श्रीकृष्ण के बारे में जनमेजय के कुछ सन्देह

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श्रीकृष्ण के बारे में जनमेजय के कुछ सन्देह

जन्मेजय व्यास जी से कहते हैं, मुझे श्री कृष्ण के चरित्र को विस्तार से बताएं। मेरे मन में कुछ संदेह है।

देवकी और वसुदेव के पुत्र स्वयं थे श्री कृष्ण और बलराम।

उनको दुख क्यों भोगना पड़ा? जिनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने स्वयं उनके पुत्र बनने का वरदान दिया, उनको कंस के बंधन में रहकर कष्ट क्यों सहना पड़ा? श्री कृष्ण का जन्म तो मथुरा में हुआ था। फिर वह गोकुल में क्यों चले गए?

कंस का वध करने के बाद, वे द्वारका क्यों चले गए? एक शाप के कारण श्री कृष्ण का पूरा वंश नष्ट हो गया। अपने अवतार के उद्देश्य को खत्म करके श्री कृष्ण वापस वैकुंठ लौट गए।

जिन पापियों ने इस भूलोक में आतंक मचा रखी थी, उनको तो श्री कृष्ण और अर्जुन ने मार दिया था।

पर जिन चोरों ने श्री कृष्ण की पत्नियों का अपहरण कर लिया, उन्हें वे क्यों नहीं मार सके? भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, धृष्टद्युम्न, सोमदत्त, इन सबके भार को भी श्री कृष्ण ने इस भूमि से उतार दिया।

पर इन छोरों को क्यों नहीं मारा श्री कृष्ण ने? कृष्ण की पतिव्रता पत्नियों को भी निर्जन स्थान में ऐसा दुख क्यों मिला?

धर्मात्मा वसुदेव भी पुत्र शोक से संतप्त होकर अपने प्राण को क्यों त्याग दिए? उनको अकाल मृत्यु कैसे प्राप्त हुई?

सारे पांडव तो धर्मनिष्ठ थे। श्री कृष्ण के प्रति उनके मन में भक्ति सर्वदा रहती थी।

फिर भी वे दुख क्यों भोगे? द्रौपदी तो साक्षात लक्ष्मी देवी की अंश थी और प्रकट हुई थी यज्ञ की वेदी से।

उनको दुख क्यों सहना पड़ा? रजोधर्म से युक्त उस युवती को दुशासन बाल पकड़कर घसीटते हुए सभा में ले आया था। वन में गई हुई पतिव्रता द्रौपदी को सिंधुराज जयद्रथ ने सताया।

अज्ञातवास के समय द्रौपदी को कीचक ने भी बहुत सी पीड़ाएं पहुंचाई। ऐसे क्यों?

अश्वत्थामा ने घर के अंदर ही द्रौपदी के पांच पुत्रों को मार डाला।

सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु बाल्यावस्था में ही मारे गए। देवकी और वसुदेव के छह पुत्रों का वध कंस ने कर दिया था। जब इन सबको रोकने में श्री कृष्ण समर्थ थे, फिर भी उन्होंने प्रारब्ध को क्यों नहीं टाला? यादवों को शाप मिला। श्री कृष्ण की प्रभास क्षेत्र में मृत्यु हो गई।

उनकी पत्नियों का अपहरण हो गया। यह सब क्यों और कैसे हुआ? भगवान श्री कृष्ण तो स्वयं विष्णु ही थे। फिर भी उन्होंने दास की तरह उग्रसेन की सेवा क्यों की?

भगवान श्री कृष्ण को ऐसे अन्यथा गति क्यों हुई?

मुनि नारायण तो महान तपस्वी थे। फिर भी हर्ष शोकादि भाव उनमें क्यों रहे? दैत्यों की आयु खत्म होने पर भी श्री कृष्ण उनको आसानी से क्यों नहीं मार पाए? उस समय उनकी ईश्वरीय शक्तियां कहां चली गई थी? मेरे मन में और एक संदेह है। द्रौपदी के पांच पतियों का होना निंदनीय नहीं था। अपनी वंश रक्षा के लिए जिस प्रकार भीष्म पितामह

ने संतान उत्पादन किया, क्या वो उचित था? व्यास जी से इन प्रश्नों का उत्तर मांगते हैं जन्मेजय। व्यास जी कहे, मैं विस्तार से आपको श्री कृष्ण का चरित्र बताता हूं।

और श्री कृष्ण के अवतार के कारणभूत जो अद्भुत देवी का चरित्र है, उसको भी बताता हूं। पापियों से भारभूत पृथ्वी दीन और भयभीत होकर एक बार गौ का रूप धारण करके स्वर्ग लोक चली गई।

इंद्र पृथ्वी से पूछे, आपको किसका भय है? कौन आपको पीड़ा पहुंचा रहा है? पृथ्वी बोली, अगर आप पूछ रहे हैं तो मैं आपको अपना सारा दुख बताती हूं।

मैं पापियों के भार से दबी हुई हूं। जरासंध नाम से जो मागध का राजा है, वो महापापी है। उसके अलावा शिशुपाल, रुक्मि, कंस, नरकासुर, शाल्व, केशी, धेनुकासुर, वत्सकासुर के जैसे धर्महीन, स्वार्थी, पापाचारी, मदोन्मत्त, परस्पर विरोध रखने वाले भूमि में राज कर रहे हैं। उनके

भार को धारण करने में मैं असमर्थ हो गई हूं। इसके पहले भी दुष्ट हिरण्याक्ष ने मुझे पानी के अंदर डूबा दिया था। मैं बहुत दुख सह रही थी।

तब विष्णु भगवान ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का संहार किया और मुझे पानी से बाहर निकालकर लाए।

अब मैं वापस वैसे ही दुख को प्राप्त की हूँ। इस दुख के बोझ को मेरे सर में से उतारें।

इंद्र पृथ्वी से बोले, हे वसुंधरे, इस समय मेरी भी बहुत बुरी अवस्था है।

मैं आपकी सहायता नहीं कर सकता। आप ब्रह्मा जी से सहायता मांगिए। इंद्र की इस बात को सुनकर पृथ्वी ब्रह्मलोक गई।

इंद्र भी देवताओं के साथ मिलकर ब्रह्मलोक गए पृथ्वी के पीछे-पीछे। रोती हुई पृथ्वी को देखकर ब्रह्मा जी बोले उनसे, हे मानवों की कल्याणकरी, आपको कौन सा दुख है? आप क्यों रो रही हैं?

किस पापाचारी ने आपको दुख पहुंचाया? मुझे बताएं।


  • जन्मेजय के मन में देवकी और वसुदेव के कष्टों को लेकर क्या मुख्य संदेह था, और यह कर्म तथा प्रारब्ध के किस रहस्य को उद्घाटित करता है?
    जन्मेजय का संदेह यह था कि जब देवकी और वसुदेव ने अपनी तपस्या से स्वयं भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त करने का महान वरदान पाया था, तो उन्हें कंस के कारागार में इतना भीषण कष्ट क्यों सहना पड़ा। यह प्रश्न इस गूढ़ रहस्य को दर्शाता है कि ईश्वरीय वरदान प्राप्त होने पर भी देहधारी को अपने पूर्व संचित कर्मों और प्रारब्ध का भोग करना ही पड़ता है। भगवान स्वयं विधि के विधान और कर्मफल के सिद्धांत का सम्मान करते हैं तथा उसमें अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करते।
  • धर्मनिष्ठ पांडवों और साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा द्रौपदी के असीम दुखों का वर्णन किस दार्शनिक सिद्धांत की ओर संकेत करता है?
    पांडवों की धर्मनिष्ठा और द्रौपदी के यज्ञ वेदी से प्रकट होने के बाद भी दुशासन, जयद्रथ और कीचक द्वारा अपमानित होना तथा पुत्रों का वध, इस दार्शनिक सिद्धांत की ओर संकेत करता है कि भौतिक जगत में धर्म का मार्ग अत्यंत दुर्गम है। यह सिद्ध करता है कि दुख और सुख देह के धर्म हैं, और महान आत्माएं भी सांसारिक लीला में अपने प्रारब्ध का निर्वहन करती हैं ताकि सामान्य मानवों को धैर्य और धर्म पालन की शिक्षा मिल सके।
  • श्री कृष्ण द्वारा बड़े-बड़े पापियों का वध करने के पश्चात भी अपनी पत्नियों को साधारण चोरों से न बचा पाना किस रहस्य को दर्शाता है?
    यह घटना इस रहस्य को दर्शाती है कि अवतार का एक निश्चित उद्देश्य और काल होता है। जब श्री कृष्ण ने पृथ्वी का भार उतारने का अपना अवतार कार्य पूर्ण कर लिया, तब उनकी ईश्वरीय शक्तियां अंतर्निहित हो गईं। यह स्पष्ट करता है कि संसार में भौतिक रूप से कोई भी शक्ति या अवस्था शाश्वत नहीं है, और समय पूर्ण होने पर भगवान भी अपनी भौतिक लीलाओं को लौकिक नियमों और काल के अधीन कर देते हैं।
  • स्वयं भगवान विष्णु के रूप होने पर भी श्री कृष्ण का राजा उग्रसेन की दास की भांति सेवा करना उनके चरित्र की किस महानता को प्रदर्शित करता है?
    श्री कृष्ण द्वारा राजा उग्रसेन की सेवा करना उनके निरहंकार स्वरूप और समाज में धर्म-मर्यादा के पालन को प्रदर्शित करता है। यह सिखाता है कि समाज में व्यवस्था, अनुशासन और बड़ों के प्रति सम्मान बनाए रखने के लिए ईश्वर भी लौकिक नियमों और पदानुक्रम का स्वेच्छा से पालन करते हैं। उनका यह आचरण नेतृत्व की सच्ची भावना को स्थापित करता है।
  • मुनि नारायण जैसे महान तपस्वी के भीतर हर्ष और शोक जैसे भावों की उपस्थिति किस मानवीय सत्य को उजागर करती है?
    यह इस गूढ़ सत्य को उजागर करती है कि जब कोई भी चेतना भौतिक देह धारण करती है, तो उसे प्रकृति के त्रिगुणों (सत्त्व, रज, तम) के प्रभाव में आना ही पड़ता है। शरीर धारण करने पर हर्ष और शोक जैसे द्वंद्व स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं, भले ही आत्मा स्वरूप से कितनी भी मुक्त और ज्ञानी क्यों न हो। देह का धर्म मन के भावों को प्रभावित करता ही है।
  • पापियों के भार से दबी पृथ्वी ने गौ माता का रूप क्यों धारण किया, और यह रूपक क्या संदेश देता है?
    पृथ्वी ने गौ का रूप धारण किया क्योंकि गौ सरलता, पवित्रता, निस्वार्थ सेवा और पालन-पोषण का प्रतीक है। यह रूपक यह संदेश देता है कि जब समाज में अधर्म, स्वार्थ और पापाचार बढ़ता है, तो सबसे अधिक पीड़ा निर्दोष और पोषण करने वाली शक्तियों को होती है। पृथ्वी का यह क्रंदन प्रकृति की करुण पुकार और मानवीय लालसा से उत्पन्न असंतुलन का प्रतीक है।
  • इंद्र द्वारा पृथ्वी की सहायता करने में अपनी असमर्थता जताना देवताओं की किस सीमा को स्पष्ट करता है?
    इंद्र का यह कहना कि वे स्वयं बुरी अवस्था में हैं और पृथ्वी की सहायता नहीं कर सकते, यह स्पष्ट करता है कि देवताओं की शक्तियां भी सीमित हैं और वे एक निश्चित अधिकार क्षेत्र में ही कार्य करते हैं। वे केवल ब्रह्मांडीय व्यवस्था के संचालक हैं, निर्माता नहीं। जब संपूर्ण ब्रह्मांडीय संतुलन बिगड़ता है और पाप का भार अत्यधिक हो जाता है, तब उसका समाधान केवल परब्रह्म या त्रिदेवों के हस्तक्षेप से ही संभव होता है।
  • महर्षि व्यास श्री कृष्ण के चरित्र के साथ-साथ किस अद्भुत देवी के चरित्र को बताने की बात करते हैं, और इसका दार्शनिक महत्व क्या है?
    महर्षि व्यास उस अद्भुत देवी के चरित्र का वर्णन करने की बात करते हैं जो श्री कृष्ण के अवतार की कारणभूत हैं, अर्थात् उनकी योगमाया या आदिशक्ति। इसका महत्व यह है कि निर्गुण और निराकार परब्रह्म का सगुण रूप में अवतरण और उनकी समस्त भौतिक लीलाएं शक्ति के बिना संभव नहीं हैं। ईश्वर अपनी माया शक्ति के माध्यम से ही इस जगत में कार्य करते हैं और लीला रचते हैं।
  • श्री कृष्ण पूर्ण रूप से समर्थ होते हुए भी प्रारब्ध को क्यों नहीं टाल सके, यह प्रश्न ईश्वर और नियति के संबंध में क्या स्पष्ट करता है?
    यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर ने ही इस सृष्टि के शाश्वत नियम और कर्मफल के विधान बनाए हैं। यदि वे स्वयं अपने बनाए नियमों (प्रारब्ध) का उल्लंघन करेंगे, तो संपूर्ण सृष्टि की व्यवस्था भंग हो जाएगी। इसलिए, भगवान समर्थ होते हुए भी नियति के विधान में तब तक परिवर्तन नहीं करते जब तक कि वह सृष्टि के वृहद कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए नितांत अनिवार्य न हो।
  • द्रौपदी के पांच पति होने और भीष्म द्वारा वंश रक्षा के लिए अपनाए गए उपायों पर जन्मेजय का संदेह, धर्म के किस सूक्ष्म रूप को दर्शाता है?
    यह संदेह धर्म के उस सूक्ष्म और जटिल रूप को दर्शाता है जिसे आपद्धर्म कहा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में जो कार्य निंदनीय या अनुचित प्रतीत होते हैं, वे ही कार्य विशेष काल, भीषण परिस्थिति और उच्चतर उद्देश्यों (जैसे धर्म की रक्षा या वंश का नाश रोकना) की पूर्ति के लिए धर्मसम्मत हो सकते हैं। यह सिखाता है कि धर्म कोई जड़ नियम नहीं है, अपितु देश, काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होने वाली एक सूक्ष्म व्यवस्था है।
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देवी भागवत

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