माणिक्यवीणामुपलालयन्तीं
मदालसां मञ्जुलवाग्विलासाम्|
माहेन्द्रनीलद्युतिकोमलाङ्गीं
मातङ्गकन्यां मनसा स्मरामि|
चतुर्भुजे चन्द्रकलावतंसे
कुचोन्नते कुङ्कुमरागशोणे|
पुण्ड्रेक्षुपाशाङ्कुशपुष्पबाण-
हस्ते नमस्ते जगदेकमातः|
माता मरकतश्यामा मातङ्गी मदशालिनी|
कुर्यात् कटाक्षं कल्याणी कदम्बवनवासिनी|
यह भाग भगवती के दिव्य स्वरूप को दर्शाता है। वह मणियों वाली वीणा बजाती हैं। वह हल्की सी मतवाली लगती हैं। उनकी वाणी अत्यंत मधुर है। उनका शरीर नीलम की भांति दमकता है। मैं उनका ध्यान करता हूँ। उनकी चार भुजाएँ हैं। उनके मस्तक पर चंद्रमा है। उनका रूप युवा है। उनका वर्ण गहरा लाल है। उनके हाथों में गन्ने का धनुष है। वह पाश और अंकुश रखती हैं। उनके पास पुष्पों के बाण हैं। वह जगत की एकमात्र माता हैं। वह पन्ने के समान हरी प्रतीत होती हैं। वह कदंब के वन में निवास करती हैं। मैं उनकी कृपा दृष्टि की प्रार्थना करता हूँ। वीणा ब्रह्मांडीय ध्वनि है। लाल रंग ऊर्जा का प्रतीक है। उनके अस्त्र बहुत गहरे अर्थ रखते हैं। पाश मन को खींचता है। अंकुश अहंकार को रोकता है। गन्ने का धनुष हमारी बुद्धि है। पुष्प हमारी पांच इंद्रियां हैं। वह मानवीय प्रवृत्तियों को नियंत्रित करती हैं। सच्ची एकाग्रता उन्हें साधक के भीतर प्रकट करती है।
जय मातङ्गतनये जय नीलोत्पलद्युते|
जय सङ्गीतरसिके जय लीलाशुकप्रिये|
जय जननि सुधासमुद्रान्तरुद्यन्मणीद्वीप-
संरूढबिल्वाटवीमध्यकल्पद्रुमाकल्प-
कादम्बकान्तारवासप्रिये कृत्तिवासप्रिये सर्वलोकप्रिये।
यहाँ कवि देवी की जय-जयकार कर रहा है। वह ऋषि मतंग की पुत्री हैं। उनकी कांति नीले कमल के समान है। वह शास्त्रीय संगीत का आनंद लेती हैं। उन्हें अपना पालतू तोता अत्यंत प्रिय है। वह अमृत के सागर में रहती हैं। वहां रत्नों का एक द्वीप है। उसमें एक घना वन है। वहां कल्पवृक्ष स्थित हैं। उन्हें वह स्थान बहुत प्रिय है। वह शिव की अत्यंत प्रिय हैं। संपूर्ण जगत उनसे प्रेम करता है। जयकार करने से आंतरिक ऊर्जा बढ़ती है। संगीत इस ब्रह्मांड का स्पंदन है। तोता पवित्र वेदों का प्रतीक है। अमृत का सागर शुद्ध चेतना है। यह जन्म-मृत्यु का भय मिटाता है। रत्नों का द्वीप हमारा हृदय है। कल्पवृक्ष हमारे शुद्ध विचार हैं। वे मनुष्य की हर कामना पूर्ण करते हैं। चेतना और ऊर्जा सदैव साथ रहते हैं। मन की शांति भीतर की यात्रा से ही मिलती है।
सादरारब्धसङ्गीतसम्भावनासम्भ्रमालोल-
नीपस्रगाबद्धचूलीसनाथत्रिके सानुमत्पुत्रिके।
शेखरीभूतशीतांशुरेखामयूखावली-
बद्धसुस्निग्धनीलालकश्रेणिशृङ्गारिते लोकसम्भाविते।
कामलीलाधनुःसन्निभभ्रूलतापुष्प-
सन्दोहसन्देहकृल्लोचने वाक्सुधासेचने।
यह श्लोक स्थिरता और गति के मिलन को समझाता है। देवी संगीत को सम्मान देती हैं। भक्त उनके लिए प्रेम से गाते हैं। वह स्वरों पर मंद-मंद झूमती हैं। उनके सुंदर केश लय में हिलते हैं। वह नूतन पुष्पों की माला धारण करती हैं। वह पर्वतराज की पुत्री हैं। उनके मस्तक पर अर्ध चंद्रमा है। चंद्रमा की किरणें नीचे पड़ती हैं। उनके काले केश चमकते हैं। संपूर्ण जगत उनका सम्मान करता है। उनकी भौहें बहुत वक्र हैं। वे कामदेव के धनुष के समान प्रतीत होती हैं। उनके नेत्र अत्यंत सुंदर हैं। वे खिले हुए पुष्पों के समान हैं। उनकी वाणी अत्यंत मधुर है। वे शब्दों से अमृत बरसाती हैं। पर्वत पूर्ण स्थिरता का प्रतीक है। संगीत निरंतर बहती हुई ऊर्जा है। चंद्रमा शीतल ज्ञान है। केश संसार की उलझनों को दर्शाते हैं। चंद्रमा का प्रकाश इस अंधकार को मिटाता है। उनकी वाणी सांसारिक दुख दूर करती है। सच्चा ज्ञान सदैव सुंदर रूप में प्रकट होता है।
चारुगोरोचनापङ्ककेली-
ललामाभिरामे सुरामे रमे।
प्रोल्लसद्ध्वालिकामौक्तिकश्रेणिका-
चन्द्रिकामण्डलोद्भासिलावण्यगण्ड-
स्थलन्यस्तकस्तूरिकापत्ररेखासमुद्भूत-
सौरभ्यसंम्भ्रान्तभृङ्गाङ्गनागीत-
सान्द्रीभवन्मन्दतन्त्रीस्वरे सुस्वरे भास्वरे।
वल्लकीवादनप्रक्रियालोलताली-
दलाबद्धताटङ्कभूषाविशेषान्विते सिद्धसम्मानिते।
इन पंक्तियों में देवी के मुखमंडल का वर्णन है। वह मस्तक पर पीला चंदन लगाती हैं। वह पूर्णतः मनमोहक प्रतीत होती हैं। वह अपार आनंद देती हैं। उन्होंने सुंदर मोती के कुंडल पहने हैं। वे पूर्णिमा के चंद्रमा के समान चमकते हैं। उनके कपोलों पर अद्भुत तेज है। उनके मुख पर सुंदर पत्रलेखा है। कस्तूरी की तीव्र सुगंध फैल रही है। मादा भंवरे उस ओर दौड़ती हैं। वे उनके चारों ओर गुंजन करती हैं। यह गुंजन संगीत में मिल जाता है। उनका स्वर पूर्णतः उत्तम है। वह वीणा बजाती हैं। उनके हाथ बहुत कोमलता से चलते हैं। उन्होंने ताड़ के पत्तों के कुंडल पहने हैं। महान योगी उनका आदर करते हैं। पीला रंग बुद्धि को दर्शाता है। मोती शुद्धता के प्रतीक हैं। भंवरे हमारे चंचल मन को बताते हैं। मन सदैव बाहरी सुगंध के पीछे भागता है। संगीत इस भटकते मन को बांध लेता है। पत्तों के आभूषण सरलता का प्रतीक हैं। सच्ची पवित्रता महान आत्माओं को आकर्षित करती है।
दिव्यहालामदोद्वेलहेलालसच्चक्षु-
रान्दोलनश्रीसमाक्षिप्तकर्णैकनीलोत्पले श्यामले।
पूरिताशेषलोकाभिवाञ्छाफले श्रीफले।
स्वेदबिन्दूल्लसद्फाललावण्यनिष्यन्द-
सन्दोहसन्देहकृन्नासिकामौक्तिके सर्वविश्वात्मिके सर्वसिद्ध्यात्मिके कालिके।
मुग्धमन्दस्मितोदारवक्त्रस्फुरत्पूग-
ताम्बूलकर्पूरखण्डोत्करे ज्ञानमुद्राकरे।
सर्वसम्पत्करे पद्मभास्वत्करे श्रीकरे।
ग्रंथ में देवी के नेत्रों को ऐसा क्यों कहा गया है? उनके नेत्र थोड़े अलसाए हुए प्रतीत होते हैं। उन्होंने दिव्य मदिरा का पान किया है। उनके सुंदर नेत्र मंद-मंद घूमते हैं। वे उनके कानों को छूते हैं। वहां एक नीला कमल रखा है। वह श्याम वर्ण की माता हैं। वह मनुष्यों की हर कामना पूर्ण करती हैं। उनके मस्तक पर स्वेद की बूंदें हैं। उनका सौंदर्य सहज ही बहता है। उन्होंने एक चमकती हुई नासिका-मुक्ता पहनी है। वह मंद-मंद मुस्कुरा रही हैं। वह पान चबाती हैं। उनके हाथों में ज्ञान की मुद्रा है। उनके पास एक चमकता हुआ कमल है। वह हर प्रकार की संपत्ति देती हैं। यह दिव्य मदिरा परमानंद है। यह आत्म-ज्ञान की अवस्था है। गहरा रंग सारे पापों को सोख लेता है। स्वेद उनके रचनात्मक श्रम को दर्शाता है। वह संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन करती हैं। मधुर मुस्कान हर भय को समाप्त करती है। वास्तविक संपत्ति आंतरिक ज्ञान है। ज्ञान ही जीवन की सबसे बड़ी निधि है।
कुन्दपुष्पद्युतिस्निग्धदन्तावलीनिर्मलालोल-
कल्लोलसम्मेलनस्मेरशोणाधरे चारुवीणाधरे पक्वबिम्बाधरे।
सुललितनवयौवनारम्भचन्द्रोदयोद्वेल-
लावण्यदुग्धार्णवाविर्भवत्कम्बु-
बिम्बोकभृत्कन्थरे सत्कलामन्दिरे मन्थरे।
दिव्यरत्नप्रभाबन्धुरच्छन्नहारादि-
भूषासमुदद्योतमानानवद्याङ्गशोभे शुभे।
रत्नकेयूररश्मिच्छटापल्लव-
प्रोल्लसद्दोल्लताराजिते योगिभिः पूजिते।
पिछले विचारों को आगे बढ़ाते हुए देवी की सुंदरता देखिए। उनके दांत कुन्द के पुष्पों के समान चमकते हैं। वे पूर्णतः श्वेत और निष्कलंक हैं। उनकी मुस्कान से सुंदर लहरें उठती हैं। उनके होंठ बहुत गहरे लाल हैं। वे पके हुए फलों की भांति दिखते हैं। उन्होंने हाथों में दिव्य वीणा धारण की है। उनका यौवन पूर्णतः नवीन है। उनकी सुंदरता चंद्रमा की भांति निखरती है। उनकी गर्दन बहुत ही आकर्षक है। वह एक शंख के समान दिखती है। वह सभी कलाओं का मंदिर हैं। उनकी चाल अत्यंत मंद है। उन्होंने देदीप्यमान दिव्य आभूषण पहने हैं। उनके शरीर की कांति बाहर झलकती है। बाजूबंद से प्रकाश की किरणें निकलती हैं। योगी जन निरंतर उनकी पूजा करते हैं। श्वेत दांत पूर्ण शुद्धता हैं। लाल होंठ सक्रिय ऊर्जा को बताते हैं। शुद्धता और ऊर्जा यहाँ एक साथ उपस्थित हैं। शंख सर्वोच्च ध्वनि को संभालता है। यौवन नवीन और अनंत शक्ति है। आभूषण प्रकाशमान आध्यात्मिक गुणों को दर्शाते हैं। सत्य ही उनका सबसे सुंदर आभूषण है।
विश्वदिङ्मण्डलव्याप्तमाणिक्यतेजः-
स्फुरत्कङ्कणालङ्कृते विभ्रमालङ्कृते साधुभिः पूजिते।
वासरारम्भवेलासमुज्जृम्भमाणारविन्द-
प्रतिद्वन्द्विपाणिद्वये सन्ततोद्यद्दये अद्वये।
दिव्यरत्नोर्मिकादीधितिस्तोम-
सन्ध्यायमानाङ्गुलीपल्लवोद्य-
न्नखेन्दुप्रभामण्डले।
सन्नुताखण्डले चित्प्रभामण्डले प्रोल्लसत्कुण्डले।
तारकाराजिनीकाशहारावलि-
स्मेरचारुस्तनाभोगभारानमन्मध्य-
वल्लीवलिच्छेदवीचीसमुद्यत्समुल्लास-
सन्दर्शिताकारसौन्दर्यरत्नाकरे वल्लकीभृत्करे किङ्करश्रीकरे।
यह पद्य देवी के हाथों की कृपा को स्पष्ट करता है। उन्होंने माणिक्य के कंगन पहने हैं। उनका लाल प्रकाश सर्वत्र फैल रहा है। वह बहुत शालीनता से चलती हैं। पवित्र संत उनकी गहराई से पूजा करते हैं। उनके हाथ अविश्वसनीय रूप से सुंदर हैं। वे प्रातःकाल के नवीन कमल को हरा देते हैं। वह निरंतर अपार दया बरसाती हैं। उन्होंने रत्नों वाली अंगूठियां पहनी हैं। उनकी उंगलियां कोमल पत्तों के समान हैं। उनके नाखून चंद्रमा की भांति चमकते हैं। इससे प्रकाश का एक मंडल बनता है। वह शुद्ध और प्रकाशमय चेतना हैं। उनके गले में एक लंबा हार है। वह तारों की आकाशगंगा जैसा प्रतीत होता है। उनकी कमर में तीन वलियां हैं। वे समुद्र की लहरों जैसी लगती हैं। माणिक्य की कांति सार्वभौमिक प्रेम है। कमल नवीन आरंभ का संकेत है। दया उनका स्वाभाविक गुण है। नाखून मनुष्य के भीतर का अंधकार मिटाते हैं। तारों का हार अनंत ब्रह्मांडों को दर्शाता है। सच्ची सुंदरता सदैव शालीनता में निवास करती है।
हेमकुम्भोपमोत्तुङ्गवक्षोज-
भारावनम्रे त्रिलोकावनम्रे।
लसद्वृत्तगम्भीरनाभीसरस्तीर-
शैवालशङ्काकरश्याम-
रोमावलीभूषणे मञ्जुसम्भाषणे।
चारुशिञ्चत्कटीसूत्रनिर्भत्सितानङ्ग-
लीलधनुश्शिञ्चिनीडम्बरे दिव्यरत्नाम्बरे।
पद्मरागोल्लसन्मेखलामौक्तिक-
श्रोणिशोभाजितस्वर्ण-
भूभृत्तले चन्द्रिकाशीतले।
यहाँ एक बहुत ही गहरा सत्य छिपा हुआ है। उनका वक्ष स्वर्ण कलश के समान है। तीनों लोक उनके सामने झुकते हैं। उनकी नाभि बहुत गहरी है। वह एक झील जैसी प्रतीत होती है। वहां से एक श्याम रेखा उठती है। वह नदी की काई जैसी लगती है। उनकी वाणी बहुत ही कोमल है। उन्होंने एक बजने वाली करधनी पहनी है। उसकी ध्वनि कामदेव के धनुष को लज्जित करती है। उन्होंने दीप्तिमान दिव्य वस्त्र पहने हैं। उनकी करधनी में लाल रत्न जड़े हैं। उनकी कमर पर मोतियों की चमक है। यह सुंदरता सुमेरु पर्वत को भी हरा देती है। वह पूर्णतः शीतलता देती हैं। स्वर्ण कलश जीवन शक्ति हैं। नाभि सृष्टि का केंद्र है। श्याम रेखा उठती हुई आध्यात्मिक ऊर्जा है। करधनी की ध्वनि सर्वोच्च कंपन है। यह सांसारिक वासना को सरलता से जीत लेती है। पर्वत विशाल सत्ता का प्रतीक है। उनकी ठोस कृपा उससे कहीं बड़ी है। चंद्रिका उनकी शीतल करुणा है। सांसारिक ज्वर केवल सच्ची भक्ति से शांत होता है।
विकसितनवकिम्शुकाताम्रदिव्याम्शुक-
च्छन्नचारूरुशोभापराभूतसिन्दूर-
शोणायमानेन्द्रमातङ्गहस्मार्गले वैभवानर्ग्गले।
श्यामले कोमलस्निग्द्धनीलोत्पलोत्पादि-
तानङ्गतूणीरशङ्काकरोदारजङ्घालते चारुलीलागते।
नम्रदिक्पालसीमन्तिनीकुन्तलस्निग्द्ध-
नीलप्रभापुञ्चसञ्जातदुर्वाङ्कुराशङ्क-
सारङ्गसंयोगरिङ्खन्नखेन्दूज्ज्वले प्रोज्ज्वले।
निर्मले प्रह्वदेवेशलक्ष्मीशभूतेश-
तोयेशवाणीशकीनाशदैत्येशयक्षेश-
वाय्वग्निकोटीरमाणिक्यसम्हृष्ट-
बालातपोद्दामलाक्षारसारुण्य-
तारुण्यलक्ष्मीगृहीताङ्घ्रिपद्म्मे सुपद्मे उमे।
ध्यान दें कि उनके वस्त्र और चाल कैसी है। उन्होंने लाल वस्त्र धारण किया है। वह खिले हुए पुष्पों की भांति चमकता है। उनकी जांघें अत्यंत सुदृढ़ हैं। वे इंद्र के हाथी को भी हरा देती हैं। उनकी महिमा को कोई रोक नहीं सकता। उनके पैर बहुत ही स्निग्ध हैं। वे कोमल तनों की भांति दिखते हैं। उनके चलने की शैली अत्यंत लीलामय है। दिक्पालों की पत्नियां झुकती हैं। उनके काले केश आपस में मिलते हैं। वे नवीन हरी घास के समान लगते हैं। हिरण उन्हें खाने का प्रयास करते हैं। देवी के पैरों के नाखून बहुत चमक रहे हैं। सभी महान देवता वहां झुकते हैं। वे उनके लाल चरणों को स्पर्श करते हैं। वह पूर्णतः पवित्र हैं। लाल रेशम सक्रिय सृष्टि है। तने उठती हुई शुद्धता को दर्शाते हैं। उनकी चंचल चाल एक नृत्य है। यह सृष्टि उनकी एक सरल लीला है। ब्रह्मांड उनके चरणों में समर्पण करता है। झुकने से मनुष्य का कठोर अहंकार टूटता है। पूर्ण समर्पण ही सबसे उज्ज्वल प्रकाश लाता है।
सुरुचिरनवरत्नपीठस्थिते सुस्थिते।
रत्नपद्मासने रत्नसिंहासने।
शङ्खपद्मद्वयोपाश्रिते विश्रुते।
तत्र विघ्नेशदुर्गावटुक्षेत्रपालैर्युते मत्तमातङ्गकन्यासमूहान्विते भैरवैरष्टभिर्वेष्टिते।
मञ्चुलामेनकाद्यङ्गनामानिते देवि वामादिभिः शक्तिभिः सेविते।
दिव्य माता अपना आसन कहाँ ग्रहण करती हैं? वह मूल्यवान रत्नों के आसन पर विराजमान होती हैं। उसमें नौ विशेष रत्न जड़े हैं। उनका आसन एक बड़ा कमल है। वह एक सिंहासन का कार्य करता है। वह दो निधियों के साथ बैठती हैं। वे शंख और कमल हैं। वह सर्वत्र प्रसिद्ध हैं। भगवान गणेश वहां उपस्थित हैं। देवी दुर्गा उनके बहुत समीप खड़ी हैं। मतंग कन्याएं उन्हें चारों ओर से घेरती हैं। वे अत्यंत मतवाली होकर व्यवहार करती हैं। आठ भयंकर भैरव उनकी रक्षा करते हैं। स्वर्ग की अप्सराएं उनका गहरा सम्मान करती हैं। आठ सर्वोच्च शक्तियां उनकी सेवा करती हैं। नौ रत्न हमारे नवग्रह हैं। वह संपूर्ण ब्रह्मांडीय काल पर शासन करती हैं। कमल वैराग्य और शुद्धता है। शंख और कमल अपार संपदा हैं। गणेश हर बड़ी बाधा को हटाते हैं। दुर्गा सुदृढ़ सुरक्षा देती हैं। कन्याएं शुद्ध स्त्री ऊर्जा को दर्शाती हैं। भैरव भटकते हुए नकारात्मक विचारों को नष्ट करते हैं। हर शक्ति अंत में केवल सत्य की सेवा करती है।
धात्रि लक्ष्म्यादिशक्त्यष्टकैः संयुते मातृकामण्डलैर्मण्डिते।
यक्षगन्धर्वसिद्धाङ्गना-
मण्डलैरर्चिते।
भैरवीसंवृते पञ्चबाणात्मिके पञ्चबाणेन रत्या च संभाविते।
प्रीतिभाजा वसन्तेन चानन्दिते भक्तिभाजं परं श्रेयसे कल्पसे।
योगिनां मानसे द्योतसे छन्दसामोजसा भ्राजसे।
अब यह मंडल पूर्णतः बाहर की ओर फैलता है। लक्ष्मी और अन्य शक्तियां उनसे जुड़ती हैं। मातृकाओं का समूह उन्हें अलंकृत करता है। दिव्य प्राणी उनकी पूजा करते हैं। भयंकर भैरवी देवियां दृढ़ता से खड़ी हैं। देवी स्वयं पांच बाणों वाली हैं। कामदेव उनका बहुत सम्मान करते हैं। रति भी उनका गहरा आदर करती हैं। सुंदर वसंत ऋतु आनंद लेकर आती है। वह सबसे बड़ा कल्याण करती हैं। वह योगियों के मन में चमकती हैं। वह पूर्ण वैदिक शक्ति बिखेरती हैं। लक्ष्मी आवश्यक प्रचुरता लाती हैं। मातृकाएं भाषा के विभिन्न अक्षर हैं। देवी हर भाषा का स्रोत हैं। दिव्य प्राणी अपना लक्ष्य यहीं पाते हैं। पांच बाण मनुष्य की पांच इंद्रियां हैं। वह सांसारिक इच्छाओं को पूर्णतः नियंत्रित करती हैं। वसंत नवीन और सुंदर आरंभ है। सबसे बड़ा कल्याण मोक्ष है। वह अज्ञान का अंधकार दूर करती हैं। मन को पूर्णतः शांत होना ही पड़ता है।
गीतविद्याविनोदाति-
तृष्णेन कृष्णेन सम्पूज्यसे।
भक्तिमच्चेतसा वेधसा स्तूयसे विश्वहृद्येन वाद्येन विद्याधरैर्गीयसे।
श्रवणहरदक्षिणक्वाणया वीणया किन्नरैर्गीयसे।
यक्षगन्धर्वसिद्धाङ्गनामण्डलैरर्च्यसे।
सर्वसौभाग्यवाञ्छावतीभि-
र्वधूभिस्सुराणां समाराध्यसे।
महान देवता भी यहाँ शुद्ध भक्ति करते हैं। भगवान कृष्ण प्रेम से उनकी पूजा करते हैं। वह शुद्ध संगीत का ज्ञान चाहते हैं। भगवान ब्रह्मा उनकी गहरी स्तुति करते हैं। विद्याधर उनकी दिव्य महिमा गाते हैं। किन्नर अत्यंत हर्ष के साथ गाते हैं। वे मधुर ध्वनि वाली वीणा बजाते हैं। यह संगीत कानों को मोह लेता है। देवताओं की पत्नियां उनकी पूजा करती हैं। वे सर्वोच्च और उज्ज्वल सौभाग्य चाहती हैं। वे परिपूर्ण भाग्य के लिए प्रार्थना करती हैं। कृष्ण बांसुरी के सबसे बड़े निपुण हैं। वे देवी से कला मांगते हैं। ब्रह्मा इस जीवन के रचयिता हैं। उन्हें देवी की प्रेरणादायक कृपा चाहिए। संगीत सर्वोच्च आध्यात्मिक पूजा है। ध्वनि इस संपूर्ण ब्रह्मांड को बांधे रखती है। सर्वोच्च भगवान यहाँ विनम्रता दिखाते हैं। कला को सदैव ईश्वर की सेवा करनी चाहिए। सच्ची भक्ति किसी भी शक्ति से बहुत बड़ी है।
सर्वविद्याविशेषत्मकं चाटुगाथा समुच्चारणाकण्ठमूलोल्ल-
सद्वर्णराजित्रयं कोमलश्यामलोदारपक्षद्वयं तुण्डशोभातिदूरी-
भवत्किंशुकं तं शुकं लालयन्ती परिक्रीडसे।
पाणिपद्मद्वयेनाक्षमालामपि स्फाटिकीं ज्ञानसारात्मकं पुस्तकञ्चङ्कुशं पाशमाबिभ्रती तेन सञ्चिन्त्यसे।
देवी के कोमल हाथों को बहुत ध्यान से देखें। उन्होंने एक सुंदर तोता पकड़ा है। वह बहुत मधुर शब्द बोलता है। उसके गले पर तीन रेखाएं हैं। देवी इस पक्षी के साथ क्रीड़ा करती हैं। उन्होंने स्फटिक की माला धारण की है। उनके हाथ में एक पवित्र पुस्तक है। वह एक तेज अंकुश रखती हैं। वह एक सुदृढ़ पाश रखती हैं। उनके हाथ अत्यंत नाजुक कमल हैं। साधक यहाँ पूर्ण अनुशासन से ध्यान लगाता है। तोता निरंतर नाम जपने का प्रतीक है। वह पवित्र नाम दोहराता है। तीन रेखाएं तीन वेद हैं। माला शुद्ध और एकाग्र ध्यान है। मन को पूर्णतः पारदर्शी होना चाहिए। पुस्तक परम सत्य का ज्ञान है। अंकुश आलसी मन को जगाता है। पाश भटकती इंद्रियों को खींचता है। यह चित्र बहुत महत्वपूर्ण है। उनका यह कठोर अनुशासन ही उनका प्रेम है।
तस्य वक्त्रान्तरात् गद्यपद्यात्मिका भारती निःसरेद् येन वाध्वंसनादा कृतिर्भाव्यसे।
तस्य वश्या भवन्ति स्त्रियः पूरुषाः।
येन वा शातकम्बद्युतिर्भाव्यसे।
सोऽपि लक्ष्मीसहस्रैः परिक्रीडते।
किन्न सिद्ध्येद्वपुःश्यामलं कोमलं चन्द्रचूडान्वितं तावकं ध्यायतः।
तस्य लीला सरोवारिधीः।
तस्य केलीवनं नन्दनम्।
तस्य भद्रासनं भूतलम्।
तस्य गीर्देवता किङ्करी।
तस्य चाज्ञाकरी श्रीः स्वयम्।
सच्चे साधक के जीवन में क्या घटित होता है? उसके मुख से सुंदर कविता बहती है। गद्य और पद्य बहुत स्वाभाविक रूप से आते हैं। पुरुष और महिलाएं दोनों उसकी बात मानते हैं। वह वाणी की शक्ति पर अधिकार करता है। वह देवी की कांति का ध्यान करता है। वह विशाल संपत्ति का आनंद लेता है। वह अनंत प्रचुरता के साथ खेलता है। उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता। वह सरलता से हर लक्ष्य पा लेता है। बड़े महासागर उसके लिए छोटे तालाब बन जाते हैं। स्वर्ग के उपवन उसके क्रीड़ा स्थल बन जाते हैं। संपूर्ण धरती उसका सिंहासन बन जाती है। जब मन परमात्मा से मिलता है, वाणी दिव्य हो जाती है। साधक एक रिक्त बांसुरी बन जाता है। वह संपत्ति का उपयोग कल्याण के लिए करता है। स्वर्ण उसे भ्रष्ट नहीं कर सकता। सफलता बिना किसी कड़वे संघर्ष के आती है। मनुष्य का पृथक अहंकार पूर्णतः मिट जाता है। कुछ न चाहने वाला ही सब कुछ पा लेता है।
सर्वतीर्थात्मिके सर्वमन्त्रात्मिके।
सर्वयन्त्रात्मिके सर्वतन्त्रात्मिके।
सर्वचक्रात्मिके सर्वशक्त्यात्मिके।
सर्वपीठात्मिके सर्ववेदात्मिके।
सर्वविद्यात्मिके सर्वयोगात्मिके।
सर्ववर्णात्मिके सर्वगीतात्मिके।
सर्वनादात्मिके सर्वशब्दात्मिके।
सर्वविश्वात्मिके सर्ववर्गात्मिके।
सर्वसर्वात्मिके सर्वगे सर्वरूपे।
जगन्मातृके पाहि मां पाहि मां पाहि माम्।
देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमः।
यह स्तोत्र अब पूर्ण एकता के साथ समाप्त होता है। वह सभी पवित्र नदियां हैं। वह सभी पवित्र मंत्र हैं। वह सभी शक्तिशाली यंत्र हैं। वह शरीर के सभी गहरे चक्र हैं। वह सभी प्राचीन वेद हैं। वह सभी सच्चा ज्ञान हैं। वह सभी योग क्रियाएं हैं। वह सभी शुद्ध ध्वनियां हैं। वह यह संपूर्ण ब्रह्मांड हैं। वह हर संभव रूप धारण करती हैं। कवि तीव्र स्वर में पुकारता है। वह गहरी सुरक्षा की प्रार्थना करता है। वह इसे तीन बार दोहराता है। वह उनके समक्ष पूर्णतः झुक जाता है। वह अपना प्रणाम बार-बार दोहराता है। देवी के बाहर कुछ भी नहीं है। परमात्मा ही इस वास्तविकता का आधार है। साधक उन्हें अब सर्वत्र देखता है। बार-बार पुकारना एक गहरी भावनात्मक पुकार है। बुद्धि यहाँ पूर्णतः हार जाती है। अब केवल निश्छल शुद्ध भक्ति शेष रहती है। सुरक्षा शरीर और आत्मा दोनों को ढक लेती है। जब बौद्धिक यात्रा समाप्त होती है, तभी सच्चा आश्रय प्राप्त होता है।
माणिक्यवीणामुपलालयन्तीं
मदालसां मञ्जुलवाग्विलासाम्|
माहेन्द्रनीलद्युतिकोमलाङ्गीं
मातङ्गकन्यां मनसा स्मरामि|
चतुर्भुजे चन्द्रकलावतंसे
कुचोन्नते कुङ्कुमरागशोणे|
पुण्ड्रेक्षुपाशाङ्कुशपुष्पबाण-
हस्ते नमस्ते जगदेकमातः|
माता मरकतश्यामा मातङ्गी मदशालिनी|
कुर्यात् कटाक्षं कल्याणी कदम्बवनवासिनी|
जय मातङ्गतनये जय नीलोत्पलद्युते|
जय सङ्गीतरसिके जय लीलाशुकप्रिये|
जय जननि सुधासमुद्रान्तरुद्यन्मणीद्वीप-
संरूढबिल्वाटवीमध्यकल्पद्रुमाकल्प-
कादम्बकान्तारवासप्रिये कृत्तिवासप्रिये सर्वलोकप्रिये।
सादरारब्धसङ्गीतसम्भावनासम्भ्रमालोल-
नीपस्रगाबद्धचूलीसनाथत्रिके सानुमत्पुत्रिके।
शेखरीभूतशीतांशुरेखामयूखावली-
बद्धसुस्निग्धनीलालकश्रेणिशृङ्गारिते लोकसम्भाविते।
कामलीलाधनुःसन्निभभ्रूलतापुष्प-
सन्दोहसन्देहकृल्लोचने वाक्सुधासेचने।
चारुगोरोचनापङ्ककेली-
ललामाभिरामे सुरामे रमे।
प्रोल्लसद्ध्वालिकामौक्तिकश्रेणिका-
चन्द्रिकामण्डलोद्भासिलावण्यगण्ड-
स्थलन्यस्तकस्तूरिकापत्ररेखासमुद्भूत-
सौरभ्यसंम्भ्रान्तभृङ्गाङ्गनागीत-
सान्द्रीभवन्मन्दतन्त्रीस्वरे सुस्वरे भास्वरे।
वल्लकीवादनप्रक्रियालोलताली-
दलाबद्धताटङ्कभूषाविशेषान्विते सिद्धसम्मानिते।
दिव्यहालामदोद्वेलहेलालसच्चक्षु-
रान्दोलनश्रीसमाक्षिप्तकर्णैकनीलोत्पले श्यामले।
पूरिताशेषलोकाभिवाञ्छाफले श्रीफले।
स्वेदबिन्दूल्लसद्फाललावण्यनिष्यन्द-
सन्दोहसन्देहकृन्नासिकामौक्तिके सर्वविश्वात्मिके सर्वसिद्ध्यात्मिके कालिके।
मुग्धमन्दस्मितोदारवक्त्रस्फुरत्पूग-
ताम्बूलकर्पूरखण्डोत्करे ज्ञानमुद्राकरे।
सर्वसम्पत्करे पद्मभास्वत्करे श्रीकरे।
कुन्दपुष्पद्युतिस्निग्धदन्तावलीनिर्मलालोल-
कल्लोलसम्मेलनस्मेरशोणाधरे चारुवीणाधरे पक्वबिम्बाधरे।
सुललितनवयौवनारम्भचन्द्रोदयोद्वेल-
लावण्यदुग्धार्णवाविर्भवत्कम्बु-
बिम्बोकभृत्कन्थरे सत्कलामन्दिरे मन्थरे।
दिव्यरत्नप्रभाबन्धुरच्छन्नहारादि-
भूषासमुदद्योतमानानवद्याङ्गशोभे शुभे।
रत्नकेयूररश्मिच्छटापल्लव-
प्रोल्लसद्दोल्लताराजिते योगिभिः पूजिते।
विश्वदिङ्मण्डलव्याप्तमाणिक्यतेजः-
स्फुरत्कङ्कणालङ्कृते विभ्रमालङ्कृते साधुभिः पूजिते।
वासरारम्भवेलासमुज्जृम्भमाणारविन्द-
प्रतिद्वन्द्विपाणिद्वये सन्ततोद्यद्दये अद्वये।
दिव्यरत्नोर्मिकादीधितिस्तोम-
सन्ध्यायमानाङ्गुलीपल्लवोद्य-
न्नखेन्दुप्रभामण्डले।
सन्नुताखण्डले चित्प्रभामण्डले प्रोल्लसत्कुण्डले।
तारकाराजिनीकाशहारावलि-
स्मेरचारुस्तनाभोगभारानमन्मध्य-
वल्लीवलिच्छेदवीचीसमुद्यत्समुल्लास-
सन्दर्शिताकारसौन्दर्यरत्नाकरे वल्लकीभृत्करे किङ्करश्रीकरे।
हेमकुम्भोपमोत्तुङ्गवक्षोज-
भारावनम्रे त्रिलोकावनम्रे।
लसद्वृत्तगम्भीरनाभीसरस्तीर-
शैवालशङ्काकरश्याम-
रोमावलीभूषणे मञ्जुसम्भाषणे।
चारुशिञ्चत्कटीसूत्रनिर्भत्सितानङ्ग-
लीलधनुश्शिञ्चिनीडम्बरे दिव्यरत्नाम्बरे।
पद्मरागोल्लसन्मेखलामौक्तिक-
श्रोणिशोभाजितस्वर्ण-
भूभृत्तले चन्द्रिकाशीतले।
विकसितनवकिम्शुकाताम्रदिव्याम्शुक-
च्छन्नचारूरुशोभापराभूतसिन्दूर-
शोणायमानेन्द्रमातङ्गहस्मार्गले वैभवानर्ग्गले।
श्यामले कोमलस्निग्द्धनीलोत्पलोत्पादि-
तानङ्गतूणीरशङ्काकरोदारजङ्घालते चारुलीलागते।
नम्रदिक्पालसीमन्तिनीकुन्तलस्निग्द्ध-
नीलप्रभापुञ्चसञ्जातदुर्वाङ्कुराशङ्क-
सारङ्गसंयोगरिङ्खन्नखेन्दूज्ज्वले प्रोज्ज्वले।
निर्मले प्रह्वदेवेशलक्ष्मीशभूतेश-
तोयेशवाणीशकीनाशदैत्येशयक्षेश-
वाय्वग्निकोटीरमाणिक्यसम्हृष्ट-
बालातपोद्दामलाक्षारसारुण्य-
तारुण्यलक्ष्मीगृहीताङ्घ्रिपद्म्मे सुपद्मे उमे।
सुरुचिरनवरत्नपीठस्थिते सुस्थिते।
रत्नपद्मासने रत्नसिंहासने।
शङ्खपद्मद्वयोपाश्रिते विश्रुते।
तत्र विघ्नेशदुर्गावटुक्षेत्रपालैर्युते मत्तमातङ्गकन्यासमूहान्विते भैरवैरष्टभिर्वेष्टिते।
मञ्चुलामेनकाद्यङ्गनामानिते देवि वामादिभिः शक्तिभिः सेविते।
धात्रि लक्ष्म्यादिशक्त्यष्टकैः संयुते मातृकामण्डलैर्मण्डिते।
यक्षगन्धर्वसिद्धाङ्गना-
मण्डलैरर्चिते।
भैरवीसंवृते पञ्चबाणात्मिके पञ्चबाणेन रत्या च संभाविते।
प्रीतिभाजा वसन्तेन चानन्दिते भक्तिभाजं परं श्रेयसे कल्पसे।
योगिनां मानसे द्योतसे छन्दसामोजसा भ्राजसे।
गीतविद्याविनोदाति-
तृष्णेन कृष्णेन सम्पूज्यसे।
भक्तिमच्चेतसा वेधसा स्तूयसे विश्वहृद्येन वाद्येन विद्याधरैर्गीयसे।
श्रवणहरदक्षिणक्वाणया वीणया किन्नरैर्गीयसे।
यक्षगन्धर्वसिद्धाङ्गनामण्डलैरर्च्यसे।
सर्वसौभाग्यवाञ्छावतीभि-
र्वधूभिस्सुराणां समाराध्यसे।
सर्वविद्याविशेषत्मकं चाटुगाथा समुच्चारणाकण्ठमूलोल्ल-
सद्वर्णराजित्रयं कोमलश्यामलोदारपक्षद्वयं तुण्डशोभातिदूरी-
भवत्किंशुकं तं शुकं लालयन्ती परिक्रीडसे।
पाणिपद्मद्वयेनाक्षमालामपि स्फाटिकीं ज्ञानसारात्मकं पुस्तकञ्चङ्कुशं पाशमाबिभ्रती तेन सञ्चिन्त्यसे।
तस्य वक्त्रान्तरात् गद्यपद्यात्मिका भारती निःसरेद् येन वाध्वंसनादा कृतिर्भाव्यसे।
तस्य वश्या भवन्ति स्त्रियः पूरुषाः।
येन वा शातकम्बद्युतिर्भाव्यसे।
सोऽपि लक्ष्मीसहस्रैः परिक्रीडते।
किन्न सिद्ध्येद्वपुःश्यामलं कोमलं चन्द्रचूडान्वितं तावकं ध्यायतः।
तस्य लीला सरोवारिधीः।
तस्य केलीवनं नन्दनम्।
तस्य भद्रासनं भूतलम्।
तस्य गीर्देवता किङ्करी।
तस्य चाज्ञाकरी श्रीः स्वयम्।
सर्वतीर्थात्मिके सर्वमन्त्रात्मिके।
सर्वयन्त्रात्मिके सर्वतन्त्रात्मिके।
सर्वचक्रात्मिके सर्वशक्त्यात्मिके।
सर्वपीठात्मिके सर्ववेदात्मिके।
सर्वविद्यात्मिके सर्वयोगात्मिके।
सर्ववर्णात्मिके सर्वगीतात्मिके।
सर्वनादात्मिके सर्वशब्दात्मिके।
सर्वविश्वात्मिके सर्ववर्गात्मिके।
सर्वसर्वात्मिके सर्वगे सर्वरूपे।
जगन्मातृके पाहि मां पाहि मां पाहि माम्।
देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमः।