
इतने में आकाश में-ऐं ऐं ऐं-यह मंत्र सुनाई दिया।
इस मन्त्र को वाग्बीज कहते हैं, यह माता के बीज मंत्रों में से एक है।
दोनों दानवों ने इस मंत्र का जाप करना शुरू किया।
जब मन्त्र उनमें दृढ हो गया तब आकाश में उन्हें बिजली दिखाई दी।
उन्होंने मान लिया कि यह बिजली उसी मंत्र का सगुण साकार स्वरूप है।
उसी बिजली के प्रकाश में ध्यान लगाकर, भोजन छोड़कर, इन्द्रियों को अपने वश में रखकर दोनों ने एक हजार वर्ष तक घोर तपस्या की।
देवी मां प्रसन्न हो गयी और दानवों से बोली कि जो वर चाहिए, माँगो।
यह सुनकर दानवों ने कहा: हमारी मृत्यु जब हम चाहेंगे तभी होगी ऐसा वर दीजिये।
माता ने वरदान दे दिया।
दानव खुश हो गये और पहले जैसे समुद्र मे घूमने और खेलने लगे।
एक बार उन्होंने कमल पर बैठे हुए ब्रह्मा जी को देखा।
ब्रह्मा जी तपस्या कर रहे थे।
दानव खुश हो गये, चलो कोई मिल गया छेडने।
दोनों ने ब्रह्मा जी के पास जाकर कहा: कायर नहीं हो तो आओ हमारे साथ लडो।
नहीं तो यह जगह छोड़कर चले जाओ।
ब्रह्मा जी व्याकुल हो गये।
क्या करें? मैं तो कोई योद्धा नही हूं, मैं तो तपस्वी हूं।
इनके साथ कैसे लड पाऊँगा?
ब्रह्मा जी सोचने लगे कि साम-दान-भेद-दण्ड इनमें से किसका प्रयोग किया जायें।
ये दानव कितने बलवान हैं कुछ पता नहीं है, जिसके बल का अनुमान नहीं उसके साथ लड़ना मूर्खता है।
अगर मैं इनसे अच्छी बात करने लगूँगा तो ये समझेंगे कि मे कमजोर हूँ और डरा हुआ हूँ, और मुझे तुरंत ही मार देंगे।
और इन दोनों को आपस में लडाना तो सर्वथा असाध्य ही है।
इसलिये अब एक ही रास्ता है।
भगवान को जगाता हूँ, वे ही बचा पाएंगे मुझे।
ऐसा सोचकर ब्रह्मा जी श्री हरी का स्तुति पाठ करने लगे।
दीननाथ हरे विष्णो वामनोत्तिष्ठ माधव।
भक्तार्तिहृद्धृषीकेश सर्वावास जगत्पते॥
अन्तर्यामिन्नमेयात्मन् वासुदेव जगतेपते।
दुष्टारिनाशनैकाग्रचित्त चक्रगदाधर॥
सर्वज्ञ सर्वलोकेश सर्वशक्तिसमन्वित।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश दुःखनाशन पाहि माम्॥
विश्वंभर विशालाक्ष पुण्यश्रवणकीर्तन।
जगद्योने निराकार सर्गस्थित्यन्तकारक॥
इमौ दैत्यौ महाराज हन्तुकामौ महोद्धतौ।
न जानास्यखिलाधार कथं मां सङ्कटे गतम्॥
उपेक्षसेति दुःखार्त्तं यदि मां शरणं गतम्।
पालक त्वं महाविष्णो निराधारं भवेत्ततः॥
उन्होंने कहा: ये दो मदोन्मत्त दानव मुझे मारने आये हैं, आप ही जगत के स्वामी हैं, आपके शरण में मैं आया हूँ, आप ही मुझे बचा सकते हैं।
लेकिन भगवान नींद से नहीं जागे।
ब्रह्मा जी घबराने लगे।
अब मैं क्या करूं?
भगवान जग नही रहे हैं।
मैं कहाँ जाऊँ?
ये तो दानव अब मुझे मार ही देंगे।
भगवान योगनिद्रा के वश में, उस शक्ति के वश में हैं।
उनको पता ही नहीं चल रहा है कि क्या हो रहा है।
क्या करें?
अब मैं उस शक्ति की, योगनिद्रा की शरण में जाता हूँ जिसके वश में अब भगवान हैं।
जो भगवान की स्वामिनी बन गयी है।
जिसके अधीन में आकर भगवान एक साधारण प्राणी की तरह सो रहे हैं उस शक्ति ने सचमुच सारे जगत को अपने काबू में करके रखा होगा।
मुझे उस शक्ति का ही पूजन करना चाहिए।
पहले वह प्रसन्न होगी तो भगवान को मुक्त करेगी, फिर बाद में होगा लडना बचाना।
ब्रह्मा जी योग निद्रा की स्तुति करने लगे।
आकाश में वाग्बीज मंत्र का प्रकट होना क्या दर्शाता है?
यह दर्शाता है कि शक्ति ने स्वयं संकेत दिया है। वाग्बीज केवल ध्वनि नहीं, बल्कि चेतना को जाग्रत करने वाला बीज है। इसके सुनते ही वातावरण बदल जाता है और आगे की घटनाओं की दिशा तय होती है। यह मंत्र साधना की शुरुआत का कारण बनता है। यहां से दानवों की तपस्या का क्रम आरंभ होता है।
दानवों ने उसी मंत्र का जाप क्यों शुरू किया?
क्योंकि उन्होंने उसमें असाधारण प्रभाव अनुभव किया। जब कोई मंत्र मन में स्थिर हो जाता है, तो साधक उसी में लीन हो जाता है। दानवों ने उसे शक्ति प्राप्त करने का साधन माना। उनका उद्देश्य शक्ति अर्जित करना था, दिशा का विचार नहीं। यही आगे समस्या का कारण बनता है।
क्या केवल मंत्र-जाप से शक्ति प्राप्त हो सकती है?
मंत्र शक्ति देता है, पर विवेक नहीं देता। विवेक साधक के भीतर से आता है। बिना विवेक के प्राप्त शक्ति विनाशकारी बन सकती है। इस प्रसंग में यही स्पष्ट हो रहा है। इसलिए मंत्र और विवेक दोनों आवश्यक हैं।
बिजली को मंत्र का सगुण रूप मानने का भाव क्या बताता है?
यह बताता है कि मन अमूर्त शक्ति को किसी दृश्य रूप में देखना चाहता है। बिजली तेज, प्रकाश और प्रभाव का प्रतीक है। दानवों ने उसी को आधार बनाकर ध्यान किया। यह साधना की सामान्य मानसिक प्रवृत्ति है। इससे उनकी तपस्या और भी कठोर हो जाती है।
एक हजार वर्ष की तपस्या का उल्लेख क्यों किया गया है?
यह तप की तीव्रता और निरंतरता दिखाने के लिए है। साधना बिना स्थायित्व के फल नहीं देती। लंबा समय यह दर्शाता है कि दानव साधना में अडिग रहे। इसी कारण देवी प्रसन्न होती हैं। अवधि यहां साधना की गंभीरता का संकेत है।
क्या कठोर तपस्या का फल हमेशा शुभ होता है?
तपस्या से शक्ति मिलती है, पर उसका उपयोग साधक पर निर्भर करता है। शुभ उद्देश्य हो तो फल भी शुभ होता है। गलत उद्देश्य हो तो वही शक्ति संकट बन जाती है। इस कथा में यही सिद्ध हो रहा है। इसलिए तप के साथ उद्देश्य शुद्ध होना चाहिए।
दानवों ने इच्छामृत्यु का वर ही क्यों मांगा?
क्योंकि मृत्यु का भय ही सीमा बनाता है। भय हटते ही नियंत्रण समाप्त हो जाता है। दानव पूर्ण स्वेच्छाचार चाहते थे। उन्होंने शक्ति को मर्यादा से अलग कर लिया। यही वर आगे उनके उन्माद का कारण बनता है।
देवी द्वारा वर देना क्या सिद्ध करता है?
यह सिद्ध करता है कि शक्ति निष्पक्ष है। साधना करने वाले को फल मिलता है, चाहे वह कोई भी हो। फल का उपयोग कैसे होगा, यह साधक की जिम्मेदारी है। शक्ति निर्णय नहीं करती, सामर्थ्य देती है। यही प्राकृतिक नियम है।
क्या ऐसा वर देना अनुचित था?
नहीं, अनुचित वर नहीं, अनुचित इच्छा थी। वर साधन है, साध्य नहीं। जब साध्य विकृत हो, तो परिणाम भी विकृत होता है। दोष शक्ति का नहीं, धारक का होता है। यही इस प्रसंग का संकेत है।
वर मिलने के बाद दानव पहले जैसे क्यों घूमने लगे?
क्योंकि अब उन्हें किसी का भय नहीं रहा। भय के हटते ही संयम भी हट गया। वे खेल और उन्माद में डूब गए। शक्ति बिना नियंत्रण के उन्हें उग्र बना देती है। यही स्वभाव आगे उत्पात में बदलता है।
ब्रह्मा को देखकर उन्हें छेड़ने की इच्छा क्यों हुई?
क्योंकि तपस्वी उन्हें निर्बल लगे। बलवान व्यक्ति जब विवेक खो देता है, तो वह निर्बलों को लक्ष्य बनाता है। यह अहंकार की स्वाभाविक परिणति है। शक्ति जब दिशा खो दे, तो अत्याचार बन जाती है। यही यहां दिखाई देता है।
क्या यह व्यवहार अप्रत्याशित था?
नहीं, यह स्वाभाविक परिणाम था। बिना सीमा की शक्ति ऐसा ही आचरण करती है। इतिहास और जीवन दोनों में यही देखा जाता है। इसलिए मर्यादा आवश्यक है। यह प्रसंग उसी सत्य को दिखाता है।
ब्रह्मा का व्याकुल होना क्या दर्शाता है?
यह दर्शाता है कि वे अपनी भूमिका पहचानते हैं। वे योद्धा नहीं, तपस्वी और स्रष्टा हैं। हर भूमिका की अपनी सीमा होती है। अपनी सीमा जानना कमजोरी नहीं, विवेक है। ब्रह्मा यही अनुभव कर रहे हैं।
साम, दान, भेद, दंड पर विचार क्यों किया गया?
क्योंकि ये व्यवहारिक नीति के चार उपाय हैं। संकट में बुद्धिमान व्यक्ति सभी विकल्पों पर विचार करता है। ब्रह्मा जानते हैं कि हर उपाय हर स्थिति में काम नहीं करता। वे परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हैं। यह नीति-बुद्धि का उदाहरण है।
लड़ाई को मूर्खता क्यों माना गया?
क्योंकि शत्रु के बल का अनुमान नहीं था। अज्ञात शक्ति से युद्ध करना विनाश को बुलाना है। ब्रह्मा यह समझते हैं। इसलिए वे सीधे संघर्ष नहीं चुनते। यह विवेकपूर्ण निर्णय है।
अंत में ब्रह्मा विष्णु को ही क्यों स्मरण करते हैं?
क्योंकि वही रक्षक की भूमिका में हैं। जब अन्य उपाय असफल हों, तब मूल आश्रय की ओर जाना उचित है। ब्रह्मा यही करते हैं। यह विवेक से उत्पन्न शरणागति है। संकट में यही सही मार्ग होता है।
स्तुति में अनेक नामों का प्रयोग क्यों किया गया है?
क्योंकि प्रत्येक नाम एक गुण को स्मरण कराता है। स्मरण से मन उसी गुण से जुड़ता है। यह केवल शब्द नहीं, चेतना का आवाहन है। ब्रह्मा पूरी एकाग्रता से पुकारते हैं। यही स्तुति की शक्ति है।
क्या नाम-स्मरण वास्तव में सहायता करता है?
यह मन को केंद्रित करता है। केंद्रित मन ही सही निर्णय और सहायता का आधार बनता है। स्मरण से भय कम होता है और आश्रय का बोध होता है। यह मानसिक और आध्यात्मिक दोनों स्तर पर कार्य करता है। इसलिए इसका महत्व है।
भगवान के न जागने से ब्रह्मा क्यों घबरा जाते हैं?
क्योंकि उनका अंतिम सहारा भी निष्क्रिय दिख रहा है। यह स्थिति भय को तीव्र कर देती है। जब रक्षक भी सक्रिय न दिखे, तो असहायता बढ़ जाती है। ब्रह्मा उसी अवस्था में हैं। यह मानवीय प्रतिक्रिया है।
यहां योगनिद्रा की भूमिका कैसे स्पष्ट होती है?
यह स्पष्ट होता है कि वही शक्ति इस समय प्रभावी है। भगवान भी उसी के वश में दिख रहे हैं। ब्रह्मा कारण को पहचान लेते हैं। वे समझ जाते हैं कि समाधान वहीं से आएगा। यही निर्णायक बोध है।
क्या यह निष्कर्ष तर्कसंगत है?
हाँ, क्योंकि कारण को संबोधित किए बिना परिणाम नहीं बदलेगा। जहां से बंधन है, वहीं से मुक्ति होगी। ब्रह्मा इसी तर्क पर आगे बढ़ते हैं। यह सोच परिपक्व और व्यावहारिक है। यही सही दिशा है।
योगनिद्रा को भगवान की स्वामिनी क्यों कहा गया है?
क्योंकि वही इस समय नियंत्रक शक्ति है। जिसके अधीन भगवान भी निष्क्रिय हों, वही प्रधान मानी जाएगी। यह शक्ति-संबंध की स्पष्ट पहचान है। ब्रह्मा इसे स्वीकार कर लेते हैं। स्वीकार से ही समाधान शुरू होता है।
पहले उसी शक्ति की पूजा करने का निर्णय क्यों लिया गया?
क्योंकि बिना उसकी कृपा आगे कुछ संभव नहीं। पहले बंधन हटेगा, फिर कार्य होगा। यह व्यवहारिक क्रम है। ब्रह्मा इस क्रम को समझते हैं। इसलिए सीधे उसी की शरण जाते हैं।
यह प्रसंग साधक को क्या सिखाता है?
कि समस्या से पहले कारण को पहचानना चाहिए। केवल परिणाम से लड़ने से समाधान नहीं आता। मूल शक्ति को समझकर साधना करनी चाहिए। यही स्थायी समाधान का मार्ग है। ब्रह्मा इसी बोध से योगनिद्रा की स्तुति करते हैं।
योगनिद्रा की स्तुति आरंभ होना किस बात का संकेत है?
यह संकेत है कि दृष्टि बदल चुकी है। अब ब्रह्मा भ्रम में नहीं हैं। वे सही केंद्र को पहचान चुके हैं। यहीं से समाधान की प्रक्रिया शुरू होती है। यह कथा का निर्णायक मोड़ है।
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