जगद्योनिरूपां सुवेशीं च रक्तां गुणातीतसंज्ञां महागुह्यगुह्याम् ।
महासर्पभूषां भवेशादिपूज्यां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
मैं उन देवी का नित्य भजन करता हूँ जो जगत की उत्पत्ति का स्रोत हैं, जो सुन्दर वेश धारण करती हैं और रक्त वर्ण की हैं, जिन्हें प्रकृति के तीनों गुणों से परे माना जाता है, और जो महान रहस्यों में भी सबसे गोपनीय हैं। जिन्होंने विशाल सर्पों को आभूषण के रूप में धारण किया है और जो भव (शिव) आदि देवों द्वारा पूजित हैं, मैं उन अत्यंत उग्र स्वरूपा बाला देवी की नित्य वंदना करता हूँ।
इस श्लोक में देवी के परम और रहस्यमय स्वरूप का वर्णन है। उन्हें 'जगद्योनि' कहकर यह निरूपित किया गया है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड उन्हीं से उत्पन्न हुआ है, वे ही सृष्टि का आदि कारण हैं। उनका 'रक्त वर्ण' सृजन की ऊर्जा, रजोगुण और संहारक शक्ति का प्रतीक है। 'गुणातीत' होने का अर्थ है कि वे सत्, रज और तम, इन तीनों गुणों के प्रभाव से परे हैं, अर्थात वे माया से अछूती, शुद्ध ब्रह्म-स्वरूपा हैं। 'महागुह्यगुह्याम्' का भाव है कि उनका वास्तविक स्वरूप तर्क और साधारण बुद्धि की सीमाओं से परे है, उसे केवल गहन साधना और कृपा से ही जाना जा सकता है। सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करना उनके योगीश्वर शिव से अभिन्नता और कुंडलिनी शक्ति पर उनके पूर्ण अधिकार को दर्शाता है। स्वयं शिव द्वारा पूजित होना उनकी सर्वोच्च सत्ता को स्थापित करता है।
महास्वर्णवर्णां शिवपृष्ठसंस्थां महामुण्डमालां गले शोभमानाम् ।
महाचर्मवस्त्रां महाशङ्खहस्तां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
जिनका वर्ण महान स्वर्ण के समान देदीप्यमान है, जो शिव की पीठ पर विराजमान हैं, जिनके गले में महान मुण्डों की माला सुशोभित हो रही है। जिन्होंने महान चर्म (व्याघ्रचर्म) को वस्त्र रूप में धारण किया है और जिनके हाथ में महाशंख है, मैं उन अत्यंत उग्र स्वरूपा बाला देवी की नित्य वंदना करता हूँ।
यह श्लोक देवी के विशिष्ट तांत्रिक स्वरूप का चित्रण करता है। 'महास्वर्णवर्णां' उनकी दिव्य आभा और तेज का द्योतक है। 'शिवपृष्ठसंस्थां' एक गहन तांत्रिक प्रतीक है, जहाँ शिव (विशुद्ध चेतना) शव के समान निष्क्रिय हैं और शक्ति (क्रियात्मक ऊर्जा) उन पर आरूढ़ होकर सृष्टि का संचालन करती हैं। यह दर्शाता है कि शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय हैं। गले में 'मुण्डमाला' काल पर उनके नियंत्रण और संहारक शक्ति का प्रतीक है। यह माला संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों का भी प्रतीक मानी जाती है, जिसका अर्थ है कि वे शब्द-ब्रह्म हैं। चर्म का वस्त्र धारण करना यह दिखाता है कि उन्होंने पाशविक वृत्तियों और अहंकार पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। हाथ में शंख विजयनाद और आदि ध्वनि 'ॐ' का प्रतीक है।
सदा सुप्रसन्नां भृतासूक्ष्मसूक्ष्मां वराभीतिहस्तां धृतावक्षपुस्ताम् ।
महाकिन्नरेशीं भगाकारविद्यां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
जो सदा अत्यंत प्रसन्न रहती हैं, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म रूप धारण करने में समर्थ हैं, जिनके हाथ वर और अभय मुद्रा में हैं, और जिन्होंने अक्षमाला (जापमाला) और पुस्तक धारण की हुई है। जो महान किन्नरों की स्वामिनी हैं और जो 'भगाकार विद्या' (योनि के आकार वाली परम विद्या) स्वरूपा हैं, मैं उन अत्यंत उग्र स्वरूपा बाला देवी की नित्य वंदना करता हूँ।
इस श्लोक में देवी के उग्र रूप के साथ उनके सौम्य और ज्ञानमय स्वरूप का भी वर्णन है। 'सदा सुप्रसन्नां' यह बताता है कि अपने भक्तों के लिए वे सदैव कृपालु और प्रसन्न रहती हैं। 'वराभीतिहस्तां' (वरद और अभय मुद्रा) उनके भक्तवत्सल स्वभाव को दर्शाता है, जहाँ वे एक हाथ से समस्त वरदान देती हैं और दूसरे से समस्त भयों को दूर करती हैं। हाथ में अक्षमाला और पुस्तक उनके ज्ञान, विद्या और मंत्र-साधना की अधिष्ठात्री देवी होने का प्रतीक है। 'भगाकारविद्या' एक अत्यंत गूढ़ तांत्रिक संज्ञा है, जो उन्हें श्रीचक्र के केंद्र या योनि के रूप में पूजित होने का संकेत देती है, जो स्वयं सृष्टि का आदि स्रोत है।
तिनीं तीकिनीनां रवां किङ्किणीनां हहाहाहहाहामहालापशब्दाम् ।
तथैथै तथैथै महानृत्यनृत्यां महाट्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
जो 'तिनीं', 'तीकिनी' जैसी ध्वनियाँ करती हैं, जिनके घुंघरुओं से 'किंकिणी' की मधुर ध्वनि निकलती है, जो 'हाहाहा-हाहाहा' का महान अट्टहास करती हैं। जो 'तथै-थै, तथै-थै' की ताल पर महान नृत्य करती हैं, मैं उन अत्यंत उग्र स्वरूपा बाला देवी की नित्य वंदना करता हूँ।
यह श्लोक देवी के नाद-ब्रह्म (ध्वनि स्वरूप) और क्रियामय स्वरूप का वर्णन करता है। यहाँ वर्णित ध्वनियाँ उनके बीजाक्षरों या उनके नृत्य और क्रियाओं से उत्पन्न होने वाली ब्रह्मांडीय ध्वनियों का प्रतीक हैं। उनका अट्टहास ब्रह्मांड को कंपा देने वाला और असुरों के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला है, साथ ही यह माया के आवरण को छिन्न-भिन्न कर देता है। 'तथै-थै' की ताल पर उनका नृत्य सृष्टि और प्रलय का नृत्य है, जो ब्रह्मांड की लय और गति को नियंत्रित करता है।
ननानारिरीरीमहागीशशम्बू हुहूवूहुहूवूपशो रक्तपानाम् ।
धिमिन्धीं धिमिन्धीं मृदङ्गस्य शब्दां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
जो 'न-ना-ना-रि-री-री' जैसे महान गीत गाती हैं, जो 'हु-हू-वू-हु-हू-वू' जैसी ध्वनि करते हुए पशु का रक्तपान करती हैं। जो 'धिमिन्-धीं, धिमिन्-धीं' जैसी मृदंग की ध्वनि स्वरूपा हैं, मैं उन अत्यंत उग्र स्वरूपा बाला देवी की नित्य वंदना करता हूँ।
यह श्लोक भी देवी के नाद-स्वरूप को आगे बढ़ाता है। यहाँ वर्णित विचित्र ध्वनियाँ उनके अव्यक्त स्वरूप को दर्शाती हैं, जो साधारण भाषा से परे है। 'पशो रक्तपानाम्' का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। यहाँ 'पशु' का अर्थ अज्ञान और अहंकार के बंधन में बंधा हुआ जीव है। देवी उसके रक्त (अर्थात उसकी आसक्तियों, वासनाओं और अहंकार) का पान करके उसे सांसारिक बंधनों से मुक्त करती हैं। मृदंग की ध्वनि उनके ब्रह्मांडीय नृत्य और सृष्टि की लय का प्रतीक है।
महाचक्रसंस्थां त्रिमात्रास्वरूपां शिवार्धाङ्गभूतां महापुष्पमालाम् ।
महादुःखहर्त्रीं महाप्रेतसंस्थां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
जो महाचक्र (श्रीचक्र) में निवास करती हैं, जो प्रणव 'ॐ' की तीन मात्राओं (अ, उ, म) के स्वरूप में हैं, जो शिव के आधे अंग में स्थित हैं (अर्धनारीश्वर), और जिन्होंने महान पुष्पों की माला धारण की है। जो महान दुःखों का हरण करने वाली हैं और जो महाप्रेत (शिव) पर विराजमान हैं, मैं उन अत्यंत उग्र स्वरूपा बाला देवी की नित्य वंदना करता हूँ।
इस श्लोक में देवी के दार्शनिक और यौगिक स्वरूप का वर्णन है। 'महाचक्रसंस्थां' का अर्थ है कि वे श्रीयंत्र या सहस्रार चक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। 'त्रिमात्रास्वरूपां' उन्हें प्रणव (ॐ) से अभिन्न बताता है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का सार है। 'शिवार्धाङ्गभूतां' अर्धनारीश्वर के सिद्धांत को दर्शाता है, जहाँ शिव और शक्ति एक ही परम तत्व के दो अविभाज्य रूप हैं। 'महादुःखहर्त्रीं' उनका करुणामयी मातृ स्वरूप है, जो भक्तों के सभी सांसारिक और आध्यात्मिक दुखों को दूर करती हैं। 'महाप्रेतसंस्थां' पुनः उसी प्रतीक को दोहराता है जहाँ वे शव रूपी, निष्क्रिय शिव पर आरूढ़ होकर उन्हें और सम्पूर्ण ब्रह्मांड को क्रियाशील बनाती हैं।
स्फुरत्पद्मवक्त्रां हिमांशोः कलापां महाकोमलाङ्गीं सुरेशेन मान्याम् ।
जगत्पालनैकाग्रचित्तां सुपुष्टां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
जिनका मुख खिले हुए कमल के समान है, जिन्होंने चन्द्रमा की कला को अपने मस्तक पर धारण किया है, जिनके अंग अत्यंत कोमल हैं, और जो देवराज इंद्र द्वारा भी सम्मानित हैं। जिनका चित्त एकमात्र जगत के पालन में लगा हुआ है और जो सुपुष्ट (सर्व-समर्थ) हैं, मैं उन अत्यंत उग्र स्वरूपा बाला देवी की नित्य वंदना करता हूँ।
यह श्लोक देवी के अत्यंत सौम्य, सुंदर और करुणामय रूप का वर्णन करता है, जो उनके 'उग्र' स्वरूप के साथ एक अद्भुत संतुलन बनाता है। खिला हुआ कमल उनके सौंदर्य, पवित्रता और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है। मस्तक पर चन्द्रमा शीतलता, शांति और अमृत का प्रतीक है। 'महाकोमलाङ्गीं' होते हुए भी वे 'महात्युग्र' हैं, यह उनके स्वरूप की पूर्णता को दर्शाता है। उनका एकमात्र ध्येय जगत का पालन करना है, जो उनके मातृ स्वरूप को प्रकट करता है। वे जगत की माता हैं, जो दुष्टों के लिए उग्र और भक्तों के लिए परम कोमल हैं।
महादैत्यनाशीं सुरान्नित्यपालीं महाबुद्धिराशिं कवीनां मुखस्थाम् ।
जटीनां हृदिस्थां मनूनां शिरःस्थां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
जो महान दैत्यों का नाश करने वाली हैं, जो देवताओं का नित्य पालन करती हैं, जो महान बुद्धि की भंडार हैं और कवियों के मुख में (वाणी के रूप में) निवास करती हैं। जो जटाधारी तपस्वियों के हृदय में स्थित हैं और जो मंत्रों के शीर्ष पर विराजमान हैं, मैं उन अत्यंत उग्र स्वरूपा बाला देवी की नित्य वंदना करता हूँ।
इस श्लोक में देवी के पालक, संहारक और ज्ञान-प्रदाता स्वरूप का समन्वय है। वे दुष्टों का नाश करती हैं और सज्जनों की रक्षा करती हैं। वे बुद्धि की देवी हैं और कवियों को प्रेरणा देती हैं, अर्थात वे वाग्देवी सरस्वती का ही एक रूप हैं। तपस्वियों के हृदय में निवास करने का अर्थ है कि वे ध्यान और गहन तपस्या से ही प्राप्त होती हैं। 'मनूनां शिरःस्थां' का अर्थ है कि वे सभी मंत्रों की मूल शक्ति हैं; किसी भी मंत्र के आरम्भ में लगने वाला बीजाक्षर या प्रणव उन्हीं का स्वरूप है। उनके बिना कोई भी मंत्र चैतन्य और फलदायी नहीं हो सकता।
भुजङ्गाख्यं महास्तोत्रं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ।
महासिद्धिप्रदं दिव्यं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥
यह 'भुजंग' नामक महास्तोत्र तीनों लोकों में दुर्लभ है। यह महान सिद्धियों को प्रदान करने वाला, दिव्य और चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) रूपी फल देने वाला है।
सर्वक्रतुफलं भद्रे सर्वव्रतफलं तथा ।
सर्वदानोद्भवं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥
हे कल्याणी! इस स्तोत्र के पाठ से सभी यज्ञों का फल, सभी व्रतों का फल तथा सभी दानों से उत्पन्न होने वाला पुण्य प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
विवादे कलहे घोरे महादुःखे पराजये ।
ग्रहदोषे महारोगे पठेत्स्तोत्रं विचक्षणः ॥
विवाद, भयानक कलह, महान दुःख, पराजय की स्थिति में, ग्रह दोष होने पर और महारोग से ग्रस्त होने पर बुद्धिमान व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
सर्वे दोषा विनश्यन्ति लभते वाञ्छितं फलम् ।
दूतीयागे पठेद्देवि सर्वशत्रुक्षयो भवत् ॥
(इसके पाठ से) सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। हे देवि! 'दूतीयाग' (एक तांत्रिक अनुष्ठान) में इसका पाठ करने से सभी शत्रुओं का नाश हो जाता है।
महाचक्रे पठेद्देवि लभते परमं पदम् ।
पूजान्ते पठते भक्त्या महाबलिफलप्रदम् ॥
हे देवि! महाचक्र (श्रीयंत्र) की पूजा में इसका पाठ करने से साधक परम पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है। पूजा के अंत में भक्तिपूर्वक इसका पाठ करने से यह महाबलिदान के समान फल प्रदान करता है।
पितृगेहे तुर्यपथे शून्यागारे शिवालये ।
बिल्वमूले चैकवृक्षे रतौ मधुसमागमे ॥
पठेत्स्तोत्रं महेशानि जीवन्मुक्तस्स उच्ते ।
त्रिकालं पठते नित्यं देवीपुत्रत्वमाप्नुयात् ॥
हे महेशानि! जो व्यक्ति पितरों के घर (श्मशान) में, चौराहे पर, सूने घर में, शिवालय में, बेल के वृक्ष के नीचे, किसी अकेले वृक्ष के नीचे, रति-क्रिया के समय अथवा वसंतोत्सव में इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो नित्य तीनों काल (सुबह, दोपहर, शाम) में इसका पाठ करता है, वह देवी का पुत्र होने का गौरव प्राप्त करता है।
(फलश्रुति के इन अंतिम श्लोकों में स्तोत्र के पाठ से प्राप्त होने वाले लौकिक और पारलौकिक फलों का वर्णन है। यह स्तोत्र न केवल भौतिक संकटों जैसे विवाद, रोग, शत्रु भय से रक्षा करता है, बल्कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों को भी सिद्ध करता है। विशिष्ट तांत्रिक साधनाओं में इसका पाठ अमोघ फलदायी बताया गया है। अंत में, नित्य पाठ करने वाले भक्त को देवी की पुत्र के समान कृपा और संरक्षण प्राप्त होता है, जो साधक के लिए सर्वोच्च सौभाग्य है।)
जगद्योनिरूपां सुवेशीं च रक्तां गुणातीतसंज्ञां महागुह्यगुह्याम् ।
महासर्पभूषां भवेशादिपूज्यां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
महास्वर्णवर्णां शिवपृष्ठसंस्थां महामुण्डमालां गले शोभमानाम् ।
महाचर्मवस्त्रां महाशङ्खहस्तां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
सदा सुप्रसन्नां भृतासूक्ष्मसूक्ष्मां वराभीतिहस्तां धृतावक्षपुस्ताम् ।
महाकिन्नरेशीं भगाकारविद्यां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
तिनीं तीकिनीनां रवां किङ्किणीनां हहाहाहहाहामहालापशब्दाम् ।
तथैथै तथैथै महानृत्यनृत्यां महाट्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
ननानारिरीरीमहागीशशम्बू हुहूवूहुहूवूपशो रक्तपानाम् ।
धिमिन्धीं धिमिन्धीं मृदङ्गस्य शब्दां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
महाचक्रसंस्थां त्रिमात्रास्वरूपां शिवार्धाङ्गभूतां महापुष्पमालाम् ।
महादुःखहर्त्रीं महाप्रेतसंस्थां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
स्फुरत्पद्मवक्त्रां हिमांशोः कलापां महाकोमलाङ्गीं सुरेशेन मान्याम् ।
जगत्पालनैकाग्रचित्तां सुपुष्टां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
महादैत्यनाशीं सुरान्नित्यपालीं महाबुद्धिराशिं कवीनां मुखस्थाम् ।
जटीनां हृदिस्थां मनूनां शिरःस्थां महात्युग्रबालां भजेऽहं हि नित्याम् ॥
भुजङ्गाख्यं महास्तोत्रं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ।
महासिद्धिप्रदं दिव्यं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥
सर्वक्रतुफलं भद्रे सर्वव्रतफलं तथा ।
सर्वदानोद्भवं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥
विवादे कलहे घोरे महादुःखे पराजये ।
ग्रहदोषे महारोगे पठेत्स्तोत्रं विचक्षणः ॥
सर्वे दोषा विनश्यन्ति लभते वाञ्छितं फलम् ।
दूतीयागे पठेद्देवि सर्वशत्रुक्षयो भवत् ॥
महाचक्रे पठेद्देवि लभते परमं पदम् ।
पूजान्ते पठते भक्त्या महाबलिफलप्रदम् ॥
पितृगेहे तुर्यपथे शून्यागारे शिवालये ।
बिल्वमूले चैकवृक्षे रतौ मधुसमागमे ॥
पठेत्स्तोत्रं महेशानि जीवन्मुक्तस्स उच्यते ।
त्रिकालं पठते नित्यं देवीपुत्रत्वमाप्नुयात् ॥