रैवत मनु का जन्म

सृष्टि, स्थिति और लय के एक चक्र को एक कल्प कहते हैं।
कल्प की शुरुआत में ब्रह्मा द्वारा विश्व की रचना होती है ,फिर विष्णु द्वारा उसका पालन होता है ,और अंत में महादेव द्वारा उसका संहार होता है।
एक कल्प की अवधि है ४.३२ अरब साल।
इस कल्प को १४ मन्वन्तरों में भाग दिया है।
हर एक मन्वन्तर में इकत्तर महायुग (चतुर्युग) होते हैं।
हर एक मन्वन्तर का एक स्वामी हैं।
सबसे पहले स्वायंभुव, उसके बाद स्वारोचिष इत्यादि।
वर्तमान मन्वन्तर के अधीश हैं वैवस्वत।
राजा ने प्रार्थना की: मेरा पुत्र मन्वन्तर के अधिपति बनें।
प्रमुच महर्षि ने कहा: देवी भगवती की आराधना कीजिए।
श्रीमद् देवी भागवत पंचम वेद के रूप में प्रसिद्ध है।
उसका पाँच बार श्रवण कीजिए।
आप वैसे ही पुत्र पाएँगे जो आप चाहते हैं।
महर्षि से विदा लेकर राजा और पत्नी अपनी राजधानी की ओर निकल पडे।
राजधानी पहुँचकर राजा राज्य-कार्यों में व्यस्त हो गये।
एक बार लोमश महर्षि उनके दरबार में आये।
उनसे राजा ने निवेदन किया कि प्रमुच के आदेशानुसार पुत्र प्राप्ति के लिए वे खुद श्रीमद् देवी भागवत अनुष्ठान करें।
महर्षि ने कहा पराशक्ति जगदम्बा न केवल मानव, देवों की और दानवों की भी आराध्या है।
उन पर आपकी भक्ति जागृत हो गयी तो समझ लेना आपका काम बन गया।
श्रीमद् देवी भागवत का श्रवण ही काफी है समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिए।
शुभ दिन देखकर उन्होंने कथा प्रारम्भ की।
कथा समाप्त होने पर नवार्ण मन्त्र से हवन, ब्राह्मण भोजन और कन्यापूजा भी सम्पन्न हो गये।
कुछ ही समय बाद दुर्दम–रेवती दम्पती को एक बेटा हुआ।
उसका नाम रखा गया रैवत।
समस्त विद्याओं में निपुण धर्मिष्ठ,अस्त्र शस्त्र विद्याओं में अग्रणी रैवत, पाँचवें मन्वन्तर का अधिपति बने।
यह सब जगदम्बा पराशक्ति के आशीर्वाद से ही हुआ।
भगवान कार्तिकेय बोले: यह है संक्षेप में श्रीमद् देवी भागवत की महिमा।
श्रीमद् देवी भागवत की महिमा को पूरी तरह से बताना या जान लेना किसी की भी बस की बात नहीं है।
अगस्त्य महर्षि भगवान कार्तिकेय की पूजा करके, उनका शुक्रिया अदा करके चले गये।
सूतजी ने ऋषि-मुनियों से कहा: यह है श्रीमद् देवी भागवत की महिमा।
जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इसका पाठ या श्रवण करेगा उसे सारे भोग और अंत में मोक्ष भी प्राप्त हो जाएँगे।
इस कथा को अगर श्रद्धा के साथ नहीं सुना तो कोई प्रयोजन नहीं है।
जितना भी सुन रहे हो उसके बीच रुकावट आने मत दो।
श्रीमद् देवी भागवत सुनते वक्त बीच में छोडकर मत जाओ।
श्रीमद् देवी भागवत नरक यातनाओं से बचने का उपाय है।
जो भी इसके श्रवण में विघ्न डालेगा वह करोड़ों जन्म तक नरक यातना भोगेगा।
सभी पुराण सुनने से जितना फल मिलता है उसका सौ गुना फल मिलता है श्रीमद् देवी भागवत को सुनने से।
जैसे नदियों में गंगा, देवों में महादेव, काव्यों में रामायण, प्रकाश वालों में सूर्य, आनन्द देने वालों में चन्द्रमा, गंभीरता में समुद्र, सहनशीलता में पृथ्वी, मंत्रों में गायत्री; वैसे ही पुराणों में सर्वश्रेष्ठ है श्रीमद् देवी भागवत।
किसी भी तरह देवी भागवत का नौ बार श्रवण कर लिया तो समझ लेना जीवन्मुक्त हो जाओगे।
शत्रु जनित बाधाएं , अकाल, महामारी, देश में विद्रोहियों द्वारा अशांति, भूत प्रेत जनित उपद्रव:- इन सबके लिए उपाय है देवी भागवत कथा।
राज्य प्राप्ति, संतान प्राप्ति, वधू प्राप्ति, वर प्राप्ति, रक्षा प्राप्ति, धन प्राप्ति: हर एक चीज़ के लिए महामाया का अनुग्रह पाया जा सकता है श्रीमद् देवी भागवत के श्रवण से।
इस पुराण के आधे श्लोक की रचना देवी भगवती ने खुद की है।
बाद में यही आधा श्लोक विस्तृत होकर श्रीमद् देवी भागवत पुराण बना।
देवी भगवती ही गायत्री माता है।
गायत्री मन्त्र से बढ़कर कोई मंत्र नहीं, कोई तप नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई देवता नहीं।
वही गायत्री माता देवी भागवत में विराजती है अपने सारे रहस्यों सहित।
गायत्री महिमा इस का भाग है , देवी-गीता इसका भाग है, सारा धर्म इसमें है।
श्रीमद् देवी भागवत के समान दूसरा कोई भी ग्रंथ नहीं है।
इसको सदा सुनो, सुनते ही रहो, बार बार सुनो।
इस सम्पूर्ण जगत को उस देवी भगवती की चरण कमलों की धूल से ही ब्रह्मा ने बनाया, उसी का भगवान विष्णु पालन करते हैं, उसी का संहार भोलेनाथ करते हैं।
त्रिदेव, देवी माँ का आश्रय लेकर ही अपने अपने कार्य करते हैं।
ऐसी देवी भगवती को बार बार नमस्कार करता हूँ।
यत्पादपङ्कजरजः समवाप्य विश्वं ब्रह्मा सृजत्यनुदिनं च विभर्ति विष्णुः।
रुद्रश्च संहरति नेतरथा समर्थास्तस्यै नमोस्तु सततं जगदम्बिकायै।

 

  • कल्प को क्या कहा गया है?
    कल्प को सृष्टि, स्थिति और लय के पूर्ण चक्र के रूप में बताया गया है। इसमें रचना, पालन और संहार तीनों क्रम से होते हैं। यह एक बार की घटना नहीं, नियमित चक्र है। इससे समय को रेखा नहीं, चक्र के रूप में समझाया गया है। यही दृष्टि पूरे वर्णन का आधार है।

  • समय को चक्र मानने से क्या समझ आता है?
    इससे यह समझ आता है कि कुछ भी स्थायी नहीं है। आरंभ और अंत दोनों निश्चित हैं। परिवर्तन ही नियम है। यह दृष्टि अहंकार और भय दोनों को कम करती है।

  • क्या इतनी विशाल समय-गणना केवल कल्पना नहीं है?
    यह गणित की सटीकता के लिए नहीं दी गई है। इसका उद्देश्य मानव जीवन को व्यापक संदर्भ में रखना है। जब दृष्टि फैलती है, तो छोटी चिंताएं हल्की पडती हैं। इसलिए यह तात्त्विक गणना है।


  • मन्वन्तर का विभाजन क्यों बताया गया है?
    ताकि यह स्पष्ट हो कि समय अव्यवस्थित नहीं है। हर कल्प को चरणों में बांटा गया है। प्रत्येक चरण का अपना शासक और व्यवस्था है। इससे सृष्टि को अनुशासित प्रक्रिया के रूप में दिखाया गया है।

  • मन्वन्तर के स्वामी का क्या अर्थ है?
    इसका अर्थ है उस कालखंड की व्यवस्था का संचालन। यह पद उत्तरदायित्व का है, अधिकार का नहीं। हर मन्वन्तर में नया संचालन होता है। यही निरंतरता को सम्भव बनाता है।

  • क्या यह केवल पौराणिक सूची नहीं है?
    नहीं, यह समय-बोध की संरचना है। इससे निरंतर परिवर्तन का बोध होता है। नाम माध्यम हैं, सिद्धांत मुख्य है।


  • राजा की प्रार्थना का लक्ष्य क्या था?
    राजा ने अपने पुत्र के लिए उच्च उत्तरदायित्व की कामना की। यह केवल वंश की इच्छा नहीं थी। वह शासन और सेवा से जुडी आकांक्षा थी। इसलिए इसे साधारण कामना नहीं कहा गया।

  • ऐसी इच्छा के लिए साधना क्यों बताई गई?
    क्योंकि उत्तरदायित्व जन्म से नहीं, पात्रता से मिलता है। पात्रता के लिए साधना आवश्यक है। यही विचार यहां रखा गया है।

  • क्या यह भाग्य के विपरीत नहीं है?
    नहीं, क्योंकि यहां प्रयास को प्रधान माना गया है। इच्छा तभी फल देती है जब उसके योग्य तैयारी हो। यह संतुलित दृष्टि है।


  • श्रीमद् देवी भागवत को पंचम वेद क्यों कहा गया?
    क्योंकि उसमें वेदों के तत्त्व सरल रूप में समाहित बताए गए हैं। यह विस्तार और व्याख्या का माध्यम है। आम व्यक्ति के लिए इसे सुलभ माना गया। इसलिए यह विशेष नाम दिया गया।

  • पांच बार श्रवण का निर्देश क्यों दिया गया?
    क्योंकि सुनना केवल एक बार का कर्म नहीं है। बार-बार सुनने से अर्थ गहराता है। मन धीरे-धीरे ढलता है। यही अभ्यास का नियम है।

  • क्या केवल सुनने से फल संभव है?
    सुनना विचार जगाता है। विचार से आचरण बदलता है। यही फल की प्रक्रिया है। इसे जादू की तरह नहीं समझाया गया है।


  • लोमश महर्षि ने श्रवण को पर्याप्त क्यों बताया?
    क्योंकि श्रवण से ही चेतना बदलती है। जटिल कर्मकांड के बिना भी मन का संस्कार संभव है। यही सरल मार्ग बताया गया है।

  • क्या यह कर्म की उपेक्षा नहीं है?
    नहीं, यह कर्म का मूल रूप है। जब मन शुद्ध होता है, कर्म स्वतः शुद्ध होते हैं। श्रवण आधार है, विकल्प नहीं।

  • क्या यह सबके लिए लागू हो सकता है?
    हां, क्योंकि सुनना सभी कर सकते हैं। इसमें कोई भेद नहीं है। यही इसकी व्यापकता है।


  • रैवत के जन्म का उल्लेख क्यों किया गया है?
    यह साधना के फल का उदाहरण है। कथा सिद्धांत को घटना से जोडती है। इससे बात केवल विचार नहीं रहती। परिणाम को प्रत्यक्ष दिखाया गया है।

  • रैवत के गुणों पर बल क्यों दिया गया?
    ताकि यह स्पष्ट हो कि केवल जन्म नहीं, गुण महत्वपूर्ण हैं। साधना से गुणों का विकास हुआ। यही उत्तरदायित्व की योग्यता बनी।

  • क्या इसे ऐतिहासिक सत्य मानना आवश्यक है?
    नहीं, इसे नैतिक सत्य के रूप में समझना पर्याप्त है। कथा का उद्देश्य सिद्धांत समझाना है। इतिहास यहां माध्यम है।


  • श्रद्धा के साथ सुनने पर इतना बल क्यों दिया गया है?
    क्योंकि बिना श्रद्धा के मन ग्रहण नहीं करता। शब्द सुनाई देते हैं, अर्थ नहीं उतरता। इसलिए मन की अवस्था निर्णायक मानी गई है।

  • बीच में छोडने से क्या हानि बताई गई?
    क्योंकि अपूर्ण सुनना अपूर्ण समझ देता है। अधूरा ज्ञान भ्रम पैदा करता है। निरंतरता इसलिए आवश्यक बताई गई है।

  • क्या यह डर दिखाने जैसा नहीं है?
    यह डर नहीं, अनुशासन की भाषा है। जैसे दवा पूरी न लेने से लाभ नहीं होता। उसी तरह यहां नियम बताया गया है।


  • देवी भागवत को सभी संकटों का उपाय क्यों कहा गया?
    क्योंकि संकट पहले मन में पैदा होते हैं। कथा मन को स्थिर करती है। स्थिर मन सही निर्णय लेता है। यही वास्तविक सुरक्षा है।

  • राज्य, धन, संतान जैसे फल क्यों गिनाए गए?
    ताकि यह दिखाया जाए कि जीवन के हर क्षेत्र से इसका संबंध है। धर्म को केवल त्याग तक सीमित नहीं किया गया। यह समग्र जीवन दृष्टि है।

  • क्या यह इच्छाओं को बढावा नहीं देता?
    नहीं, यह इच्छाओं को अनुशासन में लाता है। अनुशासित इच्छा ही शांति देती है। यही अंतर है।


  • गायत्री और देवी भागवत को एक क्यों बताया गया है?
    क्योंकि दोनों को विद्या का स्वरूप कहा गया है। एक सूत्र रूप में है, दूसरा विस्तार रूप में। सार एक ही बताया गया है।

  • गायत्री को सर्वोच्च क्यों माना गया?
    क्योंकि वह चेतना को शुद्ध करने वाली कही गई है। शुद्ध चेतना से ही धर्म, तप और साधना सफल होते हैं। इसलिए उसे मूल माना गया है।

  • क्या यह अन्य साधनों का निषेध है?
    नहीं, यह आधार की बात है। आधार मजबूत हो तो अन्य साधन फल देते हैं। यही दृष्टि यहां रखी गई है।


  • त्रिदेवों को देवी के आश्रय में क्यों बताया गया है?
    ताकि यह स्पष्ट हो कि शक्ति मूल है, कार्य गौण। सृष्टि, पालन और संहार उसी शक्ति से सम्भव हैं। यह निर्भरता का सिद्धांत है।

  • इससे क्या दार्शनिक निष्कर्ष निकलता है?
    कि अहंकार का कोई स्थान नहीं है। कार्यकर्ता होते हुए भी सब आश्रित हैं। यह विनय और संतुलन की शिक्षा है।

  • क्या यह केवल स्तुति भाषा नहीं है?
    यह स्तुति है, पर तर्कपूर्ण स्तुति है। संरचना और आश्रय का विचार इसमें स्पष्ट है। इसलिए यह भावुक नहीं, विचारपूर्ण है।

हिन्दी

हिन्दी

देवी भागवत

Click on any topic to open

0

Copyright © 2026 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |
Vedahdara - Personalize

We use cookies