श्लोक 1
श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाणे
भोगीन्द्रभोगमणिराजितपुण्यमूर्ते।
योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे लक्ष्मीपति भगवान नृसिंह, आप ऐश्वर्यशाली क्षीरसागर (पयोनिधि) में निवास करते हैं, आपके हाथों में सुदर्शन चक्र (चक्रपाणे) है और आपका पुण्य स्वरूप (पुण्यमूर्ते) सर्पराज आदिशेष (भोगीन्द्र) के फनों पर स्थित मणियों से सुशोभित (राजित) है। आप योगियों के स्वामी (योगीश), शाश्वत, और सभी के लिए आश्रय (शरण्य) हैं। आप इस संसार रूपी सागर (भवाब्धि) को पार कराने के लिए एक नौका (पोत) के समान हैं। मैं इस संसार के दुखों में डूब रहा हूँ, अतः हे प्रभु, कृपा करके मुझे अपने कर का अवलंब अर्थात सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
इस श्लोक में, आदि शंकराचार्य भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की स्तुति उनके परम स्वरूप में कर रहे हैं। क्षीरसागर में उनका निवास उनके पालनकर्ता रूप और शांत स्वभाव को दर्शाता है, जबकि चक्र धारण करना उनके दुष्टों का विनाश करने वाले सामर्थ्य का प्रतीक है। सर्पराज पर विराजना यह दिखाता है कि वे काल और प्रकृति के भी स्वामी हैं। भक्त उन्हें संसार सागर से पार कराने वाली नौका के रूप में देखता है। यह संसार अनेक प्रकार के दुखों, मोह और बंधनों से भरा एक विशाल सागर है, जिसमें जीव अपनी इंद्रियों और कर्मों के कारण डूबता रहता है। इस गहरे सागर से स्वयं के बल पर पार पाना असंभव है। इसलिए, भक्त अत्यंत दीनता से भगवान से प्रार्थना करता है कि वे अपना हाथ बढ़ाकर उसे इस सागर से बाहर निकालें। यह केवल एक भौतिक हाथ का सहारा नहीं है, बल्कि यह उनकी कृपा, ज्ञान और शक्ति का सहारा है जो जीव को मोक्ष तक ले जाता है।
श्लोक 2
ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-
सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे भगवान लक्ष्मीनृसिंह, आपके चरण-कमल (अङ्घ्रिकमल) ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र (शिव), मरुद्गण और सूर्य (अर्क) जैसे देवों के करोड़ों मुकुटों (किरीटकोटि) के स्पर्श (सङ्घट्टित) से उत्पन्न निर्मल कांति (अमलकान्ति) से अत्यंत मनोहर (कान्त) लग रहे हैं। आप देवी लक्ष्मी के वक्षस्थल रूपी कमल सरोवर (कुचसरोरुह) में विहार करने वाले राजहंस (राजहंस) के समान हैं। मैं इस संसार के दुखों से त्रस्त हूँ, अतः कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
यह श्लोक भगवान नृसिंह की सर्वोच्चता और परम पूज्यता को दर्शाता है। यहाँ तक कि सृष्टि, पालन और संहार के देवता तथा अन्य प्रमुख देवगण भी उनके चरणों में अपना मस्तक झुकाते हैं। उनके मुकुटों का स्पर्श भगवान के चरणों की महिमा को और भी बढ़ा देता है। यह दर्शाता है कि वे देवाधिदेव हैं और संपूर्ण ब्रह्मांड उनके अधीन है। दूसरी पंक्ति में, उन्हें लक्ष्मी के वक्षस्थल रूपी कमल पर विहार करने वाला राजहंस कहा गया है। यह भगवान और उनकी शक्ति (लक्ष्मी) के बीच के अभिन्न और प्रेमपूर्ण संबंध का प्रतीक है। लक्ष्मी जी करुणा और ऐश्वर्य की देवी हैं, और भगवान का उनके साथ होना यह सुनिश्चित करता है कि वे अपने भक्तों पर कृपा और ऐश्वर्य की वर्षा करेंगे। जिस प्रकार राजहंस निर्मल जल में ही विहार करता है, उसी प्रकार भगवान शुद्ध प्रेम और भक्ति में ही वास करते हैं। ऐसे परम पूज्य और करुणामय प्रभु से भक्त अपने उद्धार के लिए हाथ का सहारा मांग रहा है।
श्लोक 3
संसारदावगहनाकरभीकरोरु-
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य।
त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे लक्ष्मीनृसिंह, यह संसार एक घने और भयानक जंगल की आग (संसारदावगहन) के समान है, जिसकी विशाल और भयंकर ज्वालाओं (भीकरोरुज्वालावलीभिः) से मेरे शरीर का रोम-रोम (तनूरुह) बुरी तरह से जल (अतिदग्ध) गया है। इस आग की तपन से बचने के लिए, मैं आपके चरण-कमलों (पादपद्म) रूपी शीतल सरोवर (सरसीरुह) की शरण में आया (आगतस्य) हूँ। कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
यहाँ आदि शंकराचार्य ने संसार की तुलना एक दावानल से की है, जो सब कुछ भस्म कर देती है। संसार में तीन प्रकार के ताप होते हैं - आध्यात्मिक (मानसिक चिंता, रोग), आधिभौतिक (अन्य प्राणियों से मिलने वाला कष्ट) और आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाओं से मिलने वाला कष्ट)। ये तीनों ताप अग्नि की ज्वालाओं के समान जीव को निरंतर जलाते रहते हैं। इस जलते हुए संसार में कहीं भी शांति या शीतलता नहीं है। एकमात्र आश्रय भगवान के चरण हैं, जिन्हें एक शांत और शीतल कमल सरोवर की उपमा दी गई है। जिस प्रकार भीषण गर्मी से व्याकुल व्यक्ति ठंडे सरोवर में जाकर शांति पाता है, उसी प्रकार सांसारिक तापों से दग्ध जीव भगवान के चरणों में ही वास्तविक शांति और शीतलता का अनुभव कर सकता है। भक्त यह स्वीकार करता है कि वह इस आग से स्वयं नहीं बच सकता और इसलिए, वह पूर्ण समर्पण के साथ भगवान के चरणों की शरण लेता है और उद्धार की प्रार्थना करता है।
श्लोक 4
संसारजालपतितस्य जगन्निवास
सर्वेन्द्रियार्थबडिशाग्रझषोपमस्य।
प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुकमस्तकस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे जगन्निवास (संपूर्ण जगत के आश्रय), मैं संसार रूपी जाल (संसारजाल) में फँस (पतितस्य) गया हूँ। मेरी स्थिति उस मछली (झषोपमस्य) के समान है जो सभी इंद्रियों के विषयों (सर्वेन्द्रियार्थ) रूपी चारे (बडिश) की नोक पर फँस गई है। इस जाल में फँसने के कारण भय से मेरा तालु और मस्तक (तालुकमस्तकस्य) अत्यधिक काँप (प्रोत्कम्पितप्रचुर) रहा है। हे लक्ष्मीनृसिंह, मैं अत्यंत भयभीत और असहाय हूँ, कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
इस श्लोक में संसार की तुलना एक जाल से और इंद्रियों के विषयों की तुलना मछली पकड़ने के चारे से की गई है। जीव एक मछली की तरह है, और सांसारिक सुख जैसे रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द चारे की तरह हैं। जीव इन सुखों के आकर्षण में फँसकर अपने विवेक को खो देता है और अंततः संसार के बंधन रूपी जाल में कैद हो जाता है। एक बार जाल में फँसने के बाद, मछली जिस प्रकार छटपटाती है और उसका जीवन संकट में पड़ जाता है, उसी प्रकार जीव भी कर्मों और वासनाओं के जाल में फँसकर जन्म-मृत्यु के चक्र में छटपटाता रहता है। इस स्थिति में उत्पन्न भय और असहायता को ‘काँपते हुए तालु और मस्तक’ के माध्यम से व्यक्त किया गया है। भक्त अपनी इस दयनीय स्थिति को स्वीकार करते हुए भगवान से प्रार्थना करता है कि वे ही उसे इस जाल से मुक्त कर सकते हैं।
श्लोक 5
संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं
सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य।
दीनस्य देव कृपया पदमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे देव, मैं संसार रूपी अत्यंत भयानक (अतिघोर) और अथाह गहराई (अगाधमूलं) वाले कुएँ (संसारकूप) में गिर गया हूँ। इस अंधकारमय कुएँ में, मैं सैकड़ों दुखों रूपी साँपों (दुःखशतसर्प) से घिरा हुआ और व्याकुल (समाकुलस्य) हूँ। मैं अत्यंत दीन (दीनस्य) और असहाय होकर, कृपा करके (कृपया) आपके चरणों (पदम्) की शरण में आया (आगतस्य) हूँ। हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे इस घोर संकट से उबारने के लिए अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
इस श्लोक में संसार की तुलना एक ऐसे गहरे और अंधेरे कुएँ से की गई है, जिसकी गहराई का कोई पता नहीं है। यह कुआँ अज्ञान और मोह का प्रतीक है, जिसमें जीव अपने कर्मों के कारण गिरता है। एक बार इस कुएँ में गिरने के बाद, बाहर निकलना लगभग असंभव हो जाता है। वहाँ प्रकाश नहीं है, केवल अंधकार है। उस अंधकार में, विभिन्न प्रकार के शारीरिक और मानसिक दुख विषैले साँपों की तरह उसे हर ओर से डसते रहते हैं, जिससे उसकी पीड़ा और भी बढ़ जाती है। ऐसी दयनीय और निराशाजनक स्थिति में, जब स्वयं के प्रयास विफल हो जाते हैं, तब एकमात्र आशा भगवान की कृपा ही होती है। भक्त अपनी दीनता को स्वीकार करते हुए, यह मानता है कि केवल भगवान ही अपनी कृपा से उसे इस भयानक कुएँ से बाहर निकाल सकते हैं, इसीलिए वह उनके चरणों में शरण लेता है।
श्लोक 6
संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-
निष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश।
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे समस्त दुखों का नाश (सकलार्तिनाश) करने वाले प्रभु! मेरा शरीर (वपुषः) संसार रूपी भयानक गजराज (संसारभीकरकरीन्द्र) की सूँड के प्रहारों (कराभिघात) से बुरी तरह कुचला (निष्पीड्यमान) जा रहा है। मैं प्राण निकलने (प्राणप्रयाण) के भय (भवभीति) से अत्यंत व्याकुल (समाकुलस्य) हो गया हूँ। हे लक्ष्मीनृसिंह, मृत्यु का यह भय मुझे सता रहा है, कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
यहाँ संसार की तुलना एक उन्मत्त और भयानक हाथी से की गई है। जिस प्रकार एक शक्तिशाली हाथी अपने मार्ग में आने वाली हर वस्तु को कुचल देता है, उसी प्रकार संसार के आघात, जैसे रोग, वृद्धावस्था, अपमान, और असफलता, जीव के शरीर और मन को कुचल देते हैं। इन निरंतर आघातों के बीच, मृत्यु का भय सबसे बड़ा भय है, जो एक स्थायी आतंक की तरह बना रहता है। यह श्लोक गजेन्द्र मोक्ष की कथा का स्मरण कराता है, जहाँ एक हाथी को मगरमच्छ ने पकड़ लिया था और वह मृत्यु के भय से भगवान विष्णु को पुकारता है। यहाँ भक्त स्वयं को उस हाथी की स्थिति में देखता है, जिसे संसार रूपी हाथी कुचल रहा है और मृत्यु का भय उसे घेर रहा है। वह भगवान नृसिंह को ‘समस्त दुखों का नाश करने वाले’ के रूप में संबोधित करता है, क्योंकि वे ही इस अंतिम और सबसे बड़े भय से मुक्ति दिला सकते हैं।
श्लोक 7
संसारसर्पविषदिग्धमहोग्रतीव्र-
दंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तेः।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे भगवान, संसार रूपी सर्प (संसारसर्प) के विष से सने (विषदिग्ध), अत्यंत उग्र और तीक्ष्ण (महोग्रतीव्र) करोड़ों दाँतों (दंष्ट्राग्रकोटि) से डसे जाने (परिदष्ट) के कारण मेरा स्वरूप ही नष्ट (विनष्टमूर्तेः) हो गया है। हे शूरवीर शौरे! आप सर्पों के शत्रु गरुड़ (नागारि) पर विराजते हैं और अमृत के सागर (सुधाब्धि) में निवास करते हैं। आप ही इस विष का नाश कर सकते हैं, अतः हे लक्ष्मीनृसिंह, कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
इस श्लोक में सांसारिक आसक्तियों और वासनाओं की तुलना एक अत्यंत विषैले सर्प के विष से की गई है। जिस प्रकार सर्प का विष शरीर में फैलकर उसे नष्ट कर देता है, उसी प्रकार सांसारिक विषय-भोगों का विष आत्मा के वास्तविक स्वरूप को, जो कि सत्-चित्-आनंद है, नष्ट कर देता है और उसे दीन-हीन बना देता है। जीव अपनी वास्तविक पहचान भूलकर केवल शरीर और इंद्रियों के सुख में ही लिप्त रहता है। इस विष का एकमात्र उपचार भगवान की कृपा है। भगवान नृसिंह को ‘नागारिवाहन’ अर्थात गरुड़ पर सवार होने वाला कहा गया है। गरुड़ सर्पों का संहारक है, इसलिए गरुड़ पर सवार भगवान संसार रूपी सर्प के विष को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। साथ ही, वे ‘सुधाब्धिनिವಾಸ’ अर्थात अमृत के सागर में रहते हैं, जो मृत्यु और विष का नाशक है। इसलिए भक्त इस विष से अपनी रक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करता है।
श्लोक 8
संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-
शाखायुतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम्।
आरुह्य दुःखफलितं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे दयालु प्रभु! मैं संसार रूपी वृक्ष (संसारवृक्षम्) पर चढ़ (आरुह्य) गया हूँ। इस वृक्ष का बीज पाप (अघ) है, अनंत कर्म (अनन्तकर्म) ही इसकी असंख्य शाखाएँ (शाखायुतं) हैं, इंद्रियाँ (करण) इसके पत्ते (पत्र) हैं और कामदेव अर्थात कामना (अनङ्ग) इसका पुष्प (पुष्पम्) है। इस वृक्ष पर चढ़कर जब मैंने देखा कि इसमें केवल दुख रूपी फल (दुःखफलितं) ही लगते हैं, तो मैं अत्यंत भयभीत (चकितं) हो गया हूँ। हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे इस वृक्ष से उतारने के लिए कृपा करके अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 15 में वर्णित संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष का स्मरण कराता है। यहाँ संसार को एक ऐसे वृक्ष के रूप में चित्रित किया गया है जिसका मूल पाप और अज्ञान में है। हमारे द्वारा किए गए अनंत कर्म इसकी शाखाओं के रूप में फैलते जाते हैं, जो हमें और भी उलझा देते हैं। हमारी इंद्रियाँ पत्तों की तरह हैं, जो वृक्ष को ढक लेती हैं और हमें उसके वास्तविक स्वरूप को देखने नहीं देतीं। सांसारिक कामनाएँ सुंदर फूलों की तरह आकर्षक लगती हैं, लेकिन अंत में उनसे केवल दुख और निराशा रूपी फल ही प्राप्त होते हैं। जब जीव को यह ज्ञान होता है कि इस वृक्ष पर सुख का कोई फल नहीं है, तो वह भयभीत हो जाता है। उसे समझ आता है कि वह इस पर चढ़ तो गया है, पर उतरना उसके वश में नहीं है। तब वह दयालु भगवान से इस दुखदायी वृक्ष से उसे नीचे उतारने अर्थात मुक्त करने की प्रार्थना करता है।
श्लोक 9
संसारसागरविशालकरालकाल-
नक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य।
व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे लक्ष्मीनृसिंह, मैं इस विशाल और भयानक संसार सागर (संसारसागर) में, काल (समय) रूपी भयानक मगरमच्छ (करालकालनक्र) के द्वारा पकड़ा (ग्रसित) और जकड़ा (निग्रह) गया हूँ, जिससे मेरा शरीर और अस्तित्व संकट में है। मैं आसक्ति और कामनाओं (रागनिचय) की लहरों (ऊर्मि) से पीड़ित (निपीडितस्य) होकर अत्यंत व्याकुल (व्यग्रस्य) हूँ। कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
इस श्लोक में संसार की तुलना एक विशाल और भयानक सागर से की गई है, और समय की तुलना एक मगरमच्छ से। यह सागर इतना विशाल है कि इसका कोई किनारा नहीं दिखता। इसमें काल रूपी मगरमच्छ का ग्रास बनने से कोई नहीं बच सकता, वह प्रत्येक जीव को एक दिन निगल ही जाता है। इस सागर में उठने वाली राग, द्वेष, और आसक्ति की लहरें जीव को निरंतर थपेड़े मारती रहती हैं, उसे कभी शांत नहीं रहने देतीं। वह इन लहरों में डूबता-उतराता रहता है, और मगरमच्छ का भय उसे सदैव सताता रहता है। इस प्रकार, भक्त अपनी स्थिति को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखता है जो गहरे समुद्र में मगरमच्छ के जबड़ों में फँसा है और ऊंची लहरों से जूझ रहा है। इस अत्यंत भयावह और निराशाजनक स्थिति से केवल भगवान की शक्ति ही उसे बचा सकती है।
श्लोक 10
संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानं
दीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम्।
प्रह्लादखेदपरिहारपरावतार
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे सर्वव्यापी विभो! हे करुणानिधे (करुणा के सागर)! संसार सागर में डूबते हुए (निमज्जन) और मूर्छित होते हुए (मुह्यमानं) इस दीन (दीनं) भक्त की ओर देखिए (विलोकय माम्)। आपने अपने भक्त प्रह्लाद के दुख (खेद) को दूर (परिहार) करने के लिए ही यह विशेष अवतार (परावतार) धारण किया था। हे लक्ष्मीनृसिंह, जिस प्रकार आपने प्रह्लाद को बचाया, उसी प्रकार मुझे भी अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
इस श्लोक में भक्त अपनी दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए भगवान की करुणा को सीधे-सीधे पुकारता है। वह कहता है कि मैं इस संसार सागर में डूब रहा हूँ, मेरी चेतना लुप्त हो रही है, मैं असहाय हूँ। वह भगवान से केवल एक बार अपनी ओर देखने की प्रार्थना करता है, क्योंकि वह जानता है कि भगवान की एक करुणा-दृष्टि ही उसके उद्धार के लिए पर्याप्त है। इस प्रार्थना को और भी बल देने के लिए, वह भगवान को उनके अवतार का मूल उद्देश्य याद दिलाता है। नृसिंह अवतार का प्राकट्य ही भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए हुआ था। भक्त यह कहकर एक प्रकार से अपना अधिकार जताता है कि जिस प्रकार आपने प्रह्लाद के दुख को दूर किया, उसी प्रकार मेरे दुख को दूर करना भी आपका कर्तव्य है, क्योंकि मैं भी आपका ही भक्त हूँ। यह श्लोक भक्त और भगवान के बीच एक व्यक्तिगत और भावनात्मक संबंध को स्थापित करता है।
श्लोक 11
संसारघोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य।
आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदुःखितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे मुरारे! मैं इस संसार रूपी घोर और घने जंगल (संसारघोरगहन) में भटक (चरतः) रहा हूँ। इस जंगल में, कामदेव (मार) रूपी उग्र और भयंकर पशु (उग्रभीकरमृग) ने मुझे बहुत अधिक पीड़ा (प्रचुरार्दितस्य) दी है। मैं अत्यंत दुखी (आर्तस्य) हूँ और ईर्ष्या (मत्सर) रूपी ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड गर्मी (निदाघ) से बहुत संतप्त (सुदुःखितस्य) हूँ। हे लक्ष्मीनृसिंह, इस कष्ट से मेरी रक्षा करें और मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
यहाँ संसार की तुलना एक ऐसे घने जंगल से की गई है जिसमें कोई रास्ता नहीं दिखता और हिंसक पशुओं का भय बना रहता है। इस जंगल में भटकते हुए जीव के लिए सबसे बड़ा खतरा काम, अर्थात सांसारिक कामनाएँ हैं, जिन्हें एक क्रूर जानवर की उपमा दी गई है। यह कामना रूपी पशु आत्मा पर निरंतर आक्रमण करता है और उसे घायल कर देता है। इसके अतिरिक्त, ईर्ष्या और द्वेष की भावना एक ऐसी प्रचंड गर्मी की तरह है जो मन की शांति को जला देती है और उसे कहीं भी शीतलता नहीं मिलने देती। इस प्रकार, जीव कामनाओं से घायल और ईर्ष्या से संतप्त होकर जंगल में खो जाता है। वह भगवान को ‘मुरारे’ (मुर नामक असुर का संहार करने वाले) के रूप में पुकारता है, ताकि वे उसके भीतर के काम और मत्सर रूपी असुरों का भी संहार करें और उसे सही मार्ग दिखाएं।
श्लोक 12
बद्ध्वा गले यमभटा बहु तर्जयन्तः
कर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम्।
एकाकिनं परवशं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे दयालु प्रभु! जब यमदूत (यमभटाः) मेरे गले में सैकड़ों सांसारिक बंधनों (भवपाश) की रस्सी डालकर (बद्ध्वा), मुझे बहुत धमकाते (बहु तर्जयन्तः) हुए खींचते (कर्षन्ति) हैं, उस समय मैं अकेला (एकाकिनं), पराधीन (परवशं) और अत्यंत भयभीत (चकितं) होता हूँ। उस अंतिम और भयानक क्षण में मेरा कोई सहायक नहीं होता। हे लक्ष्मीनृसिंह, उस असहाय स्थिति में कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
यह श्लोक मृत्यु के समय और उसके पश्चात होने वाली जीव की दुर्गति का अत्यंत मार्मिक चित्रण करता है। जीवन भर जिन सांसारिक रिश्तों और वस्तुओं से हम बंधे रहते हैं, वही कर्म बंधन मृत्यु के समय यमदूतों के लिए पाश या रस्सी बन जाते हैं। यमदूत निर्दयता से जीव को खींचकर ले जाते हैं। उस समय कोई मित्र, कोई संबंधी साथ नहीं देता। जीव नितांत अकेला, भयभीत और दूसरों के वश में होता है। उसके अपने कर्मों के अतिरिक्त कोई और सहारा नहीं होता। यह क्षण अत्यंत भयावह होता है। भक्त उस अंतिम समय की कल्पना करके कांप उठता है और दया के सागर भगवान से प्रार्थना करता है कि जब कोई और साथ न हो, तब आप आकर मेरा हाथ थाम लेना और मुझे यमदूतों के भय से बचा लेना। यह मोक्ष की एक गहन प्रार्थना है।
श्लोक 13
लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे लक्ष्मीपति, हे कमलनाभ (जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ है), हे देवों के स्वामी (सुरेश), हे सर्वव्यापी विष्णु! हे यज्ञों के स्वामी (यज्ञेश), हे यज्ञ स्वरूप (यज्ञ), हे मधु नामक दैत्य का संहार करने वाले (मधुसूदन), हे विश्वरूप (संपूर्ण ब्रह्मांड जिनका स्वरूप है)! हे ब्राह्मणों के हितैषी (ब्रह्मण्य), हे केशव, हे जनार्दन (दुष्टों को दंड देने वाले), हे वासुदेव (सब में वास करने वाले)! हे लक्ष्मीनृसिंह, मैं आपके इन सभी स्वरूपों को नमन करता हूँ, कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
जब भक्त अत्यंत संकट में होता है और उसे कोई उपाय नहीं सूझता, तब भगवान के पवित्र नामों का कीर्तन ही सबसे बड़ा संबल होता है। इस श्लोक में, आदि शंकराचार्य भगवान विष्णु के अनेक प्रसिद्ध और शक्तिशाली नामों का उच्चारण कर रहे हैं। प्रत्येक नाम भगवान के एक विशेष गुण, शक्ति या लीला का प्रतिनिधित्व करता है। ‘लक्ष्मीपति’ उनके ऐश्वर्य को, ‘कमलनाभ’ उनकी सृजन शक्ति को, ‘विश्वरूप’ उनकी सर्वव्यापकता को, और ‘मधुसूदन’ उनकी दुष्ट-संहारक शक्ति को दर्शाता है। इन सभी नामों को एक साथ पुकार कर, भक्त भगवान के समग्र रूप का आह्वान करता है। वह यह कहना चाहता है कि आप ही सब कुछ हैं, आपके अतिरिक्त कोई और रक्षक नहीं है। इन नामों की शक्ति से भक्त को साहस मिलता है और वह अपने उद्धार के लिए भगवान से प्रार्थना करता है।
श्लोक 14
एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्ख-
मन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन्।
वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे लक्ष्मीनृसिंह, आपका स्वरूप अद्भुत है। आप अपने एक हाथ (एकेन करेण) में सुदर्शन चक्र और दूसरे (अपरेण) हाथ में पाञ्चजन्य शंख धारण किए हुए हैं। आपके एक अन्य हाथ से आप सागर की पुत्री देवी लक्ष्मी (सिन्धुतनयाम्) को सहारा (अवलम्ब्य) देकर खड़े हैं। और अपने दाहिने हाथ (वामेतरेण - बायें से इतर) से आप वरद (वरदान देने वाले), अभय (भय से मुक्त करने वाले) और पद्म (कमल) का चिह्न प्रदर्शित कर रहे हैं। मैं आपके इस करुणामय और शक्तिशाली स्वरूप का ध्यान करता हूँ, कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
यह एक ध्यान श्लोक है, जो भगवान लक्ष्मीनृसिंह के चतुर्भुज स्वरूप का सुंदर वर्णन करता है। उनके दो हाथों में स्थित चक्र और शंख उनकी शक्ति, धर्म की स्थापना और दुष्टों के विनाश का प्रतीक हैं। वे धर्म की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। तीसरा हाथ, जो देवी लक्ष्मी को थामे हुए है, उनकी करुणा, कृपा और ऐश्वर्य प्रदान करने की क्षमता को दर्शाता है। यह बताता है कि शक्ति के साथ-साथ उनमें परम अनुग्रह भी है। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण हाथ भक्तों के लिए है, जो वरद और अभय मुद्रा में है। यह हाथ भक्तों को आश्वासन देता है कि ‘डरो मत, मैं तुम्हारी सभी इच्छाओं को पूर्ण करूँगा और सभी भयों से तुम्हारी रक्षा करूँगा।’ भक्त इसी अभय प्रदान करने वाले हाथ का सहारा मांग रहा है, जो उसे संसार के सभी संकटों से मुक्त कर सके।
श्लोक 15
अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य
चोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः।
मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे लक्ष्मीनृसिंह, मैं अंधा (अन्धस्य) हो गया हूँ। इंद्रिय (इन्द्रियनामधेयैः) नामक अत्यंत शक्तिशाली चोरों (चोरैर्महाबलिभिः) ने मेरे विवेक रूपी महान धन (विवेक-महाधनस्य) को चुरा (हृत) लिया है। इस विवेक-धन के लुट जाने के कारण, मुझे मोह रूपी अंधकार से भरे गड्ढे (मोहान्धकारकुहरे) में गिरा (विनिपातितस्य) दिया गया है। इस घोर अंधकार में मैं मार्गहीन हो गया हूँ, कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
इस श्लोक में आध्यात्मिक अज्ञानता का मार्मिक चित्रण है। मनुष्य के पास सबसे बड़ा धन उसका विवेक है - सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के बीच भेद करने की क्षमता। हमारी पाँच इंद्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) अत्यंत शक्तिशाली चोरों की तरह हैं। वे हमें बाहरी विषयों के आकर्षण में फँसाकर हमारे विवेक रूपी धन को चुरा लेती हैं। जब विवेक नष्ट हो जाता है, तो व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से अंधा हो जाता है। उसे सही और गलत का ज्ञान नहीं रहता। ऐसी स्थिति में वह मोह, आसक्ति और अज्ञान के गहरे गड्ढे में गिर जाता है, जहाँ से स्वयं निकलना असंभव है। भक्त अपनी इस दयनीय अवस्था को स्वीकार करता है और भगवान से ज्ञान का प्रकाश प्रदान कर उस अंधकार से बाहर निकालने की प्रार्थना करता है।
श्लोक 16
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-
व्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास।
भक्तानुरक्तपरिपालनपारिजात
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
हे प्रभु! आप प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुण्डरीक, व्यास आदि श्रेष्ठ भक्तों (भागवतपुङ्गव) के हृदय में निवास (हृन्निवास) करते हैं। आप अपने भक्तों से प्रेम करने वालों का पालन (परिपालन) करने के लिए पारिजात वृक्ष (पारिजात) के समान हैं, जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करता है। हे लक्ष्मीनृसिंह, आप भक्तानुरागी हैं, मैं भी आपका भक्त बनने का प्रयास कर रहा हूँ, कृपा करके मुझे अपने हाथ का सहारा (करावलम्बम्) प्रदान करें।
इस श्लोक में भक्त भगवान के ‘भक्तवत्सल’ गुण का स्मरण कर रहा है। वह कहता है कि आप कहीं दूर नहीं हैं, बल्कि आप तो अपने प्रिय भक्तों जैसे प्रह्लाद और नारद के हृदय में ही सदा वास करते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि शुद्ध भक्ति से आपको प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, आपको ‘पारिजात’ वृक्ष की उपमा दी गई है। पारिजात एक दिव्य वृक्ष है जो अपने आश्रय में आने वालों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। भगवान भी अपने भक्तों और भक्तों के भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करते हैं और उनका पालन-पोषण करते हैं। भक्त स्वयं को उन महान भक्तों की परंपरा में रखकर, यह विश्वास व्यक्त करता है कि जिस प्रकार आपने उन सब का उद्धार किया, उसी प्रकार आप मेरा भी उद्धार अवश्य करेंगे। यह भगवान के करुणामय और भक्त-सुलभ स्वभाव पर अटूट विश्वास का प्रतीक है।
श्लोक 17
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण।
ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-
स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम्।
भगवान लक्ष्मीनृसिंह के चरण-कमलों (चरणाब्ज) पर भ्रमर (मधुव्रतेन) के समान आसक्त रहने वाले श्री शंकराचार्य (शङ्करेण) के द्वारा पृथ्वी (भुवि) पर यह कल्याणकारी (शुभकरं) स्तोत्र रचा (कृतं) गया है। जो कोई भी मनुष्य (ये मनुजाः) हरि-भक्ति से युक्त (हरिभक्तियुक्ताः) होकर इस स्तोत्र का पाठ (तत्पठन्ति) करते हैं, वे भगवान के उस चरण-कमल (तत्पदसरोजम्) को प्राप्त करते हैं, जो अखंड और अविनाशी (अखण्डरूपम्) है।
यह स्तोत्र का अंतिम श्लोक है, जिसे फलश्रुति कहते हैं। इसमें स्तोत्र के रचयिता, उनकी भक्ति और इस स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले फल का वर्णन है। इस स्तोत्र के रचयिता जगद्गुरु आदि शंकराचार्य हैं, जो स्वयं को भगवान लक्ष्मीनृसिंह के चरणों का भ्रमर बताते हैं। जिस प्रकार भ्रमर कमल के मकरंद में डूबा रहता है, उसी प्रकार शंकराचार्य का मन भी भगवान के चरण-कमलों की भक्ति में डूबा हुआ है। यह स्तोत्र अत्यंत मंगलकारी है। इस श्लोक में यह आश्वासन दिया गया है कि जो भी व्यक्ति सच्ची भक्ति के साथ इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेगा, उसे भौतिक सुखों के साथ-साथ अंत में भगवान के अविनाशी धाम, अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होगी। वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर भगवान के शाश्वत स्वरूप में लीन हो जाएगा।
श्रीमत्पयोनिधिनिकेतनचक्रपाणे
भोगीन्द्रभोगमणिराजितपुण्यमूर्ते।
योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-
सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारदावगहनाकरभीकरोरु-
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य।
त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारजालपतितस्य जगन्निवास
सर्वेन्द्रियार्थबडिशाग्रझषोपमस्य।
प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुकमस्तकस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं
सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य।
दीनस्य देव कृपया पदमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-
निष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश।
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारसर्पविषदिग्धमहोग्रतीव्र-
दंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तेः।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-
शाखायुतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम्।
आरुह्य दुःखफलितं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारसागरविशालकरालकाल-
नक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य।
व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानं
दीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम्।
प्रह्लादखेदपरिहारपरावतार
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
संसारघोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य।
आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदुःखितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
बद्ध्वा गले यमभटा बहु तर्जयन्तः
कर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम्।
एकाकिनं परवशं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्ख-
मन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन्।
वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य
चोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः।
मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-
व्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास।
भक्तानुरक्तपरिपालनपारिजात
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम्।
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण।
ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-
स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम्।