काली भुजंग स्तोत्र

विजेतुं प्रतस्थे यदा कालकस्यासुरान् रावणो मुञ्जमालिप्रवर्गान्।
तदा कामकालीं स तुष्टाव वाग्भिर्जिगीषुर्मृधे बाहुवीर्येण सर्वान्॥

जब रावण, कालक के मुञ्जमालि आदि असुरों को जीतने के लिए निकला, तब युद्ध में अपनी भुजाओं के बल पर सबको जीत लेने की इच्छा से उसने अपने शब्दों से कामकाली की स्तुति की।

यह श्लोक इस स्तोत्र की पृष्ठभूमि बताता है। यह स्तुति रावण द्वारा की गई है, जब वह कालक नामक स्थान के शक्तिशाली असुरों से युद्ध करने जा रहा था। युद्ध में विजय की कामना से, वह देवी कामकाली का आह्वान और उनकी प्रशंसा करता है। कामकाली, देवी काली का एक प्रचंड रूप हैं, जो इच्छाओं को पूर्ण करने वाली और शक्ति प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। योद्धाओं द्वारा युद्ध से पहले अपनी इष्ट देवी या देवता की स्तुति करना एक प्राचीन परंपरा रही है, ताकि उन्हें दैवीय सहायता और विजय का आशीर्वाद प्राप्त हो सके।

महावर्तभीमासृगब्ध्युत्थवीचीपरिक्षालिता श्रान्तकन्थश्मशाने।
चितिप्रज्वलद्वह्निकीलाजटाले शिवाकारशावासने सन्निषण्णाम्॥

जो भयानक भंवरों वाले रक्त के महासागर से उठती लहरों द्वारा धोये गए थके हुए कंठ वाले श्मशान में, जलती हुई चिता की अग्नि की लपटों की जटाओं के बीच, शिव रूपी शव के आसन पर विराजमान हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यहाँ से देवी के विराट और भयानक स्वरूप का ध्यान शुरू होता है। उनका निवास श्मशान में है, जो सांसारिक मोह के अंत का प्रतीक है। रक्त का महासागर सृष्टि के संहार और जीवन की कच्ची ऊर्जा को दर्शाता है। उनका आसन स्वयं शिव हैं, जो शव के रूप में हैं। इसका गहरा अर्थ है कि शक्ति (काली) के बिना, परम चेतना (शिव) भी निष्क्रिय या शव समान है। वही शिव में गति और चेतना का संचार करती हैं। जलती चिता की लपटें उनके संहारक स्वरूप की प्रचंडता को दर्शाती हैं।

महाभैरवीयोगिनीडाकिनीभिः करालाभिरापादलम्बत्कचाभिः।
भ्रमन्तीभिरापीय मद्यामिषास्रान्यजस्रं समं सञ्चरन्तीं हसन्तीम्॥

जो अपने साथ डरावनी महाभैरवियों, योगिनियों और डाकिनियों के साथ घूम रही हैं, जिनके केश पैरों तक लंबे और खुले हुए हैं, और जो निरंतर मदिरा, मांस और रक्त का पान करके उनके साथ विचरण कर रही हैं और हंस रही हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यह श्लोक देवी की सहचरियों का वर्णन करता है, जो उन्हीं की तरह प्रचंड और मुक्त हैं। भैरवी, योगिनी और डाकिनी तंत्र परंपरा में शक्तिशाली देवियाँ या आत्माएँ मानी जाती हैं। उनका भयानक रूप और सामाजिक बंधनों से परे आचरण (जैसे मद्य, मांस का सेवन) यह दर्शाता है कि देवी और उनकी सहचरियाँ सभी प्रकार के सामाजिक नियमों और द्वैत (अच्छा-बुरा, पवित्र-अपवित्र) से परे हैं। वे प्रकृति की अदम्य शक्तियों का प्रतीक हैं। इस भयानक दृश्य के बीच देवी का हंसना उनके आनंदमय और मुक्त स्वभाव को प्रकट करता है, जो सृष्टि और संहार के चक्र से अप्रभावित है।

महाकल्पकालान्तकादम्बिनीत्विट्परिस्पर्धिदेहद्युतिं घोरनादाम्।
स्फुरद्द्वादशादित्यकालाग्निरुद्रज्वलद्विद्युदोघप्रभादुर्निरीक्ष्याम्॥

जिनके शरीर की कांति महाकल्प के अंत में प्रकट होने वाले मेघों की चमक से होड़ करती है, जिनकी गर्जना घोर है, और जिनका तेज प्रलयकाल के बारह सूर्यों, कालाग्नि, रुद्र और कौंधती हुई बिजली की धाराओं के समान है, जिस कारण उन्हें देख पाना भी कठिन है, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

इस श्लोक में देवी के असहनीय तेज और ध्वनि का वर्णन है। उनके शरीर का श्याम वर्ण प्रलय के उन बादलों के समान है जो सब कुछ नष्ट कर देते हैं, यह उनके संहारक स्वरूप का प्रतीक है। उनकी गर्जना ब्रह्मांड को नष्ट करने वाली मूल ध्वनि (प्रणव) है। उनका तेज हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान की सबसे विनाशकारी शक्तियों - बारह सूर्य (जो प्रलय के समय प्रकट होते हैं), समय की अग्नि (कालाग्नि), और रुद्र (शिव का प्रचंड रूप) - के सम्मिलित प्रकाश से भी बढ़कर है। यह उनके परम और सर्वोच्च शक्ति होने को दर्शाता है।

लसन्नीलपाषाणनिर्माणवेदिप्रभश्रोणिबिम्बां चलत्पीवरोरुम्।
समुत्तुङ्गपीनायतोरोजकुम्भां कटिग्रन्थितद्वीपिकृत्त्युत्तरीयाम्॥

जिनका कटि प्रदेश चमकते हुए नीलमणि से बनी वेदी के समान है, जिनकी जांघें स्थूल और गतिमान हैं, जिनके स्तन कलशों के समान ऊँचे, स्थूल और विस्तृत हैं, और जिन्होंने अपनी कमर पर बाघ की खाल को वस्त्र के रूप में बांधा हुआ है, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यह श्लोक उनके शारीरिक स्वरूप का वर्णन करता है। उनका नीला-काला रंग अनंत आकाश या उस शून्य का प्रतीक है जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है। उनके पुष्ट अंग, विशेषकर स्तन, उनके मातृ स्वरूप को दर्शाते हैं; वे ही संपूर्ण ब्रह्मांड का पोषण करने वाली जगदम्बा हैं। कमर पर बंधी बाघ की खाल यह दर्शाती है कि उन्होंने सभी पाशविक वृत्तियों और भय पर विजय प्राप्त कर ली है। यह भगवान शिव का भी परिधान है, जो देवी के परम वैराग्य और आत्म-नियंत्रण को दर्शाता है।

स्रवद्रक्तवल्गन्नृमुण्डावनद्धासृगाबद्धनक्षत्रमालैकहाराम्।
मृतब्रह्मकुल्योपक्लृप्ताङ्गभूषां महाट्टाट्टहासैर्जगत् त्रासयन्तीम्॥

जिन्होंने बहते हुए रक्त से युक्त, हिलते हुए नर-मुंडों की माला पहन रखी है, जिसे अंतड़ियों से गूंथा गया है और जो नक्षत्रों की माला के समान लगती है, जिन्होंने मृत ब्रह्माओं की हड्डियों को अपने अंगों का आभूषण बनाया है, और जो अपने भयानक अट्टहास से जगत को भयभीत कर रही हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यह श्लोक उनके भयावह अलंकरणों का वर्णन करता है। नर-मुंडों की माला अहंकार के नाश का प्रतीक है। ये मुंड संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनसे मंत्र और सृष्टि का निर्माण होता है। ब्रह्माओं की हड्डियों के आभूषण पहनना यह दर्शाता है कि समय के चक्र में ब्रह्मांड के रचयिता (ब्रह्मा) भी उत्पन्न होते और मरते हैं, लेकिन वे उन सब से परे, कालातीत सत्ता हैं। उनका अट्टहास अज्ञान और माया का नाश करने वाला है, जो पापियों को भयभीत करता है और भक्तों को मुक्त करता है।

निपीताननान्तामितोद्धृत्तरक्तोच्छलद्धारया स्नापितोरोजयुग्माम्।
महादीर्घदंष्ट्रायुगन्यञ्चदञ्चल्ललल्लेलिहानोग्रजिह्वाग्रभागाम्॥

जो अपने मुख के भीतर पिए हुए रक्त की उछलती हुई धारा से अपने दोनों स्तनों को स्नान करा रही हैं, और जिनकी भयंकर, चंचल और लपलपाती हुई जीभ का अग्रभाग उनके दो बड़े और लंबे दांतों के बीच से बाहर निकल रहा है, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यह एक गहरा तांत्रिक प्रतीक है। देवी द्वारा पिया जा रहा रक्त ब्रह्मांड की जीवन-शक्ति (प्राण) का प्रतीक है, जिसे वे अपने भीतर समेट लेती हैं। उसी रक्त से अपने स्तनों (जो ब्रह्मांड का पोषण करते हैं) को स्नान कराना यह दर्शाता है कि सृष्टि और संहार, जीवन और मृत्यु एक ही चक्र के हिस्से हैं और वे दोनों की स्रोत हैं। बाहर निकली हुई जीभ उनका सब कुछ भक्षण कर लेने वाला या संहारक रूप दर्शाती है। उनके बड़े दांत अज्ञानता और नकारात्मकता को नष्ट करने की उनकी शक्ति के प्रतीक हैं।

चलत्पादपद्मद्वयालम्बिमुक्तप्रकम्पालिसुस्निग्धसम्भुग्नकेशाम्।
पदन्याससम्भारभीताहिराजाननोद्गच्छदात्मस्तुतिव्यस्तकर्णाम्॥

जिनके सुंदर, घने और बिखरे हुए केश खुले हुए हैं और कांपते हुए उनके चलते हुए कमल रूपी चरणों तक लटक रहे हैं, और जिनके कान, उनके कदमों के भार से भयभीत हुए नागराजाओं के मुख से निकल रही आत्म-स्तुति को सुनने में व्यस्त हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

इस श्लोक में देवी के सौंदर्य और आतंक का मिलाजुला वर्णन है। उनके खुले केश उनकी प्राकृतिक, बंधनमुक्त अवस्था का प्रतीक हैं। कमल जैसे चरण उनकी दिव्यता को दर्शाते हैं। नागराज, जो स्वयं पाताल लोक के शक्तिशाली स्वामी हैं, उनके कदमों के भार से भयभीत हैं, यह देवी की अपार शक्ति और प्रभुत्व को दर्शाता है। भय में भी नागराजों का उनकी स्तुति करना यह दिखाता है कि सभी लोकों के प्राणी, चाहे वे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, उनकी सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करते हैं।

महाभीषणां घोरविंशार्द्धवक्त्रैस्तथासप्तविंशान्वितैर्लोचनैश्च।
पुरोदक्षवामे द्विनेत्रोज्ज्वलाभ्यां तथान्यानने त्रित्रिनेत्राभिरामाम्॥

जो दस (बीस का आधा) भयंकर मुखों और सत्ताईस नेत्रों से युक्त होकर महाभीषणा लग रही हैं, जिनके सामने, दाएं और बाएं के मुख दो-दो नेत्रों से उज्ज्वल हैं तथा अन्य मुख तीन-तीन नेत्रों से सुशोभित हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यह श्लोक और अगला श्लोक मिलकर देवी के विराट स्वरूप का वर्णन करते हैं। उनके दस मुख संभवतः दस महाविद्याओं या दस दिशाओं के प्रतीक हैं, जो उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाते हैं। सत्ताईस नेत्रों का संबंध सत्ताईस नक्षत्रों से हो सकता है, जो समय और भाग्य पर उनके पूर्ण नियंत्रण का संकेत है। कुछ मुखों में दो नेत्र और कुछ में तीन नेत्र होना उनके लौकिक और अलौकिक, दोनों रूपों को दर्शाता है। तीसरा नेत्र दिव्य ज्ञान और अंतर्दृष्टि का प्रतीक है।

लसद्वीपिहर्य्यक्षफेरुप्लवङ्गक्रमेलर्क्षतार्क्षद्विपग्राहवाहैः।
मुखैरीदृशाकारितैर्भ्राजमानां महापिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम्॥

जो चीता, सिंह, सियार, वानर, ऊंट, भालू, गरुड़, हाथी और मगरमच्छ जैसे आकार वाले मुखों से सुशोभित हो रही हैं, और जो ऊपर की ओर उठी हुई विशाल भूरे-पीले रंग की जटाओं का भार धारण किए हुए हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यह श्लोक उनके विभिन्न मुखों के स्वरूप का वर्णन करता है। ये पशु-मुख इस बात का प्रतीक हैं कि वे संपूर्ण प्रकृति और प्राणिजगत की स्वामिनी हैं। सिंह का शौर्य, सियार की चालाकी, हाथी का बल - ये सभी गुण और शक्तियाँ उन्हीं में समाहित हैं। वे सृष्टि की हर ऊर्जा का मूर्त रूप हैं। उनकी ऊपर की ओर उठी हुई जटाएं एक तपस्वी के समान उनके ऊर्ध्वमुखी आध्यात्मिक ऊर्जा और वैराग्य को दर्शाती हैं।

भुजैः सप्तविंशाङ्कितैर्वामभागे युतां दक्षिणे चापि तावद्भिरेव।
क्रमाद्रत्नमालां कपालं च शुष्कं ततश्चर्मपाशं सुदीर्घं दधानाम्॥

जो अपने बाएं भाग में सत्ताईस भुजाओं से युक्त हैं और दाहिने भाग में भी उतनी ही भुजाओं से युक्त हैं, और जो अपने (बाएं) हाथों में क्रम से रत्नमाला, सूखा हुआ कपाल (खोपड़ी), और फिर एक लंबा चर्मपाश धारण करती हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यहाँ से देवी की असंख्य भुजाओं और उनमें धारण किए गए आयुधों और वस्तुओं का वर्णन आरम्भ होता है। उनकी कुल 54 भुजाएं उनकी सर्वशक्तिमत्ता और अनंत क्षमताओं का प्रतीक हैं। वे एक ही समय में अनगिनत कार्य कर सकती हैं। बाएं हाथों में रत्नमाला जप और आध्यात्मिक साधना का, कपाल और पाश मृत्यु, वैराग्य और सांसारिक बंधनों पर नियंत्रण का प्रतीक हैं। बायां पक्ष अक्सर स्त्री और संहारक शक्तियों से जुड़ा होता है।

ततः शक्तिखट्वाङ्गमुण्डं भुशुण्डीं धनुश्चक्रघण्टाशिशुप्रेतशैलान्।
ततो नारकङ्कालबभ्रूरगोन्मादवंशीं तथा मुद्गरं वह्निकुण्डम्॥

फिर (बाएं हाथों में) शक्ति (भाला), खट्वांग (नरमुंड लगी लाठी), कटा हुआ सिर, भुशुण्डी (अस्त्र), धनुष, चक्र, घंटा, बालक का शव, पर्वत, मनुष्य का कंकाल, नेवला, सर्प, उन्माद पैदा करने वाली बांसुरी, मुद्गर (गदा) और अग्निकुंड धारण करती हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

इन वस्तुओं की सूची देवी के विविध कार्यों को दर्शाती है। शक्ति, खट्वांग, मुंड, धनुष, चक्र और मुद्गर जैसे अस्त्र दुष्टों के विनाश और धर्म की रक्षा के लिए हैं। घंटा सृष्टि के नाद का प्रतीक है। बालक का शव और कंकाल जीवन और मृत्यु पर उनके पूर्ण अधिकार को दर्शाते हैं। पर्वत स्थिरता का, सर्प कुंडलिनी शक्ति का और अग्निकुंड यज्ञ और रूपांतरण की शक्ति का प्रतीक है। उन्माद वंशी यह दर्शाती है कि वे सांसारिक चेतना को भंग कर सकती हैं।

अधो डम्मरुं पारिघं भिन्दिपालं तथा मौशलं पट्टिशं प्राशमेवम्।
शतघ्नीं शिवापोतकं चाथ दक्षिणे महारत्नमालां तथा कर्तुखड्गौ॥

नीचे (के बाएं हाथों में) डमरू, परिघ (लोहे की गदा), भिन्दिपाल (छोटा भाला), मूसल, पट्टिश (धारदार भाला) और प्राश (अस्त्र) धारण करती हैं। साथ ही शतघ्नी (एक साथ सौ को मारने वाला अस्त्र) और सियार का बच्चा धारण करती हैं। और फिर दाहिने (हाथों में) एक महान रत्नमाला, तथा कर्तृ (कटार) और खड्ग (तलवार) धारण करती हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

डमरू सृजन और विलय की ध्वनि का प्रतीक है। अन्य विभिन्न अस्त्र उनकी संहारक शक्ति की व्यापकता को दर्शाते हैं। सियार का बच्चा, जो श्मशान से जुड़ा है, उनके श्मशानवासिनी रूप को पुष्ट करता है। दाहिने हाथों में वस्तुओं का क्रम शुरू होता है। दाहिना पक्ष अक्सर पुरुष और रचनात्मक शक्तियों से जुड़ा होता है। महारत्नमाला आशीर्वाद और कृपा का, जबकि कटार और तलवार अज्ञान और अहंकार को काटने का प्रतीक हैं।

चलत्तर्जनीमङ्कुशं दण्डमुग्रं लसद्रत्नकुम्भं त्रिशूलं तथैव।
शरान् पाशुपत्यांस्तथा पञ्च कुन्तं पुनः पारिजातं छुरीं तोमरं च॥

(दाहिने हाथों में) हिलती हुई तर्जनी (चेतावनी की मुद्रा), अंकुश, उग्र दण्ड, चमकता हुआ रत्नकुम्भ, त्रिशूल, तथा पांच पाशुपत बाण, भाला, फिर पारिजात का पुष्प, छुरी और तोमर (एक प्रकार का भाला) धारण करती हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

तर्जनी मुद्रा दुष्टों को चेतावनी देती है। अंकुश मन और इंद्रियों पर नियंत्रण का प्रतीक है। दण्ड और त्रिशूल न्याय और पाप के विनाश को दर्शाते हैं। रत्नकुम्भ धन और समृद्धि का, जबकि पाशुपत बाण अत्यंत शक्तिशाली दिव्य अस्त्र हैं। इन विनाशकारी अस्त्रों के साथ पारिजात पुष्प का होना यह दर्शाता है कि वे कठोरता के साथ-साथ परम कृपा भी करती हैं।

प्रसूनस्रजं डिण्डिमं गृध्रराजं ततः कोरकं मांसखण्डं श्रुवं च।
फलं बीजपूराह्वयं चैव सूचीं तथा पर्शुमेवं गदां यष्टिमुग्राम्॥

(दाहिने हाथों में) फूलों की माला, डिण्डिम (एक प्रकार का ढोल), गिद्धों का राजा, फूल की कली, मांस का टुकड़ा, स्रुवा (यज्ञ की करछुल), बिजौरा नामक फल, सुई, परशु (कुल्हाड़ी), गदा और एक उग्र लाठी धारण करती हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यह सूची उनके विरोधाभासी लेकिन संपूर्ण स्वरूप को और स्पष्ट करती है। फूलों की माला, कली और फल उनके सृजनात्मक और पोषण करने वाले रूप के प्रतीक हैं। वहीं, गिद्धराज, मांस का टुकड़ा और विभिन्न अस्त्र उनके संहारक पक्ष को दर्शाते हैं। स्रुवा उनके यज्ञ की अधिष्ठात्री होने का प्रतीक है, जबकि सुई सृजन की सूक्ष्मता को दर्शाती है।

ततो वज्रमुष्टिं कुणप्पं सुघोरं तथा लालनं धारयन्तीं भुजैस्तैः।
जवापुष्परोचिष्फणीन्द्रोपक्लृप्तक्वणन्नूपुरद्वन्द्वसक्ताङ्घ्रिपद्माम्॥

इसके बाद (दाहिने हाथों में) वज्र-मुक्का, एक अत्यंत भयानक शव, और दुलार की मुद्रा धारण करती हैं। उनके कमल रूपी चरणों में गुड़हल के फूल की तरह लाल चमक वाले नागराज से बने, बजते हुए नूपुरों की जोड़ी है, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

उनके हाथों में विनाशकारी वज्र और भयानक शव के साथ-साथ 'लालन' या दुलार की मुद्रा का होना यह दिखाता है कि वे भक्तों के लिए परम करुणामयी माँ हैं, जबकि दुष्टों के लिए महाविनाशक हैं। उनके चरणों के आभूषण भी साधारण नहीं हैं। वे स्वयं विष और मृत्यु के प्रतीक, नागराज से बने हैं, जो यह दर्शाता है कि उन्होंने मृत्यु को भी अपना आभूषण बना लिया है।

महापीतकुम्भीनसावद्धनद्धस्फुरत्सर्वहस्तोज्ज्वलत्कङ्कणां च।
महापाटलद्योतिदर्वीकरेन्द्रावसक्ताङ्गदव्यूहसंशोभमानाम्॥

जिनके सभी हाथों में बड़े पीले मगरमच्छों से बने उज्ज्वल कंगन चमक रहे हैं, और जो हल्के लाल रंग के नागराजाओं से बने बाजूबंदों के समूह से सुशोभित हो रही हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

इन श्लोकों में उनके आभूषणों का वर्णन है, जो सभी भयानक और शक्तिशाली जीवों से बने हैं। यह उनके संपूर्ण प्राकृतिक जगत पर पूर्ण आधिपत्य का प्रतीक है। मगरमच्छ (जल का शक्तिशाली जीव) और नाग (पृथ्वी और पाताल का शक्तिशाली जीव) उनके कंगन और बाजूबंद हैं, जिसका अर्थ है कि उन्होंने इन सभी शक्तियों को नियंत्रित कर अपने अधीन कर लिया है।

महाधूसरत्त्विड्भुजङ्गेन्द्रक्लृप्तस्फुरच्चारुकाटेयसूत्राभिरामाम्।
चलत्पाण्डुराहीन्द्रयज्ञोपवीतत्विडुद्भासिवक्षःस्थलोद्यत्कपाटाम्॥

जो बड़े धूसर रंग के सर्पराज से बने सुंदर करधनी (कमरबंद) से मनोहर लग रही हैं, और जिनका विशाल वक्ष-स्थल चलते हुए श्वेत नागराज से बने यज्ञोपवीत (जनेऊ) की चमक से प्रकाशित हो रहा है, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

सांपों से बने आभूषण उनकी कुंडलिनी शक्ति के प्रतीक हैं। अलग-अलग रंग के सांप विभिन्न ऊर्जाओं को दर्शाते हैं। उनके शरीर पर सांप का यज्ञोपवीत एक बहुत ही महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी प्रतीक है। यज्ञोपवीत पारंपरिक रूप से ब्राह्मण पुरुषों द्वारा धारण किया जाता है, लेकिन देवी का इसे धारण करना यह दर्शाता है कि वे सभी वर्णों, लिंगों और नियमों से परे हैं और स्वयं ही परम ब्रह्म और सर्वोच्च ज्ञान का स्रोत हैं।

पिषङ्गोरगेन्द्रावनद्धावशोभामहामोहबीजाङ्गसंशोभिदेहाम्।
महाचित्रिताशीविषेन्द्रोपक्लृप्तस्फुरच्चारुताटङ्कविद्योतिकर्णाम्॥

जिनका शरीर, जो महामोह का बीज है, भूरे रंग के नागराज से बंधा हुआ सुशोभित हो रहा है, और जिनके कान एक बड़े, बहुरंगी, विषैले सर्पराज से बने चमकते हुए सुंदर कुण्डलों से प्रकाशित हो रहे हैं, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यहाँ देवी को 'महामोह का बीज' कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे ही माया शक्ति हैं, जो इस संसार का भ्रम रचती हैं। उन्हीं के कारण जीव इस दुनिया को सत्य मानकर उसमें बंधा रहता है। लेकिन रोचक बात यह है कि जो उनकी शरण में जाता है, उसे वे इसी मोह और माया के बंधन से मुक्त भी कर देती हैं। उनके आभूषण के रूप में विषैले सर्प यह दिखाते हैं कि उन्होंने विष और मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर ली है।

वलक्षाहिराजावनद्धोर्ध्वभासिस्फुरत्पिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम्।
महाशोणभोगीन्द्रनिस्यूतमूण्डोल्लसत्किङ्कणीजालसंशोभिमध्याम्॥

जिनकी ऊपर की ओर उठी हुई भूरे-पीले रंग की जटाओं का विशाल भार एक श्वेत नागराज द्वारा बंधा हुआ है, और जिनकी कमर एक बड़े लाल नागराज द्वारा गूंथे गए मुंडों से बनी चमकती हुई घंटियों के जाल से सुशोभित है, (मैं उन कामकाली का स्मरण करता हूँ)।

यह वर्णन उनके अलंकरणों को समाप्त करता है। सफेद नाग द्वारा बंधी जटाएं उनके सिर में स्थित सहस्रार चक्र की जागृत ऊर्जा का प्रतीक हैं। कमर पर मुंडों और सांपों से बनी घंटियों की करधनी फिर से उनके संहारक स्वरूप और मृत्यु पर उनके नियंत्रण को दर्शाती है। इन घंटियों की ध्वनि ब्रह्मांड के लय का प्रतीक हो सकती है।

सदा संस्मरामीदृशीं कामकालीं जयेयं सुराणां हिरण्योद्भवानाम्।
स्मरेयुर्हि येऽन्येऽपि ते वै जयेयुः विपक्षान्मृधे नात्र सन्देहलेशः॥

मैं सदैव ऐसी कामकाली का स्मरण करता हूँ, ताकि मैं देवताओं और हिरण्य के वंशजों (असुरों) पर विजय प्राप्त कर सकूँ। जो कोई अन्य भी उनका स्मरण करेगा, वह भी युद्ध में अपने शत्रुओं पर निश्चित रूप से विजय प्राप्त करेगा, इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है।

यह श्लोक इस स्तोत्र के पाठ का फल (फलश्रुति) बताता है। रावण अपने उद्देश्य को दोहराता है और यह आश्वासन देता है कि जो कोई भी भक्त देवी के इस रूप का ध्यान करेगा, उसे अपने शत्रुओं पर विजय अवश्य मिलेगी। यहाँ 'शत्रु' का अर्थ केवल बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक शत्रु (जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) भी हैं। देवी का ध्यान करने से भक्त निर्भय और शक्तिशाली बनता है।

पठिष्यन्ति ये मत्कृतं स्तोत्रराजं मुदा पूजयित्वा सदा कामकालीम्।
न शोको न पापं न वा दुःखदैन्यं न मृत्युर्न रोगो न भीतिर्न चापत्॥

जो लोग मेरे द्वारा रचे गए इस स्तोत्रों के राजा (स्तोत्रराज) का, सदा कामकाली की प्रसन्नतापूर्वक पूजा करके, पाठ करेंगे, उन्हें न कोई शोक होगा, न पाप लगेगा, न दुःख या दीनता होगी, न मृत्यु का भय होगा, न रोग होगा, न भय होगा और न ही कोई विपत्ति आएगी।

यहाँ स्तोत्र पाठ के लाभों का विस्तार किया गया है। यह केवल युद्ध में विजय तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के सभी दुखों और कष्टों से मुक्ति का मार्ग भी है। इस स्तोत्र को एक शक्तिशाली आध्यात्मिक कवच (रक्षा कवच) के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो भक्त को हर प्रकार के नकारात्मक प्रभावों से बचाता है।

धनं दीर्घमायुःसुखं बुद्धिरोजो यशःशर्म भोगाः स्त्रियः सूनवश्च।
श्रियो मङ्गलं बुद्धिरुत्साह आज्ञा लयः शर्म सर्वविद्या भवेन्मुक्तिरन्ते॥

(उन्हें) धन, लंबी आयु, सुख, बुद्धि, ओज, यश, कल्याण, भोग, पत्नियाँ और पुत्र प्राप्त होंगे। ऐश्वर्य, मंगल, बुद्धि, उत्साह, आज्ञा (की शक्ति), (परमात्मा में) लय, शांति, सभी विद्याएं प्राप्त होंगी और अंत में मुक्ति भी प्राप्त होगी।

यह अंतिम श्लोक पाठ के संपूर्ण फलों को सूचीबद्ध करता है, जिसमें भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों तरह की उपलब्धियाँ शामिल हैं। यह दर्शाता है कि देवी कामकाली का स्वरूप भले ही भयानक हो, लेकिन वे अपने भक्तों पर परम कृपा करती हैं। वे जीवन के सभी सुख (भोग) भी प्रदान करती हैं और अंत में परम लक्ष्य - मोक्ष या मुक्ति भी प्रदान करती हैं। उनकी उपासना से मनुष्य के जीवन के सभी चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की सिद्धि होती है।

 

विजेतुं प्रतस्थे यदा कालकस्यासुरान् रावणो मुञ्जमालिप्रवर्गान्।
तदा कामकालीं स तुष्टाव वाग्भिर्जिगीषुर्मृधे बाहुवीर्येण सर्वान्॥

महावर्तभीमासृगब्ध्युत्थवीचीपरिक्षालिता श्रान्तकन्थश्मशाने।
चितिप्रज्वलद्वह्निकीलाजटाले शिवाकारशावासने सन्निषण्णाम्॥

महाभैरवीयोगिनीडाकिनीभिः करालाभिरापादलम्बत्कचाभिः।
भ्रमन्तीभिरापीय मद्यामिषास्रान्यजस्रं समं सञ्चरन्तीं हसन्तीम्॥

महाकल्पकालान्तकादम्बिनीत्विट्परिस्पर्धिदेहद्युतिं घोरनादाम्।
स्फुरद्द्वादशादित्यकालाग्निरुद्रज्वलद्विद्युदोघप्रभादुर्निरीक्ष्याम्॥

लसन्नीलपाषाणनिर्माणवेदिप्रभश्रोणिबिम्बां चलत्पीवरोरुम्।
समुत्तुङ्गपीनायतोरोजकुम्भां कटिग्रन्थितद्वीपिकृत्त्युत्तरीयाम्॥

स्रवद्रक्तवल्गन्नृमुण्डावनद्धासृगाबद्धनक्षत्रमालैकहाराम्।
मृतब्रह्मकुल्योपक्लृप्ताङ्गभूषां महाट्टाट्टहासैर्जगत् त्रासयन्तीम्॥

निपीताननान्तामितोद्धृत्तरक्तोच्छलद्धारया स्नापितोरोजयुग्माम्।
महादीर्घदंष्ट्रायुगन्यञ्चदञ्चल्ललल्लेलिहानोग्रजिह्वाग्रभागाम्॥

चलत्पादपद्मद्वयालम्बिमुक्तप्रकम्पालिसुस्निग्धसम्भुग्नकेशाम्।
पदन्याससम्भारभीताहिराजाननोद्गच्छदात्मस्तुतिव्यस्तकर्णाम्॥

महाभीषणां घोरविंशार्द्धवक्त्रैस्तथासप्तविंशान्वितैर्लोचनैश्च।
पुरोदक्षवामे द्विनेत्रोज्ज्वलाभ्यां तथान्यानने त्रित्रिनेत्राभिरामाम्॥

लसद्वीपिहर्य्यक्षफेरुप्लवङ्गक्रमेलर्क्षतार्क्षद्विपग्राहवाहैः।
मुखैरीदृशाकारितैर्भ्राजमानां महापिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम्॥

भुजैः सप्तविंशाङ्कितैर्वामभागे युतां दक्षिणे चापि तावद्भिरेव।
क्रमाद्रत्नमालां कपालं च शुष्कं ततश्चर्मपाशं सुदीर्घं दधानाम्॥

ततः शक्तिखट्वाङ्गमुण्डं भुशुण्डीं धनुश्चक्रघण्टाशिशुप्रेतशैलान्।
ततो नारकङ्कालबभ्रूरगोन्मादवंशीं तथा मुद्गरं वह्निकुण्डम्॥

अधो डम्मरुं पारिघं भिन्दिपालं तथा मौशलं पट्टिशं प्राशमेवम्।
शतघ्नीं शिवापोतकं चाथ दक्षिणे महारत्नमालां तथा कर्तुखड्गौ॥

चलत्तर्जनीमङ्कुशं दण्डमुग्रं लसद्रत्नकुम्भं त्रिशूलं तथैव।
शरान् पाशुपत्यांस्तथा पञ्च कुन्तं पुनः पारिजातं छुरीं तोमरं च॥

प्रसूनस्रजं डिण्डिमं गृध्रराजं ततः कोरकं मांसखण्डं श्रुवं च।
फलं बीजपूराह्वयं चैव सूचीं तथा पर्शुमेवं गदां यष्टिमुग्राम्॥

ततो वज्रमुष्टिं कुणप्पं सुघोरं तथा लालनं धारयन्तीं भुजैस्तैः।
जवापुष्परोचिष्फणीन्द्रोपक्लृप्तक्वणन्नूपुरद्वन्द्वसक्ताङ्घ्रिपद्माम्॥

महापीतकुम्भीनसावद्धनद्धस्फुरत्सर्वहस्तोज्ज्वलत्कङ्कणां च।
महापाटलद्योतिदर्वीकरेन्द्रावसक्ताङ्गदव्यूहसंशोभमानाम्॥

महाधूसरत्त्विड्भुजङ्गेन्द्रक्लृप्तस्फुरच्चारुकाटेयसूत्राभिरामाम्।
चलत्पाण्डुराहीन्द्रयज्ञोपवीतत्विडुद्भासिवक्षःस्थलोद्यत्कपाटाम्॥

पिषङ्गोरगेन्द्रावनद्धावशोभामहामोहबीजाङ्गसंशोभिदेहाम्।
महाचित्रिताशीविषेन्द्रोपक्लृप्तस्फुरच्चारुताटङ्कविद्योतिकर्णाम्॥

वलक्षाहिराजावनद्धोर्ध्वभासिस्फुरत्पिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम्।
महाशोणभोगीन्द्रनिस्यूतमूण्डोल्लसत्किङ्कणीजालसंशोभिमध्याम्॥

सदा संस्मरामीदृशीं कामकालीं जयेयं सुराणां हिरण्योद्भवानाम्।
स्मरेयुर्हि येऽन्येऽपि ते वै जयेयुः विपक्षान्मृधे नात्र सन्देहलेशः॥

पठिष्यन्ति ये मत्कृतं स्तोत्रराजं मुदा पूजयित्वा सदा कामकालीम्।
न शोको न पापं न वा दुःखदैन्यं न मृत्युर्न रोगो न भीतिर्न चापत्॥

धनं दीर्घमायुःसुखं बुद्धिरोजो यशः शर्म भोगाः स्त्रियः सूनवश्च।
श्रियो मङ्गलं बुद्धिरुत्साह आज्ञा लयः शर्म सर्वविद्या भवेन्मुक्तिरन्ते॥

 

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