जंबुकेश्वरी स्तोत्र

अपराधसहस्राणि ह्यपि कुर्वाणे मयि प्रसीदाम्ब।
अखिलाण्डदेवि करुणावाराशे जम्बुकेशपुण्यतते।
ऊर्ध्वस्थिताभ्यां करपङ्कजाभ्यां
गाङ्गेयपद्मे दधतीमधस्तात्।
वराभये सन्दधतीं कराभ्यां
नमामि देवीमखिलाण्डपूर्वाम्।
जम्बूनाथमनोऽम्बुजात- दिनराड्बालप्रभासन्ततिं
शम्बूकादिवृषावलिं कृतवतीं पूर्वं कृतार्थामपि।
कम्बूर्वीधरधारिणीं वपुषि च ग्रीवाकुचव्याजतो
ह्यम्बूर्वीधररूपिणीं हृदि भजे देवीं क्षमासागरीम्।
जम्बूमूलनिवासं कम्बूज्ज्वलगर्व- हरणचणकण्ठम्।
अम्बूर्वीधररूपं शम्बूकादेर्वरप्रदं वन्दे।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

67.8K

Comments Hindi

3tqwx
वेदधारा के साथ ऐसे नेक काम का समर्थन करने पर गर्व है - अंकुश सैनी

वेदधारा ने मेरी सोच बदल दी है। 🙏 -दीपज्योति नागपाल

वेदधारा को हिंदू धर्म के भविष्य के प्रयासों में देखकर बहुत खुशी हुई -सुभाष यशपाल

सनातन धर्म के भविष्य के प्रति आपकी प्रतिबद्धता अद्भुत है 👍👍 -प्रियांशु

आपकी वेबसाइट बहुत ही अद्भुत और जानकारीपूर्ण है। -आदित्य सिंह

Read more comments

Other stotras

Copyright © 2024 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |