कल्याण वृष्टि स्तोत्र

कल्याणवृष्टिभिरिवामृतपूरिताभि-
र्लक्ष्मीस्वयंवरणमङ्गलदीपिकाभिः।
सेवाभिरम्ब तव पादसरोजमूले
नाकारि किं मनसि भाग्यवतां जनानाम्।

यह श्लोक गहरे समर्पण के साथ शुरू होता है। कवि भगवती से बात कर रहा है। उनकी कृपा अमृत की तरह बरसती है। यह एक लगातार होने वाली बारिश है। इससे बहुत सारा बाहरी सौभाग्य मिलता है। चारों ओर मंगल दीपक जल उठते हैं। देवी लक्ष्मी खुद ऐसे भक्तों को चुनती हैं। वे खुशी से भगवती के चरण दबाते हैं। उनके मन में गहरी शांति होती है। इस सच्ची भक्ति से क्या नहीं मिलता? यह हर मानवीय इच्छा को पूरा करती है। भाग्यशाली लोग इस कृपा को महसूस करते हैं। सच्चा समर्पण मन को भीतर से भर देता है। मन का सारा खालीपन दूर हो जाता है। भीतर की पूर्णता से बाहर सुख आता है। पवित्र भक्ति सबसे बड़ा और सच्चा धन है।

एतावदेव जननि स्पृहणीमास्ते
त्वद्वन्दनेषु सलिलस्थगिते च नेत्रे।
सान्निध्यमुद्यदरुणायुतसोदरस्य
त्वद्विग्रहस्य सुधया परया प्लुतस्य।

इस जगह पर भक्त की मांग बहुत छोटी है। उसे केवल एक पवित्र हृदय चाहिए। खुशी के आंसू बहने चाहिए। सच्ची पूजा में ऐसा ही होता है। वह देवी के असली रूप को देखना चाहता है। उनका रूप बहुत ही चमकीला है। यह दस हजार सूर्यों की तरह चमकता है। फिर भी यह अमृत की तरह शीतल है। देवी से हमेशा अनंत कृपा बरसती है। इस दिव्य दर्शन की बहुत बड़ी चाहत है। उनका प्रकाश सब कुछ पूरी तरह बदल देता है। एक सच्चा भक्त और कुछ नहीं चाहता। दुनिया के लक्ष्य यहां बहुत छोटे लगते हैं। दिल केवल ईश्वर का साथ चाहता है। सच्ची तड़प भगवान को बहुत करीब लाती है। आंसू पुराने अहंकार को पूरी तरह धो देते हैं। प्रेम दुनिया की हर इच्छा से बहुत बड़ा है।

ईशत्वनामकलुषाः कति वा न सन्ति
ब्रह्मादयः प्रतिभवं प्रलयाभिभूताः|
एकः स एव जननि स्थिरसिद्धिरास्ते
यः पादयोस्तव सकृत् प्रणतिं करोति|

यहां बताया गया भारी अंतर बहुत ध्यान देने लायक है। बड़े-बड़े देवताओं के पास ऊंचे पद हैं। ब्रह्मा और अन्य देवता दुनिया चलाते हैं। फिर भी उनकी शक्ति हमेशा के लिए नहीं है। उन सभी को महाप्रलय का सामना करना पड़ता है। समय का चक्र उनके लोकों को नष्ट कर देता है। उनका ऊंचा रुतबा भी एक दिन खत्म हो जाएगा। बड़े पदों के साथ अहंकार का दाग होता है। केवल भगवती का भक्त हमेशा सुरक्षित रहता है। एक बार झुकने से सच्ची स्थिरता मिलती है। देवी की कृपा से यह पक्की स्थिति मिलती है। समर्पण ब्रह्मांड के कठोर नियमों को पार कर लेता है। दुनिया की ताकत सिर्फ एक बड़ा धोखा है। असली सुरक्षा देवी के पवित्र चरणों में है। सच्चा समर्पण समय को पूरी तरह हरा देता है।

लब्ध्वा सकृत् त्रिपुरसुन्दरि तावकीनं
कारुण्यकन्दलितकान्तिभरं कटाक्षम्|
कन्दर्पकोटिसुभगास्त्वयि भक्तिभाजः
सम्मोहयन्ति तरुणीर्भुवनत्रयेऽपि|

देवी की कृपा एक बहुत बड़ा बदलाव लाती है। भगवती एक दयालु नजर डालती हैं। बस एक पल की दृष्टि काफी है। यह नजर पूरी तरह करुणा से भरी है। यह सीधे सच्चे भक्त के दिल पर लगती है। भक्त तुरंत अंदर से पूरी तरह बदल जाता है। वह कामदेव से भी ज्यादा सुंदर हो जाता है। करोड़ों कामदेव भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते। वह तीनों लोकों को आसानी से मोह लेता है। यह सुंदरता केवल शरीर की नहीं है। यह एक गहरी और सच्ची आध्यात्मिक चमक है। पवित्र भक्ति अंदर एक अद्भुत आकर्षण पैदा करती है। मन बहुत ही मीठा और शांत हो जाता है। लोग प्राकृतिक रूप से उसकी ओर खिंचते हैं। भगवान की दया मानव जीवन को चमका देती है।

ह्रीङ्कारमेव तव नाम गृणन्ति वेदा
मातस्त्रिकोणनिलये त्रिपुरे त्रिनेत्रे|
त्वत्संस्मृतौ यमभटाभिभवं विहाय
दीव्यन्ति नन्दनवने सह लोकपालैः|

अब यह पाठ पवित्र ध्वनियों का रहस्य खोलता है। सभी वेद एक विशेष ध्वनि गाते हैं। वे आपको एक बीज-मंत्र से बुलाते हैं। यह पवित्र ध्वनि 'ह्रीं' है। यही देवी का अपना असली नाम है। आप एक त्रिकोण के बीच में रहती हैं। आपके तीन दिव्य और सुंदर नेत्र हैं। आप तीन महान नगरों पर राज करती हैं। आपको याद करने से सारा डर खत्म हो जाता है। भक्तों को मौत के देवता से डर नहीं लगता। यमदूत उन्हें कभी भी छू नहीं सकते। वे सभी अंधेरे लोकों से बच जाते हैं। वे स्वर्ग के सुंदर बगीचों में खेलते हैं। एक पवित्र ध्वनि में पूरे ब्रह्मांड की ताकत है। इसे जपने से भटकता हुआ मन शांत होता है। भगवान का नाम सबसे बड़ी और सच्ची आजादी है।

हन्तु पुरामधिगलं परिपीयमानः
क्रूरः कथं न भविता गरलस्य वेगः|
नाश्वासनाय यदि मातरिदं तवार्धं
देहस्य शश्वदमृताप्लुतशीतलस्य|

श्लोक में जहर का जिक्र क्यों किया गया है? भगवान शिव ने एक बहुत ही खतरनाक जहर पिया था। यह जहर बहुत ही क्रूर और तेज था। वह उनके गले में हमेशा जलता रहा। यह जहर सारी दुनिया को खत्म कर सकता था। फिर भी शिव को कोई नुकसान क्यों नहीं हुआ? देवी खुद इसका सीधा जवाब हैं। वे शिव के शरीर का आधा हिस्सा हैं। उनका यह आधा हिस्सा हमेशा के लिए शीतल है। यह हमेशा ठंडे अमृत में नहाया रहता है। देवी का शीतल स्वभाव जहर की आग को बुझाता है। स्त्री ऊर्जा हमेशा पुरुष ऊर्जा को संतुलित करती है। देवी की कृपा सबसे खतरनाक चीजों को ठीक करती है। दया हर तरह के दर्द को सोख लेती है। दोनों मिलकर इस पूरी दुनिया को संभालते हैं।

सर्वज्ञतां सदसि वाक्पटुतां प्रसूते
देवि त्वदङ्घ्रिसरसीरुहयोः प्रणामः।
किञ्च स्फुरन्मकुटमुज्ज्वलमातपत्रं
द्वे चामरे च महतीं वसुधां दधाति।

भगवती के चरणों में झुकने से अनेक उपहार मिलते हैं। भक्त को पूरी और सच्ची जानकारी मिलती है। वह बहुत ही कुशलता से बात करता है। उसके शब्द ज्ञानियों की सभा में चमकते हैं। बाहरी दुनिया की ताकत भी उसे मिलती है। उसके सिर पर एक चमकदार मुकुट होता है। एक शाही छाता उसके सिर पर रहता है। उसके दोनों तरफ शाही पंखे झेले जाते हैं। वह इस विशाल धरती पर राज करता है। भीतरी ज्ञान और बाहरी ताकत दोनों एक साथ मिलते हैं। भक्ति बिना मांगे ये दोनों चीजें देती है। देवी खुद अपने भक्त का पूरा ध्यान रखती हैं। ज्ञान ही इंसान का असली और सच्चा मुकुट है। साफ मन से ही अच्छे शब्द निकलते हैं। पूरा समर्पण इंसान को असली राजा बना देता है।

कल्पद्रुमैरभिमतप्रतिपादनेषु
कारुण्यवारिधिभिरम्ब भवत्कटाक्षैः।
आलोकय त्रिपुरसुन्दरि मामनाथं
त्वय्यैव भक्तिभरितं त्वयि बद्धतृष्णम्।

कवि की इस गहरी प्रार्थना को ध्यान से देखिए। वह देवी को बहुत सुंदर मानता है। वह खुद को एक बेसहारा अनाथ समझता है। उसका दिल पूरी तरह भक्ति से भरा है। उसकी सारी इच्छाएं केवल देवी से जुड़ी हैं। वह उनकी दयालु नजर की भीख मांगता है। देवी की आंखें करुणा का एक बड़ा समुद्र हैं। उनका देखना ही सारी अच्छी इच्छाएं पूरी करता है। यह नजर एक कल्पवृक्ष की तरह काम करती है। सिर्फ एक दृष्टि पूरी जिंदगी बदल देती है। एक अनाथ को सबसे बड़े माता-पिता मिल जाते हैं। भगवान पर पूरी तरह निर्भर होना बहुत बड़ी ताकत है। खाली बर्तन में कृपा बहुत तेजी से भरती है। विश्वास एक अनाथ को राजा बना सकता है। देवी की कोमल दृष्टि सारे पुराने घाव भर देती है।

अन्तेतरेष्वपि मनांसि निधाय चान्ये
भक्तिं वहन्ति किल पामरदैवतेषु।
त्वामेव देवि मनसा समनुस्मरामि
त्वामेव नौमि शरणं जननि त्वमेव।

सच्चा ध्यान पूरी और अटूट वफादारी की मांग करता है। बहुत से लोग छोटे देवताओं की पूजा करते हैं। वे छोटी और दुनियावी चीजें मांगते हैं। उनका मन कई अलग-अलग दिशाओं में भटकता है। वे जल्दी खत्म होने वाली चीजों के लिए प्रार्थना करते हैं। कवि इस भटके हुए रास्ते को पूरी तरह छोड़ देता है। वह केवल भगवती को याद करता है। वह उन्हें हमेशा अपने मन में रखता है। वह सिर्फ उनके सामने ही अपना सिर झुकाता है। देवी ही उसकी एकमात्र और सच्ची शरण हैं। एक जगह ध्यान लगाने से बहुत बड़े परिणाम मिलते हैं। छोटे लक्ष्य इंसान की आत्मा को भटका देते हैं। सर्वोच्च सत्य के लिए पूरा ध्यान चाहिए होता है। पूरी तरह झुक जाना ही सबसे बड़ी आजादी है।

लक्ष्येषु सत्स्वपि कटाक्षनिरीक्षणाना-
मालोकय त्रिपुरसुन्दरि मां कदाचित्।
नूनं मया तु सदृशः करुणैकपात्रं
जातो जनिष्यति जनो न च जायते वा।

समर्पण की बात को आगे बढ़ाते हुए कवि विनती करता है। देवी के अनगिनत महान और सच्चे भक्त हैं। बहुत से अच्छे लोग उनकी कृपा पाना चाहते हैं। वे दया पाने के बिल्कुल सही हकदार हैं। फिर भी कवि एक बहुत खास मांग करता है। वह देवी से अपनी तरफ देखने को कहता है। वह खुद को अंदर से बहुत गरीब बताता है। किसी और को उनकी दया की इतनी जरूरत नहीं है। ऐसा खाली इंसान पहले कभी नहीं हुआ। ऐसा इंसान भविष्य में भी कभी नहीं होगा। वह सबसे ज्यादा खाली और कमजोर बर्तन है। यह एक बहुत ही सुंदर आध्यात्मिक विनम्रता है। सबसे कमजोर जगह पर सबसे जल्दी कृपा पहुंचती है। अपनी कमी मानना ही सबसे बड़ी ताकत है।

ह्रीं ह्रीमिति प्रतिदिनं जपतां तवाख्यां
किन्नाम दुर्लभमिह त्रिपुराधिवासे।
मालाकिरीटमदवारणमाननीया
तान् सेवतेव सुमतीः स्वयमेव लक्ष्मीः।

लगातार रोज किए जाने वाले अभ्यास से क्या होता है? सच्चे भक्त पवित्र 'ह्रीं' मंत्र का जाप करते हैं। वे इसे हर एक दिन दोहराते हैं। भगवती तीनों महान नगरों में वास करती हैं। इन साधकों के लिए कुछ भी कठिन नहीं है। हर दुर्लभ चीज बहुत आसानी से मिल जाती है। धन की देवी खुद उनसे मिलने आती हैं। लक्ष्मी खुशी-खुशी उनकी सेवा करती हैं। वह मालाएं और चमकदार मुकुट लाती हैं। वह बड़े और शाही हाथी भी लाती हैं। लगातार अभ्यास अंदर एक बड़ी ऊर्जा बनाता है। एक छोटे से अक्षर में ब्रह्मांड का नक्शा है। रोज का नियम बहुत बड़े इनाम देता है। दुनिया की सारी दौलत भगवान के भक्त के पीछे भागती है। लगातार जपने से बहुत बड़ी छिपी शक्तियां खुल जाती हैं।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदाननिरतानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि।
मामेव मानरनिशं कलयन्तु नान्यम्।

यह श्लोक पहले मिले सारे आशीर्वादों का सार बताता है। भगवती की आंखें कमल के फूल जैसी हैं। उनके सामने झुकने से बहुत धन मिलता है। यह काम सभी इंद्रियों को बड़ी खुशी देता है। इससे बहुत बड़े और शाही साम्राज्य मिलते हैं। सबसे बड़ी बात, यह सारे पापों को मिटा देता है। सच्ची पूजा पुराने बुरे कर्मों को पूरी तरह नष्ट करती है। कवि यहां एक बहुत ही खास इच्छा रखता है। वह हमेशा देवी के सामने झुकना चाहता है। वह दिन-रात बस यही काम करना चाहता है। उसे दुनिया का कोई और काम नहीं चाहिए। भगवान से हमेशा जुड़े रहना ही असली लक्ष्य है। बाहरी चीजें तो बस अपने आप मिल जाती हैं। बिना रुके की गई भक्ति एक बहुत बड़ा साम्राज्य है।

कल्पोपसंहृतिषु कल्पितताण्डवस्य
देवस्य खण्डपरशोः परभैरवस्य।
पाशाङ्कुशैक्षवशरासनपुष्पबाणा
सा साक्षिणी विजयते तव मूर्तिरेका।

अब यहां एक बहुत ही विशाल ब्रह्मांडीय दृश्य सामने आता है। समय का बड़ा चक्र अंत में खत्म जरूर होता है। महाप्रलय सब कुछ पूरी तरह नष्ट कर देती है। भगवान शिव अपना भयंकर नाच शुरू करते हैं। उनके हाथ में एक टूटी हुई कुल्हाड़ी है। वे एक बहुत ही डरावना रूप लेते हैं। फिर भी एक रूप बिल्कुल सुरक्षित रहता है। भगवती बस चुपचाप यह सब देखती हैं। वे एक शांत गवाह की तरह खड़ी रहती हैं। उनके हाथ में गन्ने का एक मीठा धनुष है। वे फूलों के कोमल बाण रखती हैं। उनके विनाश के बाद भी देवी शांत रहती हैं। शांत गवाह हर तरह के काम से ऊपर होता है। प्यार हमेशा बच जाता है जब सब कुछ गिर जाता है। देवी का रूप ही हमेशा के लिए विजयी रहता है।

लग्नं सदा भवतु मातरिदं तवार्थं
तेजःपरं बहुलकुङ्कुमपङ्कशोणम्।
भास्वत्किरीटममृतांशुकलावतंसं
मध्ये त्रिकोणनिलयं परमामृतार्द्रम्।

यह वर्णन पूरी तरह से भीतरी दर्शन को दिखाता है। कवि एक बहुत ही तेज रोशनी की कल्पना करता है। यह रोशनी बहुत गहरे लाल रंग की है। यह गीले और गाढ़े कुमकुम जैसी लगती है। देवी ने एक बहुत चमकदार मुकुट पहना है। उस पर एक ठंडा आधा चांद रखा है। वह बीच के त्रिकोण में बैठी हैं। वह पूरी तरह से शुद्ध अमृत में भीगी हैं। कवि इस रूप को अपने अंदर चाहता है। वह प्रार्थना करता है कि यह उसके भीतर रहे। वह इसे हमेशा अपने दिल में बसाना चाहता है। मन में चित्र बनाने से चंचल मन शांत होता है। लाल रंग का मतलब बनाने की ताकत है। पवित्र रोशनी भारी शरीर को साफ कर देती है।

ह्रीङ्कारमेव तव नाम तदेव रूपं
त्वन्नाम दुर्लभमिह त्रिपुरे गृणन्ति।
त्वत्तेजसा परिणतं वियदादिभूतं
सौख्यं तनोति सरसीरुहसम्भवादेः।

एक बहुत गहरा सत्य ध्वनि और रूप को एक करता है। पवित्र अक्षर 'ह्रीं' ही देवी का नाम है। यही उनका अपना असली भौतिक रूप भी है। नाम और रूप दोनों पूरी तरह से एक हैं। बहुत ही दुर्लभ और शुद्ध आत्माएं इस नाम को गाती हैं। देवी एक शुद्ध और अनंत ब्रह्मांडीय रोशनी हैं। उनका यह प्रकाश पूरे ब्रह्मांड में बदल जाता है। यह अंतरिक्ष और बाकी सभी तत्वों को बनाता है। यह पूरी विशाल भौतिक दुनिया की रचना करता है। यह सुंदर दुनिया सबको बहुत खुशी देती है। बड़े-बड़े देवता भी इस खुशी को महसूस करते हैं। भगवान खुद ही ध्वनि है और पदार्थ भी। भौतिक दुनिया केवल शुद्ध ईश्वरीय रोशनी है। हम जो कुछ भी देखते हैं वह सिर्फ भगवती हैं। इस सच को जानना ही सबसे बड़ा और परम आनंद है।

 

कल्याणवृष्टिभिरिवामृतपूरिताभि-
र्लक्ष्मीस्वयंवरणमङ्गलदीपिकाभिः।
सेवाभिरम्ब तव पादसरोजमूले
नाकारि किं मनसि भाग्यवतां जनानाम्।
एतावदेव जननि स्पृहणीमास्ते
त्वद्वन्दनेषु सलिलस्थगिते च नेत्रे।
सान्निध्यमुद्यदरुणायुतसोदरस्य
त्वद्विग्रहस्य सुधया परया प्लुतस्य।
ईशत्वनामकलुषाः कति वा न सन्ति
ब्रह्मादयः प्रतिभवं प्रलयाभिभूताः|
एकः स एव जननि स्थिरसिद्धिरास्ते
यः पादयोस्तव सकृत् प्रणतिं करोति|
लब्ध्वा सकृत् त्रिपुरसुन्दरि तावकीनं
कारुण्यकन्दलितकान्तिभरं कटाक्षम्|
कन्दर्पकोटिसुभगास्त्वयि भक्तिभाजः
सम्मोहयन्ति तरुणीर्भुवनत्रयेऽपि|
ह्रीङ्कारमेव तव नाम गृणन्ति वेदा
मातस्त्रिकोणनिलये त्रिपुरे त्रिनेत्रे|
त्वत्संस्मृतौ यमभटाभिभवं विहाय
दीव्यन्ति नन्दनवने सह लोकपालैः|
हन्तु पुरामधिगलं परिपीयमानः
क्रूरः कथं न भविता गरलस्य वेगः|
नाश्वासनाय यदि मातरिदं तवार्धं
देहस्य शश्वदमृताप्लुतशीतलस्य|
सर्वज्ञतां सदसि वाक्पटुतां प्रसूते
देवि त्वदङ्घ्रिसरसीरुहयोः प्रणामः।
किञ्च स्फुरन्मकुटमुज्ज्वलमातपत्रं
द्वे चामरे च महतीं वसुधां दधाति।
कल्पद्रुमैरभिमतप्रतिपादनेषु
कारुण्यवारिधिभिरम्ब भवत्कटाक्षैः।
आलोकय त्रिपुरसुन्दरि मामनाथं
त्वय्यैव भक्तिभरितं त्वयि बद्धतृष्णम्।
अन्तेतरेष्वपि मनांसि निधाय चान्ये
भक्तिं वहन्ति किल पामरदैवतेषु।
त्वामेव देवि मनसा समनुस्मरामि
त्वामेव नौमि शरणं जननि त्वमेव।
लक्ष्येषु सत्स्वपि कटाक्षनिरीक्षणाना-
मालोकय त्रिपुरसुन्दरि मां कदाचित्।
नूनं मया तु सदृशः करुणैकपात्रं
जातो जनिष्यति जनो न च जायते वा।
ह्रीं ह्रीमिति प्रतिदिनं जपतां तवाख्यां
किन्नाम दुर्लभमिह त्रिपुराधिवासे।
मालाकिरीटमदवारणमाननीया
तान् सेवतेव सुमतीः स्वयमेव लक्ष्मीः।
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदाननिरतानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि।
मामेव मानरनिशं कलयन्तु नान्यम्।
कल्पोपसंहृतिषु कल्पितताण्डवस्य
देवस्य खण्डपरशोः परभैरवस्य।
पाशाङ्कुशैक्षवशरासनपुष्पबाणा
सा साक्षिणी विजयते तव मूर्तिरेका।
लग्नं सदा भवतु मातरिदं तवार्थं
तेजःपरं बहुलकुङ्कुमपङ्कशोणम्।
भास्वत्किरीटममृतांशुकलावतंसं
मध्ये त्रिकोणनिलयं परमामृतार्द्रम्।
ह्रीङ्कारमेव तव नाम तदेव रूपं
त्वन्नाम दुर्लभमिह त्रिपुरे गृणन्ति।
त्वत्तेजसा परिणतं वियदादिभूतं
सौख्यं तनोति सरसीरुहसम्भवादेः।

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