वीर नरसिंह अष्टक स्तोत्र

उग्रमत्युग्रमुग्रोग्रं शत्रुसंहारतत्परम् ।
पालिताशेषलोकेशं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।

'मैं उन भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ, जो स्वयं उग्र हैं, अत्यंत उग्र हैं, और उग्रों में भी सबसे भयंकर हैं, जो शत्रुओं का संहार करने में सदैव तत्पर रहते हैं। वे ही समस्त लोकों और उनमें निवास करने वाले जीवों के पालक हैं।'

'यह श्लोक भगवान नरसिंह के भयंकर और शक्तिशाली स्वरूप का गुणगान करता है। 'उग्र' शब्द उनकी प्रचण्डता और रौद्रता को दर्शाता है, जो दुष्टों का नाश करने के लिए आवश्यक थी। भगवान ने हिरण्यकशिपु जैसे अत्यंत शक्तिशाली असुर का वध करने के लिए यह विकराल रूप धारण किया था, इसीलिए उन्हें 'शत्रुसंहारतत्परम्' कहा गया है। उनके इस भयंकर रूप के बावजूद, वे 'पालिताशेषलोकेशं' हैं, जिसका अर्थ है कि वे सभी लोकों और उनके निवासियों का संरक्षण करते हैं। यह भगवान की उस विरोधाभासी प्रकृति को दर्शाता है कि वे दुष्टों के लिए भयानक और भक्तों के लिए परम रक्षक हैं।'

स्वभक्ते यस्य वात्सल्यमम्बोधिरिव विद्यते ।
वीरं विष्ण्ववतारं तं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।

'मैं उन भगवान नरसिंह को नमस्कार करता हूँ, जिनका अपने भक्तों के प्रति प्रेम (वात्सल्य) सागर के समान गहरा और असीम है। वे महान वीर हैं और स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं।'

'यह श्लोक भगवान नरसिंह के भक्तों के प्रति उनके अगाध प्रेम और करुणा को उजागर करता है। उनका रूप भले ही भयंकर हो, लेकिन अपने भक्तों के लिए उनका 'वात्सल्य' यानी स्नेह सागर की तरह विशाल है। यह विशेष रूप से भक्त प्रह्लाद की कथा की ओर संकेत करता है, जहाँ भगवान ने अपने परम भक्त की रक्षा के लिए बिना किसी संकोच के यह रूप धारण किया। 'वीरं' शब्द उनकी वीरता और पराक्रम को दर्शाता है, जिसके माध्यम से उन्होंने धर्म और न्याय की स्थापना की। उन्हें 'विष्ण्ववतारं' कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि वे स्वयं भगवान विष्णु के ही एक विशेष प्रकट रूप हैं।'

महाविष्णुं महीपालं भयहारिणमुत्तमम् ।
अनुत्तमदिष्टान्तं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।

'मैं उन भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ, जो स्वयं महाविष्णु हैं, पृथ्वी के संरक्षक हैं, समस्त भय को हरने वाले और सर्वश्रेष्ठ हैं। उनके समान कोई दूसरा अनुपम उदाहरण नहीं मिलता।'

'यह श्लोक भगवान नरसिंह को साक्षात् महाविष्णु के रूप में प्रतिष्ठित करता है। उन्हें 'महीपालं' यानी पृथ्वी का रक्षक कहा गया है, क्योंकि उन्होंने अधर्म का नाश करके पृथ्वी पर धर्म और व्यवस्था स्थापित की। वे अपने भक्तों के सभी प्रकार के भय को दूर करने वाले 'भयहारिणमुत्तमम्' हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह कि उनके अवतार और कार्य अद्वितीय हैं, 'अनुत्तमदिष्टान्तं' अर्थात् जिनके जैसा दूसरा कोई उदाहरण नहीं है। खंभे से उनका प्राकट्य और हिरण्यकशिपु का वध करने की उनकी विशेष विधि, ये सब उनके असाधारण और अनुपम स्वरूप के प्रमाण हैं।'

ज्वलन्तं जगतामीशं भक्तचित्ताब्जसंस्थितम् ।
दृप्तरिप्राणसंहारिनारसिंहं नमाम्यहम् ।।

'मैं उन भगवान नरसिंह को नमस्कार करता हूँ, जो अग्नि के समान तेजस्वी हैं, समस्त जगत के स्वामी हैं, भक्तों के हृदय-कमल में वास करते हैं, और अहंकारी शत्रुओं के प्राणों का संहार करने वाले हैं।'

'यहाँ भगवान नरसिंह के तेज और उनकी शक्ति को 'ज्वलन्तं' शब्द से वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है अग्नि के समान प्रज्वलित। वे 'जगतामीशं' यानी समस्त जगत के नियंता और स्वामी हैं। उनके इस भयानक और शक्तिशाली रूप के साथ-साथ, वे 'भक्तचित्ताब्जसंस्थितम्' यानी अपने भक्तों के हृदय-कमल में अत्यंत कोमलता और शांति से निवास करते हैं। यह भक्त और भगवान के बीच के गहन आत्मिक संबंध को दर्शाता है। 'दृप्तरिप्राणसंहारिन्' शब्द हिरण्यकशिपु जैसे घमंडी और अभिमानी शत्रुओं का नाश करने की उनकी क्षमता को स्पष्ट करता है।'

सर्वतोमुखमव्यक्तं नखास्त्रं तीक्ष्णलोचनम् ।
सर्वामर्त्येष्वपि श्रेष्ठं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।

'मैं उन भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ, जिनका मुख सभी दिशाओं में है, जो अव्यक्त (अगोचर) हैं, जिनके नाखून ही उनके अस्त्र हैं, जिनकी आँखें तीक्ष्ण हैं, और जो सभी देवताओं में भी सर्वश्रेष्ठ हैं।'

'इस श्लोक में भगवान नरसिंह के अद्भुत और अद्वितीय शारीरिक लक्षणों का वर्णन है। 'सर्वतोमुखम्' यह दर्शाता है कि वे सर्वव्यापी हैं और सभी दिशाओं से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। 'अव्यक्तं' का अर्थ है कि वे अपनी माया से प्रकट होकर भी अपनी वास्तविक दिव्यता को सामान्य दृष्टि से अगोचर रखते हैं। उनके 'नखास्त्रं' (नाखून ही अस्त्र) का उल्लेख उनकी अद्वितीय युद्धकला और अस्त्रों को दर्शाता है, जिन्होंने हिरण्यकशिपु के वरदान को निरर्थक सिद्ध किया। उनकी 'तीक्ष्णलोचनम्' यानी तीखी और भेदक आँखें उनके क्रोध, तीव्र बुद्धि और सूक्ष्म दृष्टि को दर्शाती हैं। उन्हें 'सर्वामर्त्येष्वपि श्रेष्ठं' कहा गया है, क्योंकि उनकी शक्ति, पराक्रम और अवतार का उद्देश्य सभी देवताओं से बढ़कर था।'

भीषणं भक्तचित्तस्थं भूमौ सर्वजनैर्नुतम् ।
तापत्रयप्रहन्तारं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।

'मैं उन भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टों के लिए भयानक हैं, भक्तों के हृदय में स्थित हैं, पृथ्वी पर सभी लोगों द्वारा पूजे जाते हैं, और तीनों प्रकार के तापों (दुःखों) का नाश करने वाले हैं।'

'यहाँ एक बार फिर भगवान के 'भीषणं' रूप का उल्लेख है, जो अधर्मी शक्तियों के लिए भय उत्पन्न करने वाला है। इसके विपरीत, भक्तों के लिए वे 'भक्तचित्तस्थं' हैं, अर्थात उनके हृदय में शांति और विश्वास के साथ वास करते हैं। 'भूमौ सर्वजनैर्नुतम्' का अर्थ है कि उन्हें पृथ्वी पर सभी लोगों द्वारा आदर और पूजा प्राप्त है, जो उनकी व्यापक लोकप्रियता और महत्व को दर्शाता है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि वे 'तापत्रयप्रहन्तारं' हैं। हिंदू दर्शन में 'तापत्रय' तीन प्रकार के दुखों को संदर्भित करता है: आध्यात्मिक (अपने शरीर और मन से उत्पन्न), आधिभौतिक (अन्य जीवों या प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न), और आधिदैविक (दैवीय शक्तियों से उत्पन्न)। भगवान नरसिंह अपने भक्तों को इन सभी दुखों और क्लेशों से मुक्ति प्रदान करते हैं।'

भद्रं भयङ्करं भीतिहारिणं भूसुराश्रयम् ।
स्तम्भोद्भवं महावीरं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।

'मैं उन भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ, जो कल्याणकारी हैं, भय उत्पन्न करने वाले हैं, भय को हरने वाले हैं, ब्राह्मणों (धार्मिकों) के आश्रयदाता हैं। जो खंभे से प्रकट हुए थे और महान वीर हैं।'

'यह श्लोक भगवान नरसिंह के द्वैत स्वभाव को भली-भांति दर्शाता है: वे 'भद्रं' (शुभ और कल्याणकारी) हैं और साथ ही 'भयङ्करं' (भय उत्पन्न करने वाले) भी हैं। वे दुष्टों के लिए आतंक का कारण बनते हैं, लेकिन अपने भक्तों के लिए 'भीतिहारिणं' (समस्त भय को हरने वाले) हैं। उन्हें 'भूसुराश्रयम्' कहा गया है, जिसका अर्थ है ब्राह्मणों और धर्मपरायण लोगों के रक्षक और आश्रयदाता। 'स्तम्भोद्भवं' उनके अवतार की सबसे विशिष्ट और चमत्कारी विशेषता को उजागर करता है, जब वे एक खंभे को चीरकर प्रकट हुए थे। यह हिरण्यकशिपु के दर्प को चूर-चूर करने का एक असाधारण तरीका था। वे 'महावीरं' यानी महान योद्धा और परम पराक्रमी हैं।'

मृत्युमृत्युं महेशानं सर्वदा स्तुत्यमुत्तमम् ।
महाज्वालं महीपालं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।

'मैं उन भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ, जो मृत्यु की भी मृत्यु हैं, महान ईश्वर हैं, जो सदैव स्तुति के योग्य और सर्वश्रेष्ठ हैं। जो महान ज्वाला के समान तेजस्वी हैं और पृथ्वी के पालक हैं।'

'यह अंतिम श्लोक भगवान नरसिंह की सर्वोच्चता को स्थापित करता है। उन्हें 'मृत्युमृत्युं' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे मृत्यु को भी पराजित करने वाले हैं, स्वयं काल के नियंत्रक हैं। उन्होंने हिरण्यकशिपु को अमरता के वरदान के बावजूद मार डाला, जो यह दर्शाता है कि वे स्वयं मृत्यु के स्वामी हैं। वे 'महेशानं' यानी महान ईश्वर हैं, सर्वशक्तिमान और सर्वोच्च सत्ता। वे 'सर्वदा स्तुत्यमुत्तमम्' हैं, यानी हमेशा स्तुति और पूजा के योग्य हैं। 'महाज्वालं' उनकी प्रचंड अग्नि के समान आभा और शक्ति को दर्शाता है, जबकि 'महीपालं' एक बार फिर उनके पृथ्वी के संरक्षक होने की भूमिका पर जोर देता है। यह श्लोक भगवान नरसिंह के अविनाशी, सर्वोच्च और समस्त सृष्टि के रक्षक स्वरूप का सार प्रस्तुत करता है।'

 

उग्रमत्युग्रमुग्रोग्रं शत्रुसंहारतत्परम् ।
पालिताशेषलोकेशं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।
स्वभक्ते यस्य वात्सल्यमम्बोधिरिव विद्यते ।
वीरं विष्ण्ववतारं तं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।
महाविष्णुं महीपालं भयहारिणमुत्तमम् ।
अनुत्तमदिष्टान्तं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।
ज्वलन्तं जगतामीशं भक्तचित्ताब्जसंस्थितम् ।
दृप्तरिप्राणसंहारिनारसिंहं नमाम्यहम् ।।
सर्वतोमुखमव्यक्तं नखास्त्रं तीक्ष्णलोचनम् ।
सर्वामर्त्येष्वपि श्रेष्ठं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।
भीषणं भक्तचित्तस्थं भूमौ सर्वजनैर्नुतम् ।
तापत्रयप्रहन्तारं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।
भद्रं भयङ्करं भीतिहारिणं भूसुराश्रयम् ।
स्तम्भोद्भवं महावीरं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।
मृत्युमृत्युं महेशानं सर्वदा स्तुत्यमुत्तमम् ।
महाज्वालं महीपालं नारसिंहं नमाम्यहम् ।।

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