गान करते हैं, तो हमारे जीवन के समस्त क्लेश मिट जाएंगे और हमें वह परम पद प्राप्त होगा जो जन्म और मृत्यु के भय से सर्वथा मुक्त है।
अंत काल रघुबर पुर जाई । जहां जन्म हरि भगत कहाई ॥३४॥
इसका अर्थ है कि हनुमान जी की कृपा से भक्त अपने जीवन के अंतिम समय में भगवान राम के धाम (साकेत या वैकुंठ) को प्राप्त करता है। यदि उसे पुनर्जन्म लेना भी पड़े, तो वह भगवान के एक महान भक्त के रूप में ही जन्म लेता है। 'रघुबर पुर' दिव्य चेतना और मोक्ष का प्रतीक है। यह चौपाई भक्त की अंतिम गति और उसके आध्यात्मिक भविष्य के बारे में आश्वासन देती है कि हनुमान जी की शरण में जाने वाला व्यक्ति कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
हिंदू पौराणिक परंपरा में मृत्यु के समय की चेतना बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। कहा जाता है कि अंत समय में व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसी ही उसकी गति होती है। हनुमान जी का निरंतर स्मरण करने से अंत काल में राम का नाम स्वतः ही मुख पर आता है, जिससे जीव को मुक्ति मिलती है। 'हरि भगत कहाई' का अर्थ है कि वह आत्मा भक्ति के संस्कारों के साथ जन्म लेती है और सदैव ईश्वर के सान्निध्य में रहती है। यह निरंतरता भक्ति मार्ग की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
दार्शनिक स्तर पर, यह पद मोक्ष और जीवन-मुक्ति के विचार को पुष्ट करता है। हनुमान जी का भक्त संसार में रहते हुए भी भक्त कहलाता है और शरीर त्यागने के बाद परमात्मा में विलीन हो जाता है। यह चौपाई यह भी सिखाती है कि भक्ति का फल केवल इस जन्म तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अगले जन्मों के लिए भी एक सुरक्षित आध्यात्मिक आधार तैयार करती है। जो हरि का भक्त है, उसके लिए कहीं भी भय नहीं है क्योंकि वह साक्षात मंगल स्वरूप हनुमान जी के संरक्षण में है।
और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥
इस चौपाई का शाब्दिक अर्थ है कि जो व्यक्ति अपने चित्त में किसी अन्य देवता का विचार न करते हुए केवल हनुमान जी की सेवा करता है, वह सभी प्रकार के सुखों को प्राप्त कर लेता है। यहाँ 'और देवता चित्त न धरई' का अर्थ अन्य देवताओं का अपमान करना नहीं, बल्कि अनन्य भक्ति या एकाग्रता को दर्शाना है। जब साधक का मन एक ही इष्ट में पूरी तरह एकाग्र हो जाता है, तो उसे उस एक के माध्यम से ही संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा और सुख प्राप्त होने लगते हैं।
पौराणिक दृष्टि से हनुमान जी को सभी देवताओं की शक्तियों का पुंज माना गया है। वे रुद्र के अवतार हैं, उनमें विष्णु की सेवा है और ब्रह्मा का ज्ञान। इसलिए उनकी सेवा करने से सभी देवताओं का आशीर्वाद स्वतः ही प्राप्त हो जाता है। 'सर्ब सुख' का अर्थ है शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति, सांसारिक समृद्धि और आत्मिक आनंद। हनुमान जी एक ऐसे जाग्रत देवता हैं जो अपने भक्त की हर छोटी-बड़ी जरूरत को पूरा करने में सक्षम हैं, बशर्ते भक्त का विश्वास दृढ़ हो।
आध्यात्मिक रूप से, यह पद एकाग्रता के महत्व को बताता है। बिखरा हुआ मन कभी भी सत्य तक नहीं पहुँच सकता। हनुमान जी को 'सेइ' यानी उनकी सेवा करने का अर्थ है उनके गुणों को अपने जीवन में उतारना। जब हम उनके जैसे ब्रह्मचर्य, सेवा और बल को अपनाते हैं, तो हमारे जीवन के सभी अभाव समाप्त हो जाते हैं। यह चौपाई भक्त को यह सिखाती है कि यदि उसने हनुमान जी का हाथ थाम लिया है, तो उसे किसी और आश्रय की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हनुमान जी स्वयं में पूर्ण हैं।
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥
इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति पराक्रमी हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके सभी संकट कट जाते हैं और सारी मानसिक व शारीरिक पीड़ाएं समाप्त हो जाती हैं। हनुमान जी को 'संकटमोचन' कहा ही इसलिए जाता है क्योंकि वे बाधाओं को दूर करने में निपुण हैं। 'बलबीरा' शब्द उनकी उस असीमित शक्ति को संबोधित करता है जिसके सामने काल और कष्ट भी टिक नहीं सकते। यह चौपाई हनुमान चालीसा का एक अत्यंत प्रभावशाली मंत्र माना जाता है जो भक्त को तुरंत सुरक्षा का अनुभव कराता है।
पौराणिक प्रसंगों में हनुमान जी ने सुग्रीव, विभीषण और स्वयं राम-लक्ष्मण के संकटों को दूर किया है। उनके लिए कोई भी समस्या दुर्गम नहीं है। 'सुमिरै' शब्द का अर्थ केवल नाम जपना नहीं, बल्कि उनकी उपस्थिति का हृदय से अनुभव करना है। जब कोई भक्त पूर्ण श्रद्धा से उन्हें पुकारता है, तो हनुमान जी अदृश्य रूप में उसकी रक्षा के लिए आ खड़े होते हैं। यह पद हमें कठिन समय में धैर्य रखने और ईश्वरीय सहायता पर विश्वास करने की प्रेरणा देता है।
दार्शनिक रूप से, संकट अज्ञान और अहंकार से उत्पन्न होते हैं, जबकि पीड़ा हमारे प्रारब्ध का फल है। हनुमान जी ज्ञान के सूर्य हैं, जिनका स्मरण करते ही अज्ञान का अंधेरा छंट जाता है और दुख का अनुभव समाप्त हो जाता है। बल और वीरता केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक भी है। जो व्यक्ति हनुमान जी का ध्यान करता है, उसके भीतर का आत्मविश्वास इतना बढ़ जाता है कि वह बड़े से बड़े कष्ट को भी हंसते हुए पार कर लेता है। यह चौपाई मानसिक और शारीरिक आरोग्य की प्राप्ति का एक अचूक माध्यम है।
जय जय जय हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥
इस चौपाई का अर्थ है कि हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप मुझ पर उसी प्रकार कृपा करें जैसे एक दयालु गुरु अपने शिष्य पर करता है। यहाँ 'गोसाईं' शब्द का अर्थ है इंद्रियों का स्वामी, जो यह दर्शाता है कि हनुमान जी ने अपनी सभी इंद्रियों को वश में कर लिया है। भक्त यहाँ हनुमान जी को केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक गुरु के रूप में पुकार रहा है, क्योंकि बिना गुरु की कृपा के ईश्वर की प्राप्ति और आत्मज्ञान संभव नहीं है।
पौराणिक और आध्यात्मिक परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। हनुमान जी को राम-भक्ति का सबसे बड़ा आचार्य माना जाता है। तीन बार 'जय' कहने का तात्पर्य मन, वाणी और शरीर से उनकी विजय की कामना करना और स्वयं को उन्हें सौंप देना है। गुरु की तरह कृपा करने का अर्थ है कि वे हमारे दोषों को सुधारें, हमें अज्ञान से बाहर निकालें और हमें सही मार्ग दिखाएं। हनुमान जी वह गुरु हैं जो अपने शिष्य को अपनी शक्ति का अंश देकर उसे समर्थ बनाते हैं।
दार्शनिक दृष्टिकोण से, यह पद भक्त की विनम्रता और सीखने की इच्छा को प्रकट करता है। हनुमान जी को गुरु मानना यह दर्शाता है कि साधक उनकी तरह निस्वार्थ सेवा और बुद्धिमत्ता को अपनाना चाहता है। 'कृपा' शब्द यहाँ केवल आशीर्वाद नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक शक्ति का संचार है जो शिष्य के जीवन को रूपांतरित कर देती है। यह चौपाई हमें याद दिलाती है कि भक्ति मार्ग पर प्रगति करने के लिए हमें एक ऐसे रक्षक और शिक्षक की आवश्यकता है जो हमें संसार की माया से बचाकर परमात्मा के चरणों तक ले जा सके।
जो शत बार पाठ कर कोई । छूटहिं बंदि महा सुख होई ॥३८॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि जो व्यक्ति इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करता है, वह सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसे महान सुख की प्राप्ति होती है। 'बंदि' का अर्थ केवल जेल या भौतिक कारावास नहीं है, बल्कि यह अज्ञान, मोह, भय और जन्म-मरण के उन बंधनों का प्रतीक है जिनमें जीवात्मा फंसी हुई है। सौ बार पाठ करना अनुशासन और दृढ़ संकल्प का सूचक है, जो साधक के मन को पूरी तरह से हनुमान जी की ऊर्जा से भर देता है।
पौराणिक संदर्भ में, संख्या का अपना महत्व होता है। 'शत' या सौ बार का पाठ एक प्रकार का अनुष्ठान है जो चित्त की गहरी शुद्धि करता है। तुलसीदास जी ने यह चौपाई लिखकर भक्तों को एक सरल साधना पद्धति दी है। जब मनुष्य बार-बार एक ही पवित्र विचार को दोहराता है, तो वह उसके अवचेतन मन का हिस्सा बन जाता है और उसकी बाहरी परिस्थितियाँ बदलने लगती हैं। महा सुख का अर्थ है वह आनंद जो कभी समाप्त नहीं होता और जो केवल ईश्वरीय कृपा से ही प्राप्त हो सकता है।
आध्यात्मिक रूप से, बंधन हमारे अपने कर्मों और संस्कारों की बेड़ियाँ हैं। हनुमान जी की शक्ति इन बेड़ियों को काटने में सक्षम है क्योंकि वे स्वयं पूर्णतः मुक्त और स्वतंत्र हैं। यह चौपाई हमें अभ्यास की निरंतरता का संदेश देती है। मुक्ति का अर्थ है अपनी असली पहचान को जानना और दुखों से सदा के लिए ऊपर उठ जाना। यह पद हमें विश्वास दिलाता है कि श्रद्धापूर्वक किया गया प्रयास कभी निष्फल नहीं होता और हनुमान जी की स्तुति हमें लौकिक कष्टों से ऊपर उठाकर परम आनंद की स्थिति में पहुँचा देती है।
जो यह पढैं हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥
इसका अर्थ है कि जो भी व्यक्ति इस हनुमान चालीसा का पाठ करेगा, उसे निश्चित ही सफलता और सिद्धियाँ प्राप्त होंगी। इस बात के गवाह स्वयं भगवान शिव (गौरीसा) हैं। हनुमान जी स्वयं भगवान शंकर के ग्यारहवें रुद्र अवतार माने जाते हैं, इसलिए शिव जी की गवाही का अर्थ है कि यह ग्रंथ स्वयं परमात्मा द्वारा प्रमाणित है। 'सिद्धि' का अर्थ केवल चमत्कारिक शक्तियाँ नहीं है, बल्कि कार्य में सफलता, मानसिक शांति और आध्यात्मिक प्रगति भी है।
पौराणिक दृष्टि से, गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब इसकी रचना की थी, तब उन्होंने इसे लोक कल्याण के लिए समर्पित किया था। भगवान शंकर का नाम यहाँ इसलिए लिया गया है क्योंकि वे ही हनुमान जी के मूल स्वरूप हैं और वे ही ज्ञान व वैराग्य के आदि गुरु हैं। 'साखी' शब्द का अर्थ है साक्षी या गवाह, जो यह सिद्ध करता है कि हनुमान चालीसा का प्रभाव संदिग्ध नहीं बल्कि अटल सत्य है। यह चौपाई इस स्तोत्र की महिमा और इसकी फलश्रुति को प्रतिपादित करती है।
दार्शनिक स्तर पर, यह पद श्रद्धा और प्रमाण के महत्व को बताता है। जब हम किसी कार्य को पूरे विश्वास के साथ करते हैं, तो वह सिद्ध हो जाता है। हनुमान चालीसा का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि यह हनुमान जी के दिव्य गुणों के साथ जुड़ने की प्रक्रिया है। भगवान शिव की गवाही यह दर्शाती है कि हनुमान जी की भक्ति ही शिव तत्व तक पहुँचने का मार्ग है। यह चौपाई साधक को यह आश्वासन देती है कि उसकी प्रार्थना सुनी जाएगी और उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति अवश्य होगी।
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥
इसका शाब्दिक अर्थ है कि तुलसीदास सदैव भगवान विष्णु (हरि) के सेवक हैं। हे नाथ! आप मेरे हृदय में अपना निवास स्थान बना लीजिए। यहाँ 'चेरा' शब्द का अर्थ है दास या शिष्य, जो पूर्ण समर्पण का भाव व्यक्त करता है। तुलसीदास जी स्वयं को कर्ता न मानकर केवल एक सेवक मानते हैं और हनुमान जी से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके अंतःकरण में सदैव के लिए बस जाएं। हृदय में निवास करने का अर्थ है कि मन के विचार और भावनाएं पूरी तरह हनुमान जी के अनुरूप हो जाएं।
पौराणिक और आध्यात्मिक परंपरा में भक्त की सबसे बड़ी इच्छा यही होती है कि भगवान उसके हृदय में वास करें। जब ईश्वर हृदय में निवास करते हैं, तो वहां विकार, क्रोध और लोभ के लिए कोई स्थान नहीं रहता। 'नाथ' संबोधन हनुमान जी की सर्वोच्चता और उनके प्रति कवि के अगाध प्रेम को दर्शाता है। यद्यपि तुलसीदास जी ने इसे लिखा है, किंतु 'तुलसीदास' शब्द यहाँ प्रत्येक उस साधक का प्रतिनिधित्व करता है जो स्वयं को ईश्वर का सेवक मानता है। यह विनम्रता की पराकाष्ठा है।
आध्यात्मिक रूप से, यह पद भक्त और भगवान के एकीकरण का प्रतीक है। जब हनुमान जी हमारे हृदय में 'डेरा' डाल लेते हैं, तो हमारा जीवन मंगलमय हो जाता है और हमें कहीं बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह चौपाई सिखाती है कि सच्ची भक्ति केवल बाहरी पूजा नहीं, बल्कि परमात्मा को अपने भीतर अनुभव करना है। यह हनुमान चालीसा का उपसंहार है, जहाँ साधक अपने अहंकार को विसर्जित कर देता है और केवल ईश्वरीय उपस्थिति की याचना करता है, जो कि भक्ति का अंतिम लक्ष्य है।
पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥
इस दोहे का अर्थ है कि हे पवनपुत्र! आप सभी कष्टों को दूर करने वाले हैं और आपका रूप मंगलकारी और शुभ है। हे देवताओं के राजा (हनुमान जी)! आप भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता के साथ मेरे हृदय में सदैव निवास करें। 'पवन तनय' उन्हें प्राण शक्ति का पुत्र बताता है और 'संकट हरन' उनके दुखों को मिटाने वाले स्वरूप को। यह संपूर्ण हनुमान चालीसा का सार है, जहाँ हनुमान जी से अकेले नहीं बल्कि पूरे राम-परिवार के साथ आने की प्रार्थना की गई है।
पौराणिक संदर्भ में हनुमान जी का हृदय फाड़कर राम-सीता के दर्शन कराने वाला प्रसंग यहाँ अत्यंत प्रासंगिक है। वे राम के बिना नहीं रह सकते और राम उनके बिना, इसलिए भक्त चाहता है कि जहाँ हनुमान हों, वहाँ प्रभु राम और जानकी भी अवश्य हों। 'मंगल मूरति' शब्द यह दर्शाता है कि हनुमान जी का दर्शन मात्र ही अमंगल को दूर करने वाला है। उन्हें 'सुर भूप' कहना यह सिद्ध करता है कि वे देवताओं के भी स्वामी और अत्यंत शक्तिशाली हैं। यह दोहा एक संपूर्ण प्रार्थना है जो सुरक्षा और भक्ति दोनों मांगती है।
दार्शनिक रूप से, यह दोहा अंतर्मुखी होने की प्रेरणा देता है। हृदय वह स्थान है जहाँ परमात्मा का साक्षात्कार होता है। जब हमारे भीतर हनुमान (बल और बुद्धि), राम (आत्मा), सीता (भक्ति) और लक्ष्मण (एकाग्रता) का वास हो जाता है, तो हमारा जीवन स्वयं एक तीर्थ बन जाता है। यह दोहा साधक को यह याद दिलाता है कि धर्म का वास्तविक निवास मंदिर में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। हनुमान जी की कृपा से ही यह दिव्य मिलन संभव है, जो हमें संसार के द्वंद्वों से मुक्त कर परम शांति प्रदान करता है।
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जस जो दायक फल चारि ।
बुद्धि हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार ।
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर ॥१।
राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥२॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥३॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुंचित केसा ॥४॥
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेऊ छाजै ॥५॥
शंकर स्वयं केसरीनंदन ।
तेज प्रताप महा जग बंदन ॥६॥
बिद्यावान गुणी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥९॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचंद्र के काज सँवारे ॥१०॥
लाय सँजीवनि लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई ।
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई ॥१२।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥१३॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा ।
नारद सारद सहित अहीशा ॥१४॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते ॥१५॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा ।
राम मिलाय राज-पद दीन्हा ॥१६॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना ।
लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥१७॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥
दुर्गम काज जगत के जे ते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते ॥२०॥
राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥
सब मुख लहहिं तुम्हारी शरना ।
तुम रक्षक काहू को डर ना ॥२२॥
आपन तेज सम्हारो आपे ।
तीनौं लोक हाँक ते काँपे ॥२३॥
भूत पिशाच निकट नहीं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥
नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥२५॥
संकट तें हनुमान छुडावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावैं ॥२६॥
सब पर राम राय सिरताजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥
और मनोरथ जो कोइ लावै ।
तासु अमित जीवन फल पावै ॥२८॥
चारिउ जुग परताप तुम्हारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥
साधु संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ॥३०॥
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता ।
अस बर दीन्ह जानकी माता ॥३१॥
राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सादर हौ रघुपति के दासा ॥३२॥
तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥
अंत काल रघुबर पुर जाई ।
जहां जन्म हरि भगत कहाई ॥३४॥
और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥
संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥
जो शत बार पाठ कर कोई ।
छूटहिं बंदि महा सुख होई ॥३८॥
जो यह पढैं हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥
पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥