अम्बा स्तुति

अम्बा स्तुति

Verse 1

चेटी भवन्निखिलखेटी कदंबवनवाटीषु नाकपटली

कोटीरचारुतरकोटीमणीकिरणकोटीकरम्बितपदा ।

पाटीरगन्धिकुचशाटी कवित्वपरिपाटी मगाधिपसुता

घोटीखुरादधिकधाटीमुदारमुखवीटीरसेन तनुताम् ‖ 1 ‖

 

यह स्तोत्र देवी के कदम्ब वन स्थित दिव्य आवास के वर्णन से आरम्भ होता है। यहाँ चेटी-भवन्निखिलखेटी का भाव है कि समस्त देवगण देवी की सेवा में एक सेवक की भांति सदैव तत्पर रहते हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण उन्हें मगाधिपसुता कहा गया है। उनके चरणों की महिमा इतनी है कि जब देवता उनके चरणों में नमन करते हैं, तो उनके मुकुटों में जड़े मणियों की किरणों से देवी के चरण सदैव चमकते रहते हैं। चन्दन की सुगन्ध से युक्त उनके वस्त्र उनकी शीतलता और सौम्यता का प्रतीक हैं।

दार्शनिक रूप से, यह श्लोक देवी को समस्त कलाओं और कवित्व की जननी के रूप में स्थापित करता है। उनके मुख की मधुरता और उनके हास्य में जो रसमयता है, वह भक्त को संसार के संहारक रूप से हटाकर मातृ-स्वरूप की ओर ले जाती है। यह श्लोक हमें स्मरण कराता है कि समस्त लौकिक और अलौकिक सौंदर्य का मूल स्रोत वही पराशक्ति है। उनकी कृपा ही वह मार्ग है जो साधक की बुद्धि को परिष्कृत कर उसे सत्य के प्रति उन्मुख करती है। वे न केवल ब्रह्मांड की स्वामिनी हैं, बल्कि भक्त के जीवन में रसों का संचार करने वाली करुणामयी माता भी हैं।

 

Verse 2

द्वैपायनप्रभृतिशापायुधत्रिदिवसोपानधूलिचरणा

पापापहस्वमनुजापानुलीनजनतापापनोदनिपुणा ।

नीपालया सुरभिधूपालका दुरितकूपादुदञ्चयतु मां

रूपाधिका शिखरिभूपालवंशमणिदीपायिता भगवती ‖ 2 ‖

 

इस श्लोक में देवी को संसार के दुखों और दोषों से मुक्ति दिलाने वाली परम रक्षक के रूप में संबोधित किया गया है। महर्षि व्यास जैसे ऋषियों की शक्ति भी उन्हीं के चरणों की धूलि से संचालित होती है, जो स्वर्ग तक पहुँचने के लिए एक सोपान या सीढ़ी के समान है। वे दोषों को नष्ट करने में अत्यंत निपुण हैं और अपने शरणागत भक्तों के समस्त कष्टों का हरण करती हैं। दुरितकूप का अर्थ है अधर्म और अज्ञान का वह गहरा गड्ढा, जिसमें फँसा हुआ जीव स्वयं को असहाय पाता है, और केवल माँ की कृपा ही उसे बाहर निकाल सकती है।

पौराणिक संदर्भ में, वे पर्वतराज के कुल में एक उज्ज्वल दीपक के समान हैं, जो अपने प्रकाश से संपूर्ण वंश को आलोकित करती हैं। दार्शनिक दृष्टि से, यह श्लोक जीव की उस विवशता को दर्शाता है जहाँ वह अपने संचित कर्मों के जाल से नहीं निकल पाता। देवी का अनुग्रह ही वह दिव्य प्रकाश है जो आत्मा को कर्म-बंधन से मुक्त करता है। यह स्तुति साधक को आत्म-समर्पण का मार्ग दिखाती है, जहाँ वह पूरी तरह माँ की करुणा पर आश्रित होकर अपने अज्ञान का अंत करने की प्रार्थना करता है।

 

Verse 3

यालीभिरात्मतनुतालीनकृत्प्रियकपालीषु खेलति भवा

व्यालीनकुल्यसितचूलीभरा चरणधूलीलसन्मणिगणा ।

यालीभृति श्रवसि तालीदलं वहति यालीकशोभितिलका

सालीकरोतु मम काली मनः स्वपदनालीकसेवनविधौ ‖ 3 ‖

 

यहाँ देवी को काली के रूप में स्मरण किया गया है, जो शिव के साथ लीला करती हैं। वे सर्पों के आभूषण धारण करने वाली और अपने चरणों की धूलि से मणियों को प्रकाशित करने वाली शक्ति हैं। उनके कानों में ताड़ के पत्ते के कुंडल और माथे पर तिलक उनकी सुंदरता को अलौकिक बनाते हैं। वे काल की स्वामिनी हैं, फिर भी अपने भक्तों के लिए परम दयालु हैं। कवि उनसे प्रार्थना करता है कि वह उसके चंचल मन को अपने कमल रूपी चरणों की सेवा में स्थिर करें।

आध्यात्मिक अर्थ में, यह श्लोक द्वैत और अद्वैत के मिलन का बोध कराता है। काली का वह रूप जो संसार को डराने वाला लगता है, वास्तव में भक्त के अहंकार का विनाश करने वाला है। जब साधक उनके चरणों का ध्यान करता है, तो वह काल के चक्र और भय से मुक्त हो जाता है। यह श्लोक साधक को सिखाता है कि मन को विषयों से हटाकर भक्ति में लगाने का एकमात्र उपाय देवी के पावन चरणों का आश्रय लेना है। यह भक्ति ही अंधकार को मिटाकर भीतर चैतन्य का प्रकाश जगाती है, जिससे साधक के मन की चंचलता सदा के लिए समाप्त हो जाती है।

 

Verse 4

बालामृतांशुनिभफालामनागरुणचेला नितम्बफलके

कोलाहलक्षपितकालामराकुशलकीलालशोषणरविः ।

स्थूला कुचे जलदनीलाकचे कलितवीला कदम्बविपिने

शूलायुधप्रणतिशीला दधातु हृदि शैलाधिराजतनया ‖ 4 ‖

 

इस श्लोक में देवी के मोहक स्वरूप का चित्रण है। उनका मस्तक बाल चन्द्रमा के समान उज्ज्वल है और उन्होंने लाल वस्त्र धारण किए हैं। वे देवताओं के भय को दूर करने वाली और संकटों के महासागर को सोखने वाली सूर्य के समान तेजस्वी हैं। उनके केश मेघों के समान काले हैं, और उनका मातृ-स्वरूप उनके विशाल स्तन-भार में परिलक्षित होता है। वे शिव के प्रति नत-मस्तक रहती हैं, जो उनकी सौम्यता और समर्पण की पराकाष्ठा है।

दार्शनिक रूप से, देवी यहाँ प्रकृति और पुरुष के मिलन की अधिष्ठात्री हैं। वे कदम्ब वन में अपनी लीलाएं करती हैं। साधक के हृदय में उनका वास होना ही आत्मिक सिद्धि का प्रथम सोपान है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि शक्ति और सौम्यता का एक साथ होना ही पूर्णता है। जब साधक उन्हें अपने हृदय में धारण करता है, तो उसके भीतर के समस्त द्वंद्व और अशांति का स्वतः नाश हो जाता है। वे उस परम शांति की प्रतीक हैं, जो सांसारिक कोलाहल के बीच भी भक्त के भीतर निवास करती है। उनके हृदय में वास का अर्थ है स्वयं के भीतर के ईश्वरत्व को पहचानना और उनके साथ एकाकार हो जाना।

 

Verse 5

कम्बावतीव सविडम्बा गलेन नवतुम्बाभवीणसविधा

बिम्बाधरा विनतशम्बायुधादिनिकुरुम्बा कदम्बविपिने ।

अम्बा कुरङ्गमदजम्बालरोचिरिह लम्बालका दिशतु मे

शं बाहुलेयशशिबिम्बाभिराममुखसम्बाधिता स्तनभरा ‖ 5 ‖

 

कवि यहाँ देवी की शारीरिक शोभा का वर्णन करते हुए उन्हें शंख जैसी ग्रीवा वाली और बिम्ब फल जैसे लाल अधरों वाली बताता है। वे देवताओं द्वारा पूजित हैं और कस्तूरी की सुगंध से सुवासित हैं। उनके पुत्र बाहुलेय यानी कार्तिकेय का उल्लेख उनके मातृ-स्वरूप को उजागर करता है। माँ का मुख चंद्रमा के समान शीतल है। उनके विशाल स्तन-भार उनकी अनंत करुणा और पोषण की शक्ति के प्रतीक हैं।

यह श्लोक माँ की ममता और दिव्य सौंदर्य का मिलन है। अम्ब शब्द उनके वात्सल्य को दर्शाता है। वे केवल एक निर्गुण शक्ति नहीं, बल्कि एक माँ हैं जो अपने पुत्रों के दुखों को हरने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। दार्शनिक रूप से, यह श्लोक ईश्वर के सगुण रूप के प्रति प्रेम को जागृत करता है। जब साधक माँ की सुंदरता और प्रेम के भाव में खो जाता है, तो उसके भीतर का अहंकार स्वतः ही गल जाता है और वह पूर्णतः उनके प्रति समर्पित हो जाता है। यह भक्ति का वह स्तर है जहाँ साधक को ईश्वर में अपना ही प्रिय रूप दिखाई देने लगता है, और संसार के प्रति उसका मोह पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

 

Verse 6

दासायमानसुमहासा कदम्बवनवासा कुसुम्भसुमनो-

वासा विपञ्चिकृतरासा विधूतमधुमासारविन्दमधुरा ।

कासारसूनततिभासाभिरामतनुरासारशीतकरुणा

नासामणिप्रवरभासा शिवा तिमिरमासादयेदुपरतिम् ‖ 6 ‖

 

देवी कदम्ब वन में निवास करती हैं और उनका मंद-हास देवताओं को भी अपना सेवक बना लेता है। वे वीणा की मधुर ध्वनि और रास-लीला में आनंदित होने वाली हैं। उनकी करुणा वर्षा की तरह शीतल है, जो भक्तों के संताप को मिटा देती है। उनकी नासिका में जड़ी मणि की चमक संसार के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने में समर्थ है। वे स्वयं शिव स्वरूपा हैं जो मन की चंचलता को विराम देती हैं।

यहाँ ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। देवी का हास्य अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाला प्रकाश है। दार्शनिक रूप से, तिमिर या अंधकार मन का वह अज्ञान है जो उसे माया में बांधे रखता है। देवी की करुणा ही वह औषधि है जो आत्मा को पुनः परमात्मा से जोड़ती है। यह श्लोक भक्त को प्रेरित करता है कि वह बाहरी कर्मों से हटकर माँ के भीतर छिपे परम शांति के स्वरूप का ध्यान करे। इससे उसकी चेतना ऊर्ध्वगामी होती है और वह भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठकर आत्मा की शांति को प्राप्त करता है। यह शांति ही वह स्थिति है जहाँ साधक को स्वयं के भीतर दिव्य प्रकाश का अनुभव होता है।

 

Verse 7

न्यङ्काकरे वपुषि कङ्कालरक्तपुषि कङ्कादिपक्षिविषये

त्वं कामनामयसि किं कारणं हृदयपङ्कारिमे हि गिरिजाम् ।

शङ्काशिलानिशितटङ्कायमानपदसङ्काशमानसुमनो-

झङ्कारिभृङ्गततिमङ्कानुपेतशशिसङ्काशवक्त्रकमलाम् ‖ 7 ‖

 

यह श्लोक बहुत गहरा प्रश्न पूछता है: हे मन, तू अस्थि, रक्त और नश्वर शरीर के पीछे क्यों भाग रहा है? तू व्यर्थ की वासनाओं को छोड़कर पर्वतराज की पुत्री गिरिजा के चरणों की शरण में क्यों नहीं जाता? उनके चरण पत्थर जैसी शंकाओं को काटने वाली छैनी के समान हैं। उनका मुख चंद्रमा के समान है, जिस पर भक्ति के भंवरे मँडराते रहते हैं।

यह वैराग्य और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है। कवि साधक को उसके अनित्य शरीर और सांसारिक आसक्तियों के प्रति सचेत करता है। वास्तविकता केवल देवी का स्वरूप है जो शाश्वत है। दार्शनिक रूप से, यह श्लोक मन को एकाग्र करने की शिक्षा देता है। जब मन शरीर की नश्वरता को समझ लेता है और अपना ध्यान देवी के चरणों पर लगाता है, तो वही मन जो पहले सांसारिक विकारों में फंसा था, अब दिव्य आनंद का अनुभव करने लगता है। यह शरीर नश्वर है, किन्तु आत्मा जो देवी का अंश है, वह अमर है। अतः साधक को क्षणिक सुखों की कामना छोड़कर उस नित्य शक्ति की शरण लेनी चाहिए जो उसे मोक्ष दिला सके।

 

Verse 8

जम्भारिकुम्भिपृथुकुम्भापहासि कुचसम्भाव्यहारलतिका

रम्भाकरीन्द्रकरदम्भापहोरुगतिडिम्भानुरञ्जितपदा ।

शम्भा उदारपरिरम्भाङ्कुरत्पुलकदम्भानुरागपिशुना

शं भासुराभरणगुम्भा सदा दिशतु शुम्भासुरप्रहरणा ‖ 8 ‖

 

यहाँ देवी को शुम्भासुर का वध करने वाली वीरांगना के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी चाल हाथी और कदली के समान सुंदर है। उनके आभूषण और उनका रूप अत्यधिक तेजस्वी है। वे अपने भक्तों को उदारतापूर्वक गले लगाती हैं, जिससे साधक के भीतर प्रेम के रोमांच उत्पन्न होते हैं। वे सुख प्रदान करने वाली और मंगलकारी हैं।

पौराणिक रूप से, शुम्भासुर का वध अहंकार के विनाश का प्रतीक है। दार्शनिक रूप से, यह श्लोक बताता है कि देवी केवल कोमल नहीं हैं, वे दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश करने वाली योद्धा भी हैं। साधक के जीवन में आने वाली बाधाएं ही शुम्भासुर हैं, और देवी का स्मरण उन बाधाओं को दूर करता है। वे अपने प्रेम से भक्तों को अभयदान देती हैं और उनके जीवन में सुख-शांति का संचार करती हैं। यह श्लोक भक्त के भीतर के उस योद्धा को जगाता है जो अपनी साधना के बल पर अपने भीतर के शत्रुओं को समाप्त कर सके और देवी की कृपा से परम पद को प्राप्त करे।

 

Verse 9

दाक्षायणी दनुजशिक्षाविधौ विकृतदीक्षा मनोहरगुणा

भिक्षाशिनो नटनवीक्षाविनोदमुखि दक्षाध्वरप्रहरणा ।

वीक्षां विधेहि मयि दक्षा स्वकीयजनपक्षा विपक्षविमुखी

यक्षेशसेवितनिराक्षेपशक्ति जय लक्षावधानकलना ‖ 9 ‖

 

देवी दक्ष की पुत्री (दाक्षायणी) हैं, लेकिन उन्होंने अपने पिता के उस यज्ञ का नाश कर दिया जो शिव के विरुद्ध था। वे दानवों को शिक्षा देने में निपुण हैं और भिक्षा मांगने वाले शिव की प्रिय हैं। कवि प्रार्थना करता है कि माँ अपनी करुणा भरी दृष्टि उस पर डाले और उसे अपने पक्ष में रखे। वे यक्षराज कुबेर द्वारा पूजित और निर्बाध शक्ति वाली हैं।

यह श्लोक भक्ति के उस भाव को दर्शाता है जहाँ साधक अपने उद्धार के लिए प्रार्थना करता है। दक्ष का यज्ञ अहंकार का प्रतीक था, जिसे देवी ने नष्ट कर दिया। दार्शनिक अर्थ में, यह बताता है कि बिना भक्ति और शिव के प्रति सम्मान के किए गए कर्म व्यर्थ हैं। माँ की कृपा ही वह शक्ति है जो साधक को उसके विपक्ष (अज्ञान और काम) से विमुख करके सत्य के पक्ष में ले जाती है। वे बाधाओं को दूर करने वाली हैं और अपने भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़तीं। इस स्तुति के माध्यम से साधक उनके प्रति अपना पूर्ण विश्वास व्यक्त करता है और उनसे स्वयं को अज्ञान से दूर करने का आग्रह करता है।

 

Verse 10

वन्दारुलोकवरसन्धायिनी विमलकुन्दावदातरदना

बृन्दारुबृन्दमणिबृन्दारविन्दमकरन्दाभिषिक्तचरणा ।

मन्दानिला कलितमन्दारदामभिरमन्दाभिराममकुटा

मन्दाकिनीजवनभिन्दारवाचमरविन्दानना दिशतु मे ‖ 10 ‖

 

देवी भक्तों को वर देने वाली और कुंद के फूल जैसी उज्ज्वल दंतपंक्ति वाली हैं। देवता उनके कमल रूपी चरणों की सेवा में निरंतर लगे रहते हैं। मंदाकिनी नदी की धारा उनके मुख की शोभा बढ़ाती है। वे मंदार फूलों की माला धारण करने वाली और मंद पवन के समान सुखद हैं।

यह श्लोक भक्ति के आनंद का वर्णन है। यहाँ देवगण देवी के चरणों में मधु के समान अपने समर्पण को अर्पित कर रहे हैं। दार्शनिक दृष्टि से, यह साधक की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ वह ईश्वर की दिव्यता के दर्शन करता है और स्वयं को उनके चरणों में अर्पित कर देता है। यह पवित्रता, शांति और आनंद की स्थिति है जहाँ देवी का आशीर्वाद साधक के समस्त जीवन को अमृत के समान मीठा बना देता है। देवी का रूप इतना दिव्य है कि उसके दर्शन मात्र से भक्त के पाप धुल जाते हैं और वह परम शांति को प्राप्त करता है। यह स्तुति हमें उस अनंत सौंदर्य के प्रति जागरूक करती है जो ब्रह्मांड के कण-कण में विद्यमान है।

 

Verse 11

यत्राशयो लगति तत्रागजा भवतु कुत्रापि निस्तुलशुका

सुत्रामकालमुखसत्रासकप्रकरसुत्राणकारिचरणा ।

छत्रानिलातिरयपत्त्राभिभिरामगुणमित्रामरीसमवधूः

कुत्रासहीनमणिचित्राकृतिस्फुरितपुत्रादिदाननिपुणा ‖ 11 ‖

 

कवि कामना करता है कि जहाँ भी उसका मन लगे, वहीं देवी का वास हो। वे काल के भय से रक्षा करने वाली हैं। वे अपने भक्तों को सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने में निपुण हैं। उनकी कृपा का विस्तार इतना है कि वे हर स्थान पर अपने साधक की रक्षा के लिए उपस्थित रहती हैं।

आध्यात्मिक रूप से, यह सर्वव्यापकता का बोध है। जब भक्त का मन पूरी तरह से देवी में लीन हो जाता है, तो उसे हर वस्तु और हर स्थान पर माँ के ही दर्शन होते हैं। यह श्लोक विश्वास की पराकाष्ठा है कि देवी हर स्थिति में और हर स्थान पर भक्त की रक्षा करती हैं। उनका रूप अद्भुत और चमत्कारिक है, जो भक्त के जीवन को भौतिक और आध्यात्मिक सुखों से भर देता है। वे न केवल दुखों को हरने वाली हैं, बल्कि जीवन में जो भी मंगलकारी है, उसकी स्वामिनी हैं। उनके प्रति पूर्ण विश्वास ही साधक को जीवन की अनिश्चितताओं से सुरक्षित रखता है।

 

Verse 12

इन्धानकीरमणिबन्धा भवे हृदयबन्धावतीव रसिका

सन्धावती भुवनसन्धारणेऽप्यमृतसिन्धावुदारनिलया ।

गन्धानुभावमुहुरन्धालिपीतकचबन्धा समर्पयतु मे

शं धाम भानुमपिरुन्धानमाशु पदसन्धानमप्यनुगता ‖ 12 ‖

 

अंतिम श्लोक में कवि हृदय के मिलन की प्रार्थना करता है। देवी हृदय को अपने प्रेम से बांधने वाली और रस की स्वामिनी हैं। वे संसार को धारण करती हैं और अमृत के सागर में निवास करती हैं। उनकी सुगंध और सौंदर्य सूर्य के प्रकाश को भी ढक लेते हैं। कवि अंत में माँ से प्रार्थना करता है कि वे उसे अपने चरणों की भक्ति प्रदान करें।

यह पूर्ण समर्पण और मोक्ष की प्रार्थना है। यहाँ सूर्य का प्रकाश भी माँ के तेज के आगे फीका पड़ जाता है, जो यह दर्शाता है कि देवी का प्रकाश आत्मिक ज्ञान का प्रकाश है। कवि कामना करता है कि उसका मन हमेशा उनके चरणों में लगा रहे और वह संसार के द्वंद्वों से मुक्त होकर उनके धाम को प्राप्त करे। यह एक भक्त की अंतिम यात्रा है, जहाँ वह स्वयं को माँ की करुणा में विलीन कर देता है। देवी के चरणों की प्राप्ति ही जीवन का चरम लक्ष्य है, और इस स्तुति के अंत में भक्त उसी शाश्वत सत्य के साथ एक होने का संकल्प लेता है।

 

चेटी भवन्निखिलखेटी कदम्बवनवाटीषु नाकपटली
कोटीरचारुतरकोटीमणीकिरणकोटीकरम्बितपदा ।
पाटीरगन्धिकुचशाटी कवित्वपरिपाटी मगाधिपसुता
घोटीखुरादधिकधाटीमुदारमुखवीटीरसेन तनुताम् ‖ 1 ‖

द्वैपायनप्रभृतिशापायुधत्रिदिवसोपानधूलिचरणा
पापापहस्वमनुजापानुलीनजनतापापनोदनिपुणा ।
नीपालया सुरभिधूपालका दुरितकूपादुदञ्चयतु मां
रूपाधिका शिखरिभूपालवंशमणिदीपायिता भगवती ‖ 2 ‖

यालीभिरात्मतनुतालीनकृत्प्रियकपालीषु खेलति भवा
व्यालीनकुल्यसितचूलीभरा चरणधूलीलसन्मणिगणा ।
यालीभृति श्रवसि तालीदलं वहति यालीकशोभितिलका
सालीकरोतु मम काली मनः स्वपदनालीकसेवनविधौ ‖ 3 ‖

बालामृतांशुनिभफालामनागरुणचेला नितम्बफलके
कोलाहलक्षपितकालामराकुशलकीलालशोषणरविः ।
स्थूला कुचे जलदनीलाकचे कलितवीला कदम्बविपिने
शूलायुधप्रणतिशीला दधातु हृदि शैलाधिराजतनया ‖ 4 ‖

कम्बावतीव सविडम्बा गलेन नवतुम्बाभवीणसविधा
बिम्बाधरा विनतशम्बायुधादिनिकुरुम्बा कदम्बविपिने ।
अम्बा कुरङ्गमदजम्बालरोचिरिह लम्बालका दिशतु मे
शं बाहुलेयशशिबिम्बाभिराममुखसम्बाधिता स्तनभरा ‖ 5 ‖

दासायमानसुमहासा कदम्बवनवासा कुसुम्भसुमनो-
वासा विपञ्चिकृतरासा विधूतमधुमासारविन्दमधुरा ।
कासारसूनततिभासाभिरामतनुरासारशीतकरुणा
नासामणिप्रवरभासा शिवा तिमिरमासादयेदुपरतिम् ‖ 6 ‖

न्यङ्काकरे वपुषि कङ्कालरक्तपुषि कङ्कादिपक्षिविषये
त्वं कामनामयसि किं कारणं हृदयपङ्कारिमे हि गिरिजाम् ।
शङ्काशिलानिशितटङ्कायमानपदसङ्काशमानसुमनो-
झङ्कारिभृङ्गततिमङ्कानुपेतशशिसङ्काशवक्त्रकमलाम् ‖ 7 ‖

जम्भारिकुम्भिपृथुकुम्भापहासि कुचसम्भाव्यहारलतिका
रम्भाकरीन्द्रकरदम्भापहोरुगतिडिम्भानुरञ्जितपदा ।
शम्भा उदारपरिरम्भाङ्कुरत्पुलकदम्भानुरागपिशुना
शं भासुराभरणगुम्भा सदा दिशतु शुम्भासुरप्रहरणा ‖ 8 ‖

दाक्षायणी दनुजशिक्षाविधौ विकृतदीक्षा मनोहरगुणा
भिक्षाशिनो नटनवीक्षाविनोदमुखि दक्षाध्वरप्रहरणा ।
वीक्षां विधेहि मयि दक्षा स्वकीयजनपक्षा विपक्षविमुखी
यक्षेशसेवितनिराक्षेपशक्ति जय लक्षावधानकलना ‖ 9 ‖

वन्दारुलोकवरसन्धायिनी विमलकुन्दावदातरदना
वृन्दारुवृन्दमणिवृन्दारविन्दमकरन्दाभिषिक्तचरणा ।
मन्दानिला कलितमन्दारदामभिरमन्दाभिराममकुटा
मन्दाकिनीजवनभिन्दानवाचमरविन्दानना दिशतु मे ‖ 10 ‖

यत्राशयो लगति तत्रागजा भवतु कुत्रापि निस्तुलशुका
सुत्रामकालमुखसत्रासकप्रकरसुत्राणकारिचरणा ।
छत्रानिलातिरयपत्त्राभिरामगुणमित्रामरीसमवधूः
कुत्रासहीनमणिचित्राकृतिस्फुरितपुत्रादिदाननिपुणा ‖ 11 ‖

इन्धानकीरमणिबन्धा भवे हृदयबन्धावतीव रसिका
सन्धावती भुवनसन्धारणेऽप्यमृतसिन्धावुदारनिलया ।
गन्धानुभावमुहुरन्धालिपीतकचबन्धा समर्पयतु मे
शं धाम भानुमपि रुन्धानमाशु पदसन्धानमप्यनुगता ‖ 12 ‖

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

Other stotras

Copyright © 2026 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |
Vedahdara - Personalize

We use cookies