
सबिन्दुसिन्धुसुस्खलत्तरङ्गभङ्गरञ्जितं
द्विषत्सु पापजातजातकादिवारिसंयुतम्।
कृतान्तदूतकालभूतभीतिहारिवर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
यह श्लोक देवी का सुंदर वर्णन करता है। जल की बूंदें रमणीय लहरें बनाती हैं। ये लहरें समुद्र की ओर बहती हैं। यह जल घोर पापों को धोता है। जन्म-मरण के कर्म-बंधन कट जाते हैं। यह नदी अभेद्य कवच के समान है। यमराज के दूतों का भय मिटता है। मृत्यु का भय समीप नहीं आता। भक्त आपके चरण कमलों में वंदते हैं। देवी का आश्रय सर्वोच्च सुरक्षा देता है। प्रकृति मानव आत्मा का पोषण करती है। सच्ची भक्ति पूर्ण अभय प्रदान करती है। ईश्वरीय कृपा प्राणों की रक्षा करती है।
त्वदम्बुलीनदीनमीनदिव्यसंप्रदायकं
कलौ मलौघभारहारिसर्वतीर्थनायकम्।
सुमच्छकच्छनक्रचक्रवाकचक्रशर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
जल की महिमा का अद्भुत रूप देखिए। इस नदी में छोटी मछलियां तैरती हैं। उन्हें शीघ्र ही दिव्य लोक मिलता है। यह कलयुग के भारी मल को हरती है। नर्मदा समस्त तीर्थों की अधिष्ठात्री हैं। जलचरों को यहां पूर्ण विश्राम मिलता है। मगरमच्छ और कछुए सुखपूर्वक निवास करते हैं। तट पर पक्षी अत्यंत आनंदित रहते हैं। यह पवित्र जल सभी जीवों को सुख देता है। प्रकृति किसी प्राणी में भेदभाव नहीं करती। ईश्वरीय कृपा का प्रवाह सबके लिए है। एक साधारण स्पर्श से मोक्ष संभव है। शुद्ध चेतना हर जीव का कल्याण करती है।
महागभीरनीरपूरपापधूतभूतलं
ध्वनत्समस्तपातकारिदारितापदाचलम्।
जगल्लये महाभये मृकण्डुसूनुहर्म्यदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
ध्यान दें कि यह प्रवाह कितना शक्तिशाली है। नदी का जल अत्यंत गहरा है। इसका वेग पृथ्वी के पाप धोता है। जल की गर्जना से विपत्तियां टूटती हैं। महाप्रलय के समय संसार में भय छाता है। उस घोर संकट में नर्मदा आश्रय देती हैं। महर्षि मार्कण्डेय ने यहीं अभय पाया था। यह नदी एक शाश्वत रक्षक है। भौतिक संकटों में आध्यात्मिक कृपा ढाल बनती है। सच्ची आस्था प्रलयकाल में स्थिर रहती है। ईश्वरीय आश्रय संसार के विनाश से परे है। आंतरिक शांति बाहरी प्रलय को जीत लेती है।
गतं तदैव मे भयं त्वदम्बु वीक्षितं यदा
मृकण्डुसूनुशौनकासुरारिसेवितं सदा।
पुनर्भवाब्धिजन्मजं भवाब्धिदुःखवर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
दर्शन मात्र से सारा भय तिरोहित होता है। आपके पवित्र जल को देखते ही शांति मिलती है। मार्कण्डेय और शौनक जैसे महर्षि सेवा करते हैं। देवता और असुर भी उपासना करते हैं। भवसागर का जन्म-मृत्यु चक्र कष्टकारी है। यह नदी दुःखों के विरुद्ध एक कवच है। माता के दर्शन से पुनर्जन्म का भय मिटता है। चंचल मन पूरी तरह शांत होता है। ईश्वरीय दर्शन आंतरिक शंकाओं का नाश करता है। दृष्टि का शुद्धिकरण ही सच्ची साधना है। अलौकिक दृष्टि से भौतिक संताप सदा नष्ट होते हैं।
अलक्ष्यलक्षकिन्नरामरासुरादिपूजितं
सुलक्षनीरतीरधीरपक्षिलक्षकूजितम्।
वसिष्ठशिष्टपिप्पलादिकर्दमादिशर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
इस बिंदु पर व्यापक भक्ति प्रकट होती है। लाखों अदृश्य प्राणी इस नदी को पूजते हैं। देव, गंधर्व और असुर शीश नवाते हैं। तटों पर लाखों पक्षी मधुर कलरव करते हैं। यहां का निर्मल जल शांतिदायक है। महर्षि वशिष्ठ और पिप्पलाद ने आनंद पाया। कर्दम ऋषि ने भी यहीं सिद्धि पाई। यह भौतिक तट आध्यात्मिक स्वर्ग बन जाता है। यहां वन्य प्रकृति और दिव्यता का संगम है। पवित्रता उच्च और निम्न स्तरों को जोड़ती है। सच्ची भक्ति संसार में पूर्ण संतुलन लाती है।
सनत्कुमारनाचिकेतकश्यपात्रिषट्पदै-
र्धृतं स्वकीयमानसेषु नारदादिषट्पदैः।
रवीन्दुरन्तिदेवदेवराजकर्मशर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
महान ऋषि माता नर्मदा की ओर क्यों आते हैं? ज्ञानी पुरुषों का मन भौरों के समान है। वे आपके चरण कमलों पर मंडराते हैं। सनत्कुमार और नचिकेता आपका ध्यान करते हैं। कश्यप और अत्रि मुनि हृदय में आपको धारते हैं। देवर्षि नारद निरंतर आपका स्मरण करते हैं। सूर्य, चंद्र और रन्तिदेव भी कृपा पाते हैं। देवराज इंद्र को भी सफलता मिलती है। निरंतर आंतरिक ध्यान से बाहरी जगत सुधरता है। पवित्रता पर मन एकाग्र करना आवश्यक है। मानसिक ध्यान और बाह्य पूजा का फल समान है।
अलक्षलक्षलक्षपापलक्षसारसायुधं
ततस्तु जीवजन्तुतन्तुभुक्तिमुक्तिदायकम्।
विरिञ्चिविष्णुशङ्करस्वकीयधामवर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
यह पंक्ति एक अत्यंत गूढ़ सत्य उजागर करती है। मनुष्यों के लाखों अदृश्य पाप होते हैं। यह जल एक अमोघ अस्त्र है। यह अनंत दुष्कर्मों को काट देता है। सभी जीवों को इस जल से पोषण मिलता है। यह नदी सांसारिक भोग और मोक्ष देती है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव यहां निवास करते हैं। माता नर्मदा त्रिदेवों को भी आश्रय देती हैं। भौतिक आनंद और आध्यात्मिक मुक्ति एक साथ मिलते हैं। ईश्वरीय कृपा से मनुष्य की आवश्यकता पूर्ण होती है। परम सत्य इसी धारा में प्रवाहित होता है।
अहो धृतं स्वनं श्रुतं महेशिकेशजातटे
किरातसूतवाडवेषु पण्डिते शठे नटे।
दुरन्तपापतापहारि सर्वजन्तुशर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
यह अंश पूर्ण आध्यात्मिक समानता सिद्ध करता है। यह पवित्र नदी शिव की जटाओं से निकलती है। इसकी मधुर ध्वनि सभी तक समान पहुंचती है। ईश्वरीय कृपा कभी सामाजिक स्तर नहीं देखती। वनवासी और विद्वान दोनों लाभान्वित होते हैं। अज्ञानी और ज्ञानी सभी जल ग्रहण करते हैं। यह जल पाप और संताप हरता है। हर एक प्राणी को यहाँ विश्राम मिलता है। मानव द्वारा बनाए नियम यहां व्यर्थ हैं। प्रकृति अच्छे और बुरे दोनों को अपनाती है। निस्वार्थ प्रेम समाज की सभी सीमाएं तोड़ता है।
इदं तु नर्मदाष्टकं त्रिकालमेव ये सदा
पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गतिं कदा।
सुलभ्यदेहदुर्लभं महेशधामगौरवं
पुनर्भवा नरा न वै विलोकयन्ति रौरवम्।
अंतिम श्लोक में महान फलश्रुति दी गई है। जो मनुष्य इस अष्टक का पाठ करता है। जो प्रतिदिन तीनों काल इसका उच्चारण करता है। वह कभी भी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। यह मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ है। इस स्तोत्र से जीवन सफल होता है। भक्त भगवान शिव के धाम को पाता है। उसे अत्यंत उच्च ईश्वरीय गौरव मिलता है। जन्म और मृत्यु का कष्टकारी चक्र रुकता है। उसे नरक के भयंकर दुःख नहीं देखने पड़ते। निरंतर साधना से मनुष्य का लक्ष्य सिद्ध होता है। पवित्र शब्द आत्मा को परमात्मा से जोड़ते हैं।
सबिन्दुसिन्धुसुस्खलत्तरङ्गभङ्गरञ्जितं
द्विषत्सु पापजातजातकादिवारिसंयुतम्।
कृतान्तदूतकालभूतभीतिहारिवर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
त्वदम्बुलीनदीनमीनदिव्यसंप्रदायकं
कलौ मलौघभारहारिसर्वतीर्थनायकम्।
सुमच्छकच्छनक्रचक्रवाकचक्रशर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
महागभीरनीरपूरपापधूतभूतलं
ध्वनत्समस्तपातकारिदारितापदाचलम्।
जगल्लये महाभये मृकण्डुसूनुहर्म्यदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
गतं तदैव मे भयं त्वदम्बु वीक्षितं यदा
मृकण्डुसूनुशौनकासुरारिसेवितं सदा।
पुनर्भवाब्धिजन्मजं भवाब्धिदुःखवर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
अलक्ष्यलक्षकिन्नरामरासुरादिपूजितं
सुलक्षनीरतीरधीरपक्षिलक्षकूजितम्।
वसिष्ठशिष्टपिप्पलादिकर्दमादिशर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
सनत्कुमारनाचिकेतकश्यपात्रिषट्पदै-
र्धृतं स्वकीयमानसेषु नारदादिषट्पदैः।
रवीन्दुरन्तिदेवदेवराजकर्मशर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
अलक्षलक्षलक्षपापलक्षसारसायुधं
ततस्तु जीवजन्तुतन्तुभुक्तिमुक्तिदायकम्।
विरिञ्चिविष्णुशङ्करस्वकीयधामवर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
अहो धृतं स्वनं श्रुतं महेशिकेशजातटे
किरातसूतवाडवेषु पण्डिते शठे नटे।
दुरन्तपापतापहारि सर्वजन्तुशर्मदे
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।
इदं तु नर्मदाष्टकं त्रिकालमेव ये सदा
पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गतिं कदा।
सुलभ्यदेहदुर्लभं महेशधामगौरवं
पुनर्भवा नरा न वै विलोकयन्ति रौरवम्।