अखिलाण्डेश्वरी स्तोत्र

समग्रगुप्तचारिणीं परन्तपःप्रसाधिकां
मनःसुखैक- वर्द्धिनीमशेष- मोहनाशिनीम्।
समस्तशास्त्रसन्नुतां सदाऽष्चसिद्धिदायिनीं
भजेऽखिलाण्डरक्षणीं समस्तलोकपावनीम्।
तपोधनप्रपूजितां जगद्वशीकरां जयां
भुवन्यकर्मसाक्षिणीं जनप्रसिद्धिदायिनीम्।
सुखावहां सुराग्रजां सदा शिवेन संयुतां
भजेऽखिलाण्डरक्षणीं जगत्प्रधानकामिनीम्।
मनोमयीं च चिन्मयां महाकुलेश्वरीं प्रभां
धरां दरिद्रपालिनीं दिगम्बरां दयावतीम्।
स्थिरां सुरम्यविग्रहां हिमालयात्मजां हरां
भजेऽखिलाण्डरक्षणीं त्रिविष्टपप्रमोदिनीम्।
वराभयप्रदां सुरां नवीनमेघकुन्तलां
भवाब्धिरोगनाशिनीं महामतिप्रदायिनीम्।
सुरम्यरत्नमालिनीं पुरां जगद्विशालिनीं
भजेऽखिलाण्डरक्षणीं त्रिलोकपारगामिनीम्।
श्रुतीज्यसर्व- नैपुणामजय्य- भावपूर्णिकां
गॆभीरपुण्यदायिकां गुणोत्तमां गुणाश्रयाम्।
शुभङ्करीं शिवालयस्थितां शिवात्मिकां सदा
भजेऽखिलाण्डरक्षणीं त्रिदेवपूजितां सुराम्।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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