असुरों के प्रहार से थके देव, पहुँचे देवी शरण

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असुरों के प्रहार से थके देव, पहुँचे देवी शरण

असुरों ने शुक्राचार्य का तिरस्कार किया था और शुक्राचार्य कुपित होकर चले गए। प्रह्लाद और असुरों ने शुक्राचार्य से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी और शुक्राचार्य ने असुरों को क्षमा कर दिया। पर कहे कि इस बार आप लोग देवों से युद्ध में हारेंगे। फिर अगले मन्वंतर में आप लोग स्वर्ग में राज करेंगे। शुक्राचार्य के इस वचन को सुनकर प्रह्लाद असुरों को आकर बोले, कर्म बड़ा बलवान है। युद्ध करके भी हम लोग पराजित ही होने वाले हैं। इसलिए हम स्वयं हार मानकर पाताल में चले जाएंगे तो हमें हानि नहीं होगी। असुरों ने उनकी बात नहीं मानी। वे बोले कि हम लोग भाग्य पर भरोसा नहीं रखते। उद्यम करने वालों की कभी हार नहीं होती। इसलिए हमें युद्ध करना चाहिए। आप बस हमारे आगे खड़े रहिए। हम देवों के साथ युद्ध करेंगे। दानवों की बात सुनकर प्रह्लाद ने भी युद्ध के नगाड़े बजवा दिए। देवता भी युद्ध के लिए तैयार होकर आ गए। 100 वर्षों तक देवासुरों के बीच घोर संग्राम चला। शुक्राचार्य भी दानवों की रक्षा करने के लिए आ गए। देवगण असुरों से मार खाने लगे। देवों की युद्ध में हारने की हालत हो गई। तब देवगुरु बृहस्पति ने देवी जगदंबा का स्मरण करिए ऐसे कहा। इंद्र ने देवी मां को याद करते हुए उनकी स्तुति की। जयदेवी महामाये शूलधारिणी चाम्बिके शंखचक्र गदापद्म खड्गहस्ते अभयप्रदे नमस्ते भुवनेशानी शक्ति दर्शन नायिके दशतत्वात्मिके मातः महाबिंदु स्वरूपिणी देवी, आप ही महामाया हैं। आप शूल, शंख, चक्र, गदा, पद्म और खड्ग को अपने हाथों में धारण करके रखते हैं। आप ही अभय प्रदान करती हैं। आप ही भुवनेश्वरी हैं। शक्ति के उपासकों की नायिका आप ही हैं। महाबिंदु स्वरूपिणी, सृष्टि आदि और अंत में स्थित परमाणु स्वरूपिणी आप ही हैं। महाकुंडलिनी रूपे। सच्चिदानंद रूपिणी प्राणाग्निहोत्र विद्येते नमो दीपशिखात्मिके पंचकोशान्तरगते पुच्छब्रह्म स्वरूपिणी आनंदतिलके मातः सर्वोपनिषदर्चिते आप ही कुंडलिनी शक्ति के रूप में स्थित हैं। सत, चित और आनंद स्वरूपिणी आप ही हैं। आप ही चिन्मय रूपा हैं। सारे मनुष्य अंत में आपके पास ही आकर लय को प्राप्त करते हैं। यथा नद्यस्यंदमाना समुद्रे अस्तम गच्छन्ति नामरूपे विहाय तथा विद्वान नामरूपाद्विमुक्तः। परात्परम पुरुषमुपैति दिव्यम्। जब नदियां अलग-अलग होकर बहती है तो उनको हम अलग-अलग नाम से और स्वरूप से जानते हैं। नाम गंगा, यमुना, सरस्वती। स्वरूप रंग में विद्यमान अंतर। जैसे नीले रंग का पानी, हरे रंग का पानी, मिट्टी के रंग का पानी इत्यादि। पर जब वे समुद्र में जाकर मिल जाते हैं तो अपने नाम और स्वरूप को खो देते हैं। वैसे ही पुरुष भूमि में रहते समय अलग-अलग नाम और स्वरूप से जाने जाते हैं। पर जब वो संसार में बहते-बहते परब्रह्म तक पहुंच जाते हैं तो अपने नाम और स्वरूप को खोकर ब्रह्म में लय को प्राप्त कर लेते हैं। वो परब्रह्म स्वरूपिणी है देवी मां। आप ही मनुष्यों के प्राण हैं। आप ही उनके लिए अग्निहोत्र विद्या हैं। दीपों में विद्यमान ज्वाला आप ही हैं। पंचकोष, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय। इन पांचों कोषों के अंदर आप ही विद्यमान हैं। आप ही पुच्छ ब्रह्म स्वरूपिणी हैं। पुच्छ ब्रह्म अर्थात वेदांत। उपनिषद वाक्य है, इदम पुच्छम प्रतिष्ठा। ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा इत्यादि। उच्च ब्रह्म वेदांत परब्रह्म तत्व विचार। आप ही परब्रह्म स्वरूपिणी है। आनंद कलिका आप ही आनंद की कली है। सभी उपनिषदों में आपका ही वर्णन है। मातः प्रसीध सुमुखी भव हीनसत्वां स्त्रायस्वनः जननी दैत्य पराजितान्वै। त्वम देवी न शरणदा भुवने प्रमाण शक्तासि दुःख शमनेखिल वीर्य युक्ते। हे माँ, आप हम पर प्रसन्न हो जाएं। अभी हम देवगण असुरों के सामने निर्बल हो गए हैं। हमको एकमात्र आप ही शरण दे सकती हैं। आप हमारी रक्षा करें। इस संसार में आप ही प्रमाण स्वरूपा हैं। आप ही इस अवस्था में हमारी रक्षा करके हमारे दुख को पूर्ण रूप से मिटाने में समर्थ हैं। आप हमारी रक्षा करके हमारे दुख को मिटाएं। ध्यायन्ति येपि सुखिनो नितरां भवन्ति दुःखान्विता विगत शोक भयास्तधान्ये मोक्षार्थिनो विगत मानविमुक्त संगाः संसार वारिधि जलं प्रतरन्ति सन्तः आपको जो ध्यान करते हैं, वे सुखी हो जाते हैं। जो दुख के समय आपका स्मरण करते हैं, वे दुख से निकल जाते हैं। संत जन आपको ध्यान करके संसार सागर का तरण करके मुक्ति को पा लेते हैं। त्वम देवी विश्व जननी प्रथित प्रभावा संरक्षणार्थ मुदितार्थि हर प्रतापा। संहर्तुमेतदखिलं किल कालरूपा कोवेत्ति तेम्ब चरितं ननु मंद बुद्धिः। आप ही विश्व की जननी है। आपके प्रभाव से ही यह विश्व उत्पन्न हुआ है। आप ही हमारी रक्षा करती हैं। आपके भक्तों को वरदान देने के लिए आप खुद प्रकट हो जाती हैं। आप इस जगत को संहार करने में भी समर्थ हैं। ब्रह्मा हरश्च हरिदश्वरथो हरिश्च इंद्रो यमश्च वरुणोग्नि समीरणौ च। ज्ञातुं क्षमानमुनयोपि महानुभावाः यस्याः प्रभावमतुलं निगमागमाश्च। ब्रह्मा, शिवजी, श्रीहरि, सूर्य, इन्द्रमे, यमराज, वरुण्, अग्निदेव। वायुदेव, मुनिगण, वेद, आगम, निगम, इनमें से कोई भी आपके प्रभाव को जानने में समर्थ नहीं है। आप हमें इस दुख से निकालिए। हमारी रक्षा कीजिए।

 

  • शुक्राचार्य ने असुरों को क्षमा करने के बाद भी उनकी पराजय की भविष्यवाणी क्यों की?
    शुक्राचार्य त्रिकालदर्शी हैं। उन्होंने देखा कि यद्यपि उन्होंने असुरों के अपराध को क्षमा कर दिया था, किंतु उस कालखंड का प्रारब्ध देवों के पक्ष में था। क्षमा हृदय का भाव है, किंतु काल की गति और कर्म का फल अटल होता है। उन्होंने असुरों को यह बोध कराने के लिए ऐसा कहा कि गुरु का आशीर्वाद होने पर भी व्यक्ति को समय की सीमा और ईश्वरीय विधान का सम्मान करना चाहिए।
  • प्रह्लाद ने युद्ध के स्थान पर पाताल जाने का सुझाव क्यों दिया था?
    प्रह्लाद परम ज्ञानी और भगवद्भक्त हैं। उनका यह सुझाव पलायन नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय था। वे जानते थे कि जब कर्म और काल प्रतिकूल हों, तो व्यर्थ का रक्तपात करने के स्थान पर स्वयं को सुरक्षित कर लेना ही बुद्धिमत्ता है। उन्होंने 'कर्म की बलवत्ता' को पहचाना था कि युद्ध करके हारने से उत्तम है कि अपनी मर्यादा में रहकर समय की प्रतीक्षा की जाए।
  • असुरों के इस तर्क में क्या रहस्य छिपा है कि उद्यम करने वालों की हार नहीं होती?
    असुरों का यह तर्क पुरुषार्थ के अहंकार को दर्शाता है। वे भाग्य और दैवीय विधान से ऊपर अपने बाहुबल को मानते थे। यह संदेश देता है कि बिना आध्यात्मिक मार्गदर्शन और बिना काल की गति को समझे किया गया केवल भौतिक परिश्रम या उद्यम अंततः विफलता और दुख का कारण बनता है।
  • देवासुर संग्राम में जब देवता हारने लगे, तब बृहस्पति ने देवी जगदंबा के ही स्मरण का सुझाव क्यों दिया?
    बृहस्पति देवगुरु और तत्ववेत्ता हैं। वे जानते हैं कि जब समस्त पुरुषार्थ, शस्त्र और सेना विफल हो जाए, तब केवल आदि शक्ति ही रक्षा कर सकती हैं। देवी जगदंबा इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति का मूल हैं। वे ही प्रकृति हैं और वही नियंता हैं। अतः मूल शक्ति की शरण में जाना ही संकट से निकलने का एकमात्र गुप्त मार्ग है।
  • देवी के हाथों में विद्यमान शस्त्रों और अभय मुद्रा का दार्शनिक अर्थ क्या है?
    देवी के हाथों में शंख शब्द ब्रह्म का, चक्र काल चक्र का, गदा अनुशासन का, पद्म शांति का और खड्ग विवेक का प्रतीक है। ये शस्त्र केवल असुरों को मारने के लिए नहीं, बल्कि साधक के भीतर के काम-क्रोध आदि विकारों के संहार हेतु हैं। अभय मुद्रा यह दर्शाती है कि जो शक्ति के शरणागत हैं, उन्हें संसार के किसी भी भय से डरने की आवश्यकता नहीं है।
  • स्तुति में देवी को महाबिंदु स्वरूपिणी क्यों कहा गया है?
    यह एक अत्यंत रहस्यमयी संज्ञा है। सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व सब कुछ एक अत्यंत सूक्ष्म बिंदु में समाहित होता है, जिसे महाबिंदु कहते हैं। देवी ही वह आदि बिंदु हैं जहाँ से संपूर्ण ब्रह्मांड का विस्तार होता है और प्रलय काल में पुनः सब कुछ उन्हीं में सिमट जाता है। वे ही परमाणु रूप में प्रत्येक पदार्थ के केंद्र में स्थित हैं।
  • नदियों के समुद्र में मिलने के उदाहरण से देवी और जीव के संबंध को कैसे समझा जा सकता है?
    जैसे गंगा और यमुना अपने नाम और स्वरूप (रंग-गुण) को त्यागकर समुद्र में एकाकार हो जाती हैं, वैसे ही मनुष्य जब माया के आवरण (नाम-रूप) को हटाकर देवी के परब्रह्म स्वरूप को पहचान लेता है, तो उसका पृथक अस्तित्व समाप्त हो जाता है। वह स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है। यही अद्वैत ज्ञान का शिखर है।
  • देवी को पंचकोशों के भीतर विद्यमान पुच्छ ब्रह्म स्वरूपिणी कहने का क्या तात्पर्य है?
    मानव शरीर अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय इन पाँच आवरणों से ढका है। इनके भीतर जो आधारभूत सत्य है, वह देवी ही हैं। 'पुच्छ ब्रह्म' वेदांत का वह सूत्र है जो बताता है कि ब्रह्म ही सबका आधार और प्रतिष्ठा है। देवी ही वह अंतिम सत्य हैं जिस पर यह सारा संसार टिका हुआ है।
  • इंद्र की स्तुति में हीनसत्त्व शब्द का प्रयोग देवताओं की किस स्थिति को प्रकट करता है?
    हीनसत्त्व का अर्थ है जिसका ओज, बल और आत्मशक्ति क्षीण हो गई हो। देवता जब अपने ऐश्वर्य के अभिमान में मूल शक्ति को भूल गए, तब वे असुरों से पराजित होने लगे। यह मनुष्य के लिए भी संदेश है कि आंतरिक शक्ति (देवी) के बिना व्यक्ति केवल एक निर्जीव पुतले के समान है, जो तुच्छ बाधाओं से भी हार जाता है।
  • इस प्रसंग का सबसे गोपनीय आध्यात्मिक पक्ष क्या है जिसे प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है?
    इसका सबसे गोपनीय पक्ष यह है कि देवी केवल बाहर युद्ध करने वाली कोई शक्ति नहीं हैं, बल्कि वे 'प्राणाग्निहोत्र' और 'दीपशिखा' के रूप में हमारे भीतर ही प्रज्वलित हैं। जो व्यक्ति अपने अंतःकरण में उन्हें खोजता है, उसे देवों की भाँति विजय और शांति की प्राप्ति होती है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिनके प्रभाव को पूरी तरह नहीं जानते, वे ही जगदंबा भक्ति से सुलभ हो जाती हैं।
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देवी भागवत

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