जय जय भयहारिन् भक्तचित्ताब्जचारिन्
जय जय नयचारिन् दृप्तमत्तारिमारिन् ।
जय जय जयशालिन् पाहि नः शूरसिंह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ १॥
हे भय का हरण करने वाले, आपकी जय हो! हे भक्तों के हृदय-कमल में विचरण करने वाले, आपकी जय हो! हे नीति के मार्ग पर चलने वाले, हे घमंडी और उन्मत्त शत्रुओं का संहार करने वाले, आपकी जय हो! हे विजय से सुशोभित रहने वाले वीर सिंह, हमारी रक्षा करें! हे दया से आर्द्र हृदय वाले श्री नृसिंह, हमारी रक्षा करें, आपकी जय हो, जय हो!
इस श्लोक में भक्त, भगवान नृसिंह के विभिन्न गुणों का स्तवन करते हुए उनकी जय-जयकार कर रहा है। उन्हें 'भयहारिन्' कहा गया है, क्योंकि वे अपने भक्तों के सभी प्रकार के भय को दूर कर देते हैं, जैसा उन्होंने भक्त प्रह्लाद के भय को दूर किया था। 'भक्तचित्ताब्जचारिन्' का अर्थ है कि वे केवल किसी धाम में ही नहीं, अपितु अपने भक्तों के पवित्र हृदय में ही निवास करते हैं। 'दृप्तमत्तारिमारिन्' विशेष रूप से हिरण्यकशिपु जैसे अहंकारी और शक्ति के मद में चूर शत्रु के संहारक के रूप में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है। अंत में, भक्त उन्हें 'शूरसिंह' (वीर सिंह) और 'दययार्द्र' (दया से पूर्ण) कहकर उनके पराक्रम और करुणा, इन दोनों स्वरूपों को एक साथ नमन करता है और उनसे अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है।
असुरसमरधीरस्त्वं महात्मासि जिष्णो
अमरविसरवीरस्त्वं परात्मासि विष्णो ।
सदयहृदय गोप्ता त्वन्न चान्यो विमोह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ २॥
हे जिष्णु (विजयी)! आप असुरों के साथ युद्ध में धैर्यवान वीर हैं, आप महात्मा हैं। हे विष्णु! आप देवताओं के समूह के रक्षक वीर हैं, आप ही परम आत्मा हैं। हे मोह को दूर करने वाले! दयापूर्ण हृदय वाले आपके अतिरिक्त हमारा कोई और रक्षक नहीं है। हे दया से आर्द्र हृदय वाले श्री नृसिंह, हमारी रक्षा करें, आपकी जय हो, जय हो!
इस श्लोक में भगवान नृसिंह के वास्तविक, पारमार्थिक स्वरूप का वर्णन है। उन्हें केवल एक उग्र अवतार के रूप में नहीं, बल्कि 'परात्मा' अर्थात् परब्रह्म के रूप में दर्शाया गया है। वे स्वयं 'विष्णु' ही हैं। उन्होंने देवताओं की रक्षा और असुरों के संहार हेतु यह रूप धारण किया, इसलिए वे 'असुरसमरधीर' और 'अमरविसरवीर' हैं। भक्त यह स्वीकार करता है कि इस संसार के मोह-जाल से बचाने वाले और करुणा के साथ रक्षा करने वाले एकमात्र श्री नृसिंह ही हैं। यह श्लोक भगवान के प्रति भक्त के पूर्ण समर्पण और अटूट विश्वास को अभिव्यक्त करता है।
खरतरनखरास्त्रं स्वारिहत्यै विधत्से
परतरवरहस्तं स्वावनायैव धत्से ।
भवभयभयकर्ता कोऽपरस्तार्क्ष्यवाह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ ३॥
आप अपने अत्यंत तीक्ष्ण नखों रूपी अस्त्र को अपने शत्रुओं के संहार के लिए धारण करते हैं और अपने दूसरे श्रेष्ठ वरदान देने वाले हाथ को अपने भक्तों की रक्षा के लिए ही धारण करते हैं। हे गरुड़ पर सवार होने वाले! संसार के भय को भी भयभीत करने वाला आपके सिवा दूसरा कौन है? हे दया से आर्द्र हृदय वाले श्री नृसिंह, हमारी रक्षा करें, आपकी जय हो, जय हो!
यह श्लोक भगवान के दोहरे स्वरूप को अत्यंत सुंदरता से दर्शाता है - दुष्टों के लिए वे काल हैं और भक्तों के लिए कृपालु। उनके एक हाथ में 'खरतरनखरास्त्र' (अत्यंत पैने नाख़ून) हैं, जो न्याय और दंड का प्रतीक हैं, जिनसे उन्होंने हिरण्यकशिपु का वध किया। वहीं उनका दूसरा हाथ 'वरहस्त' है, जो प्रह्लाद जैसे भक्तों को आशीर्वाद और अभय प्रदान करता है। 'भवभयभयकर्ता' एक बहुत गहरा भाव है, जिसका अर्थ है कि हम जिस संसार (भव) के जन्म-मृत्यु से डरते हैं, वह भय भी आपसे डरता है। अर्थात्, आपकी शरण में आने से सबसे बड़ा भय भी समाप्त हो जाता है। 'तार्क्ष्यवाह' (गरुड़ के वाहक) कहकर यह स्मरण दिलाया गया है कि वे स्वयं भगवान विष्णु ही हैं।
असुरकुलबलारिः स्वेष्टचेतस्तमोऽरिः
सकलखलबलारिस्त्वं स्वभक्तारिवैरी ।
त्वदित स इनदृक् सत्पक्षपाती न चेह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ ४॥
आप असुरों के कुल और बल के शत्रु हैं, आप अपने प्रिय भक्तों के चित्त के अंधकार (अज्ञान) के शत्रु हैं। आप समस्त दुष्टों के बल के शत्रु हैं और अपने भक्तों के शत्रुओं के भी शत्रु हैं। आपके अतिरिक्त यहाँ सज्जनों का ऐसा पक्ष लेने वाला और कौन है? हे दया से आर्द्र हृदय वाले श्री नृसिंह, हमारी रक्षा करें, आपकी जय हो, जय हो!
इस श्लोक में भगवान को 'अरि' अर्थात् शत्रु के रूप में चित्रित किया गया है, लेकिन वे किसके शत्रु हैं, यह स्पष्ट किया गया है। वे केवल बाह्य असुरों के ही शत्रु नहीं, बल्कि भक्तों के मन में बैठे अज्ञान और अंधकार रूपी आंतरिक शत्रुओं के भी संहारक हैं। वे 'स्वभक्तारिवैरी' हैं, जिसका अर्थ है कि जो उनके भक्त का शत्रु है, वे उसे अपना शत्रु मानते हैं। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से शत्रुता की, तो भगवान ने हिरण्यकशिपु को अपना शत्रु मानकर उसका वध कर दिया। यह श्लोक भगवान की भक्तवत्सलता और सज्जनों के प्रति उनके 'पक्षपात' (कृपापूर्ण पक्ष) को दर्शाता है, कि वे सदैव धर्म और अपने भक्तों के साथ खड़े रहते हैं।
सकलसुरबलारिः प्राणिमात्रापकारी
तव भजकवरारिर्धर्मविध्वंसकारी ।
सुरवरवरदृप्तः सोऽप्यरिस्ते हतो ह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ ५॥
जो समस्त देवताओं की शक्ति का शत्रु था, जो सभी प्राणियों को कष्ट देने वाला था, जो आपके श्रेष्ठ भक्त (प्रह्लाद) का शत्रु था और जो धर्म का नाश करने वाला था, देवताओं में श्रेष्ठ ब्रह्माजी से मिले वरदान के कारण जो अत्यंत घमंडी हो गया था, ऐसा वह शत्रु भी आपके द्वारा निश्चय ही मारा गया। हे दया से आर्द्र हृदय वाले श्री नृसिंह, हमारी रक्षा करें, आपकी जय हो, जय हो!
यह श्लोक सीधे-सीधे हिरण्यकशिपु के चरित्र और उसके अंत का वर्णन करता है। उसके सभी दुष्कर्मों को गिनाया गया है - वह देवताओं का शत्रु था, निर्दोष प्राणियों को सताता था, धर्म का विध्वंस करता था और सबसे बड़ा अपराध यह कि वह भगवान के भक्त प्रह्लाद का शत्रु था। उसे ब्रह्मा जी से मिले वरदान का अहंकार था। श्लोक में 'सोऽप्यरिस्ते हतो ह' कहकर इस बात पर बल दिया गया है कि इतना शक्तिशाली और वरदानों से रक्षित शत्रु भी आपके सामने टिक नहीं सका और मारा गया। यह भगवान की अमोघ शक्ति और धर्म की स्थापना के उनके संकल्प को दर्शाता है।
दहनादहहाब्धिपातनाद्गरदानाद्भृगुपातनादपि ।
निजभक्त इहावितो यथा नरसिंहापि सदाव नस्तथा ॥ ६॥
हे नरसिंह! जिस प्रकार इस संसार में आपने अपने भक्त (प्रह्लाद) की आग में जलाने से, सर्पों से भरे समुद्र में फेंकने से, विष पिलाने से और पर्वत से गिराने से भी रक्षा की थी, उसी प्रकार आप हमारी भी सदा रक्षा करें।
यह श्लोक भक्त प्रह्लाद पर हुए अनगिनत अत्याचारों और हर बार भगवान द्वारा की गई उनकी चमत्कारी रक्षा का स्मरण कराता है। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के लिए उन्हें होलिका के साथ आग में बिठाया, विष दिया, ऊँचे पर्वत से फेंका और सर्पों से भरे समुद्र में डुबोया, पर हर बार भगवान ने उन्हें बचा लिया। भक्त यहाँ उसी रक्षा का दृष्टांत देकर प्रार्थना कर रहा है कि 'हे प्रभु! जैसे आपने उस कठिन समय में प्रह्लाद की रक्षा की, वैसे ही हमारे जीवन के संकटों में आप हमारी भी रक्षा करें'। यह दर्शाता है कि भगवान की कृपा किसी एक युग या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, वह हर उस भक्त के लिए उपलब्ध है जो सच्चे मन से उन्हें पुकारता है।
निजभृत्यविभाषितं मितं खलु कर्तुं त्वमृतं दयाकर ।
प्रकटीकृतमिध्ममध्यतो निजरूपं नरसिंह दर्शय ॥ ७॥
हे दया करने वाले! अपने सेवक (प्रह्लाद) द्वारा कहे गए सत्य वचनों को सिद्ध करने के लिए, आपने खंभे के मध्य से अपने रूप को प्रकट किया था। हे नरसिंह! हमें भी (अपना) वही रूप दिखाइए।
यह श्लोक उस प्रसिद्ध कथा का उल्लेख करता है जब हिरण्यकशिपु ने क्रोध में प्रह्लाद से पूछा, 'कहाँ है तेरा विष्णु? क्या इस खंभे में है?' प्रह्लाद ने अटूट विश्वास से कहा, 'हाँ, वह इस खंभे में भी है'। अपने भक्त ('निजभृत्य') के वचनों को सत्य ('अमृतं कर्तुं') करने के लिए भगवान उसी निर्जीव खंभे ('इध्ममध्यतः') से भयंकर गर्जना करते हुए प्रकट हो गए। भक्त यहाँ उसी दिव्य और अद्भुत रूप के दर्शन की अभिलाषा कर रहा है। यह केवल एक भौतिक रूप देखने की इच्छा नहीं, बल्कि भगवान की सर्वव्यापकता और भक्त-वत्सलता का साक्षात् अनुभव करने की गहरी आध्यात्मिक प्यास है।
नाराधनं न हवनं न तपो जपो वा
तीर्थं व्रतं न च कृतं श्रवणादि नो वा ।
सेवा कुटुम्बभरणाय कृतादिदीना
दीनार्तिहन् नरहरेऽघहरेह नोऽव ॥ ८॥
न मैंने कोई आराधना की, न हवन किया, न कोई तप या जप ही किया। न कोई तीर्थयात्रा की, न व्रत रखा और न ही (शास्त्रों का) श्रवण आदि किया। मैंने जो भी सेवा या कार्य किया, वह केवल अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए किया, जिससे मैं दीन-हीन हूँ। हे दीनों के दुःख को हरने वाले! हे नरहरे! हे पापों को हरने वाले! इस संसार में हमारी रक्षा करें।
यह अंतिम श्लोक भक्त की परम विनम्रता और पूर्ण शरणागति के भाव को दर्शाता है। भक्त यह स्वीकार करता है कि उसके पास कोई भी शास्त्रीय पूजन, तप, जप या पुण्य-कर्म की योग्यता नहीं है। उसके सारे कर्म केवल सांसारिक दायित्वों ('कुटुम्बभरण') को पूरा करने में ही व्यतीत हुए। वह स्वयं को 'दीन' अर्थात् असहाय और साधनहीन मानता है। इसी दीनता के भाव से वह भगवान को पुकारता है, क्योंकि भगवान 'दीनार्तिहन्' (दीनों का दुःख हरने वाले) और 'अघहरे' (पापों का नाश करने वाले) हैं। यह श्लोक भक्ति का सार प्रस्तुत करता है कि जब कोई साधक अपने साधनों के अहंकार को त्यागकर, अपनी अयोग्यता को स्वीकार कर पूरी तरह से भगवान की करुणा पर निर्भर हो जाता है, तो भगवान उसकी रक्षा अवश्य करते हैं।
जय जय भयहारिन् भक्तचित्ताब्जचारिन्
जय जय नयचारिन् दृप्तमत्तारिमारिन् ।
जय जय जयशालिन् पाहि नः शूरसिंह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ १॥
असुरसमरधीरस्त्वं महात्मासि जिष्णो
अमरविसरवीरस्त्वं परात्मासि विष्णो ।
सदयहृदय गोप्ता त्वन्न चान्यो विमोह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ २॥
खरतरनखरास्त्रं स्वारिहत्यै विधत्से
परतरवरहस्तं स्वावनायैव धत्से ।
भवभयभयकर्ता कोऽपरस्तार्क्ष्यवाह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ ३॥
असुरकुलबलारिः स्वेष्टचेतस्तमोऽरिः
सकलखलबलारिस्त्वं स्वभक्तारिवैरी ।
त्वदित स इनदृक् सत्पक्षपाती न चेह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ ४॥
सकलसुरबलारिः प्राणिमात्रापकारी
तव भजकवरारिर्धर्मविध्वंसकारी ।
सुरवरवरदृप्तः सोऽप्यरिस्ते हतो ह
जय जय दययार्द्र त्राहि नः श्रीनृसिंह ॥ ५॥
दहनादहहाब्धिपातनाद्गरदानाद्भृगुपातनादपि ।
निजभक्त इहावितो यथा नरसिंहापि सदाव नस्तथा ॥ ६॥
निजभृत्यविभाषितं मितं खलु कर्तुं त्वमृतं दयाकर ।
प्रकटीकृतमिध्ममध्यतो निजरूपं नरसिंह दर्शय ॥ ७॥
नाराधनं न हवनं न तपो जपो वा
तीर्थं व्रतं न च कृतं श्रवणादि नो वा ।
सेवा कुटुम्बभरणाय कृतादिदीना
दीनार्तिहन् नरहरेऽघहरेह नोऽव ॥ ८॥