चार्वाक दर्शन - खुशी और आनंद को गले लगाना

लोकायतदर्शन-मान्य भूतचैतन्यवाद का सुस्पष्ट रूप से प्रतिपादन करने वाले श्रीमद्भागवत के स्कन्ध ११, अध्याय १४ के दो
वचन और सुनिये -
आसीज्ज्ञानमथो अर्थं एकमेवाविकल्पितम् ।
वाङ्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद्बृहत् ॥
तयोरेकतरोह्यर्थः प्रकृतिः सोऽभयात्मिका ।
ज्ञानं त्वन्यतमो भावः पुरुष सोऽभिधीयते ॥
इन वचनों का अर्थ संक्षेप में यह है कि अतिपूर्वकाल में ज्ञान और उसके विषय ये दोनों आज की तरह पृथक् रूप से अवस्थित या मान्य नहीं थे। दोनों का सम्मिलित वास्तविक वह स्वरूप एक ही था जिसे एक सत्य अर्थात भूतात्मक वृहत्तत्व कहा जाता था। वही भूताद्वैत तत्व जब ज्ञान और विषय इन दो रूपों में पृथक्-पृथक् मान्य हुआ, तो विषय को कार्यकारणात्मक प्रकृति, और ज्ञान को पुरुष कहा जाने लगा। इन भागवत- वाक्यों से भी लोकायत सिद्धान्त की पूर्ण रूप से पुष्टि इसलिए होती दीख पड़ती है चैतन्यात्मक ज्ञान को विषयात्मक भूतों में ही सन्निविष्ट अकेला वहीं मानता है ।
उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को यह कह कर भी युद्धोद्यत करने के लिए प्रयत्न किया है कि -
अथ चेत् त्वं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो ! नैनं शोचितुमर्हसि ॥
उससे यह सुस्पष्ट है कि गीता एवं उसके पात्र लोकायत सम्मत शरीरात्मवाद से असहमत नहीं थे, क्योंकि इस गीता - वाक्य का सरल अर्थ यही है कि हे महाबाहु अर्जुन ! यदि तुम नियमतः जन्ममरणशील शरीर को ही आत्मा मानते हो फिर भी तुझे चिन्ता - त्यागपूर्वक युद्ध करना चाहिए। शरीर को आत्मा लोकायत सिद्धान्त ही मानता है। अन्य कोई नहीं। इतना ही नहीं-
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
इसकी व्याख्या करते हुए आचार्य शंकर ने यतचित्तात्मा का अर्थ मन और शरीर पर अधिकार प्राप्त करने वाला किया है और
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
इसके भाष्य में जो विजितात्मा का अर्थ संयत शरीर किया है उसे देखते हुए यह मानना आवश्यक हो जाता है कि गीता भी लोकायत दर्शन के वितत प्रभाव से अछूती नहीं है। लोकायत सिद्धान्त अनुगामी जन ही आजीवक नाम से इसलिये अभिहित होते थे कि शरीरात्मवादी होने के कारण शरीर के सदुपयोगार्थ, उसकी रक्षा के लिए, आजीवन को, अर्थात् श्रमात्मक आजीविका को, वे, मुख्य कर्तव्य रूप से अपनाते थे । एतदतिरिक्त यह भी कारण था आजीवक नाम से उनके पुकारे जाने का, कि वे श्रमोपयोगी स्वास्थ्य के लिए सदा सचेष्ट रहते थे। क्योंकि आजीवक का दूसरा अर्थ, पूर्ण रूप से जीवन का अर्थात् स्वास्थ्य का सम्पादन भी होता है। शरीर को आत्मा मानने वाले अपने स्वास्थ्य-स्वरूप जीवन के सम्पादन में सर्वथा सचेष्ट हों, यह सर्वथा युक्ति-संगत ही हैं। इन सारी बातों की ओर ध्यान देने पर यह स्पष्ट हो उठता है कि यह दर्शन जन- जीवन से घनिष्ठता रखने वाले कृषि पशुपालन वाणिज्य आदि; राजनीतिस्वरूप दण्डनीति और स्वास्थ्यप्रद आयुर्वेद इन तीनों से पूर्ण रूप से सम्बद्ध था। इसका परिचय ब्रह्मद्वैतवाद के महान आचार्य शंकर के द्वारा उनके सर्वसिद्धान्त-संग्रह में, लोका त सिद्धान्त वर्णन के अंदर कहे गये-
कृषि - गौरक्ष्यवाणिज्यदण्डनीत्यादिभिर्बुधः ।
दृष्टैरेव सदोपायैर्भोगाननुभवेद् भुवि ॥
इस वचन से भी प्राप्त होता है। लोकायत वचन के रूप में कहे गये, इस श्लोक का अर्थ यह है कि विवेकी व्यक्तियों को यही चाहिए कि वे खेती, पशुपालन, वाणिज्य व्यवसाय और दण्डनीति का आश्रय लेकर इन प्रत्यक्ष फलप्रद उपायों के द्वारा इस संसार
सुख का भोग अवश्य करें। आचार्य शंकररचित इस लोकायत - वाक्य की ओर ध्यान देने पर आज भारतवर्ष में इस दर्शन के वास्तविक स्वरूप के प्रचार की कितनी आवश्यकता है; यह बात भी पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्मसूत्रकार व्यसदेव एवं भाष्यकार आचार्य शंकर ने जो अन्य दर्शनों के खण्डनार्थ अधिकरणरचना एवं उसके भाष्य की रचना की है यहाँ इस दर्शन के खण्डनार्थ अधिकरण और भाष्य की रचना नहीं है। वह स्पष्ट बतलाता है कि उनकी दृष्टि में मुमुक्षुओं के लिए वेदान्तदर्शन के समान ऐहिक भोग के इच्छुक व्यक्तियों के लिए यह लोकायत दर्शन भी अवश्य आश्रयणीय है और लोकायत दर्शन का वह निन्दित स्वरूप, जिसका वर्णन हरिभद्र - सूरि आदि जैन विद्वानों और माधवाचार्य आदि वैदिक विद्वानों ने किया है वह लोकायत - सिद्धान्त का वास्तविक स्वरूप नहीं है। आचार्य शंकर ने जो लोकायत-सम्मत शरीरात्मवाद का उल्लेख करते हुए प्राकृता लौकायतिकाश्च प्रतिपन्नः इस कथन के द्वारा लोकायतिकों को अविचारी प्राकृत जनों से बिलकुल अलग कहा है, उससे अनेक लोगों का, यह कथन भी, अनायास खण्डित हो जाता है कि लोकायत नामक कोई दर्शन कभी नहीं था, वह केवल खण्डन करने वालों की मनगढ़न्त कल्पना का ही प्रसव है। उक्त भगवत वचनों के समान भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धि रेव च यह गीता - वाक्य भी लोकायत-सम्मत पृथिवी, जल आदि भूतों को भगवान् का स्वरूप बतलाता है। लोकायत दर्शन में जो प्रत्यक्ष मात्र को प्रमाण माना गया है उसका अभिप्राय यह है कि पृथिवी आदि चारों ही मान्य तत्व प्रत्यक्ष गम्य हैं। दूसरा कारण यह भी है कि यदि मन को ही इन्द्रिय माना जाय तो अनुमिति आदि ज्ञान भी अनायास इन्द्रियजन्य होने के कारण प्रत्यक्ष के ही अन्दर गतार्थ हो उठते हैं।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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