दुर्गा सप्तश्लोकी

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥

 

भावार्थ:

वे देवी भगवती महामाया, ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। 

यह श्लोक देवी की अचिंत्य शक्ति का वर्णन करता है। महामाया वह शक्ति है जो इस संपूर्ण सृष्टि का निर्माण करती है और उसे संचालित करती है। बड़े-बड़े ज्ञानी, जिन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया है, वे भी इसी माया के प्रभाव में हैं। उनकी बुद्धि और विवेक भी देवी की शक्ति के आगे विवश हो जाते हैं। यह केवल नकारात्मक मोह नहीं है, बल्कि यह उनकी वह लीला है जो सृष्टि को चलायमान रखती है। इसका गहरा अर्थ यह है कि केवल ज्ञान या तर्क से उन्हें पार नहीं किया जा सकता, बल्कि उनकी कृपा से ही मोह का यह पर्दा हटता है। यह श्लोक हमें विनम्रता सिखाता है कि हम कितने भी ज्ञानी क्यों न हो जाएँ, अंततः उनकी शरण में ही परम सत्य का बोध संभव है।

 

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः

स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।

 

भावार्थ:

हे माँ दुर्गे! जब कोई भयभीत प्राणी आपका स्मरण करता है, तो आप उसके संपूर्ण भय को हर लेती हैं। और जब कोई स्वस्थ (शांत और सुखी) व्यक्ति आपका स्मरण करता है, तो आप उसे अत्यंत शुभ और कल्याणकारी बुद्धि प्रदान करती हैं। 

इस श्लोक में माँ के दो अद्भुत रूपों का वर्णन है। पहला, वह संकटमोचिनी हैं। जो कष्ट में हैं, भयभीत हैं, उनके लिए वे रक्षक हैं। उनका नाम लेते ही बड़े से बड़ा भय समाप्त हो जाता है। दूसरा, वे ज्ञानदायिनी हैं। जो शांति और भक्ति से उनका चिंतन करते हैं, उन्हें वे सांसारिक बुद्धि नहीं, बल्कि 'शुभ मति' प्रदान करती हैं - ऐसी बुद्धि जो धर्म, विवेक और कल्याण के मार्ग पर ले जाए। इस प्रकार, माँ संकट में पड़े लोगों की भी सुनती हैं और जो शांति में हैं, उन्हें और भी ऊँचा उठाती हैं।

 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

 

भावार्थ:

हे दरिद्रता, दुःख और भय को हरने वाली देवी! आपके अतिरिक्त और कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही करुणा से द्रवित रहता हो? 

यह एक भक्त का उद्गार है, जो माँ की अद्वितीय करुणा को पहचानता है। संसार में तीन मुख्य कष्ट हैं - दरिद्रता (अभाव), दुःख (मानसिक पीड़ा) और भय (असुरक्षा)। माँ इन तीनों का नाश करने वाली हैं। इस श्लोक की सबसे सुंदर पंक्ति है 'सदार्द्रचित्ता' - अर्थात जिनका हृदय सदा ही गीला, या करुणा से पिघला हुआ रहता है। उनकी करुणा किसी शर्त या समय पर निर्भर नहीं करती, वह शाश्वत और निरंतर है। वे बिना किसी भेदभाव के सभी का उपकार करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। उनके सिवा ऐसी संपूर्ण और नित्य करुणा किसी और में नहीं है।

 

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

 

भावार्थ:

हे सर्व मंगल में भी परम मंगल स्वरूप, कल्याणमयी, सभी मनोरथों को सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी, नारायणी! आपको नमस्कार है। 

यह एक अत्यंत प्रसिद्ध और शक्तिशाली श्लोक है जो माँ के संपूर्ण स्वरूप का वर्णन करता है।

- सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये: वे केवल मंगल करने वाली नहीं, बल्कि मंगल की भी मंगल हैं, अर्थात वे ही शुभता का मूल स्रोत हैं।

- शिवे: वे स्वयं कल्याण का स्वरूप हैं।

- सर्वार्थसाधिके: वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करने की शक्ति रखती हैं।

- शरण्ये: वे ही अंतिम आश्रय हैं, जहाँ हर जीव को अभय मिलता है।

- त्र्यंबके गौरि, नारायणि: ये नाम उनके शिव और नारायण, दोनों की शक्ति होने का प्रतीक हैं, जो यह दर्शाता है कि वे ही परब्रह्म की संपूर्ण शक्ति हैं। यह श्लोक माँ के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव है।

 

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

 

भावार्थ:

शरण में आए हुए, दीन और पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली, सबकी पीड़ा हरने वाली हे देवी नारायणी! आपको नमस्कार है। 

यह श्लोक माँ के रक्षक और करुणामयी स्वरूप पर केंद्रित है। 'परित्राणपरायणे' का अर्थ है कि उनका मुख्य कार्य ही रक्षा करना है। जो भी असहाय, दुःखी और पीड़ित होकर उनकी शरण में आता है, उसकी रक्षा करना उनका व्रत है, उनका स्वभाव है। वे केवल किसी एक की नहीं, बल्कि 'सर्वस्य' अर्थात सबकी पीड़ा को हरने वाली हैं। यह भक्त को आश्वासन देता है कि जब कोई सहारा नहीं होता, तब माँ का आश्रय निश्चित रूप से मिलता है और वे हर कष्ट को दूर करती हैं।

 

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥

 

भावार्थ:

हे सर्वस्वरूपा (जो सभी रूपों में विद्यमान हैं), हे सर्वेश्वरी (जो सबकी स्वामी हैं), हे सर्वशक्तिसंपन्ना! हे देवी! हमें सभी भयों से बचाइए। हे दुर्गे देवी! आपको नमस्कार है। 

इस श्लोक में भक्त माँ की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और स्वामित्व को स्वीकार करते हुए उनसे रक्षा की प्रार्थना करता है।

- सर्वस्वरूपे: आप ही इस जगत के हर कण-कण में, हर रूप में हैं।

- सर्वेशे: आप ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड की शासक हैं।

- सर्वशक्तिसमन्विते: संसार की समस्त शक्तियाँ आप में ही निहित हैं।

चूंकि आप ही सब कुछ हैं, सबकी स्वामी हैं और सर्वशक्तिमान हैं, इसलिए आप ही हमें सभी प्रकार के (आंतरिक और बाह्य) भयों से बचाने में सक्षम हैं। यह तर्कपूर्ण और भक्तिपूर्ण प्रार्थना है जो उनकी महिमा को स्वीकार करते हुए की गई है।

 

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा

रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां

त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥

 

भावार्थ:

आप जब प्रसन्न होती हैं, तो संपूर्ण रोगों का नाश कर देती हैं। किन्तु जब आप रुष्ट होती हैं, तो सभी प्रिय कामनाओं को नष्ट कर देती हैं। आपकी शरण में आए हुए मनुष्यों पर कोई विपत्ति नहीं आती, बल्कि आपकी शरण में आए हुए लोग स्वयं दूसरों को आश्रय देने वाले बन जाते हैं। 

यह श्लोक दो गहरे सत्यों को प्रकट करता है। पहला, माँ की प्रसन्नता और अप्रसन्नता का फल। जब वे प्रसन्न होती हैं, तो आरोग्य और सुख मिलता है। जब वे रुष्ट होती हैं (अर्थात जब कोई अधर्म करता है), तो उसकी सभी इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं। दूसरा, उनकी शरण का चमत्कार। उनकी शरण लेने वाला न केवल स्वयं विपत्तियों से बचता है, बल्कि वह इतना सक्षम और कृपान्वित हो जाता है कि वह दूसरों के लिए भी आश्रयदाता बन जाता है। यह भक्त की सर्वोच्च अवस्था है, जहाँ वह केवल याचक नहीं रहता, बल्कि माँ की करुणा का माध्यम बन जाता है।

 

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।

एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥

 

भावार्थ:

हे त्रैलोक्य की अखिलेश्वरी! आप तीनों लोकों की सभी बाधाओं को शांत करती हैं। ठीक उसी प्रकार, आप हमारे शत्रुओं का भी विनाश कीजिए। 

यह एक प्रत्यक्ष प्रार्थना है। भक्त माँ को 'अखिलेश्वरी' (संपूर्ण ब्रह्मांड की स्वामिनी) के रूप में संबोधित करता है और स्वीकार करता है कि वे तीनों लोकों की सभी समस्याओं ('सर्वाबाधा') को शांत करने की क्षमता रखती हैं। फिर वह प्रार्थना करता है कि जिस प्रकार आप पूरे ब्रह्मांड का कल्याण करती हैं, उसी प्रकार कृपा करके हमारे शत्रुओं का भी नाश करें। यहाँ 'शत्रु' का अर्थ केवल बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि हमारे भीतर के शत्रु भी हैं - जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। यह हर उस बाधा को दूर करने की प्रार्थना है जो एक शांतिपूर्ण और धर्ममय जीवन के मार्ग में आती है।

 

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।


दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।


दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।


सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते।


शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।


सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।


रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।


त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।


सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्।

 

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