नवग्रह पीडाहर स्तोत्र

 

ग्रहाणामादिरादित्यो लोकरक्षणकारकः।
विषणस्थानसंभूतां पीडां हरतु मे रविः।
रोहिणीशः सुधामूर्तिः सुधागात्रः सुधाशनः।
विषणस्थानसंभूतां पीडां हरतु मे विधुः।
भूमिपुत्रो महातेजा जगतां भयकृत् सदा।
वृष्टिकृद्धृष्टिहर्ता च पीडां हरतु मे कुजः।
उत्पातरूपो जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युतिः।
सूर्यप्रियकरो विद्वान् पीडां हरतु मे बुधः।
देवमन्त्री विशालाक्षः सदा लोकहिते रतः।
अनेकशिष्यसम्पूर्णः पीडां हरतु मे गुरुः।
दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामतिः।
प्रभुस्ताराग्रहाणां च पीडां हरतु मे भृगुः।
सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो विशालाक्षः शिवप्रियः।
मन्दचारः प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनिः।
महाशिरा महावक्त्रो दीर्घदंष्ट्रो महाबलः।
अतनुश्चोर्ध्वकेशश्च पीडां हरतु मे तमः।
अनेकरूपवर्णैश्च शतशोऽथ सहस्रशः।
उत्पातरूपो जगतां पीडां हरतु मे शिखी।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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ktsuv
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