देवी जगदम्बा देवासुर युद्ध को समाप्त कर देती है

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देवी जगदम्बा देवासुर युद्ध को समाप्त कर देती है

देवों और असुरों के बीच में युद्ध चल रहा था और देव हारने की हालत में आ गए थे।

तब इंद्र ने देवी माँ की स्तुति की। धन्यास्त एव तव भक्ति परा महान्तः संसार सिंधु रहिताः सुख सिंधु मग्नाः ये भक्ति भाव रहिता न कदापि दुःखां बोधिं जनिक्षय तरंग मुमे तरन्ति। आप पर जिनकी भक्ति नहीं है वे दुःख भूत संसार सागर का तरण कभी नहीं कर पाते।

पर आपकी भक्ति जिनमें है, वे बड़े धन्य हैं। वे दुख से रहित हो जाते हैं। सुख के सागर में डूबे हुए रहते हैं हमेशा।

सभी मनुष्य जो भूमि में सुख शांति से रह रहे हैं, उन सबने पूर्व जन्म में आपकी सेवा जरूर की है। ऐसे इंद्र की स्तुति सुनकर भगवती जगदंबा सिंह में आरूढ़ होकर प्रकट हो गई। दिव्य माल्य और रक्त वस्त्र को पहनकर कोटि सूर्य प्रभा देवी चामुंडा चमक रही थी। देवी देवों को देखकर मुस्कुराकर बोली,

आप लोग डरना छोड़ दीजिए। मैं आ गई हूं। मैं आपका कल्याण करूंगी। ऐसे बोलकर देवी अपने सिंह के साथ असुरों के पास जा रही थी। सारे असुर देवी मां को देखकर भयभीत हो गए।

असुर परस्पर बोल रहे थे। इसी देवी ने महिषासुर और चंडमुंड का विनाश किया था। पूर्व काल में इन्होंने ही मधु और कैटभ का भी विनाश किया था। यह देवी क्षण भर में हम लोग को विनाश कर सकती है। प्रह्लाद कहे कि युद्ध को छोड़कर सब लोग भागो। छिपकर अपनी जान बचाओ।

तब असुर गण में विद्यमान नमुची ने कहा।

यह देवी कुपित होकर हमारा विनाश करने आ रही है। हम लोग जितना भी भाग लें, उनसे बच नहीं पाएंगे। हम उनकी स्तुति करके उनको प्रसन्न करें तो वह हमें क्षमा कर सकती है। उन्होंने क्षमा कर दिया तो हम लोग बचकर पाताल में चले जाएंगे। प्रल्हाद देवी की स्तुति करने लगे। आप ही सृष्टि पालन और संहार करने वाली हैं।

आपके भक्तों पर कोई भी भय को आप आने नहीं देती। यह जगत ही आपके गले में विद्यमान माला के जैसे है। यह घूम कर आपके पास ही आ पहुंचता है। ह्रीमकार स्वरूपिणी है आप। मैं आपको नमस्कार करता हूं।

जगत के कर्ता तो जगत की सृष्टि में सिर्फ निमित्त मात्र हैं। आप ही इस जगत के मूल हैं। आपने ही जगत सृष्टा को जगत सृष्टि करने की शक्ति दी है। आप ही सारे प्राणियों के जननी कहलाई गई हैं। देवों और दैत्यों इन दोनों को भी आपने ही बनाया है। फिर हमारे ऊपर आपके दया में भेदभाव कैसे हो सकता है?

पुत्र अच्छे हो या बुरे, मां उन पर सर्वदा दया का प्रदर्शन करती है। हम पर आप दया करें।

वे देवता भी त्रिगुणों से उत्पन्न हुए हैं। हम दैत्य भी उन्हीं त्रिगुणों से उत्पन्न हुए हैं। काम क्रोधादि विकार उनमें भी है और हम में भी है।

हम सब आपके ही पुत्र हैं। हम यह भी जानते हैं कि आपके विनोद के लिए ही आपने देव दैत्यों के बीच में युद्ध की स्थिति उत्पन्न की है।

नहीं तो दोनों देव और असुर कश्यप के ही पुत्र हैं। हमारे अंदर युद्ध ही क्यों होता? मैं स्पष्ट जानता हूं कि आप ही संसार की एकमात्र शासिका हैं। फिर भी स्वर्ग में शासन को पाने के लिए आपके ही माया से प्रेरित होकर हमें युद्ध करना पड़ता है। अधिकतर लोगों को पता होता है कि लोभ गलत है। फिर भी वे लोभ के वश में हो जाते हैं। उस लोभ में जाने के लिए उनको प्रेरित करने वाली आप हैं। आपने भगवान विष्णु को जगत का पालक बतलाया है। पर सत्य कहे तो आप ही इस जगत का पालन करती हैं।

इससे स्पष्ट पता चलता है कि आप ही इस ब्रह्मांड में लोभ से रहित हैं।

आप ही धर्म के लक्षण हैं। आपने ही धर्म का इस जगत में प्रतिष्ठापन किया है। आप जो सोचती हैं, वही होता है।

आप अगर देवगण का विजय सोचे तो वे जीत जाते हैं और अगर आप सोच लें कि दैत्यगण जीते तो वे जीत जाते हैं। आप धर्म को संपूर्ण तरह से अपने वश में रखने वाली हैं। हम सभी दानव आपके शरण में आ रहे हैं। आप ही हमारी रक्षा कर सकती हैं। आप हमारी रक्षा करें। देवी माँ बोली, आप सब लोग पाताल में चले जाइए।

वहाँ पर शोक और भय से रहित होकर रहिए। आप लोग सावर्णी मन्वंतर के आदि से स्वर्ग में राज करेंगे। उस समय की प्रतीक्षा करिए। मनुष्य जो दूसरों की खुशी में खुशी को पाते हैं, वे ही हमेशा खुश रह पाते हैं। लोभी जन तो सत्य युग में भी थे। मैंने उनको हर प्रकार का सुख दिया, फिर भी वे संपूर्ण प्रकार से संतुष्ट नहीं हुए।

आप लोग पाताल में वैवस्वत मन्वंतर के अंत तक रहिए। कोई पाप मत कीजिए। उसके फल स्वरूप में आप लोगों को स्वर्ग मिलेगा। ऐसे बोलकर देवी मां अंतर्धान हो गई। उसके बाद देव स्वर्ग में चले गए और दानव पाताल में जाकर शांति से रहने लगे।


  • देवराज इंद्र की स्तुति में देवी की भक्ति का क्या महत्व दर्शाया गया है, और यह सांसारिक दुखों से मुक्ति का मार्ग कैसे प्रशस्त करता है?
    इंद्र की स्तुति के अनुसार, जो व्यक्ति देवी की भक्ति से रहित हैं, वे दुख रूपी संसार सागर को कभी पार नहीं कर पाते। इसके विपरीत, देवी के भक्त अत्यंत धन्य हैं, क्योंकि वे दुखों से मुक्त होकर निरंतर सुख के सागर में निमग्न रहते हैं। यह इंगित करता है कि सच्ची भक्ति ही सांसारिक बंधनों और कष्टों से मुक्ति का एकमात्र साधन है।
  • असुरों के समक्ष देवी के प्रकट होने पर उनके भयभीत होने का मूल कारण क्या था?
    असुरों के भयभीत होने का मूल कारण देवी का पूर्व का इतिहास था। उन्होंने स्मरण किया कि इसी भगवती ने पूर्व काल में महिषासुर, चंड-मुंड और मधु-कैटभ जैसे महाबली असुरों का संहार किया था। उन्हें यह भान हो गया था कि यह देवी क्षण मात्र में उनका भी पूर्ण विनाश करने में सक्षम हैं।
  • युद्ध भूमि से पलायन करने के प्रह्लाद के विचार को नमुचि ने किस तर्क से परिवर्तित किया, और इसमें क्या रहस्य छिपा है?
    नमुचि ने तर्क दिया कि देवी के कोप से भागकर बचना असंभव है, चाहे वे कहीं भी चले जाएं। उसने सुझाया कि पलायन के स्थान पर देवी की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न करना अधिक उचित है, जिससे वे क्षमा दान पाकर पाताल जा सकें। इसमें यह रहस्य छिपा है कि ईश्वरीय शक्ति से भागना व्यर्थ है, पूर्ण समर्पण और शरणागति ही रक्षा का एकमात्र मार्ग है।
  • प्रह्लाद की स्तुति में देवों और असुरों की उत्पत्ति के विषय में क्या अत्यंत गूढ़ सत्य उद्घाटित किया गया है?
    प्रह्लाद ने यह गूढ़ सत्य उद्घाटित किया कि देव और असुर दोनों ही त्रिगुणों से उत्पन्न हुए हैं और दोनों ही ऋषि कश्यप की संतान हैं। दोनों में ही काम, क्रोध आदि विकार समान रूप से विद्यमान हैं। चूँकि भगवती ही समस्त प्राणियों की जननी हैं, अतः दोनों ही उनके पुत्र हैं। यह भेद केवल ईश्वरीय माया और उनके विनोद का परिणाम है।
  • प्रह्लाद के अनुसार माता भगवती के स्वभाव में देवों और दानवों के प्रति भेदभाव क्यों संभव नहीं है?
    प्रह्लाद के अनुसार, माता के लिए उनके सभी पुत्र समान होते हैं। पुत्र चाहे गुणवान हो अथवा दुर्गुणों से युक्त, एक माता सदैव उन पर समान रूप से दया का प्रदर्शन करती है। इसलिए, संपूर्ण जगत की जननी होने के नाते, भगवती के लिए देवों और दानवों में कोई भी भेदभाव करना उनके मातृत्व के मूल स्वभाव के पूर्णतः विरुद्ध है।
  • प्रह्लाद ने जगत के कर्ता और देवी के मध्य क्या संबंध स्थापित किया है?
    प्रह्लाद ने स्पष्ट किया कि जगत के कर्ता कहलाने वाले देव केवल सृष्टि निर्माण में निमित्त मात्र हैं, जबकि वास्तविक मूल शक्ति देवी ही हैं। देवी ने ही जगत के स्रष्टा को सृष्टि निर्माण की शक्ति प्रदान की है। अतः वे ही ह्रींकार स्वरूपिणी और चराचर जगत की वास्तविक संचालिका हैं।
  • लोभ और मोह के संदर्भ में प्रह्लाद ने देवी की माया के किस रहस्यमयी पहलू को उजागर किया है?
    प्रह्लाद ने इस रहस्य को उजागर किया कि यद्यपि प्राणी भली-भांति जानते हैं कि लोभ अनुचित है, फिर भी वे इसके वशीभूत हो जाते हैं। उन्हें इस लोभ के जाल में प्रेरित करने वाली शक्ति स्वयं भगवती की माया ही है। स्वर्ग के शासन हेतु देवों और असुरों के मध्य युद्ध भी इसी माया द्वारा प्रेरित है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने अधीन रखती है।
  • देवी को धर्म का लक्षण और लोभ से रहित क्यों कहा गया है?
    देवी इस चराचर जगत का पालन करती हैं, परंतु वे स्वयं किसी भी प्रकार के लोभ या आसक्ति से पूर्णतः मुक्त हैं। वे ही धर्म की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं और उन्होंने ही जगत में धर्म की स्थापना की है। विजय अथवा पराजय केवल उनके संकल्प मात्र पर निर्भर करती है, जो यह सिद्ध करता है कि वे धर्म की सर्वोच्च नियंत्रक हैं।
  • देवी ने दानवों को क्या वरदान दिया और स्वर्ग प्राप्ति के लिए कौन सी शर्त रखी?
    देवी ने दानवों को क्षमा करते हुए वरदान दिया कि वे वर्तमान में शोकरहित होकर पाताल में निवास करें। उन्होंने शर्त रखी कि वैवस्वत मन्वंतर के अंत तक वे कोई भी पाप कर्म न करें। इसके फलस्वरूप, सावर्णि मन्वंतर के आरंभ में उन्हें स्वर्ग का राज्य प्राप्त होगा। यह दर्शाता है कि ईश्वर की क्षमा भी धर्मपूर्ण आचरण की अपेक्षा रखती है।
  • देवी के उपदेश के अनुसार वास्तविक प्रसन्नता का रहस्य क्या है, और लोभी प्रवृत्ति के विषय में उन्होंने क्या स्पष्ट किया?
    देवी ने उपदेश दिया कि जो प्राणी दूसरों के सुख में अपना सुख अनुभव करते हैं, वे ही जीवन में सदैव प्रसन्न रह पाते हैं। लोभी प्रवृत्ति के विषय में उन्होंने बताया कि सत्य युग में भी ऐसे लोभी जन थे जिन्हें उन्होंने संपूर्ण सुख प्रदान किए, फिर भी वे पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हुए। यह सिद्ध करता है कि लोभ का कोई अंत नहीं है और संतोष ही वास्तविक आनंद है।
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देवी भागवत

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