लक्ष्मी हृदय स्तोत्र
अस्य श्री आद्यादि श्रीमहालक्ष्मी-हृदय-स्तोत्र-महामन्त्रस्य भार्गव ऋषिः(शिरसि), अनुष्टुभादि नानाछन्दांसि (मुखे), आद्यादि-श्रीमहालक्ष्मी सहित नारायणो देवता (हृदये)॥
अर्थ: इस आद्यादि श्री महालक्ष्मी हृदय स्तोत्र महामंत्र के भार्गव ऋषि हैं (सिर पर न्यास करें); इसमें अनुष्टुप् आदि अनेक छंद हैं (मुख पर न्यास करें); आद्यादि श्री महालक्ष्मी सहित नारायण इसके देवता हैं (हृदय पर न्यास करें)।
। ॐ बीजं, ह्रीं शक्तिः, ऐं कीलकम् ।
आद्यादि-श्रीमहालक्ष्मी-प्रसादसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ॥
अर्थ: 'ॐ' इसका बीज मंत्र है, 'ह्रीं' इसकी शक्ति है, 'ऐं' इसका कीलक है। आद्यादि श्री महालक्ष्मी के प्रसाद की सिद्धि के लिए इस जप का विनियोग (उपयोग) किया जाता है।
ओम् ॥ आद्यादि-श्रीमहालक्ष्मी देवतयै नमः'' हृदये, श्रीं बीजायै नमः'' गुह्ये, ह्रीं शक्त्यै नमः'' पादयोः, ऐं बलायै नमः'' मूर्धादि-पाद-पर्यन्तं विन्यसेत् ॥
अर्थ: ॐ! 'आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवतायै नमः' कहकर हृदय पर न्यास करें; 'श्रीं बीजायै नमः' कहकर गुह्य स्थान पर न्यास करें; 'ह्रीं शक्त्यै नमः' कहकर पैरों पर न्यास करें; 'ऐं बलायै नमः' कहकर सिर से पैर तक (संपूर्ण शरीर पर) न्यास करें।
ओम् श्रीं ह्रीं ऐं करतल-करपार्श्वयोः, श्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः, ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः, ऐं मध्यमाभ्यां नमः, श्रीं अनामिकाभ्यां नमः, ह्रीं कनिष्टिकाभ्यां नमः, ऐं करतल करपृष्ठाभ्यां नमः ॥
(करन्यासः - हाथों पर न्यास)
अर्थ: ॐ श्रीं ह्रीं ऐं कहकर हथेलियों और हाथों के किनारों पर (न्यास करें)।
'श्रीं' कहकर दोनों अँगूठों को नमस्कार।
'ह्रीं' कहकर दोनों तर्जनी (अंगूठे के पास वाली उंगली) को नमस्कार।
'ऐं' कहकर दोनों मध्यमा (बीच वाली उंगली) को नमस्कार।
'श्रीं' कहकर दोनों अनामिका (छोटी उंगली के पास वाली उंगली) को नमस्कार।
'ह्रीं' कहकर दोनों कनिष्ठिका (सबसे छोटी उंगली) को नमस्कार।
'ऐं' कहकर दोनों हथेली और हथेली के पृष्ठ भाग को नमस्कार।
ॐ हृदयाय नमः, ह्रीं शिरसे स्वाहा, ऐं शिखायै वषट्, श्रीं कवचाय हुम्, ह्रीं नेत्राभ्यां वौषट्, भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
(षडंगन्यासः - छह अंगों पर न्यास)
अर्थ: 'ॐ' कहकर हृदय को नमस्कार।
'ह्रीं' कहकर सिर को 'स्वाहा'।
'ऐं' कहकर शिखा को 'वषट्'।
'श्रीं' कहकर कवच (दोनों भुजाओं को क्रॉस करते हुए शरीर पर) को 'हुम्'।
'ह्रीं' कहकर दोनों आँखों को 'वौषट्'।
'भूर्भुवस्सुवरोमिति' कहकर दसों दिशाओं को बांधें (दिग्बन्ध)।
॥ अथ ध्यानम् ॥ (अब ध्यान)
हस्तद्वयेन कमले धारयन्तीं स्वलीलया ॥
हार-नूपुर-संयुक्तां महालक्ष्मीं विचिन्तयेत् ॥
अर्थ: अपने दोनों हाथों में सहज भाव से कमल धारण करने वाली, हार और नूपुर (पायल) से सुशोभित महालक्ष्मी का चिंतन (ध्यान) करना चाहिए।
कौशेय-पीतवसनामरविन्दनेत्राम्
पद्मद्वयाभय-वरोद्यत-पद्महस्ताम् ।
उद्यच्छतार्क-सदृशां परमाङ्क-संस्थां
ध्यायेत् विधीशनत-पादयुगां जनित्रीम् ॥
अर्थ: रेशमी पीले वस्त्र धारण की हुई, कमल के समान नेत्रों वाली, दोनों हाथों में कमल, अभय मुद्रा और वरदान मुद्रा धारण की हुई, उदय होते हुए सैकड़ों सूर्यों के समान कांति वाली, श्रेष्ठ आसन पर विराजमान, ब्रह्मा और शिव द्वारा वंदित चरणों वाली, सभी की जननी (माता) लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिए।
॥श्रीलक्ष्मी-कमलधारिण्यै सिंहवाहिन्यै स्वाहा ॥
अर्थ: श्रीलक्ष्मी को, कमल धारण करने वाली को, सिंह पर आरूढ़ रहने वाली को 'स्वाहा' (यह एक मंत्र है)।
पीतवस्त्रां सुवर्णाङ्गीं पद्महस्त-द्वयान्विताम् ।
लक्ष्मीं ध्यात्वेति मन्त्रेण स भवेत् पृथिवीपतिः ॥
अर्थ: पीले वस्त्र धारण की हुई, स्वर्णिम अंगों वाली, दोनों हाथों में कमल धारण की हुई लक्ष्मी का इस मंत्र (ऊपर दिए गए ध्यान मंत्रों या बीजाक्षर मंत्रों) के द्वारा ध्यान करके वह व्यक्ति पृथ्वी का स्वामी (सम्राट) बन जाता है।
मातुलङ्ग-गदाखेटे पाणौ पात्रञ्च बिभ्रती ।
वागलिङ्गञ्च मानञ्च बिभ्रती नृपमूर्धनि ॥
अर्थ: जो अपने हाथों में मातुलङ्ग (एक प्रकार का फल), गदा, खेट (ढाल) और पात्र धारण किए हुए हैं, तथा वाणी और लिंग (ज्ञान का प्रतीक) को धारण करती हुई राजाओं के मस्तक पर विराजमान हैं।
। ॐ श्रीं ह्रीं ऐम् ।
अर्थ: यह महालक्ष्मी का मूल बीज मंत्र है, जिसका जप किया जाता है।
वन्दे लक्ष्मीं परशिवमयीं शुद्धजाम्बूनदाभां
तेजोरूपां कनक-वसनां सर्वभूषोज्ज्वलाङ्गीम् ।
बीजापूरं कनक-कलशं हेमपद्मं दधानाम्
आद्यां शक्तिं सकलजननीं विष्णु-वामाङ्कसंस्थाम् ॥ १॥
अर्थ: मैं उन लक्ष्मी देवी की वंदना करता हूँ, जो पर-शिव स्वरूपा हैं, शुद्ध सोने के समान आभा वाली हैं, तेजोरूपिणी हैं, सोने के वस्त्र धारण की हुई हैं, सभी आभूषणों से उज्ज्वल अंगों वाली हैं। जो अपने हाथों में बीजापूर (नींबू जैसा फल), सोने का कलश और स्वर्ण कमल धारण किए हुए हैं, जो आद्या शक्ति हैं, सम्पूर्ण जगत् की जननी हैं और भगवान विष्णु के वामांग (बाईं ओर) में विराजमान हैं।
श्रीमत्सौभाग्यजननीं स्तौमि लक्ष्मीं सनातनीम् ।
सर्वकाम-फलावाप्ति-साधनैक-सुखावहाम् ॥ २॥
अर्थ: मैं श्री (संपत्ति और शोभा) और सौभाग्य को जन्म देने वाली, सनातनी (अनादि) लक्ष्मी की स्तुति करता हूँ। जो सभी कामनाओं के फल को प्राप्त करने का एकमात्र साधन हैं और सुख प्रदान करने वाली हैं।
स्मरामि नित्यं देवेशि त्वया प्रेरितमानसः ।
त्वदाज्ञां शिरसा धृत्वा भजामि परमेश्वरीम् ॥ ३॥
अर्थ: हे देवेश्वरी! मैं नित्य आपका स्मरण करता हूँ, मेरा मन आपके द्वारा प्रेरित है। आपकी आज्ञा को सिर पर धारण करके मैं परमेश्वरी (आप) का भजन करता हूँ।
समस्त-सम्पत्सुखदां महाश्रियं
समस्त-कल्याणकरीं महाश्रियम् ।
समस्त-सौभाग्यकरीं महाश्रियं
भजाम्यहं ज्ञानकरीं महाश्रियम् ॥ ४॥
अर्थ: मैं उन महालक्ष्मी का भजन करता हूँ जो समस्त सम्पत्तियों और सुखों को देने वाली हैं, जो समस्त कल्याणों को करने वाली हैं, जो समस्त सौभाग्य को प्रदान करने वाली हैं, और जो ज्ञान प्रदान करने वाली हैं।
विज्ञानसम्पत्सुखदां महाश्रियं
विचित्र-वाग्भूतिकरीं मनोहराम् ।
अनन्त-सौभाग्य-सुखप्रदायिनीं
नमाम्यहं भूतिकरीं हरिप्रियाम् ॥ ५॥
अर्थ: मैं उन हरिप्रिया (भगवान विष्णु की प्रिया) महालक्ष्मी को नमन करता हूँ, जो विज्ञान और सम्पत्ति का सुख प्रदान करने वाली हैं, जो विचित्र वाणी की समृद्धि को करने वाली और मन को हरने वाली हैं। जो अनन्त सौभाग्य और सुख को प्रदान करने वाली हैं और ऐश्वर्य देने वाली हैं।
समस्त-भूतान्तरसंस्थिता त्वं
समस्त-भक्तेश्वरि विश्वरूपे ।
तन्नास्ति यत्त्वद्व्यतिरिक्तवस्तु
त्वत्पादपद्मं प्रणमाम्यहं श्रीः ॥ ६॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! आप समस्त प्राणियों के भीतर स्थित हैं, हे भक्तों की ईश्वरी, हे विश्वरूपिणी! ऐसा कोई वस्तु नहीं है जो आपसे भिन्न हो। मैं आपके चरण-कमलों को प्रणाम करता हूँ।
दारिद्र्य-दुःखौघ-तमोऽपहन्त्रि त्वत्-पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ।
दीनार्ति-विच्छेदन-हेतुभूतैः कृपाकटाक्षैरभिषिञ्च मां श्रीः ॥ ७॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! आप दारिद्र्य और दुःख समूह रूपी अंधकार को नष्ट करने वाली हैं, आपके चरण-कमल मुझमें स्थापित हों। दीन-दुखियों के कष्टों को दूर करने वाले अपने कृपापूर्ण कटाक्षों से मुझ पर अभिषेक करें।
विष्णु-स्तुतिपरां लक्ष्मीं स्वर्णवर्णां स्तुति-प्रियाम् ।
वरदाभयदां देवीं वन्दे त्वां कमलेक्षणे ॥ ८॥
अर्थ: हे कमलेक्षणे (कमल के समान नेत्रों वाली)! मैं आपको प्रणाम करता हूँ, जो विष्णु की स्तुति में लीन रहने वाली, स्वर्ण के समान वर्ण वाली, स्तुति प्रिय, वरदान देने वाली और अभय प्रदान करने वाली देवी लक्ष्मी हैं।
अम्ब प्रसीद करुणा-परिपूर्ण-दृष्ट्या
मां त्वत्कृपाद्रविणगेहमिमं कुरुष्व ।
आलोकय प्रणत-हृद्गत-शोकहन्त्रि
त्वत्पाद-पद्मयुगलं प्रणमाम्यहं श्रीः ॥ ९॥
अर्थ: हे माता! करुणा से परिपूर्ण दृष्टि से मुझ पर प्रसन्न हों, मुझे अपनी कृपा और धन का घर बनाइए। हे भक्तों के हृदय में स्थित शोक को हरने वाली! मुझ पर दृष्टि डालें। हे श्री (लक्ष्मी)! मैं आपके चरण-कमलों के युगल को प्रणाम करता हूँ।
शान्त्यै नमोऽस्तु शरणागत-रक्षणायै
कान्त्यै नमोऽस्तु कमनीय-गुणाश्रयायै ।
क्षान्त्यै नमोऽस्तु दुरितक्षय-कारणायै
धात्र्यै नमोऽस्तु धन-धान्य-समृद्धिदायै ॥ १०॥
अर्थ: शरणागतों की रक्षा करने वाली शांति को नमस्कार है। सुंदर गुणों की आश्रय रूपा कांति को नमस्कार है। पापों का क्षय करने वाली क्षमा को नमस्कार है। धन और धान्य की समृद्धि देने वाली धात्री (धारण करने वाली/पोषक) को नमस्कार है।
शक्त्यै नमोऽस्तु शशिशेखर-संस्थितायै
रत्यै नमोऽस्तु रजनीकर-सोदरायै ।
भक्त्यै नमोऽस्तु भवसागर-तारकायै
मत्यै नमोऽस्तु मधुसूदन-वल्लभायै ॥ ११॥
अर्थ: हे शक्तिरूपा देवी, जो चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करने वाले (शिव) में स्थित हैं, आपको नमस्कार है। हे रति (प्रेम) स्वरूपा, जो चंद्रमा की बहन हैं (समुद्र मंथन से उत्पन्न), आपको नमस्कार है। हे भक्ति स्वरूपा, जो भवसागर से तारने वाली हैं, आपको नमस्कार है। हे मति (बुद्धि) स्वरूपा, जो मधुसूदन (भगवान विष्णु) की प्रिया हैं, आपको नमस्कार है।
लक्ष्म्यै नमोऽस्तु शुभ-लक्षण-लक्षितायै
सिद्ध्यै नमोऽस्तु सुर-सिद्ध-सुपूजितायै ।
धृत्यै नमोऽस्तु मम दुर्गति-भञ्जनायै
गत्यै नमोऽस्तु वरसद्गति-दायकायै ॥ १२॥
अर्थ: हे लक्ष्मी स्वरूपा, जो शुभ लक्षणों से युक्त हैं, आपको नमस्कार है। हे सिद्धि स्वरूपा, जो देवता और सिद्धों द्वारा भली-भांति पूजित हैं, आपको नमस्कार है। हे धृति (धैर्य/धारणा शक्ति) स्वरूपा, जो मेरी दुर्गति को नष्ट करने वाली हैं, आपको नमस्कार है। हे गति (मार्ग) स्वरूपा, जो उत्तम सद्गति प्रदान करने वाली हैं, आपको नमस्कार है।
देव्यै नमोऽस्तु दिवि देवगणार्चितायै
भूत्यै नमोऽस्तु भुवनार्ति-विनाशनायै ।
शान्त्यै नमोऽस्तु धरणीधर-वल्लभायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तम-वल्लभायै ॥ १३॥
अर्थ: हे देवी स्वरूपा, जो स्वर्ग में देवगणों द्वारा पूजित हैं, आपको नमस्कार है। हे भूति (ऐश्वर्य/समृद्धि) स्वरूपा, जो संसार के दुखों को नष्ट करने वाली हैं, आपको नमस्कार है। हे शांति स्वरूपा, जो धरणीधर (पृथ्वी को धारण करने वाले विष्णु) की प्रिया हैं, आपको नमस्कार है। हे पुष्टि (पोषण/शक्ति) स्वरूपा, जो पुरुषोत्तम (भगवान विष्णु) की प्रिया हैं, आपको नमस्कार है।
सुतीव्र-दारिद्र्य-तमोऽपहन्त्र्यै नमोऽस्तु ते सर्व-भयापहन्त्र्यै ।
श्रीविष्णु-वक्षःस्थल-संस्थितायै नमो नमः सर्व-विभूति-दायै ॥ १४॥
अर्थ: हे अत्यंत तीव्र दारिद्र्य रूपी अंधकार को दूर करने वाली, आपको नमस्कार है। हे सभी भयों को हरने वाली, आपको नमस्कार है। श्री विष्णु के वक्षस्थल पर विराजमान रहने वाली, सभी विभूतियों (ऐश्वर्यों) को प्रदान करने वाली (आपको) बार-बार नमस्कार है।
जयतु जयतु लक्ष्मीः लक्षणालङ्कृताङ्गी
जयतु जयतु पद्मा पद्मसद्माभिवन्द्या ।
जयतु जयतु विद्या विष्णु-वामाङ्क-संस्था
जयतु जयतु सम्यक् सर्व-सम्पत्करी श्रीः ॥ १५॥
अर्थ: शुभ लक्षणों से सुशोभित अंगों वाली लक्ष्मी की जय हो, जय हो! कमल के घर में निवास करने वाली और सभी द्वारा वंदित पद्मा की जय हो, जय हो! विष्णु के वामांग में स्थित विद्या की जय हो, जय हो! भली-भांति सभी सम्पत्तियाँ प्रदान करने वाली श्री की जय हो, जय हो!
जयतु जयतु देवी देवसङ्घाभिपूज्या
जयतु जयतु भद्रा भार्गवी भाग्यरूपा ।
जयतु जयतु नित्या निर्मलज्ञानवेद्या
जयतु जयतु सत्या सर्वभूतान्तरस्था ॥ १६॥
अर्थ: देवसमूहों द्वारा पूजित देवी की जय हो, जय हो! कल्याणकारिणी, भृगु की पुत्री (भार्गवी) और भाग्य स्वरूपा भद्रा की जय हो, जय हो! नित्य रहने वाली और निर्मल ज्ञान से जानने योग्य (नित्या) की जय हो, जय हो! सभी प्राणियों के भीतर स्थित सत्य स्वरूपा की जय हो, जय हो!
जयतु जयतु रम्या रत्नगर्भान्तरस्था
जयतु जयतु शुद्धा शुद्धजाम्बूनदाभा ।
जयतु जयतु कान्ता कान्तिमद्भासिताङ्गी
जयतु जयतु शान्ता शीघ्रमागच्छ सौम्ये ॥ १७॥
अर्थ: मनोहर, रत्नों के गर्भ में स्थित (रम्या) की जय हो, जय हो! शुद्ध, शुद्ध सोने के समान आभा वाली (शुद्धा) की जय हो, जय हो! कांतिमान अंगों वाली कांता की जय हो, जय हो! हे सौम्य (देवी)! शांत स्वरूपा (आप) शीघ्र आइए, आपकी जय हो, जय हो!
यस्याः कलायाः कमलोद्भवाद्या रुद्राश्च शक्रप्रमुखाश्च देवाः ।
जीवन्ति सर्वेऽपि सशक्तयस्ते प्रभुत्वमाप्ताः परमायुषस्ते ॥ १८॥
अर्थ: जिनकी कला के अंश से कमल से उत्पन्न ब्रह्मा आदि, रुद्र और इंद्र प्रमुख सभी देवता अपनी शक्तियों सहित जीवित रहते हैं, और जिन्होंने परम आयु और प्रभुत्व प्राप्त किया है।
॥ मुखबीजम् ॥ ॐ-ह्रां-ह्रीं-अं-आं-यं-दुं-लं-वम् ॥
अर्थ: (यह) मुख का बीज मंत्र है: ॐ-ह्रां-ह्रीं-अं-आं-यं-दुं-लं-वम्। (यह मंत्र जप में प्रयुक्त होता है।)
लिलेख निटिले विधिर्मम लिपिं विसृज्यान्तरं
त्वया विलिखितव्यमेतदिति तत्फलप्राप्तये ।
तदन्तिकफलस्फुटं कमलवासिनि श्रीरिमां
समर्पय स्वमुद्रिकां सकलभाग्यसंसूचिकाम् ॥ १९॥
अर्थ: ब्रह्मा ने मेरे माथे पर भाग्य की जो लिपि लिखी है, उसे छोड़कर, हे कमलवासिनी श्री! आप मेरे लिए यह (शुभ लिपि) लिखें, ताकि मुझे उसके फल की प्राप्ति हो। उस निकटस्थ फल को स्पष्ट करने वाली, अपनी संपूर्ण भाग्य को सूचित करने वाली अपनी मुद्रिका (अंगूठी) को मुझे अर्पित करें।
॥ पादबीजम् ॥ ॐ-अं-आं-ईं-एं-ऐं-कं-लं-रं ॥
अर्थ: (यह) पैर का बीज मंत्र है: ॐ-अं-आं-ईं-एं-ऐं-कं-लं-रं। (यह मंत्र जप में प्रयुक्त होता है।)
कलया ते यथा देवि जीवन्ति सचराचराः ।
तथा सम्पत्करी लक्ष्मि सर्वदा सम्प्रसीद मे ॥ २०॥
अर्थ: हे देवी! जिस प्रकार आपकी कला (शक्ति के अंश) से चर और अचर सभी जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हे सम्पत्ति प्रदान करने वाली लक्ष्मी! मुझ पर सदा प्रसन्न रहें।
यथा विष्णुर्ध्रुवं नित्यं स्वकलां संन्यवेशयत् ।
तथैव स्वकलां लक्ष्मि मयि सम्यक् समर्पय ॥ २१॥
अर्थ: जिस प्रकार भगवान विष्णु ने निश्चित रूप से अपनी कला को नित्य स्थापित किया है, उसी प्रकार हे लक्ष्मी! आप भी अपनी कला को मुझमें भली-भांति स्थापित करें।
सर्वसौख्यप्रदे देवि भक्तानामभयप्रदे ।
अचलां कुरु यत्नेन कलां मयि निवेशिताम् ॥ २२॥
अर्थ: हे सभी सुखों को प्रदान करने वाली देवी! हे भक्तों को अभय प्रदान करने वाली! मुझमें स्थापित अपनी कला को प्रयत्नपूर्वक अचल (स्थिर) करें।
मुदास्तां मत्फाले परमपदलक्ष्मीः स्फुटकला
सदा वैकुण्ठश्रीर्निवसतु कला मे नयनयोः ।
वसेत्सत्ये लोके मम वचसि लक्ष्मीर्वरकला
श्रियश्वेतद्वीपे निवसतु कला मे स्व-करयोः ॥ २३॥
अर्थ: मेरे ललाट पर परमपद लक्ष्मी की स्पष्ट कला हर्षपूर्वक रहे। वैकुण्ठ की श्री की कला सदा मेरी आँखों में निवास करे। सत्यलोक की लक्ष्मी की श्रेष्ठ कला मेरे वचनों में निवास करे। श्वेतद्वीप की श्री की कला मेरे हाथों में निवास करे।
॥ नेत्रबीजम् ॥ ॐ-घ्रां-घ्रीं-घ्रें-घ्रैं-घ्रों-घ्रौं-घ्रं-घ्रः ॥
अर्थ: (यह) नेत्र का बीज मंत्र है: ॐ-घ्रां-घ्रीं-घ्रें-घ्रैं-घ्रों-घ्रौं-घ्रं-घ्रः। (यह मंत्र जप में प्रयुक्त होता है।)
तावन्नित्यं ममाङ्गेषु क्षीराब्धौ श्रीकला वसेत् ।
सूर्याचन्द्रमसौ यावद्यावल्लक्ष्मीपतिः श्रियौ ॥ २४॥
अर्थ: मेरे अंगों में क्षीरसागर (क्षीराब्धि) की श्री कला तब तक नित्य निवास करे, जब तक सूर्य और चंद्रमा रहें, और जब तक लक्ष्मीपति (विष्णु) और लक्ष्मी (श्री) रहें।
सर्वमङ्गलसम्पूर्णा सर्वैश्वर्यसमन्विता ।
आद्याऽऽदिश्रीर्महालक्ष्मीस्त्वत्कला मयि तिष्ठतु ॥ २५॥
अर्थ: सभी मंगलों से परिपूर्ण और सभी ऐश्वर्यों से युक्त आद्यादि श्री महालक्ष्मी की कला मुझमें निवास करे।
अज्ञानतिमिरं हन्तुं शुद्धज्ञानप्रकाशिका ।
सर्वैश्वर्यप्रदा मेऽस्तु त्वत्कला मयि संस्थिता ॥ २६॥
अर्थ: अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाली, शुद्ध ज्ञान को प्रकाशित करने वाली, और सभी ऐश्वर्यों को प्रदान करने वाली आपकी कला, जो मुझमें स्थित है, मुझे प्राप्त हो।
अलक्ष्मीं हरतु क्षिप्रं तमः सूर्यप्रभा यथा ।
वितनोतु मम श्रेयस्त्वत्कला मयि संस्थिता ॥ २७॥
अर्थ: जिस प्रकार सूर्य की प्रभा अंधकार को तुरंत हर लेती है, उसी प्रकार आपकी कला, जो मुझमें स्थित है, मेरी अलक्ष्मी (दरिद्रता) को शीघ्र हर ले और मेरा कल्याण विस्तार करे।
ऐश्वर्यमङ्गलोत्पत्तिः त्वत्कलायां निधीयते ।
मयि तस्मात्कृतार्थोऽस्मि पात्रमस्मि स्थितेस्तव ॥ २८॥
अर्थ: ऐश्वर्य और मंगल की उत्पत्ति आपकी कला में निहित है। इसलिए मैं कृतार्थ हूँ, और आपकी स्थिति (कृपा) का पात्र हूँ।
भवदावेशभाग्यार्हो भाग्यवानस्मि भार्गवि ।
त्वत्प्रसादात्पवित्रोऽहं लोकमातर्नमोऽस्तु ते ॥ २९॥
अर्थ: हे भार्गवि (भृगु की पुत्री)! मैं आपके आवेश (आशीर्वाद/प्रवेश) के योग्य होने के कारण भाग्यवान हूँ। आपके प्रसाद से मैं पवित्र हूँ, हे लोकमाता! आपको नमस्कार है।
पुनासि मां त्वत्कलयैव यस्मात्
अतस्समागच्छ ममाग्रतस्त्वम् ।
परं पदं श्रीर्भव सुप्रसन्ना
मय्यच्युतेन प्रविशादिलक्ष्मीः ॥ ३०॥
अर्थ: चूँकि आप मुझे अपनी कला से ही पवित्र करती हैं, इसलिए आप मेरे सामने आइए। हे श्री (लक्ष्मी)! परम पद को प्राप्त करने वाली, सुप्रसन्न होकर अच्युत (विष्णु) के साथ मुझमें प्रवेश करें, हे आदिलक्ष्मी!
श्रीवैकुण्ठस्थिते लक्ष्मि समागच्छ ममाग्रतः ।
नारायणेन सह मां कृपादृष्ट्याऽवलोकय ॥ ३१॥
अर्थ: हे श्रीवैकुण्ठ में स्थित लक्ष्मी! मेरे सामने आइए। नारायण के साथ मुझे अपनी कृपादृष्टि से देखें।
सत्यलोकस्थिते लक्ष्मि त्वं ममागच्छ सन्निधिम् ।
वासुदेवेन सहिता प्रसीद वरदा भव ॥ ३२॥
अर्थ: हे सत्यलोक में स्थित लक्ष्मी! आप मेरे समीप आइए। वासुदेव के साथ मुझ पर प्रसन्न हों और वरदान देने वाली हों।
श्वेतद्वीपस्थिते लक्ष्मि शीघ्रमागच्छ सुव्रते ।
विष्णुना सहिता देवि जगन्मातः प्रसीद मे ॥ ३३॥
अर्थ: हे श्वेतद्वीप में स्थित लक्ष्मी! हे सुव्रते! शीघ्र आइए। विष्णु सहित, हे देवी, हे जगन्माता! मुझ पर प्रसन्न हों।
क्षीराम्बुधिस्थिते लक्ष्मि समागच्छ समाधवे ।
त्वत्कृपादृष्टिसुधया सततं मां विलोकय ॥ ३४॥
अर्थ: हे क्षीरसागर (क्षीराम्बुधि) में स्थित लक्ष्मी! माधव (विष्णु) के साथ आइए। अपनी कृपादृष्टि रूपी अमृत से निरंतर मुझे देखें।
रत्नगर्भस्थिते लक्ष्मि परिपूर्णहिरण्मयि ।
समागच्छ समागच्छ स्थित्वाऽऽशु पुरतो मम ॥ ३५॥
अर्थ: हे रत्नगर्भ (पृथ्वी) में स्थित लक्ष्मी! हे पूर्ण रूप से स्वर्णिम कांति वाली! आइए, आइए, मेरे सामने शीघ्र स्थापित हों।
स्थिरा भव महालक्ष्मि निश्चला भव निर्मले ।
प्रसन्नकमले देवि प्रसन्नहृदया भव ॥ ३६॥
अर्थ: हे महालक्ष्मी! स्थिर हों। हे निर्मल! निश्चल हों। हे प्रसन्न कमल के समान मुख वाली देवी! प्रसन्न हृदय वाली हों।
श्रीधरे श्रीमहालक्ष्मि त्वदन्तःस्थं महानिधिम् ।
शीघ्रमुद्धृत्य पुरतः प्रदर्शय समर्पय ॥ ३७॥
अर्थ: हे श्रीधर (विष्णु की शक्ति)! हे श्री महालक्ष्मी! आपके भीतर स्थित महान निधि को शीघ्र बाहर निकालकर मेरे सामने प्रदर्शित करें और मुझे अर्पित करें।
वसुन्धरे श्रीवसुधे वसुदोग्ध्रि कृपामयि ।
त्वत्कुक्षिगतसर्वस्वं शीघ्रं मे सम्प्रदर्शय ॥ ३८॥
अर्थ: हे वसुन्धरे (पृथ्वी)! हे श्री वसुधे! हे वसुओं (धन) को प्रदान करने वाली! हे कृपामयी! आपके गर्भ में स्थित सभी सम्पत्ति को शीघ्र मुझे दिखाएं।
विष्णुप्रिये रत्नगर्भे समस्तफलदे शिवे ।
त्वद्गर्भगतहेमादीन् सम्प्रदर्शय दर्शय ॥ ३९॥
अर्थ: हे विष्णुप्रिया! हे रत्नगर्भा! हे समस्त फल देने वाली! हे शिवा (कल्याणकारी)! आपके गर्भ में स्थित सोना आदि धन को मुझे दिखलाएं, दिखलाएं।
रसातलगते लक्ष्मि शीघ्रमागच्छ मे पुरः ।
न जाने परमं रूपं मातर्मे सम्प्रदर्शय ॥ ४०॥
अर्थ: हे रसातल में स्थित लक्ष्मी! मेरे सामने शीघ्र आइए। हे माता! मैं आपके परम रूप को नहीं जानता, मुझे वह दिखाइए।
आविर्भव मनोवेगात् शीघ्रमागच्छ मे पुरः ।
मा वत्स भैरिहेत्युक्त्वा कामं गौरिव रक्ष माम् ॥ ४१॥
अर्थ: हे देवी! मन के वेग से प्रकट हों, शीघ्र मेरे सामने आइए। 'हे वत्स, डरो मत' ऐसा कहकर, इच्छा पूरी करने वाली गाय की तरह मेरी रक्षा कीजिए।
देवि शीघ्रं समागच्छ धरणीगर्भसंस्थिते ।
मातस्त्वद्भृत्यभृत्योऽहं मृगये त्वां कुतूहलात् ॥ ४२॥
अर्थ: हे धरणी (पृथ्वी) के गर्भ में स्थित देवी! शीघ्र आइए। हे माता! मैं आपका दास का दास हूँ, आपको उत्सुकता से खोज रहा हूँ।
उत्तिष्ठ जागृहि त्वं मे समुत्तिष्ठ सुजागृहि ।
अक्षयान् हेमकलशान् सुवर्णेन सुपूरितान् ॥ ४३॥
निक्षेपान्मे समाकृष्य समुद्धृत्य ममाग्रतः ।
समुन्नतानना भूत्वा सम्यग्धेहि धरातलात् ॥ ४४॥
अर्थ: (हे लक्ष्मी!) उठिए, मेरे लिए जागृत होइए, अच्छी तरह से जागृत होइए। अक्षय (कभी न समाप्त होने वाले) सोने के कलशों को, जो सोने से भरे हुए हैं, (और) मेरे निधियों को आकर्षित करके, मेरे सामने ऊपर उठाइए। ऊँचा मुख करके (प्रसन्न मुद्रा में), उन्हें पृथ्वी से भली-भांति निकालिए और मुझे दीजिए।
मत्सन्निधिं समागच्छ मदाहितकृपारसात् ।
प्रसीद श्रेयसां दोग्ध्रि लक्ष्मि मे नयनाग्रतः ॥ ४५॥
अर्थ: हे लक्ष्मी! मुझ पर रखी हुई कृपा के रस (भाव) से मेरे समीप आइए। हे श्रेय (कल्याण) को देने वाली! मेरे नेत्रों के सामने प्रसन्न हों।
अत्रोपविश्य लक्ष्मि त्वं स्थिरा भव हिरण्मयी ।
सुस्थिरा भव सम्प्रीत्या प्रसन्ना वरदा भव ॥ ४६॥
अर्थ: हे लक्ष्मी! यहाँ बैठकर आप हिरण्मयी (स्वर्णमयी) होकर स्थिर हों। प्रेमपूर्वक अत्यंत स्थिर हों, प्रसन्न हों और वरदान देने वाली हों।
आनीतांस्तु त्वया देवि निधीन्मे सम्प्रदर्शय ।
अद्य क्षणेन सहसा दत्त्वा संरक्ष मां सदा ॥ ४७॥
अर्थ: हे देवी! आपके द्वारा लाए गए निधियों को मुझे दिखाइए। आज क्षण भर में सहसा (तुरंत) उन्हें देकर मेरी सदा रक्षा कीजिए।
मयि तिष्ठ तथा नित्यं यथेन्द्रादिषु तिष्ठसि ।
अभयं कुरु मे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ४८॥
अर्थ: मुझमें आप उसी प्रकार नित्य निवास करें, जिस प्रकार आप इंद्र आदि में निवास करती हैं। हे देवी! मुझे अभय प्रदान करें। हे महालक्ष्मी! आपको नमस्कार है।
समागच्छ महालक्ष्मि शुद्धजाम्बूनद-स्थिते ।
प्रसीद पुरतः स्थित्वा प्रणतं मां विलोकय ॥ ४९॥
अर्थ: हे महालक्ष्मी! शुद्ध सोने के समान कांति वाली! आइए। मेरे सामने स्थित होकर, मुझ प्रणाम करने वाले को कृपापूर्वक देखिए।
लक्ष्मीर्भुवं गता भासि यत्र यत्र हिरण्मयी ।
तत्र तत्र स्थिता त्वं मे तव रूपं प्रदर्शय ॥ ५०॥
अर्थ: हे लक्ष्मी! जहाँ-जहाँ आप पृथ्वी पर स्वर्णमयी रूप में शोभा पाती हैं, वहाँ-वहाँ आप स्थित होकर मुझे अपना रूप दिखाइए।
क्रीडन्ती बहुधा भूमौ परिपूर्णकृपा मयि ।
मम मूर्धनि ते हस्तमविलम्बितमर्पय ॥ ५१॥
अर्थ: पृथ्वी पर अनेक प्रकार से क्रीड़ा करती हुई, मुझ पर परिपूर्ण कृपा वाली (देवी)! बिना विलंब किए अपने हाथ को मेरे मस्तक पर रखिए।
फलद्भाग्योदये लक्ष्मि समस्तपुरवासिनि ।
प्रसीद मे महालक्ष्मि परिपूर्णमनोरथे ॥ ५२॥
अर्थ: हे फल देने वाले भाग्य के उदय वाली लक्ष्मी! हे समस्त नगरों में निवास करने वाली! हे महालक्ष्मी! मुझ पर प्रसन्न हों, मेरे मनोरथों को पूर्ण करें।
अयोध्यादिषु सर्वेषु नगरेषु समास्थिते ।
विभवैर्विविधैर्युक्तैः समागच्छ मुदान्विते ॥ ५३॥
अर्थ: हे अयोध्या आदि सभी नगरों में निवास करने वाली! अनेक प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त होकर हर्षपूर्वक आइए।
समागच्छ समागच्छ ममाग्रे भव सुस्थिरा ।
करुणारसनिष्यन्दनेत्रद्वयविशालिनि ॥ ५४॥
अर्थ: आइए, आइए, मेरे सामने अत्यंत स्थिर हों। हे करुणारस (दया के अमृत) से परिपूर्ण विशाल नेत्रों वाली!
सन्निधत्स्व महालक्ष्मि त्वत्पाणिं मम मस्तके ।
करुणासुधया मां त्वमभिषिच्य स्थिरं कुरु ॥ ५५॥
अर्थ: हे महालक्ष्मी! अपने हाथ को मेरे मस्तक पर रखिए। करुणा रूपी अमृत से मेरा अभिषेक करके मुझे स्थिर कीजिए।
सर्वराजगृहे लक्ष्मि समागच्छ बलान्विते ।
स्थित्वाऽऽशु पुरतो मेऽद्य प्रसादेनाभयं कुरु ॥ ५६॥
अर्थ: हे सभी राजाओं के घरों में स्थित लक्ष्मी! बल (शक्ति) सहित आइए। आज मेरे सामने शीघ्र स्थित होकर अपने प्रसाद से मुझे अभय प्रदान कीजिए।
सादरं मस्तके हस्तं मम त्वं कृपयाऽर्पय ।
सर्वराजस्थिते लक्ष्मि त्वत्कला मयि तिष्ठतु ॥ ५७॥
अर्थ: आप कृपापूर्वक आदर सहित अपना हाथ मेरे मस्तक पर रखें। हे सभी राजाओं में स्थित लक्ष्मी! आपकी कला मुझमें निवास करे।
आद्यादि श्रीर्महालक्ष्मि विष्णुवामाङ्कसंस्थिते ।
प्रत्यक्षं कुरु मे रूपं रक्ष मां शरणागतम् ॥ ५८॥
अर्थ: हे आद्यादि श्री महालक्ष्मी! विष्णु के वामांग में स्थित! मुझे अपना रूप प्रत्यक्ष दिखाइए और शरणागत मेरी रक्षा कीजिए।
प्रसीद मे महालक्ष्मि सुप्रसीद महाशिवे ।
अचला भव सुप्रीता सुस्थिरा भव मद्गृहे ॥ ५९॥
अर्थ: हे महालक्ष्मी! मुझ पर प्रसन्न हों। हे महाशिवे (परमकल्याणकारी)! अति प्रसन्न हों। अत्यंत प्रीतिपूर्वक अचल हों और मेरे घर में अत्यंत स्थिर हों।
यावत्तिष्ठन्ति वेदाश्च यावच्चन्द्र-दिवाकरौ ।
यावद्विष्णुश्च यावत्त्वं तावत्कुरु कृपां मयि ॥ ६०॥
अर्थ: जब तक वेद हैं, जब तक चंद्रमा और सूर्य हैं, जब तक विष्णु हैं और जब तक आप हैं, तब तक मुझ पर कृपा करें।
चान्द्री कला यथा शुक्ले वर्धते सा दिने दिने ।
तथा दया ते मय्येव वर्धतामभिवर्धताम् ॥ ६१॥
अर्थ: जिस प्रकार शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कला दिन-प्रतिदिन बढ़ती है, उसी प्रकार आपकी दया मुझ पर बढ़े और खूब बढ़े।
यथा वैकुण्ठनगरे यथा वै क्षीरसागरे ।
तथा मद्भवने तिष्ठ स्थिरं श्रीविष्णुना सह ॥ ६२॥
अर्थ: जिस प्रकार आप वैकुण्ठ नगर में और जिस प्रकार क्षीरसागर में निवास करती हैं, उसी प्रकार मेरे भवन में श्रीविष्णु के साथ स्थिर होकर निवास करें।
योगिनां हृदये नित्यं यथा तिष्ठसि विष्णुना ।
तथा मद्भवने तिष्ठ स्थिरं श्रीविष्णुना सह ॥ ६३॥
अर्थ: जिस प्रकार आप योगियों के हृदय में नित्य विष्णु के साथ निवास करती हैं, उसी प्रकार मेरे भवन में श्रीविष्णु के साथ स्थिर होकर निवास करें।
नारायणस्य हृदये भवती यथाऽऽस्ते
नारायणोऽपि तव हृत्कमले यथाऽऽस्ते ।
नारायणस्त्वमपि नित्यविभू तथैव
तौ तिष्ठतां हृदि ममापि दयान्वितौ श्रीः ॥ ६४॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! जिस प्रकार आप नारायण के हृदय में रहती हैं, और जिस प्रकार नारायण भी आपके हृदय कमल में रहते हैं। जिस प्रकार नारायण और आप नित्य विद्यमान हैं, उसी प्रकार वे दोनों (नारायण और आप) दया सहित मेरे हृदय में भी निवास करें।
विज्ञानवृद्धिं हृदये कुरु श्रीः सौभाग्यवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः ।
दयासुवृद्धिं कुरुतां मयि श्रीः सुवर्णवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः ॥ ६५॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! मेरे हृदय में विज्ञान की वृद्धि करें। मेरे घर में सौभाग्य की वृद्धि करें। मुझमें दया की वृद्धि करें। मेरे घर में सोने की वृद्धि करें।
न मां त्यजेथाः श्रितकल्पवल्लि सद्भक्ति-चिन्तामणि-कामधेनो ।
न मां त्यजेथा भव सुप्रसन्ने गृहे कलत्रेषु च पुत्रवर्गे ॥ ६६॥
अर्थ: हे कल्पलता का आश्रय लेने वाली (कल्पवल्लि)! हे सद्-भक्ति रूपी चिन्तामणि और कामधेनु! मुझे मत त्यागिए। मेरे घर में, पत्नी में और पुत्रों के समूह में आप अत्यंत प्रसन्न होकर निवास करें, मुझे मत त्यागिए।
॥ कुक्षिबीजम् ॥ ॐ-अं-आं-ईं-एं-ऐं ॥
अर्थ: (यह) कुक्षि (पेट) का बीज मंत्र है: ॐ-अं-आं-ईं-एं-ऐं। (यह मंत्र जप में प्रयुक्त होता है।)
आद्यादिमाये त्वमजाण्डबीजं त्वमेव साकार-निराकृती त्वम् ।
त्वया धृताश्चाब्जभवाण्डसङ्घाश्चित्रं चरित्रं तव देवि विष्णोः ॥ ६७॥
अर्थ: हे आद्यादि माया! आप ही ब्रह्मांड का बीज हैं। आप ही साकार और निराकार दोनों हैं। आपके द्वारा ही ब्रह्मा के अंडों (ब्रह्मांडों) के समूह धारण किए गए हैं। हे देवी विष्णु की प्रिया! आपका चरित्र अद्भुत है।
ब्रह्मरुद्रादयो देवा वेदाश्चापि न शक्नुयुः ।
महिमानं तव स्तोतुं मन्दोऽहं शक्नुयां कथम् ॥ ६८॥
अर्थ: ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता और वेद भी आपके महिमा का स्तवन करने में सक्षम नहीं हैं, तो मैं मंदबुद्धि कैसे कर सकता हूँ?
अम्ब त्वद्वत्सवाक्यानि सूक्तासूक्तानि यानि च ।
तानि स्वीकुरु सर्वज्ञे दयालुत्वेन सादरम् ॥ ६९॥
अर्थ: हे माता! आपके शिशु (वत्स) के जो भी वाक्य, चाहे वे सु-उक्त (अच्छे) हों या असु-उक्त (अव्यवस्थित), उन सभी को हे सर्वज्ञे! दयालुतापूर्वक आदर सहित स्वीकार करें।
भवन्तं शरणं गत्वा कृतार्थाः स्युः पुरातनाः ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा त्वामहं शरणं व्रजे ॥ ७०॥
अर्थ: आपको शरण जाकर प्राचीन काल के लोग कृतार्थ हुए हैं। ऐसा मन में विचार करके, मैं आपकी शरण में आता हूँ।
अनन्ता नित्यसुखिनः त्वद्भक्तास्त्वत्परायणाः ।
इति वेदप्रमाणाद्धि देवि त्वां शरणं व्रजे ॥ ७१॥
अर्थ: हे देवी! आपके भक्त, जो आपके परायण हैं, वे अनन्त और नित्य सुखी होते हैं, यह वेद का प्रमाण है। अतः मैं आपकी शरण में आता हूँ।
तव प्रतिज्ञा मद्भक्ता न नश्यन्तीत्यपि क्वचित् ।
इति सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य प्राणान् सन्धारयाम्यहम् ॥ ७२॥
अर्थ: आपकी यह प्रतिज्ञा है कि 'मेरे भक्त कभी नष्ट नहीं होते।' ऐसा बार-बार विचार करके मैं अपने प्राणों को धारण करता हूँ।
त्वदधीनस्त्वहं मातः त्वत्कृपा मयि विद्यते ।
यावत्सम्पूर्णकामः स्यां तावद्देहि दयानिधे ॥ ७३॥
अर्थ: हे माता! मैं आपके अधीन हूँ, आप मुझ पर कृपा करती हैं। जब तक मैं अपनी कामनाओं को पूर्ण न कर लूँ, तब तक, हे दयानिधि! मुझे (वह सब) दीजिए।
क्षणमात्रं न शक्नोमि जीवितुं त्वत्कृपां विना ।
न हि जीवन्ति जलजा जलं त्यक्त्वा जलाश्रयाः ॥ ७४॥
अर्थ: मैं आपकी कृपा के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। जैसे जल में रहने वाले (जलज) जल को छोड़कर जीवित नहीं रहते।
यथा हि पुत्रवात्सल्यात् जननी प्रस्नुतस्तनी ।
वत्सं त्वरितमागत्य सम्प्रीणयति वत्सला ॥ ७५॥
अर्थ: जिस प्रकार पुत्र के प्रति वात्सल्य से जिसका स्तन दूध से भर जाता है, वह वत्सल माता शीघ्रता से आकर अपने बच्चे को संतुष्ट करती है।
यदि स्यां तव पुत्रोऽहं माता त्वं यदि मामकी ।
दयापयोधर-स्तन्य-सुधाभिरभिषिञ्च माम् ॥ ७६॥
अर्थ: यदि मैं आपका पुत्र हूँ और आप मेरी माता हैं, तो दया रूपी आपके पयोधरों (स्तनों) के स्तन्य रूपी अमृत से मेरा अभिषेक करें।
मृग्यो न गुणलेशोऽपि मयि दोषैक-मन्दिरे ।
पांसूनां वृष्टिबिन्दूनां दोषाणां च न मे मतिः ॥ ७७॥
अर्थ: मुझ दोषों के एकमात्र घर में गुण का एक कण भी खोजने योग्य नहीं है। धूल के कणों, वर्षा की बूंदों और दोषों की गिनती मैं नहीं कर सकता।
पापिनामहमेकाग्रो दयालूनां त्वमग्रणीः ।
दयनीयो मदन्योऽस्ति तव कोऽत्र जगत्त्रये ॥ ७८॥
अर्थ: मैं पापियों में सबसे आगे हूँ, और आप दयालुओँ में अग्रणी हैं। इस तीनों लोकों में मेरे अलावा आपके लिए और कौन दयनीय होगा?
विधिनाहं न सृष्टश्चेत् न स्यात्तव दयालुता ।
आमयो वा न सृष्टश्चेदौषधस्य वृथोदयः ॥ ७९॥
अर्थ: यदि आपने मुझे नहीं बनाया होता, तो आपकी दयालुता नहीं होती। यदि रोग (आमय) ही नहीं बना होता, तो औषधि का उदय व्यर्थ होता।
कृपा मदग्रजा किं ते अहं किं वा तदग्रजः ।
विचार्य देहि मे वित्तं तव देवि दयानिधे ॥ ८०॥
अर्थ: हे देवी! क्या आपकी कृपा मुझसे पहले उत्पन्न हुई है या मैं उससे पहले उत्पन्न हुआ हूँ? (अर्थात, मेरी दीनता पहले है या आपकी कृपा पहले?) विचार करके मुझे धन दीजिए, हे दयानिधि!
माता पिता त्वं गुरुः सद्गतिः श्रीः
त्वमेव सञ्जीवनहेतुभूता ।
अन्यं न मन्ये जगदेकनाथे
त्वमेव सर्वं मम देवि सत्यम् ॥ ८१॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! आप ही माता हैं, पिता हैं, गुरु हैं, सद्गति हैं। आप ही जीवन का कारण हैं। हे जगत की एकमात्र स्वामिनी! मैं किसी अन्य को नहीं मानता। हे देवी! आप ही मेरा सब कुछ हैं, यह सत्य है।
॥ हृदय बीजम् ॥
ॐ-घ्रां-घ्रीं-घ्रूं-घ्रें-घ्रों-घ्रः-हुं फट् कुरु कुरु स्वाहा ॥
अर्थ: (यह) हृदय का बीज मंत्र है: ॐ-घ्रां-घ्रीं-घ्रूं-घ्रें-घ्रों-घ्रः-हुं फट् कुरु कुरु स्वाहा। (यह मंत्र जप में प्रयुक्त होता है।)
आद्यादिलक्ष्मीर्भव सुप्रसन्ना विशुद्धविज्ञानसुखैकदोग्ध्रि ।
अज्ञानहन्त्री त्रिगुणातिरिक्ता प्रज्ञाननेत्री भव सुप्रसन्ना ॥ ८२॥
अर्थ: हे आद्यादि लक्ष्मी! अत्यंत प्रसन्न हों। विशुद्ध विज्ञान और सुख को एकमात्र प्रदान करने वाली। अज्ञान को नष्ट करने वाली, तीनों गुणों से परे, प्रज्ञान (दिव्य ज्ञान) की नेत्र स्वरूपिणी, आप अत्यंत प्रसन्न हों।
अशेषवाग्जाड्य-मलापहन्त्री नवं नवं सुष्टु सुवाक्यदायिनी ।
ममैव जिह्वाग्रसुरङ्गवर्तिनी भव प्रसन्ना वदने च मे श्रीः ॥ ८३॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! सभी वाणी संबंधी जड़ता के दोषों को दूर करने वाली, नवीन और सुंदर वाक्यों को देने वाली, मेरी जिह्वा के अग्र भाग पर सुंदर रंग के समान निवास करने वाली (सरस्वती रूप में) मेरे मुख में प्रसन्न हों।
समस्तसम्पत्सु विराजमाना समस्ततेजस्सु विभासमाना ।
विष्णुप्रिये त्वं भव दीप्यमाना वाग्देवता मे नयने प्रसन्ना ॥ ८४॥
अर्थ: हे विष्णुप्रिया! सभी सम्पत्तियों में शोभायमान, सभी तेजों में प्रकाशित होने वाली, आप देदीप्यमान हों। मेरी वाग्देवता (सरस्वती) मेरी आँखों में प्रसन्न हों।
सर्वप्रदर्शे सकलार्थदे त्वं प्रभासुलावण्यदयाप्रदोग्ध्रि ।
सुवर्णदे त्वं सुमुखी भव श्रीर्हिरण्मयी मे नयने प्रसन्ना ॥ ८५॥
अर्थ: हे सर्व-प्रदर्शिका (सभी को दिखाने वाली)! हे सभी अर्थों को देने वाली! आप प्रभा, सौंदर्य और दया को प्रदान करने वाली हैं। हे सुवर्ण (सोना) देने वाली श्री! सुमुखी हों। हे हिरण्मयी! मेरी आँखों में प्रसन्न हों।
सर्वार्थदा सर्वजगत्प्रसूतिः सर्वेश्वरी सर्वभयापहन्त्री ।
सर्वोन्नता त्वं सुमुखी च नः श्रीर्हिरण्मयी मे भव सुप्रसन्ना ॥ ८६॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! सभी अर्थों को देने वाली, सभी जगत् को उत्पन्न करने वाली, सर्वेश्वरी, सभी भयों को हरने वाली, सर्वोन्नत, और सुंदर मुख वाली आप हिरण्मयी (स्वर्णमयी) मेरे लिए अत्यंत प्रसन्न हों।
समस्त-विघ्नौघ-विनाशकारिणी समस्त-भक्तोद्धरणे विचक्षणा ।
अनन्तसम्मोद-सुखप्रदायिनी हिरण्मयी मे नयने प्रसन्ना ॥ ८७॥
अर्थ: सभी विघ्नों के समूह को नष्ट करने वाली, समस्त भक्तों के उद्धार में निपुण, अनन्त आनंद और सुख को प्रदान करने वाली हिरण्मयी मेरी आँखों में प्रसन्न हों।
देवि प्रसीद दयनीयतमाय मह्यं
देवाधिनाथ-भव-देवगणाभिवन्द्ये ।
मातस्तथैव भव सन्निहिता दृशोर्मे
पत्या समं मम मुखे भव सुप्रसन्ना ॥ ८८॥
अर्थ: हे देवी! मुझ अत्यंत दयनीय पर प्रसन्न हों। हे देवाधिनाथ (विष्णु), भव (शिव) और देवगणों द्वारा वंदित! हे माता! उसी प्रकार मेरी आँखों में सन्निहित हों और पति (विष्णु) के साथ मेरे मुख में अत्यंत प्रसन्न हों।
मा वत्स भैरभयदानकरोऽर्पितस्ते
मौलौ ममेति मयि दीनदयानुकम्पे ।
मातः समर्पय मुदा करुणाकटाक्षं
माङ्गल्यबीजमिह नः सृज जन्म मातः ॥ ८९॥
अर्थ: हे दीनदयालु! हे माता! 'हे वत्स! डरो मत, मैंने अपना अभय देने वाला हाथ तुम्हारे मस्तक पर रखा है' ऐसा कहकर, हर्षपूर्वक मुझ पर करुणापूर्ण कटाक्ष करें। हे माता! इस जीवन में हमारे लिए मंगल का बीज (शुभता) उत्पन्न करें।
॥ कण्ठबीजम् ॥ ॐ-श्रां-श्रीं-श्रूं-श्रैं-श्रौं-श्रं-श्राः ॥
अर्थ: (यह) कंठ का बीज मंत्र है: ॐ-श्रां-श्रीं-श्रूं-श्रैं-श्रौं-श्रं-श्राः। (यह मंत्र जप में प्रयुक्त होता है।)
कटाक्ष इह कामधुक् तव मनस्तु चिन्तामणिः
करः सुरतरुः सदा नवनिधिस्त्वमेवेन्दिरे ।
भवेत्तव दयारसो मम रसायनं चान्वहं
मुखं तव कलानिधिर्विविध-वाञ्छितार्थप्रदम् ॥ ९०॥
अर्थ: हे इंदिरे (लक्ष्मी)! इस संसार में आपका कटाक्ष कामधेनु के समान है, आपका मन चिन्तामणि है, आपका हाथ कल्पवृक्ष है, और आप स्वयं सदा नौ निधियाँ हैं। आपकी दया का रस प्रतिदिन मेरे लिए रसायन (अमृत) हो। आपका मुख कलाओं का निधि है और विभिन्न वांछित अर्थों (कामनाओं) को प्रदान करने वाला है।
यथा रसस्पर्शनतोऽयसोऽपि सुवर्णता स्यात्कमले तथा ते ।
कटाक्षसंस्पर्शनतो जनानाममङ्गलानामपि मङ्गलत्वम् ॥ ९१॥
अर्थ: हे कमले (लक्ष्मी)! जिस प्रकार पारस पत्थर के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है, उसी प्रकार आपके कटाक्ष के स्पर्श से लोगों के अमंगल भी मंगल में बदल जाते हैं।
देहीति नास्तीति वचः प्रवेशाद् भीतो रमे त्वां शरणं प्रपद्ये ।
अतः सदास्मिन्नभयप्रदा त्वं सहैव पत्या मयि सन्निधेहि ॥ ९२॥
अर्थ: हे रमे (लक्ष्मी)! 'दो' और 'नहीं है' इन वचनों के प्रवेश से भयभीत होकर मैं आपकी शरण में आता हूँ। अतः आप सदा मुझे अभय प्रदान करने वाली हों और पति (विष्णु) के साथ मुझमें निवास करें।
कल्पद्रुमेण मणिना सहिता सुरम्या
श्रीस्ते कला मयि रसेन रसायनेन ।
आस्तामतो मम च दृक्करपाणिपाद-
स्पृष्ट्याः सुवर्णवपुषः स्थिरजङ्गमाः स्युः ॥ ९३॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! कल्पवृक्ष और चिन्तामणि के साथ अत्यंत रमणीय आपकी कला, रस और रसायन के साथ मुझमें स्थित हो। अतः मेरी आँख, हाथ, पैर के स्पर्श से (सभी) स्थिर और जंगम (अचल और चल) वस्तुएँ सुवर्णमयी हो जाएँ।
आद्यादिविष्णोः स्थिरधर्मपत्नी त्वमेव पत्या मम सन्निधेहि ।
आद्यादिलक्ष्मि त्वदनुग्रहेण पदे पदे मे निधिदर्शनं स्यात् ॥ ९४॥
अर्थ: हे आद्यादि विष्णु की स्थिर धर्मपत्नी! आप पति (विष्णु) के साथ मुझमें निवास करें। हे आद्यादि लक्ष्मी! आपके अनुग्रह से मुझे पग-पग पर निधियों (धन) का दर्शन हो।
आद्यादिलक्ष्मीहृदयं पठेद्यः स राज्यलक्ष्मीमचलां तनोति ।
महादरिद्रोऽपि भवेद्धनाढयः तदन्वये श्रीः स्थिरतां प्रयाति ॥ ९५॥
अर्थ: जो आद्यादि लक्ष्मी हृदय का पाठ करता है, वह अचल राज्यलक्ष्मी को प्राप्त करता है। महादरिद्र व्यक्ति भी धनाढ्य हो जाता है, और उसके वंश में श्री (लक्ष्मी) स्थिरता प्राप्त करती हैं।
यस्य स्मरणमात्रेण तुष्टा स्याद्विष्णुवल्लभा ।
तस्याभीष्टं ददत्याशु तं पालयति पुत्रवत् ॥ ९६॥
अर्थ: जिनके स्मरण मात्र से विष्णु की प्रिया (लक्ष्मी) संतुष्ट होती हैं, वे उसे शीघ्र ही अभीष्ट प्रदान करती हैं और पुत्र के समान उसका पालन करती हैं।
इदं रहस्यं हृदयं सर्वकामफलप्रदम् ।
जपः पञ्चसहस्रं तु पुरश्चरणमुच्यते ॥ ९७॥
अर्थ: यह रहस्यमय हृदय (स्तोत्र) सभी कामनाओं के फल को देने वाला है। इसका पाँच हजार जप पुरश्चरण कहलाता है।
त्रिकालमेककालं वा नरो भक्तिसमन्वितः ।
यः पठेत् शृणुयाद्वापि स याति परमां श्रियम् ॥ ९८॥
अर्थ: जो मनुष्य भक्ति से युक्त होकर तीनों कालों में या एक काल में भी इसका पाठ करता है या सुनता है, वह परम श्री (ऐश्वर्य) को प्राप्त करता है।
महालक्ष्मीं समुद्दिश्य निशि भार्गववासरे ।
इदं श्रीहृदयं जप्त्वा पञ्चवारं धनी भवेत् ॥ ९९॥
अर्थ: महालक्ष्मी को उद्देश्य करके, शुक्रवार की रात में इस श्री हृदय (स्तोत्र) का पाँच बार जप करके व्यक्ति धनी हो जाता है।
अनेन हृदयेनान्नं गर्भिण्या अभिमन्त्रितम् ।
ददाति तत्कुले पुत्रो जायते श्रीपतिः स्वयम् ॥ १००॥
अर्थ: इस हृदय (स्तोत्र) से अभिमंत्रित अन्न जो गर्भवती स्त्री को दिया जाता है, उसके कुल में स्वयं श्रीपति (विष्णु के समान) पुत्र जन्म लेता है।
नरेणाप्यथवा नार्या लक्ष्मीहृदयमन्त्रिते ।
जले पीते च तद्वंशे मन्दभाग्यो न जायते ॥ १०१॥
अर्थ: पुरुष या स्त्री द्वारा लक्ष्मी हृदय मंत्र से अभिमंत्रित जल पीने से उसके वंश में कोई मंदभाग्य (दुर्भाग्यशाली) जन्म नहीं लेता।
य आश्वयुङ्मासि च शुक्लपक्षे रमोत्सवे सन्निहिते च भक्त्या ।
पठेत्तथैकोत्तरवारवृद्ध्या लभेत्स सौवर्णमयीं सुवृष्टिम् ॥ १०२॥
अर्थ: जो आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में, लक्ष्मी उत्सव (शरद पूर्णिमा) के समीप भक्तिपूर्वक इसका एक-एक बार बढ़ाकर (अर्थात उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ) पाठ करता है, वह सोने की सुंदर वर्षा प्राप्त करता है।
य एकभक्त्याऽन्वहमेकवर्षं विशुद्धधीः सप्ततिवारजापी ।
स मन्दभाग्योऽपि रमाकटाक्षात् भवेत्सहस्राक्षशताधिकश्रीः ॥ १०३॥
अर्थ: जो शुद्ध बुद्धि वाला व्यक्ति एक वर्ष तक प्रतिदिन एक भक्ति से सत्तर बार इसका जप करता है, वह मंदभाग्यशाली भी रमा (लक्ष्मी) के कटाक्ष से सहस्राक्ष (इंद्र) से सौ गुना अधिक श्री (ऐश्वर्य) वाला हो जाता है।
श्रीशांघ्रिभक्तिं हरिदासदास्यं प्रपन्नमन्त्रार्थदृढैकनिष्ठाम् ।
गुरोः स्मृतिं निर्मलबोधबुद्धिं प्रदेहि मातः परमं पदं श्रीः ॥ १०४॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! हे माता! मुझे श्रीश (विष्णु) के चरणों में भक्ति, हरिदास की सेवा, मंत्र के अर्थ में दृढ़ निष्ठा, गुरु का स्मरण, निर्मल ज्ञान युक्त बुद्धि और परम पद प्रदान करें।
पृथ्वीपतित्वं पुरुषोत्तमत्वं विभूतिवासं विविधार्थसिद्धिम् ।
सम्पूर्णकीर्तिं बहुवर्षभोगं प्रdehi मे देवि पुनःपुनस्त्वम् ॥ १०५॥
अर्थ: हे देवी! आप मुझे बार-बार पृथ्वी का स्वामित्व, पुरुषोत्तमत्व (श्रेष्ठ पुरुष होना), विभूतियों (ऐश्वर्य) का निवास, विभिन्न अर्थों (उद्देश्यों) की सिद्धि, सम्पूर्ण कीर्ति और बहुत वर्षों तक भोग प्रदान करें।
वादार्थसिद्धिं बहुलोकवश्यं वयःस्थिरत्वं ललनासु भोगम् ।
पौत्रादिलब्धिं सकलार्थसिद्धिं प्रदेहि मे भार्गवि जन्मजन्मनि ॥ १०६॥
अर्थ: हे भार्गवि! मुझे जन्म-जन्म में वाद-विवाद में सिद्धि, अनेक लोगों को वश में करने की शक्ति, आयु की स्थिरता, स्त्रियों में भोग, पौत्र आदि की प्राप्ति और सभी अर्थों की सिद्धि प्रदान करें।
सुवर्णवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः विभूतिवृद्धिं कुरू मे गृहे श्रीः ।
कल्याणवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः विभूतिवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः ॥ १०७॥
अर्थ: हे श्री (लक्ष्मी)! मेरे घर में सोने की वृद्धि करें। मेरे घर में ऐश्वर्य की वृद्धि करें। मेरे घर में कल्याण की वृद्धि करें। मेरे घर में ऐश्वर्य की वृद्धि करें।
॥ शिरो बीजम् ॥ ॐ-यं-हं-कं-लं- वं-श्रीं ॥
अर्थ: (यह) सिर का बीज मंत्र है: ॐ-यं-हं-कं-लं- वं-श्रीं। (यह मंत्र जप में प्रयुक्त होता है।)
ध्यायेल्लक्ष्मीं प्रहसितमुखीं कोटिबालार्कभासां
विद्युद्वर्णाम्बरवरधरां भूषणाढ्यां सुशोभाम् ।
बीजापूरं सरसिजयुगं बिभ्रतीं स्वर्णपात्रं
भर्त्रायुक्तां मुहुरभयदां मह्यमप्यच्युतश्रीः ॥ १०८॥
अर्थ: लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिए, जिनका मुख प्रहसित (प्रसन्न) है, जिनकी आभा करोड़ों बाल सूर्यों के समान है, जो बिजली के रंग के सुंदर वस्त्र धारण किए हुए हैं, आभूषणों से सुशोभित हैं। जो बीजापूर (नींबू जैसा फल), दो कमल और स्वर्णपात्र धारण किए हुए हैं, पति (विष्णु) के साथ हैं, और बार-बार अभय प्रदान करने वाली हैं। हे अच्युतश्री (विष्णुप्रिया)! आप मुझे भी (अभय प्रदान करें)।
नारायण हृदय स्तोत्र
हरिः ॐ ।
यह 'हरिः ॐ' एक शुभ और पवित्र ध्वनि है, जिसका उपयोग किसी भी शुभ कार्य या मंत्रोच्चारण की शुरुआत में किया जाता है।
अस्य श्रीनारायणहृदयस्तोत्रमहामन्त्रस्य भार्गव ऋषिः, (ब्रह्मा ऋषिः) अनुष्टुप्छन्दः, लक्ष्मीनारायणो देवता, नारायणप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
इसका अर्थ है: इस श्रीनारायणहृदयस्तोत्र महामंत्र के लिए, भार्गव ऋषि हैं (और कुछ परंपराओं में ब्रह्मा ऋषि भी माने जाते हैं); इसका छंद अनुष्टुप् है; इसके देवता लक्ष्मीनारायण हैं; और इस मंत्र के जप का विनियोग (उद्देश्य) भगवान नारायण को प्रसन्न करना है।
॥ करन्यासः ॥ (करन्यास का अर्थ है हाथों की उंगलियों और हथेली पर मंत्रों का न्यास करना, जिससे शरीर के अंगों में देवत्व का आह्वान हो।)
नारायणः परं ज्योतिरिति अङ्गुष्ठाभ्यां नमः,
अर्थ: 'नारायण ही परम ज्योति हैं' - ऐसा कहते हुए दोनों अँगूठों को नमस्कार। (इससे अंगूठों में नारायण की ज्योति स्थापित की जाती है।)
नारायणः परं ब्रह्मेति तर्जनीभ्यां नमः,
अर्थ: 'नारायण ही परम ब्रह्म हैं' - ऐसा कहते हुए दोनों तर्जनी (अंगूठे के पास वाली उंगली) को नमस्कार। (इससे तर्जनी में नारायण के ब्रह्म स्वरूप को स्थापित किया जाता है।)
नारायणः परो देव इति मध्यमाभ्यां नमः,
अर्थ: 'नारायण ही परम देव हैं' - ऐसा कहते हुए दोनों मध्यमा (बीच वाली उंगली) को नमस्कार। (इससे मध्यमा में नारायण के देव स्वरूप को स्थापित किया जाता है।)
नारायणः परं धामेति अनामिकाभ्यां नमः,
अर्थ: 'नारायण ही परम धाम हैं' - ऐसा कहते हुए दोनों अनामिका (छोटी उंगली के पास वाली उंगली) को नमस्कार। (इससे अनामिका में नारायण के परम धाम स्वरूप को स्थापित किया जाता है।)
नारायणः परो धर्म इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः,
अर्थ: 'नारायण ही परम धर्म हैं' - ऐसा कहते हुए दोनों कनिष्ठिका (सबसे छोटी उंगली) को नमस्कार। (इससे कनिष्ठिका में नारायण के परम धर्म स्वरूप को स्थापित किया जाता है。)
विश्वं नारायण इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
अर्थ: 'यह सम्पूर्ण विश्व ही नारायण है' - ऐसा कहते हुए दोनों हथेली और हथेली के पृष्ठ भाग (पीछे का भाग) को नमस्कार। (इससे संपूर्ण हाथ में नारायण के विश्व स्वरूप को स्थापित किया जाता है।)
॥ अङ्गन्यासः ॥ (अंगन्यास का अर्थ है शरीर के विभिन्न अंगों पर मंत्रों का न्यास करना, जिससे शरीर के अंगों में देवत्व का आह्वान हो और सुरक्षा कवच निर्मित हो।)
नारायणः परं ज्योतिरिति हृदयाय नमः,
अर्थ: 'नारायण ही परम ज्योति हैं' - ऐसा कहते हुए हृदय को स्पर्श करते हुए 'नमः' कहें। (इससे हृदय में नारायण की ज्योति स्थापित होती है।)
नारायणः परं ब्रह्मेति शिरसे स्वाहा,
अर्थ: 'नारायण ही परम ब्रह्म हैं' - ऐसा कहते हुए सिर को स्पर्श करते हुए 'स्वाहा' कहें। (इससे सिर में नारायण के ब्रह्म स्वरूप को स्थापित किया जाता है।)
नारायणः परो देव इति शिखायै वौषट्,
अर्थ: 'नारायण ही परम देव हैं' - ऐसा कहते हुए शिखा (सिर के ऊपरी भाग) को स्पर्श करते हुए 'वौषट्' कहें। (इससे शिखा में नारायण के देव स्वरूप को स्थापित किया जाता है।)
नारायणः परं धामेति कवचाय हुम्,
अर्थ: 'नारायण ही परम धाम हैं' - ऐसा कहते हुए दोनों भुजाओं को क्रॉस करते हुए शरीर पर स्पर्श करें और 'हुम्' कहें। (यह एक प्रकार का सुरक्षा कवच है।)
नारायणः परो धर्म इति नेत्राभ्यां वौषट्,
अर्थ: 'नारायण ही परम धर्म हैं' - ऐसा कहते हुए दोनों आँखों को स्पर्श करते हुए 'वौषट्' कहें। (इससे आँखों में नारायण के धर्म स्वरूप की स्थापना होती है।)
विश्वं नारायण इति अस्त्राय फट्,
अर्थ: 'यह सम्पूर्ण विश्व ही नारायण है' - ऐसा कहते हुए अपनी दाहिनी हथेली से बाईं हथेली पर ताली बजाते हुए या दायें हाथ की तर्जनी और मध्यमा उंगली से बायें हाथ की हथेली पर ताली बजाते हुए 'फट्' कहें। (यह अस्त्र न्यास है, जो सभी बाधाओं को दूर करने के लिए होता है।)
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
अर्थ: 'भूर्भुवस्सुवः' - ऐसा कहते हुए दसों दिशाओं को बांधा जाता है। (यह दिग्बन्ध है, जिससे मंत्र जप के दौरान किसी भी नकारात्मक शक्ति या बाधा से सुरक्षा मिलती है। इसमें चारों दिशाओं में चुटकी बजाई जाती है।)
कृपया प्रस्तुत है आपके द्वारा दिए गए संस्कृत पाठ का हिंदी में स्पष्टीकरण:
॥ अथ ध्यानम् ॥
(अब ध्यान की विधि/स्वरूप का वर्णन किया जा रहा है)
उद्यदादित्यसङ्काशं पीतवासं चतुर्भुजम् ।
शङ्खचक्रगदापाणिं ध्यायेल्लक्ष्मीपतिं हरिम् ॥ १॥
अर्थ: उदय होते हुए सूर्य के समान कांति वाले, पीले वस्त्र धारण किए हुए, चार भुजाओं वाले, शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए लक्ष्मीपति भगवान हरि का ध्यान करना चाहिए।
त्रैलोक्याधारचक्रं तदुपरि कमठं तत्र चानन्तभोगी ।
तन्मध्ये भूमिपद्माङ्कुशशिखरदळं कर्णिकाभूतमेरुम् ।
तत्रत्यं शान्तमूर्तिं मणिमयमकुटं कुण्डलोद्भासिताङ्गं ।
लक्ष्मीनारायणाख्यं सरसिजनयनं सन्ततं चिन्तयामः ॥ २॥
अर्थ: हम सदा उन लक्ष्मीनारायण का चिंतन करते हैं, जिनके नीचे तीनों लोकों का आधारभूत चक्र है, उसके ऊपर कछुआ (कमठ) है, और उस पर शेषनाग (अनन्तभोगी) विराजमान हैं। उस शेषनाग के मध्य में भूमि ही कमल के अंकुश (मूल) और शिखरदल के रूप में है, और मेरु पर्वत उस कमल की कर्णिका (बीजकोष) के समान है। वहीं पर शांतमूर्ति, मणिमय मुकुट धारण किए हुए, कुण्डलों से सुशोभित अंग वाले, कमल के समान नेत्रों वाले लक्ष्मीनारायण विराजमान हैं।
ॐ नारायणः परं ज्योतिरात्मा नारायणः परः ।
नारायणः परं ब्रह्म नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ३॥
अर्थ: ॐ! नारायण ही परम ज्योति हैं, नारायण ही परम आत्मा हैं। नारायण ही परम ब्रह्म हैं। हे नारायण! आपको नमस्कार है।
नारायणः परो देवो धाता नारायणः परः ।
नारायणः परो धाता नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ४॥
अर्थ: नारायण ही परम देव हैं, नारायण ही परम धाता (धारण करने वाले या विधाता) हैं। नारायण ही परम धाता हैं। हे नारायण! आपको नमस्कार है।
नारायणः परं धाम ध्यानं नारायणः परः ।
नारायण परो धर्मो नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ५॥
अर्थ: नारायण ही परम धाम हैं, नारायण ही परम ध्यान हैं। नारायण ही परम धर्म हैं। हे नारायण! आपको नमस्कार है।
नारायणः परो देवो विद्या नारायणः परः ।
विश्वं नारायणः साक्षान् नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ६॥
अर्थ: नारायण ही परम देव हैं, नारायण ही परम विद्या हैं। यह सम्पूर्ण विश्व साक्षात् नारायण ही हैं। हे नारायण! आपको नमस्कार है।
नारायणाद् विधिर्जातो जातो नारायणाद्भवः ।
जातो नारायणादिन्द्रो नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ७॥
अर्थ: नारायण से ही ब्रह्मा (विधि) उत्पन्न हुए हैं, नारायण से ही शिव (भव) उत्पन्न हुए हैं। नारायण से ही इंद्र उत्पन्न हुए हैं। हे नारायण! आपको नमस्कार है।
रविर्नारायणस्तेजः चन्द्रो नारायणो महः ।
वह्निर्नारायणः साक्षात् नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ८॥
अर्थ: सूर्य (रवि) नारायण का तेज हैं, चंद्रमा (चंद्र) नारायण का प्रकाश (महः) हैं। अग्नि (वह्नि) साक्षात् नारायण हैं। हे नारायण! आपको नमस्कार है।
नारायण उपास्यः स्याद् गुरुर्नारायणः परः ।
नारायणः परो बोधो नारायण नमोऽस्तु ते ॥ ९॥
अर्थ: नारायण ही उपासनीय हैं, नारायण ही परम गुरु हैं। नारायण ही परम ज्ञान (बोध) हैं। हे नारायण! आपको नमस्कार है।
नारायणः फलं मुख्यं सिद्धिर्नारायणः सुखम् ।
हरिर्नारायणः शुद्धिर्नारायण नमोऽस्तु ते ॥ १०॥
अर्थ: नारायण ही मुख्य फल हैं, नारायण ही सिद्धि हैं, नारायण ही सुख हैं। हरि (नारायण) ही शुद्धि हैं। हे नारायण! आपको नमस्कार है।
निगमावेदितानन्तकल्याणगुणवारिधे ।
नारायण नमस्तेऽस्तु नरकार्णवतारक ॥ ११॥
अर्थ: हे वेदों द्वारा बताए गए अनन्त कल्याणकारी गुणों के सागर! हे नरक रूपी सागर से तारने वाले नारायण! आपको नमस्कार है।
जन्ममृत्युजराव्याधिपारतन्त्र्यादिभिः सदा ।
दोषैरस्पृष्टरूपाय नारायण नमोऽस्तु ते ॥ १२॥
अर्थ: हे जिनके स्वरूप को जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था, व्याधि (रोग) और परतंत्रता (दूसरों पर निर्भरता) आदि दोष कभी स्पर्श नहीं करते, उन नारायण को नमस्कार है।
वेदशास्त्रार्थविज्ञानसाध्यभक्त्येकगोचर ।
नारायण नमस्तेऽस्तु मामुद्धर भवार्णवात् ॥ १३॥
अर्थ: हे नारायण! आप वेदों और शास्त्रों के अर्थ के विज्ञान से साध्य, एकमात्र भक्ति के द्वारा ही जानने योग्य हैं। आपको नमस्कार है। मुझे संसार रूपी सागर से उबारिए।
नित्यानन्द महोदार परात्पर जगत्पते ।
नारायण नमस्तेऽस्तु मोक्षसाम्राज्यदायिने ॥ १४॥
अर्थ: हे नित्य आनंद स्वरूप, अत्यंत उदार, परात्पर (सबसे परे), जगत् के स्वामी नारायण! आपको नमस्कार है। आप मोक्ष रूपी साम्राज्य को प्रदान करने वाले हैं।
आब्रह्मस्थम्बपर्यन्तमखिलात्ममहाश्रय ।
सर्वभूतात्मभूतात्मन् नारायण नमोऽस्तु ते ॥ १५॥
अर्थ: हे ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक सभी आत्माओं के महान आश्रय! हे सभी प्राणियों की आत्मा में निवास करने वाले आत्मस्वरूप नारायण! आपको नमस्कार है।
पालिताशेषलोकाय पुण्यश्रवणकीर्तन ।
नारायण नमस्तेऽस्तु प्रलयोदकशायिने ॥ १६॥
अर्थ: हे सम्पूर्ण लोकों का पालन करने वाले! हे जिनके श्रवण और कीर्तन (सुनना और गुणगान करना) पवित्र हैं! हे प्रलयकाल के जल में शयन करने वाले नारायण! आपको नमस्कार है।
निरस्तसर्वदोषाय भक्त्यादिगुणदायिने ।
नारायण नमस्तेऽस्तु त्वां विना न हि मे गतिः ॥ १७॥
अर्थ: हे सभी दोषों से रहित! हे भक्ति आदि गुणों को प्रदान करने वाले नारायण! आपको नमस्कार है। आपके बिना मेरी कोई गति नहीं है (मेरा कोई आश्रय नहीं है)।
धर्मार्थकाममोक्षाख्यपुरुषार्थप्रदायिने ।
नारायण नमस्तेऽस्तु पुनस्तेऽस्तु नमो नमः ॥ १८॥
अर्थ: हे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले नारायण! आपको नमस्कार है। आपको बार-बार नमस्कार है।
अथ प्रार्थना ॥ (अब प्रार्थना)
नारायण त्वमेवासि दहराख्ये हृदि स्थितः ।
प्रेरिता प्रेर्यमाणानां त्वया प्रेरितमानसः ॥ १९॥
अर्थ: हे नारायण! आप ही दहर नामक हृदय में स्थित हैं (हृदयगुहा में)। आप ही प्रेरित किए जाने वालों के प्रेरक हैं। आपके द्वारा ही मेरा मन प्रेरित है।
त्वदाज्ञां शिरसा कृत्वा भजामि जनपावनम् ।
नानोपासनमार्गाणां भवकृद् भावबोधकः ॥ २०॥
अर्थ: आपकी आज्ञा को शिरोधार्य करके, मैं जन-पावन (लोगों को पवित्र करने वाले) आपको भजता हूँ। आप अनेक उपासना मार्गों को बनाने वाले हैं और भावों को समझाने वाले हैं।
भावार्थकृद् भवातीतो भव सौख्यप्रदो मम ।
त्वन्मायामोहितं विश्वं त्वयैव परिकल्पितम् ॥ २१॥
अर्थ: आप भावों का अर्थ करने वाले, संसार से परे हैं, आप मुझे सुख प्रदान करें। यह सारा विश्व आपकी माया से मोहित है और आपके द्वारा ही इसकी कल्पना की गई है।
त्वदधिष्ठानमात्रेण सा वै सर्वार्थकारिणी ।
त्वमेव तां पुरस्कृत्य मम कामान् समर्थय ॥ २२॥
अर्थ: केवल आपके अधिष्ठान (सत्ता) से वह माया सभी कार्य करने वाली हो जाती है। आप ही उस माया को आगे करके मेरी कामनाओं को पूर्ण करें।
न मे त्वदन्यस्त्रातास्ति त्वदन्यन्न हि दैवतम् ।
त्वदन्यं न हि जानामि पालकं पुण्यवर्धनम् ॥ २३॥
अर्थ: आपके सिवा मेरा कोई रक्षक नहीं है, आपके सिवा कोई देवता नहीं है। आपके सिवा मैं किसी अन्य पालक या पुण्य बढ़ाने वाले को नहीं जानता।
यावत्सांसारिको भावो मनस्स्थो भावनात्मकः ।
तावत्सिद्धिर्भवेत् साध्या सर्वदा सर्वदा विभो ॥ २४॥
अर्थ: हे विभो! जब तक मेरे मन में सांसारिक भाव और भावनाएँ स्थित हैं, तब तक हमेशा-हमेशा मुझे सिद्धि प्राप्त हो।
पापिनामहमेकाग्रो दयालूनां त्वमग्रणीः ।
दयनीयो मदन्योऽस्ति तव कोऽत्र जगत्त्रये ॥ २५॥
अर्थ: मैं पापियों में सबसे आगे हूँ, और आप दयालुओँ में अग्रणी हैं। इस तीनों लोकों में मेरे अलावा आपके लिए और कौन दयनीय होगा?
त्वयाहं नैव सृष्टश्चेत् न स्यात्तव दयालुता ।
आमयो वा न सृष्टश्चेदौषधस्य वृथोदयः ॥ २६॥
अर्थ: यदि आपने मुझे नहीं बनाया होता, तो आपकी दयालुता नहीं होती। यदि रोग (आमय) ही नहीं बना होता, तो औषधि का उदय व्यर्थ होता।
पापसङ्गपरिश्रान्तः पापात्मा पापरूपधृक् ।
त्वदन्यः कोऽत्र पापेभ्यः त्रातास्ति जगतीतले ॥ २७॥
अर्थ: पापों के संग से थका हुआ, पापात्मा, पाप रूप धारण करने वाला (मैं), इस पृथ्वी पर पापों से बचाने वाला आपके अतिरिक्त कौन है?
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥ २८॥
अर्थ: हे देवों के देव! आप ही मेरी माता हैं और आप ही मेरे पिता हैं। आप ही मेरे बंधु हैं और आप ही मेरे सखा हैं। आप ही मेरी विद्या हैं और आप ही मेरा धन हैं। आप ही मेरे सब कुछ हैं।
प्रार्थनादशकं चैव मूलाष्टकमतःपरम् ।
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं तस्य लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् ॥ २९॥
अर्थ: इस प्रार्थना के दस श्लोकों को और उसके बाद (ऊपर दिए गए) मूलाष्टक (आठ मूल श्लोक, जो आमतौर पर नारायणहृदय में गिने जाते हैं) को जो नित्य पढ़ता या सुनता है, उसके घर में लक्ष्मी स्थिर रहती हैं।
नारायणस्य हृदयं सर्वाभीष्टफलप्रदम् ।
लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं यदि चैतद्विनाकृतम् ॥ ३०॥
तत्सर्वं निष्फलं प्रोक्तं लक्ष्मीः क्रुध्यति सर्वदा ।
एतत्सङ्कलितं स्तोत्रं सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥ ३१॥
अर्थ: नारायण हृदय सभी अभीष्ट फल देने वाला है। यदि लक्ष्मी हृदय स्तोत्र को इसके बिना (नारायण हृदय के बिना) किया जाए, तो वह सब निष्फल कहा गया है और लक्ष्मी सदा रुष्ट हो जाती हैं। यह संकलित स्तोत्र (नारायण हृदय और लक्ष्मी हृदय दोनों का साथ में पाठ) सभी अभीष्ट फल देने वाला है।
जपेत् सङ्कलितं कृत्वा सर्वाभीष्टमवाप्नुयात् ।
नारायणस्य हृदयं आदौ जप्त्वा ततःपरम् ॥ ३२॥
लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं जपेन्नारायणं पुनः ।
पुनर्नारायणं जप्त्वा पुनर्लक्ष्मीनुतिं जपेत् ॥ ३३॥
अर्थ: जो इसे संकलित करके जपता है, वह सभी अभीष्ट को प्राप्त करता है। पहले नारायण हृदय का जप करके, उसके बाद लक्ष्मी हृदय स्तोत्र का जप करें। फिर नारायण का जप करें और फिर लक्ष्मी स्तुति (लक्ष्मी हृदय) का जप करें।
तद्वद्धोमादिकं कुर्यादेतत्सङ्कलितं शुभम् ।
एवं मध्ये द्विवारेण जपेत् सङ्कलितं शुभम् ॥ ३४॥
अर्थ: इसी प्रकार (इस संकलित विधि से) होमादि शुभ कार्य करें। इस प्रकार मध्य में दो बार इस शुभ संकलित (क्रम) का जप करें।
लक्ष्मीहृदयके स्तोत्रे सर्वमन्यत् प्रकाशितम् ।
सर्वान् कामानवाप्नोति आधिव्याधिभयं हरेत् ॥ ३५॥
अर्थ: लक्ष्मी हृदय स्तोत्र में अन्य सभी (जानकारी) प्रकाशित की गई है। (इस विधि से जप करने वाला) सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और आधि (मानसिक पीड़ा) तथा व्याधि (शारीरिक रोग) के भय को हर लेता है।
गोप्यमेतत् सदा कुर्यात् न सर्वत्र प्रकाशयेत् ।
इति गुह्यतमं शास्त्रं प्रोक्तं ब्रह्मादिभिः पुरा ॥ ३६॥
अर्थ: इसे हमेशा गुप्त रखना चाहिए, इसे सब जगह प्रकाशित नहीं करना चाहिए। इस प्रकार ब्रह्मा आदि देवों ने पहले ही इस अत्यंत गोपनीय शास्त्र का उपदेश दिया है।
लक्ष्मीहृदयप्रोक्तेन विधिना साधयेत् सुधीः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन साधयेद् गोपयेत् सुधीः ॥ ३७॥
अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति लक्ष्मी हृदय में बताई गई विधि के अनुसार (इस स्तोत्र) को सिद्ध करे। इसलिए, बुद्धिमान व्यक्ति को सभी प्रयासों से इसे सिद्ध करना चाहिए और इसे गुप्त रखना चाहिए।
यत्रैतत्पुस्तकं तिष्ठेत् लक्ष्मीनारायणात्मकम् ।
भूतपैशाचवेताळभयं नैव तु सर्वदा ॥ ३८॥
अर्थ: जहाँ यह लक्ष्मीनारायण स्वरूप पुस्तक (यानी यह स्तोत्र) रहता है, वहाँ भूत, पिशाच और वेताल का भय कभी नहीं होता है।
भृगुवारे तथा रात्रौ पूजयेत् पुस्तकद्वयम् ।
सर्वदा सर्वदा स्तुत्यं गोपयेत् साधयेत् सुधीः ।
गोपनात् साधनाल्लोके धन्यो भवति तत्त्वतः ॥ ३ ९॥
अर्थ: शुक्रवार को और रात में इन दोनों पुस्तकों (नारायण हृदय और लक्ष्मी हृदय) की पूजा करनी चाहिए। इसे हमेशा स्तुत्य, गुप्त रखना चाहिए और बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा सिद्ध करना चाहिए। वास्तव में, इसे गुप्त रखने और सिद्ध करने से व्यक्ति इस लोक में धन्य होता है।
नहीं। दीक्षा केवल तब आवश्यक होती है जब आप मंत्र साधना करना चाहते हैं, सुनने के लिए नहीं।
लाभ प्राप्त करने के लिए बस हमारे द्वारा दिए गए मंत्रों को सुनना पर्याप्त है।
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