यमुना अष्टक स्तोत्र

यमुना अष्टक स्तोत्र

मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी
तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी।
मनोनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

यह श्लोक एक सुंदर उपमा से आरंभ होता है। इस नदी का जल श्याम रंग का है। यह जल भगवान कृष्ण के शरीर जैसा है। यह स्वर्ग के सुखों को भी तुच्छ कर देती है। यह तीनों लोकों के दुखों का हरण करती है। इसके तटों पर सुंदर वन-उपवन हैं। ये उपवन मनुष्यों का अहंकार नष्ट करते हैं। कवि इस पवित्र नदी से प्रार्थना करते हैं। वे मन के मल को धोने की याचना करते हैं। बाहरी अशुद्धि सरलता से धुल जाती है। भीतरी शुद्धि के लिए ईश्वरीय कृपा आवश्यक है। हमारा मन सरलता से अहंकार ग्रहण कर लेता है। यह नदी इस कठोर आंतरिक मल को धो देती है। दैवीय स्पर्श हमारे मिथ्या अभिमान को मिटाता है। वास्तविक पवित्रता सदा भीतर से उत्पन्न होती है। निर्मल मन ही सर्वोच्च स्वर्ग है।

मलापहारिवारिपूरिभूरिमण्डितामृता
भृशं प्रवातकप्रपञ्चनातिपण्डितानिशा।
सुनन्दनन्दिनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

यहाँ जल की महिमा का वर्णन है। यह नदी अमृत रूपी जल से परिपूर्ण है। यह मीठा जल समस्त अशुद्धियों को मिटाता है। इसकी सतह पर तीव्र पवन बहती है। रात्रि के समय इसका जल अत्यंत मनोहारी लगता है। यह भगवान कृष्ण के दिव्य शरीर का स्पर्श करती है। इस स्पर्श से जल लालिमा युक्त हो जाता है। यह नदी सदा कल्याण करने वाली है। हम इससे आत्मिक शुद्धि की प्रार्थना करते हैं। जल संपूर्ण भौतिक जीवन का आधार है। ईश्वरीय जल आत्मा को पोषण देता है। जल की लालिमा ईश्वरीय प्रेम को दर्शाती है। प्रेम सबसे बड़ा शोधक तत्व है। यह हमारे स्वार्थ को पूर्णतया धो देता है। परमात्मा का स्पर्श मूल स्वभाव को बदल देता है। सच्ची भक्ति मानवीय मन को रंग देती है।

लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका
नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका।
तटान्तवासदासहंससंवृताह्निकामदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

इन लहरों में एक गहरा सत्य छिपा है। नृत्य करती हुई लहरों में अपार शक्ति है। ये लहरें प्राणियों के पाप धो देती हैं। यह नदी नवीन और मधुर भक्ति प्रदान करती है। भक्त इस मधुर भक्ति की प्रतीक्षा करते हैं। वे प्यासे चातक पक्षी के समान रहते हैं। नदी के तटों पर श्वेत हंस निवास करते हैं। ये पक्षी अपनी दैनिक क्रियाएं संपन्न करते हैं। ये जल के समीप असीम आनंद पाते हैं। बहता हुआ जल निरंतर आध्यात्मिक कर्म का प्रतीक है। ठहरा हुआ जल अत्यंत मलिन हो जाता है। मन को परमात्मा की ओर बढ़ते रहना चाहिए। भक्ति एक गहरी प्यास के समान कार्य करती है। आत्मा इस पवित्र अमृत की लालसा करती है। पवित्र वातावरण स्वभावतः पवित्र आदतें बनाता है। निरंतर भक्ति पूर्व जन्मों के कर्मों को काटती है।

विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुता
गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता।
प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

यह छंद शीतल मंद पवन का चित्रण करता है। तटों पर एक कोमल वायु बहती है। यह ईश्वरीय क्रीड़ा की थकान को मिटाती है। इस जल का सौंदर्य अत्यंत महान है। शब्द इस सुंदरता का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। यह नदी भूमि पर बहती है। यह अपने मार्ग की पृथ्वी को पवित्र करती है। यह अन्य नदियों और झरनों को भी पावन बनाती है। यह पवित्र जल हमारे मन को स्वच्छ करे। ईश्वरीय आनंद प्रायः एक मधुर विश्राम लाता है। शीतल पवन दैवीय आश्रय को दर्शाती है। परमात्मा की कृपा नदी के समान बहती है। यह अपने संपर्क में आने वाले सबको उठाती है। संतों का संग हमारे चरित्र को ऊंचा करता है। वास्तविक सौंदर्य मानवीय भाषा से परे है। ईश्वरीय कृपा संपूर्ण परिवेश को शुद्ध करती है।

तरङ्गसङ्गसैकतान्तरातितं सदासिता
शरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरी सभाजिता।
भवार्चनाप्रचारुणाम्बुनाधुना विशारदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

प्रवाह के साथ दृश्य में परिवर्तन आता है। श्याम रंग की लहरें श्वेत बालू को छूती हैं। शरद ऋतु की चाँदनी जल पर पड़ती है। रात्रि में यह नदी अत्यंत उज्ज्वल चमकती है। भगवान शिव इस पवित्र जल की पूजा करते हैं। संपूर्ण संसार इस सुंदर नदी की स्तुति करता है। यह जल गहन आध्यात्मिक ज्ञान धारण करता है। हम आंतरिक पवित्रता के लिए प्रार्थना करते हैं। श्याम जल श्वेत बालू से मिलता है। यह विपरीत तत्वों के मिलन को दर्शाता है। प्रकाश और अंधकार सद्भाव में एक साथ रहते हैं। चाँदनी गहरी शांति और स्थिरता लाती है। मन को भी इस गहन शांति की आवश्यकता है। ज्ञान एक स्थिर नदी के समान बहता है। प्रकृति एक मौन आध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य करती है। सच्चा ज्ञान मानसिक धुंध को साफ करता है।

जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी
स्वभर्त्तुरन्यदुर्लभाङ्गताङ्गताम्शभागिनी।
स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदिनातिकोविदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

किस तत्व ने इस नदी को यह विशिष्ट रंग दिया है? राधा इन जलों में आनंदपूर्वक क्रीड़ा करती हैं। उनका रंगीन श्रृंगार नदी में घुल जाता है। जल इन चमकीले रंगों को सोख लेता है। नदी को एक अत्यंत दुर्लभ स्वरूप प्राप्त होता है। महान देवता भी इसे सरलता से नहीं पा सकते। यह नदी सात गहरे महासागरों को पार करती है। इसमें अपार शक्ति और कौशल है। यह हमारे मानसिक मल को धो डाले। यह नदी भक्ति के सार को धारण करती है। यह पवित्र आत्माओं के प्रेम को ग्रहण करती है। प्रेम जल को उसकी वास्तविक शक्ति देता है। यह ईश्वरीय प्रेम अत्यंत दुर्लभ है। यह भारी बाधाओं को भी तोड़ सकता है। सात महासागर गहरी सांसारिक आसक्तियों के प्रतीक हैं। भक्ति सांसारिक बंधनों को सरलता से काटती है। सच्चा प्रेम साधारण वस्तुओं को पूर्णतः बदल देता है।

जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी
विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी।
सदावगाहनावतीर्णभर्तृभृत्यनारदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

अब पाठ एक जीवंत दृश्य को प्रस्तुत करता है। कृष्ण के सुगंधित लेप जल में घुल जाते हैं। भौंरों के झुंड इस मीठी सुगंध के पीछे आते हैं। जल-क्रीड़ा के दौरान राधा के केश खुल जाते हैं। उनके बालों से पीले चम्पक पुष्प गिरते हैं। वे नदी की सतह पर सुंदरता से तैरते हैं। महर्षि नारद यहाँ स्नान करने आते हैं। अन्य महान भक्त भी यहाँ स्नान करते हैं। यह नदी हमारे अशुद्ध मनों को शुद्ध करे। सुगंध अच्छाई के स्थायी प्रभाव को दर्शाती है। पवित्र कर्म अपने पीछे एक मीठी महक छोड़ते हैं। भौंरे वास्तविक ईश्वरीय मिठास को खोजते हैं। मन को इन भौंरों के समान कार्य करना चाहिए। इसे सच्चे आध्यात्मिक आनंद का पीछा करना चाहिए। ऋषि शुद्ध प्रेम पाने के लिए यहाँ स्नान करते हैं। पवित्र स्थान संतों की ऊर्जा को सोख लेते हैं। उच्च ऊर्जा वाले स्थान मन को ऊपर खींचते हैं।

सदैव नन्दिनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला
तटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्वला।
जलावगाहिणां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

इस अंतिम श्लोक में सुंदर नदी तटों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। तटों पर सुंदर हरे वन-उपवन हैं। कृष्ण इन घने उपवनों में आनंदपूर्वक खेलते हैं। किनारों पर चमेली के फूल खिलते हैं। कदम्ब के फूल अपना पीला पराग गिराते हैं। यह पराग जल को अत्यंत उज्ज्वल बनाता है। लोग इस पवित्र नदी में स्नान करते हैं। नदी उन्हें जीवन के सागर को पार कराती है। यह हमारे मनों को सदा के लिए शुद्ध करे। नदी के तट आनंद के स्थान हैं। वे ईश्वरीय लीला के सौंदर्य को दिखाते हैं। खिले हुए फूल पूर्णतः जागृत आत्मा के प्रतीक हैं। स्नान का अर्थ आध्यात्मिक सत्य में डूबना है। जीवन का महासागर अत्यंत विशाल और भयानक है। नदी एक सुरक्षित नौका के रूप में कार्य करती है। जीवन रूपी सागर को पार करने हेतु निर्मल मन चाहिए। समर्पण अंतिम आध्यात्मिक मुक्ति की ओर ले जाता है।

 

मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी
तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी।
मनोनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।
मलापहारिवारिपूरिभूरिमण्डितामृता
भृशं प्रवातकप्रपञ्चनातिपण्डितानिशा।
सुनन्दनन्दिनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।
लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका
नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका।
तटान्तवासदासहंससंवृताह्निकामदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।
विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुता
गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता।
प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।
तरङ्गसङ्गसैकतान्तरातितं सदासिता
शरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरी सभाजिता।
भवार्चनाप्रचारुणाम्बुनाधुना विशारदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।
जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी
स्वभर्त्तुरन्यदुर्लभाङ्गताङ्गताम्शभागिनी।
स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदिनातिकोविदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।
जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी
विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी।
सदावगाहनावतीर्णभर्तृभृत्यनारदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।
सदैव नन्दिनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला
तटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्वला।
जलावगाहिणां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा
धुनोतु नो मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा।

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