
भास्वान् काश्यपगोत्रजोऽरुणरुचिः सिंहाधिपोऽर्कः सुरो
गुर्विन्द्वोश्च कुजस्य मित्रमखिलस्वामी शुभः प्राङ्मुखः।
शत्रुर्भार्गवसौरयोः प्रियकुजः कालिङ्गदेशाधिपो
मध्ये वर्तुलपूर्वदिग्दिनकरः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
भगवान सूर्य काश्यप गोत्र में उत्पन्न हुए हैं। उनकी कान्ति अरुण (लाल) है। वे सिंह राशि के स्वामी हैं। गुरु, चन्द्रमा और मंगल उनके मित्र हैं और वे संपूर्ण जगत के स्वामी हैं। उनका मुख पूर्व दिशा की ओर है। शुक्र और शनि उनके शत्रु हैं। मंगल उन्हें प्रिय है। वे कलिंग देश के अधिपति हैं। नवग्रह मण्डल के मध्य में स्थित, गोलाकार स्वरूप वाले और पूर्व दिशा के स्वामी भगवान सूर्यदेव सदा मंगल करें।
चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेयगोत्रोद्भव-
श्चात्रेयश्चतुरश्रवाऽरुणमुखो राकोडुपः शीतगुः।
षट्,सप्ताग्निदशैकशोभनफलो नोरिर्बुधार्कौ प्रियौ
स्वामी यामुनजश्च पर्णसमिधः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
भगवान चन्द्रमा कर्क राशि के स्वामी हैं। उनकी कान्ति श्वेत है और वे अत्रेय गोत्र में उत्पन्न हुए हैं। उनका आकार चौकोर और मुख कुछ अरुण (लाल) है। बुध और सूर्य उनके प्रिय मित्र हैं तथा उनका कोई शत्रु नहीं है। यमुना प्रदेश में उत्पन्न और पलाश की समिधा वाले भगवान चन्द्रमा सदा मंगल करें।
भौमो दक्षिणदिक्त्रिकोणयमदिग्विन्ध्येश्वरः खादिरः
स्वामी वृश्चिकमेषयोस्तु सुगुरुश्चार्कः शशी सौहृदः।
ज्ञोऽरिः षट्त्रिफलप्रदश्च वसुधास्कन्दौ क्रमाद्देवते
भारद्वाजकुलोद्वहोऽरुणरुचिः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
भगवान मंगल दक्षिण दिशा के स्वामी हैं। उनका आकार त्रिकोण है। वे विन्ध्य पर्वत के अधिपति हैं और खैर (खादिर) उनकी समिधा है। वे वृश्चिक और मेष राशि के स्वामी हैं। गुरु, सूर्य और चन्द्रमा उनके मित्र हैं, जबकि बुध उनका शत्रु है। पृथ्वी और कार्तिकेय (स्कन्द) उनके मुख्य देवता हैं। भारद्वाज गोत्र में उत्पन्न और अरुण कान्ति वाले भगवान मंगल सदा मंगल करें।
सौम्यः पीत उदङ्मुखः समिदपामार्गोऽत्रिगोत्रोद्भवो
बाणेशानदिशः सुहृद्रविसुतः शान्तः सुतः शीतगोः।
कन्यायुग्मपतिर्दशाष्टचतुरः षण्णेत्रगः शोभनो
विष्णुर्देव्यधिदेवते मगधपः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
चन्द्रमा के पुत्र भगवान बुध का वर्ण पीत (पीला) है। उनका मुख उत्तर दिशा की ओर है और अपामार्ग (चिरचिटा) उनकी समिधा है। वे अत्रि गोत्र में उत्पन्न हुए हैं और उनका आकार बाण के समान है। सूर्य और शुक्र उनके मित्र हैं। वे कन्या और मिथुन राशि के स्वामी हैं। भगवान विष्णु उनकी अधिदेवता हैं। मगध देश के स्वामी भगवान बुध सदा मंगल करें।
जीवश्चाङ्गिरगोत्रजोत्तरमुखो दीर्घोत्तराशास्थितः
पीतोऽश्वत्थसमिच्च सिन्धुजनितश्चापाधिपो मीनपः।
सूर्येन्दुक्षितिजाः प्रिया बुधसितौ शत्रू समाश्चापरे
सप्तद्वे नवपञ्चमे शुभकरः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
भगवान बृहस्पति आंगिरस गोत्र में उत्पन्न हुए हैं। उनका मुख उत्तर दिशा की ओर है और उनका आकार आयताकार (दीर्घ) है। उनका वर्ण पीत है और पीपल (अश्वत्थ) उनकी समिधा है। सिन्धु देश में उत्पन्न बृहस्पति धनु और मीन राशि के स्वामी हैं। सूर्य, चन्द्र और मंगल उनके मित्र हैं, तथा बुध और शुक्र उनके शत्रु हैं। भगवान बृहस्पति सदा मंगल करें।
शुक्रो भार्गवगोत्रजः सितरुचिः पूर्वम्मुखः पूर्वदिक्-
पाञ्चालो वृषपस्तुलाधिपमहाराष्ट्राधिपौदुम्बरः।
इन्द्राणीमघवा बुधश्च रविजो मित्रार्कचन्द्रावरी
षष्ठाकाशविवर्जितो भगुसुतः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
भगवान शुक्र भार्गव गोत्र में उत्पन्न हुए हैं। उनकी कान्ति श्वेत है और वे पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए हैं। वे वृषभ और तुला राशि के स्वामी हैं तथा गूलर (औदुम्बर) उनकी समिधा है। पञ्चाल और महाराष्ट्र देश के अधिपति हैं। इन्द्राणी और इन्द्र उनके देवता हैं। बुध और शनि उनके मित्र हैं तथा सूर्य और चन्द्रमा शत्रु हैं। भृगु नन्दन भगवान शुक्र सदा मंगल करें।
मन्दः कृष्णनिभः सपश्चिममुखः सौराष्ट्रपः काश्यपिः
स्वामी नक्रसुकुम्भयोर्बुधसितौ मित्रौ कुजेन्दू द्विषौ।
स्थानं पश्चिमदिक् प्रजापतियमौ देवौ धनुर्धारकः
षट्त्रिस्थः शुभकृच्छनी रविसुतः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
भगवान शनि का वर्ण कृष्ण (काला) है और उनका मुख पश्चिम दिशा की ओर है। वे सौराष्ट्र देश के स्वामी और काश्यप गोत्र में उत्पन्न हुए हैं। वे मकर और कुम्भ राशि के स्वामी हैं। बुध और शुक्र उनके मित्र हैं तथा मंगल और चन्द्रमा उनके शत्रु हैं। उनका स्थान पश्चिम दिशा है और उनका स्वरूप धनुष धारण किए हुए है। प्रजापति और यम उनके देवता हैं। सूर्यपुत्र भगवान शनि सदा मंगल करें।
राहुः सिंहलदेशपोऽपि सतमः कृष्णाङ्गशूर्पासनो
यः पैठीनसगोत्रसम्भवसमिद्दूर्वो मुखाद्दक्षिणः।
यः सर्पः पशुदैवतोऽखिलगतः सूर्यग्रहे छादकः
षट्त्रिस्थः शुभकृच्च सिंहकसुतः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
भगवान राहु सिंहल देश के अधिपति हैं। उनका शरीर अन्धकार के समान कृष्ण है और वे सूप (शूर्प) के आकार के आसन पर विराजमान हैं। वे पैठीनस गोत्र में उत्पन्न हुए हैं और दूर्वा (दूब) उनकी समिधा है। उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर है। वे सर्प रूप हैं और सूर्य ग्रहण का कारण बनते हैं। सिंहिका के पुत्र भगवान राहु सदा मंगल करें।
केतुर्जैमिनिगोत्रजः कुशसमिद्वायव्यकोणस्थित-
श्चित्राङ्कध्वजलाञ्छनो हि भगवान् यो दक्षिणाशामुखः।
ब्रह्मा चैव तु चित्रगुप्तपतिमान् प्रीत्याधिदेवः सदा
षट्त्रिस्थः शुभकृच्च बर्बरपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
अर्थ:
भगवान केतु जैमिनि गोत्र में उत्पन्न हुए हैं और कुश उनकी समिधा है। वे वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) में स्थित हैं। उनकी ध्वजा अनेक वर्णों वाली है और उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर है। ब्रह्मा और चित्रगुप्त उनके अधिदेवता हैं। बर्बर देश के स्वामी भगवान केतु सदा मंगल करें।
भास्वान् काश्यपगोत्रजोऽरुणरुचिः सिंहाधिपोऽर्कः सुरो
गुर्विन्द्वोश्च कुजस्य मित्रमखिलस्वामी शुभः प्राङ्मुखः।
शत्रुर्भार्गवसौरयोः प्रियकुजः कालिङ्गदेशाधिपो
मध्ये वर्तुलपूर्वदिग्दिनकरः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेयगोत्रोद्भव-
श्चात्रेयश्चतुरश्रवाऽरुणमुखो राकोडुपः शीतगुः।
षट्,सप्ताग्निदशैकशोभनफलो नोरिर्बुधार्कौ प्रियौ
स्वामी यामुनजश्च पर्णसमिधः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
भौमो दक्षिणदिक्त्रिकोणयमदिग्विन्ध्येश्वरः खादिरः
स्वामी वृश्चिकमेषयोस्तु सुगुरुश्चार्कः शशी सौहृदः।
ज्ञोऽरिः षट्त्रिफलप्रदश्च वसुधास्कन्दौ क्रमाद्देवते
भारद्वाजकुलोद्वहोऽरुणरुचिः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
सौम्यः पीत उदङ्मुखः समिदपामार्गोऽत्रिगोत्रोद्भवो
बाणेशानदिशः सुहृद्रविसुतः शान्तः सुतः शीतगोः।
कन्यायुग्मपतिर्दशाष्टचतुरः षण्णेत्रगः शोभनो
विष्णुर्देव्यधिदेवते मगधपः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
जीवश्चाङ्गिरगोत्रजोत्तरमुखो दीर्घोत्तराशास्थितः
पीतोऽश्वत्थसमिच्च सिन्धुजनितश्चापाधिपो मीनपः।
सूर्येन्दुक्षितिजाः प्रिया बुधसितौ शत्रू समाश्चापरे
सप्तद्वे नवपञ्चमे शुभकरः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
शुक्रो भार्गवगोत्रजः सितरुचिः पूर्वम्मुखः पूर्वदिक्-
पाञ्चालो वृषपस्तुलाधिपमहाराष्ट्राधिपौदुम्बरः।
इन्द्राणीमघवा बुधश्च रविजो मित्रार्कचन्द्रावरी
षष्ठाकाशविवर्जितो भगुसुतः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
मन्दः कृष्णनिभः सपश्चिममुखः सौराष्ट्रपः काश्यपिः
स्वामी नक्रसुकुम्भयोर्बुधसितौ मित्रौ कुजेन्दू द्विषौ।
स्थानं पश्चिमदिक् प्रजापतियमौ देवौ धनुर्धारकः
षट्त्रिस्थः शुभकृच्छनी रविसुतः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
राहुः सिंहलदेशपोऽपि सतमः कृष्णाङ्गशूर्पासनो
यः पैठीनसगोत्रसम्भवसमिद्दूर्वो मुखाद्दक्षिणः।
यः सर्पः पशुदैवतोऽखिलगतः सूर्यग्रहे छादकः
षट्त्रिस्थः शुभकृच्च सिंहकसुतः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।
केतुर्जैमिनिगोत्रजः कुशसमिद्वायव्यकोणस्थित-
श्चित्राङ्कध्वजलाञ्छनो हि भगवान् यो दक्षिणाशामुखः।
ब्रह्मा चैव तु चित्रगुप्तपतिमान् प्रीत्याधिदेवः सदा
षट्त्रिस्थः शुभकृच्च बर्बरपतिः कुर्यात् सदा मङ्गलम्।