लक्ष्मी क्षमापण स्तोत्र

क्षमस्व भगवत्यम्ब क्षमाशीले परात्परे ।
शुद्धसत्त्वस्वरूपे च कोपादिपरिवर्जिते ॥

हे भगवती! हे अम्बे! हे क्षमा करने वाली! हे सर्वश्रेष्ठ से भी परे! आप हमें क्षमा करें। आप शुद्ध सत्त्वगुण की साक्षात् मूर्ति हैं और आप क्रोध आदि सभी विकारों से सर्वथा रहित हैं।

यह श्लोक देवी से क्षमा याचना के साथ प्रारम्भ होता है, जो भक्त की विनम्रता और शरणागति को दर्शाता है। देवी को 'क्षमाशीले' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि क्षमा करना उनका स्वभाव है। 'परात्परे' कहकर उन्हें प्रकृति के तीनों गुणों और समस्त सृष्टि से भी परे, सर्वोच्च सत्ता बताया गया है। उन्हें 'शुद्धसत्त्वस्वरूपे' कहा गया है, अर्थात वे केवल सात्त्विक गुणों का ही स्वरूप हैं, जिनमें रजोगुण और तमोगुण का कोई स्थान नहीं है। इसी कारण वे क्रोध, ईर्ष्या, लोभ जैसे सभी मानसिक विकारों से मुक्त हैं। यह श्लोक देवी के परम शांत, निर्मल और करुणामय स्वरूप का ध्यान कराता है।

उपमे सर्वसाध्वीनां देवीनां देवपूजिते ।
त्वया विना जगत्सर्वं मृततुल्यं च निष्फलम् ॥

आप सभी साध्वी (पवित्र) स्त्रियों के लिए एक आदर्श उपमा हैं, आप सभी देवियों में श्रेष्ठ और देवताओं द्वारा पूजित हैं। आपके बिना यह सम्पूर्ण जगत एक मृत शरीर के समान और सारहीन है।

इस श्लोक में देवी की महिमा को स्थापित किया गया है। वे सभी पवित्र और पतिव्रता स्त्रियों के लिए एक आदर्श हैं। वे न केवल मनुष्यों, अपितु स्वयं देवताओं द्वारा भी पूजनीय हैं। इस श्लोक का सबसे गहरा भाव यह है कि उनके बिना यह संसार 'मृततुल्यं' अर्थात एक शव के समान है। इसका तात्पर्य है कि देवी लक्ष्मी केवल धन या ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री नहीं, बल्कि वे जगत की 'श्री' हैं - अर्थात चेतना, प्राण-शक्ति, सौंदर्य और सार्थकता। उनके बिना सृष्टि में न तो जीवन है, न सौंदर्य और न ही कोई उद्देश्य।

सर्वसम्पत्स्वरूपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी ।
रासेश्वर्यधिदेवी त्वं त्वत्कलाः सर्वयोषितः ॥

आप सभी प्रकार की सम्पदाओं का स्वरूप हैं और सभी प्राणियों के लिए सभी रूपों में विद्यमान हैं। आप रास की अधिष्ठात्री देवी रासेश्वरी (श्री राधा) हैं और संसार की समस्त स्त्रियाँ आपकी ही अंश-कला हैं।

यहाँ देवी को 'सर्वसम्पत्स्वरूपा' कहा गया है, जिसका अर्थ केवल भौतिक धन-धान्य नहीं, बल्कि ज्ञान, बल, सौंदर्य, सौभाग्य और शांति जैसी सभी प्रकार की सकारात्मक सम्पदाओं से है। वे 'सर्वरूपिणी' हैं, अर्थात वे प्रत्येक जीव में विभिन्न रूपों में वास करती हैं। उन्हें भगवान कृष्ण की दिव्य रासलीला की स्वामिनी 'रासेश्वरी' के रूप में भी सम्बोधित किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गई है कि जगत की सभी स्त्रियाँ उन्हीं की 'कला' अर्थात आंशिक अभिव्यक्ति हैं। यह कथन नारी मात्र में देवत्व को स्थापित करता है और प्रत्येक स्त्री के प्रति सम्मान का भाव जगाता है।

कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका ।
स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं मर्त्यलक्ष्मीश्च भूतले ॥

आप ही कैलाश में पार्वती हैं और क्षीरसागर में सिन्धु-पुत्री (लक्ष्मी) हैं। आप ही स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी हैं और इस पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच मर्त्यलक्ष्मी हैं।

यह श्लोक देवी के विभिन्न लोकों में विभिन्न रूपों की व्याख्या करता है। यह उस अद्वैत भाव को दर्शाता है, जहाँ विभिन्न नाम और रूप वाली देवियों को एक ही महाशक्ति का स्वरूप माना गया है। कैलाश पर वे भगवान शिव की शक्ति 'पार्वती' हैं। क्षीरसागर में वे भगवान विष्णु की शक्ति 'सिन्धुकन्यका' (लक्ष्मी) हैं। स्वर्ग में वे 'स्वर्गलक्ष्मी' के रूप में देवताओं को ऐश्वर्य प्रदान करती हैं और मृत्युलोक में 'मर्त्यलक्ष्मी' के रूप में मनुष्यों का कल्याण करती हैं। यह दर्शाता है कि स्थान और कार्य के अनुसार एक ही शक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होती है।

वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सरस्वती ।
गङ्गा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मालोकतः ॥

आप ही वैकुण्ठ में महालक्ष्मी हैं, देवों की देवी सरस्वती हैं। आप ही गंगा और तुलसी हैं तथा ब्रह्मलोक में आप ही सावित्री हैं।

यहाँ देवी के अन्य प्रमुख स्वरूपों का वर्णन है। वैकुण्ठ में वे भगवान नारायण की 'महालक्ष्मी' हैं। विद्या, ज्ञान और कला की देवी 'सरस्वती' भी आप ही हैं। पवित्रता की प्रतीक 'गंगा' और भक्ति की प्रतीक 'तुलसी' भी आपका ही स्वरूप हैं। ब्रह्मलोक में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की शक्ति 'सावित्री' भी आप ही हैं। इस प्रकार, यह श्लोक त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की शक्तियों को एक ही महादेवी का भिन्न-भिन्न स्वरूप बताकर त्रिदेवियों की एकता को प्रतिपादित करता है।

कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयम् ।
रासे रासेश्वरी त्वं च वृन्दावनवने वने ॥

आप गोलोक में श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी स्वयं राधिका हैं। रासलीला में आप रासेश्वरी हैं और वृन्दावन के प्रत्येक वन में आप ही विराजमान हैं।

यह श्लोक विशेष रूप से देवी के श्री राधा स्वरूप पर केंद्रित है, जिन्हें वैष्णव परम्परा में परम शक्ति माना जाता है। उन्हें गोलोक धाम में परब्रह्म श्रीकृष्ण के प्राणों की स्वामिनी 'राधिका' कहा गया है। वे ही महारास की अधीश्वरी 'रासेश्वरी' हैं और वृन्दावन के कण-कण और प्रत्येक वन में उन्हीं का वास है। यह देवी के ऐश्वर्य रूप से उनके माधुर्य और प्रेममय स्वरूप की ओर एक सुंदर मोड़ है, जहाँ वे भगवान की आह्लादिनी शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं।

कृष्णा प्रिया त्वं भाण्डीरे चन्द्रा चन्दनकानने ।
विरजा चम्पकवने शतश‍ृङ्गे च सुन्दरी ॥

आप भाण्डीरवन में 'कृष्णप्रिया' हैं, चंदनवन में 'चन्द्रा' हैं। चम्पकवन में आप 'विरजा' हैं और शतशृंग पर्वत पर 'सुन्दरी' नाम से जानी जाती हैं।

यहाँ वृन्दावन के विभिन्न वनों और स्थानों में देवी राधा के विभिन्न नामों और रूपों का उल्लेख है। यह उनके लीला-विलास की विविधता को दर्शाता है। प्रत्येक वन में उनका एक विशेष नाम और स्वरूप है, जो उस स्थान की दिव्य लीला से सम्बंधित है। ये सभी नाम श्री राधा की मुख्य सखियों या उनके अपने ही विभिन्न भावों के प्रतीक हैं, जो यह दर्शाते हैं कि सम्पूर्ण ब्रजमंडल उनकी दिव्य उपस्थिति से ओत-प्रोत है।

पद्मावती पद्मवने मालती मालतीवने ।
कुन्ददन्ती कुन्दवने सुशीला केतकीवने ॥

पद्मवन (कमलों के वन) में आप 'पद्मावती' हैं और मालतीवन में 'मालती' हैं। कुन्दवन में आप 'कुन्ददन्ती' (कुंद के पुष्प जैसे दांतों वाली) हैं और केतकीवन में 'सुशीला' हैं।

यह वर्णन पिछले श्लोक की ही निरंतरता है, जिसमें वृन्दावन के अलग-अलग उपवनों में देवी के अलग-अलग नामों का उल्लेख है। ये नाम उस वन की प्रकृति और पुष्पों से सम्बंधित हैं और देवी के सौंदर्य, स्वभाव और उनकी लीलाओं को इंगित करते हैं। यह देवी के प्रकृति के साथ गहरे और अभिन्न संबंध को भी उजागर करता है।

कदम्बमाला त्वं देवी कदम्बकाननेऽपि च ।
राजलक्ष्मी राजगेहे गृहलक्ष्मीगृहे गृहे ॥

हे देवी! कदम्ब के वन में आप 'कदम्बमाला' हैं। साथ ही, आप राजभवनों में 'राजलक्ष्मी' और प्रत्येक घर में 'गृहलक्ष्मी' के रूप में निवास करती हैं।

यह श्लोक देवी के दिव्य लीला-क्षेत्र से लेकर मनुष्य के सांसारिक जीवन तक उनकी व्यापकता को दर्शाता है। जहाँ वे श्रीकृष्ण के प्रिय कदम्ब वन में 'कदम्बमाला' के रूप में हैं, वहीं वे मनुष्यों के जीवन में भी प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हैं। राजाओं के महलों में वे 'राजलक्ष्मी' के रूप में राज्य को स्थिरता और वैभव प्रदान करती हैं और साधारण मनुष्यों के प्रत्येक घर में वे 'गृहलक्ष्मी' के रूप में सुख, शांति और समृद्धि का वास सुनिश्चित करती हैं।

इत्युक्त्वा देवताः सर्वा मुनयो मनवस्तथा ।
रूरूदुर्नम्रवदनाः शुष्ककण्ठोष्ठ तालुकाः ॥

इस प्रकार स्तुति करने के बाद सभी देवता, मुनि और मनु सिर झुकाकर रोने लगे; (दुःख और आतुरता के कारण) उनके कंठ, होंठ और तालू सूखे हुए थे।

यह श्लोक स्तुति के पीछे की पृष्ठभूमि और भक्तों की दशा का वर्णन करता है। यह दर्शाता है कि यह स्तुति किसी बड़े संकट के समय की गई है, संभवतः देवी के रूठ जाने या अंतर्धान हो जाने पर। देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों की व्याकुलता इतनी तीव्र है कि वे रो रहे हैं और उनके कंठ सूख गए हैं। यह उनकी गहरी पीड़ा, आतुरता और देवी की कृपा की तात्कालिक आवश्यकता को प्रकट करता है। सच्ची प्रार्थना अक्सर गहरी व्याकुलता से ही जन्म लेती है।

इति लक्ष्मीस्तवं पुण्यं सर्वदेवैः कृतं शुभम् ।
यः पठेत्प्रातरूत्थाय स वै सर्वै लभेद् ध्रुवम् ॥

इस प्रकार सभी देवताओं द्वारा रचित इस पवित्र और मंगलकारी लक्ष्मी स्तोत्र का जो कोई भी प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, वह निश्चित रूप से सब कुछ प्राप्त कर लेता है।

यहाँ से स्तोत्र का 'फलश्रुति' अर्थात इसके पाठ से मिलने वाले फलों का वर्णन प्रारम्भ होता है। इस स्तोत्र की महत्ता इसलिए भी अधिक है क्योंकि इसकी रचना स्वयं देवताओं ने की है। यह कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन सुबह उठकर इस पवित्र स्तोत्र का पाठ करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं निश्चित रूप से पूरी होती हैं। 'सर्वै लभेद् ध्रुवम्' (सब कुछ निश्चित रूप से प्राप्त करता है) यह एक बहुत बड़ा आश्वासन है, जो इस स्तोत्र की अमोघ शक्ति को दर्शाता है।

अभार्यो लभते भार्यां विनीतां सुसुतां सतीम् ।
सुशीलां सुन्दरीं रम्यामतिसुप्रियवादिनीम् ॥

जिसका विवाह न हुआ हो, उसे विनम्र, अच्छे पुत्रों को जन्म देने वाली, पतिव्रता, सुशील, सुंदर, मन को हरने वाली और अत्यंत मधुर बोलने वाली पत्नी प्राप्त होती है।

यह श्लोक अविवाहित पुरुष के लिए फल का वर्णन करता है। इस स्तोत्र के पाठ से उसे केवल पत्नी ही नहीं मिलती, बल्कि एक आदर्श पत्नी के सभी गुण भी बताए गए हैं। वह 'विनीता' (विनम्र), 'सुसुता' (उत्तम संतान वाली), 'सती' (चरित्रवान), 'सुशीला' (अच्छे स्वभाव वाली), 'सुन्दरी' (रूपवती), 'रम्या' (मनोरम) और 'अतिसुप्रियवादिनी' (बहुत मीठा बोलने वाली) होती है। यह एक सुखी और धार्मिक गृहस्थ जीवन के लिए आवश्यक सभी गुणों को समाहित करता है।

पुत्रपौत्रवतीं शुद्धां कुलजां कोमलां वराम् ।
अपुत्रो लभते पुत्रं वैष्णवं चिरजीविनम् ॥

वह पत्नी पुत्रों और पौत्रों से युक्त, पवित्र, उच्च कुल में जन्मी, कोमल स्वभाव वाली और श्रेष्ठ होती है। जिसे पुत्र न हो, उसे वैष्णव (भगवान विष्णु का भक्त) और दीर्घायु पुत्र प्राप्त होता है।

यह पिछले श्लोक में वर्णित पत्नी के गुणों का विस्तार है। इसके अतिरिक्त, जिन्हें संतान नहीं है, उन्हें इस स्तोत्र के पाठ से न केवल पुत्र की प्राप्ति होती है, बल्कि वह पुत्र 'वैष्णव' (भगवद्भक्त) और 'चिरंजीवी' (लम्बी आयु वाला) होता है। यह दर्शाता है कि स्तोत्र से प्राप्त होने वाले फल केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी श्रेष्ठ और कल्याणकारी होते हैं।

परमैश्वर्ययुक्तं च विद्यावन्तं यशस्विनम् ।
भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भ्रष्टश्रीर्लभते श्रियम् ॥

वह पुत्र परम ऐश्वर्य से युक्त, विद्यावान और यशस्वी होता है। जिसका राज्य छिन गया हो, उसे राज्य वापस मिल जाता है और जिसकी शोभा या संपत्ति नष्ट हो गई हो, उसे वह पुनः प्राप्त हो जाती है।

यह श्लोक पुत्र के अन्य गुणों और स्तोत्र के अन्य फलों का वर्णन करता है। साथ ही यह स्तोत्र पुनर्स्थापना की शक्ति रखता है। यदि किसी राजा ने अपना राज्य खो दिया है, तो इस पाठ से उसे पुनः राज्य की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार, जिस व्यक्ति का वैभव, धन या सौभाग्य ('श्री') नष्ट हो गया हो, उसे वह पुनः प्राप्त होता है। यह स्तोत्र खोई हुई प्रतिष्ठा और संपत्ति को वापस दिलाने वाला है।

हतबन्धुर्लभेद्बन्धुं धनभ्रष्टो धनं लभेत् ।
कीर्तिहीनो लभेत्कीर्तिं प्रतिष्ठां च लभेद् ध्रुवम् ॥

जिसने अपने बंधू-बांधवों को खो दिया हो, उसे बंधु मिलते हैं, जिसका धन नष्ट हो गया हो, उसे धन मिलता है। कीर्तिहीन व्यक्ति को कीर्ति मिलती है और उसे निश्चित रूप से प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

यह श्लोक विभिन्न प्रकार की हानियों की पूर्ति का आश्वासन देता है। यदि किसी का परिवार या मित्र बिछुड़ गए हों, तो उसे पुनः बंधु-बांधवों का साथ मिलता है। धनहीन को धन, यशहीन को यश और अपमानित व्यक्ति को पुनः समाज में प्रतिष्ठा निश्चित रूप से प्राप्त होती है। यह जीवन के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को पुनर्स्थापित करने में इस स्तोत्र की शक्ति को बताता है।

सर्वमङ्गलदं स्तोत्रं शोकसन्तापनाशनम् ।
हर्षानन्दकरं शश्वद्धर्ममोक्षसुहृत्प्रदम् ॥

यह स्तोत्र सभी प्रकार का मंगल प्रदान करने वाला, शोक और संताप को नष्ट करने वाला है। यह सदैव हर्ष और आनंद देने वाला तथा धर्म, मोक्ष और अच्छे मित्रों को प्रदान करने वाला है।

यह फलश्रुति का अंतिम और सार श्लोक है। यह स्तोत्र 'सर्वमंगलदं' है, अर्थात हर प्रकार से केवल कल्याण ही करता है। यह 'शोकसन्तापनाशनम्' है, जो मानसिक और भावनात्मक दुःखों को दूर करता है। यह 'हर्षानन्दकरं' है, जो जीवन में स्थायी खुशी और आनंद लाता है। अंत में, यह स्तोत्र मनुष्य के जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों की प्राप्ति में भी सहायक है। यह 'धर्म' (कर्तव्यपरायणता), 'मोक्ष' (जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति) और 'सुहृत्' (सच्चे हितैषी मित्र) प्रदान करता है। इस प्रकार यह स्तोत्र भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक, हर स्तर पर साधक का कल्याण करता है।

 

क्षमस्व भगवत्यम्ब क्षमाशीले परात्परे ।
शुद्धसत्त्वस्वरूपे च कोपादिपरिवर्जिते ॥

उपमे सर्वसाध्वीनां देवीनां देवपूजिते ।
त्वया विना जगत्सर्वं मृततुल्यं च निष्फलम् ॥

सर्वसम्पत्स्वरूपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी ।
रासेश्वर्यधिदेवी त्वं त्वत्कलाः सर्वयोषितः ॥

कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका ।
स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं मर्त्यलक्ष्मीश्च भूतले ॥

वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सरस्वती ।
गङ्गा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मालोकतः ॥

कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयम् ।
रासे रासेश्वरी त्वं च वृन्दावनवने वने ॥

कृष्णा प्रिया त्वं भाण्डीरे चन्द्रा चन्दनकानने ।
विरजा चम्पकवने शतश‍ृङ्गे च सुन्दरी ॥

पद्मावती पद्मवने मालती मालतीवने ।
कुन्ददन्ती कुन्दवने सुशीला केतकीवने ॥

कदम्बमाला त्वं देवी कदम्बकाननेऽपि च ।
राजलक्ष्मी राजगेहे गृहलक्ष्मीगृहे गृहे ॥

इत्युक्त्वा देवताः सर्वा मुनयो मनवस्तथा ।
रूरूदुर्नम्रवदनाः शुष्ककण्ठोष्ठ तालुकाः ॥

इति लक्ष्मीस्तवं पुण्यं सर्वदेवैः कृतं शुभम् ।
यः पठेत्प्रातरूत्थाय स वै सर्वै लभेद् ध्रुवम् ॥

अभार्यो लभते भार्यां विनीतां सुसुतां सतीम् ।
सुशीलां सुन्दरीं रम्यामतिसुप्रियवादिनीम् ॥

पुत्रपौत्रवतीं शुद्धां कुलजां कोमलां वराम् ।
अपुत्रो लभते पुत्रं वैष्णवं चिरजीविनम् ॥

परमैश्वर्ययुक्तं च विद्यावन्तं यशस्विनम् ।
भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भ्रष्टश्रीर्लभते श्रियम् ॥

हतबन्धुर्लभेद्बन्धुं धनभ्रष्टो धनं लभेत् ।
कीर्तिहीनो लभेत्कीर्तिं प्रतिष्ठां च लभेद् ध्रुवम् ॥

सर्वमङ्गलदं स्तोत्रं शोकसन्तापनाशनम् ।
हर्षानन्दकरं शश्वद्धर्ममोक्षसुहृत्प्रदम् ॥

 

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