भगवान विष्णु का सिर कैसे कटा?

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भगवान विष्णु का सिर कैसे कटा?

दीमक को कहा: धनुष का जमीन पर रखे अग्र को खा जाओ।
धनुष गिरेगा तो भगवान जग जाएंगे।
दीमक ने कहा: किसी की नींद में बाधा डालना, कथा में विघ्न डालना, पति-पत्नी के एकांत को भंग करना, माता से बच्चे को अलग करना- ये सब ब्रह्महत्या के समान पाप हैं।
मैं क्यों करूं इस पाप को?
भगवान के निद्रा सुख को मैं नहीं तोडने वाला।
बाद में दीमक ने कहा: चलो इसमे मेरा कोई लाभ है तो सोचता हूं।
ब्रह्मा जी ने कहा: उसकी भी व्यवस्था हो जाएगी।
जब हम यज्ञ करेंगे, होम कुण्ड के आस पास बाहर जो भी भक्ष्य भोजन गिरेगा उसका तुम हिस्सेदार बनोगे।
देखो, दैविक स्तर में भी बात लेन देन की ही हो रही है क्यों कि सृष्टि के बाद जगत में जैसे कार्य और कारण का नियम है वैसे ही है लेन देन का भी नियम।
चाहे व्यवहार देवता और देवता के बीच में हो, मनुष्य और देवता के बीच में हो, या मनुष्य और मनुष्य के बीच में हो।
केवल निस्वार्थ दान से काम नहीं चलेगा।
केवल त्याग से दुनिया नहीं चलेगी।
व्यवहार का सबसे प्रथम तरीका है लेन देन।
वेद में बोला है- शतहस्तसमाहर सहस्रहस्तसङ्किर।
सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से बांटो।
तुम्हारे पास रहेगा तो ही बाँटोगे न?
लेन देन में कोई दोष नहीं है, इसमें कोई अधमता नही है।
यह ही सबसे मुख्य और प्रथम रीति है व्यवहार के लिये।
देवता लोग भी इसका आचरण करते है।
ब्रह्मा जी का वचन सुनकर दीमक धनुष को खाने लगा।
अचानक धनुष की डोरी खुल गयी।
धनुष सीधा हो गया।
उसका तना खुल गया।
उसके कारण जो शब्द निकला, उससे पृथ्वी काँपने लगी, ब्रह्माण्ड प्रक्षुब्ध हो गया, समंदर में ऊंची लहरें उडने लगी, जानवर डरकर इधर उधर भागने लगे।
देवता लोग भी घबरा गये, उन्होंने देखा तो भगवान के शरीर के ऊपर सर नहीं था।
धनुष की डोरी खुलने के आघात से, उसका अग्र जिसके ऊपर भगवान ने अपना गर्दन रखा था उस अग्र ने भगवान के गर्दन को काट दिया।
भगवान के शिरोहीन धड को देखकर सब व्याकुल हो गये और रोने लगे।
यह कैसा संकट पैदा हो गया।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
यह तो आत्मा के साथ है।
यहाँ पर आत्माओं के आत्मा परमात्मा पड़े हैं शिरोरहित धड बनकर।
देवताओं ने निश्चय कर लिया कि उनका अंत पास आ गया है।
यह क्या माया है?
कौन ले गया भगवान का सिर?
हमने तो अच्छा समझ कर किया।
भगवान जग जाएंगे तो उनकी अनुमति प्राप्त करके यज्ञ करेंगे।
इतनी सावधानी कि उनको प्रत्यक्ष नहीं जगायेंगे।
वे स्वयं ही जग जाएँ।
इसलिये दीमक को काम पर लगाया।
लेकिन यह क्या हो गया?
ये सब हमारी ही गलती है, देवता लोग रो रहे थे।
देव गुरु बृहस्पति बोले: अब यह रोना पीटना बंद करो।
विवेक से काम लो, कुछ उपाय ढूंढो।
दैवश्च पुरुषार्थश्च देवेश सदृशावुभौ।
उपायश्च विधातव्यो दैवात्फलति सर्वथा।
एक और महान तत्व, बृहस्पति देवेन्द्र से कह रहे है।
भाग्य से भी काम बनता है।
प्रयास से भी काम बनता है।
दोनों समान है।
इन्द्र बोले: मैं नहीं मानता पुरुषार्थ को, क्या फायदा है पुरुष के प्रयत्न का?
देखो स्वयं भगवान विष्णु का सिर कट गया।
भाग्य और दुर्भाग्य ये दो ही काम करते हैं, प्रयत्न से कुछ नहीं होता।
बृहस्पति बोले: यह सोच गलत है, प्रयास अलग, भाग्य अलग।
दोनों की महत्ता है, दोनों ही श्रेष्ठ हैं।
दोनों अपने अपने स्थानों में हैं।
भाग्य के भरोसे न रहकर प्रयास करना चाहिए।
देवकृपा से प्रयास सफल होता है।
देवगुरु का उपदेश है यह देवराज के प्रति।
जो तुम्हारे माथे पर लिखा है वह मिल जाएगा; ऐसा नहीं कहा उन्होंने।
देवगुरु कहते हैं: प्रयास करो।
और तुम यहां भाग्य के भरोसे बैठे हो।
भाग्य और प्रयास दोनों फल देते हैं।
लेकिन इन के अंतर को गौर से समझना चाहिए।
भाग्यवश फल प्राप्ति तुम्हारा ही पूर्व जन्म में किया हुआ अच्छे कर्मों का फल है।
इसे तुमसे कोई छीन नहीं सकता, कभी न कभी तुम्हें मिलेगा ही।
इसमें भगवान का कोई हाथ नहीं है।
लेकिन इसका कोई भरोसा नहीं है, तुम ने कर रखा है तो मिलेगा।
लेकिन प्रयास की सफलता में भगवान हाथ देते हैं।
आशीर्वाद काम करता है।
यदि तुम अपने प्रयास से, परिश्रम से सफल होना चाहते हो तो तुम्हें भगवान की कृपा अवश्य चाहिए।
भाग्य के भरोसे रहना है तो इसकी आवश्यकता नहीं है।
भगवान उन्हीं लोगों के लिये है, सुस्त व आलसी लोगों के लिये नहीं।
सुस्त व आलसी लोग अपने भाग्य के भरोसे जीयें।
इसका प्रमाण है लक्ष्मी शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत में।
लक्ष्यति पश्यति उद्योगिनमिति लक्ष्मीः।
परिश्रम करने वाले के ऊपर जिसकी नजर पड़ती है वह है लक्ष्मी।
लक्ष्मी केवल परिश्रमियों के ही ऊपर कटाक्ष करती है, भाग्य के भरोसे रहने वाले के ऊपर नहीं।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
लक्ष्मी उस उत्तम पुरुष के पास ही जाती है जो परिश्रमी है।
अयोग्य होते हुए भी यदि कोई श्रीमान दिखाई दे रहा है तो समझ लेना वह उसके द्वारा किये हुए कर्म का फल है।
कभी नहीं कहना कि भगवान ने उसे बहुत कुछ दे दिया।
इस में कोई महानता की बात नहीं है।
उसे अनुग्रहीत नहीं समझना।
बस इतना है कि उसके काम का वेतन उसके पास थोड़ी देर से आ गया है।
ऐसे तत्वों को समझना ही पुराण का काम है ।

 

  • दीमक ने धनुष को खाने से पहले आपत्ति क्यों की?
    दीमक का तर्क नैतिक था, न कि भयजन्य। उसने कहा कि किसी की नींद में विघ्न डालना, पवित्र कार्य में बाधा बनना, या संवेदनशील संबंधों को तोडना घोर पाप के समान है। वह किसी के सुख को तोडकर लाभ नहीं चाहता था। यह दिखाता है कि नैतिक विवेक केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं माना गया। कथा यह संकेत देती है कि सही-गलत की समझ हर स्तर पर अपेक्षित है।

  • अगर काम से हानि हो सकती थी, तो दीमक ने बाद में सहमति क्यों दी?
    क्योंकि उसने अपने लिए व्यावहारिक लाभ की स्पष्ट व्यवस्था देखी। जब उसे बताया गया कि यज्ञ से गिरने वाले अन्न में उसका हिस्सा होगा, तब उसने लेन-देन को स्वीकार किया। यह लालच नहीं, बल्कि व्यवहारिक संतुलन था। बिना किसी प्रतिफल के काम करना हर स्थिति में संभव नहीं होता। यही सोच उसे आगे बढने के लिए प्रेरित करती है।

  • क्या किसी लाभ के लिए नैतिक आपत्ति छोडना गलत नहीं है?
    यह गलत तभी है जब लाभ अन्यायपूर्ण हो। यहां लाभ स्पष्ट, सीमित और संतुलित था, किसी का शोषण नहीं था। व्यवहार में लेन-देन का होना नैतिकता के विरुद्ध नहीं माना गया। समस्या तब होती है जब लाभ के लिए विवेक पूरी तरह खत्म हो जाए। इस प्रसंग में विवेक बना रहा, इसलिए यह स्वीकार्य ठहरता है।


  • लेन-देन को व्यवहार की पहली रीति क्यों कहा गया है?
    क्योंकि संसार कारण और परिणाम के नियम पर चलता है। बिना कुछ पाए लगातार देना व्यावहारिक नहीं है। पहले अर्जन होता है, फिर वितरण। यही संतुलन समाज को चलाता है। इसे ही व्यवहार की मूलभूत व्यवस्था कहा गया है।

  • क्या केवल निस्वार्थ दान से समाज नहीं चल सकता?
    दान आवश्यक है, लेकिन अकेला पर्याप्त नहीं। अगर कमाने की व्यवस्था टूट जाए, तो देने की क्षमता भी खत्म हो जाती है। पहले संसाधन चाहिए, फिर उदारता। इसलिए अर्जन और वितरण दोनों जरूरी हैं। यही बात वेद व व्यवहार दोनों में दोहराई गई है।

  • क्या लेन-देन को महिमा देना स्वार्थ को बढावा नहीं देता?
    नहीं, क्योंकि यहां स्वार्थ नहीं, संतुलन की बात है। लेन-देन का अर्थ शोषण नहीं होता। यह स्पष्ट समझ है कि हर क्रिया का कोई प्रतिफल होता है। जब यह नियम स्वीकार होता है, तब व्यवस्था टिकती है।


  • धनुष टूटने से इतना भयानक संकट कैसे उत्पन्न हुआ?
    धनुष की डोरी खुलते ही उसका संतुलन बिगड गया। जिस स्थान पर सिर टिका था, वहीं आघात पडा। इससे ऐसा कंपन उत्पन्न हुआ कि प्रकृति स्तर पर प्रतिक्रिया दिखी। यह दिखाता है कि छोटी सी क्रिया भी विशाल परिणाम ला सकती है। कथा कारण-परिणाम की श्रृंखला को तीव्रता से दर्शाती है।

  • क्या यह सब केवल संयोग था?
    कथा इसे संयोग नहीं मानती। यह दिखाया गया है कि अधूरी समझ और अप्रत्यक्ष उपाय भी विनाशकारी हो सकते हैं। देवताओं ने सावधानी समझकर जो किया, वही संकट का कारण बन गया। इससे यह शिक्षा मिलती है कि अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते। सही विवेक भी जरूरी है।

  • क्या इतनी बड़ी दुर्घटना अवास्तविक नहीं लगती?
    कथा का उद्देश्य भौतिक यथार्थ नहीं, बौद्धिक चेतावनी है। यह अतिशयोक्ति के माध्यम से चेतना जगाती है। छोटे निर्णयों के दूरगामी परिणाम समझाने के लिए यह रूपक प्रयोग किया गया है। इसे शाब्दिक नहीं, तात्त्विक स्तर पर समझना चाहिए।


  • देवताओं का विलाप किस बात को दर्शाता है?
    यह उनके अहंकार के टूटने को दर्शाता है। उन्होंने सोचा था कि सब कुछ उनके नियंत्रण में है। संकट आते ही उन्हें अपनी सीमाएं दिखीं। यह स्थिति मनुष्य की भी है जब योजना विफल हो जाती है। कथा असहायता की स्वीकारोक्ति दिखाती है।

  • देवताओं ने खुद को दोषी क्यों माना?
    क्योंकि उन्होंने बिना प्रत्यक्ष अनुमति के उपाय किया। उन्होंने परिणाम की पूरी कल्पना नहीं की थी। बाद में उन्हें समझ आया कि चतुराई और विवेक में अंतर है। यही आत्मग्लानि उनके विलाप में झलकती है।

  • क्या यह शिक्षा नहीं कि कुछ भी करना ही नहीं चाहिए?
    नहीं, यह निष्क्रियता का संदेश नहीं है। यह अधकचरे उपायों से बचने की चेतावनी है। सोच-समझकर किया गया प्रयास ही उपयोगी होता है। अंधी चतुराई विनाश ला सकती है।


  • बृहस्पति ने रोना बंद कर विवेक से सोचने को क्यों कहा?
    क्योंकि संकट समाधान भावना से नहीं, विवेक से होता है। रोना स्थिति नहीं बदलता। जब सोच स्थिर होती है, तभी उपाय निकलते हैं। यह व्यावहारिक बुद्धि का संदेश है।

  • दैव और पुरुषार्थ को समान क्यों कहा गया?
    क्योंकि दोनों अलग-अलग स्तरों पर काम करते हैं। एक पूर्व कारणों का फल है, दूसरा वर्तमान प्रयास का साधन। दोनों मिलकर परिणाम देते हैं। किसी एक को नकारना अधूरी समझ है।

  • क्या यह विरोधाभास नहीं कि दोनों समान कहे जाएं?
    नहीं, क्योंकि समान का अर्थ एक जैसे नहीं, बल्कि समान महत्व वाला है। दोनों की भूमिका अलग है। जैसे बीज और पानी दोनों जरूरी हैं। एक के बिना दूसरा निष्फल है।


  • इन्द्र ने पुरुषार्थ को व्यर्थ क्यों कहा?
    क्योंकि उसने तत्काल घटना से निष्कर्ष निकाल लिया। उसने देखा कि प्रयास के बावजूद संकट आया। इसलिए उसने भाग्य को ही निर्णायक मान लिया। यह जल्दबाजी का निष्कर्ष था।

  • क्या असफलता के बाद प्रयास पर संदेह स्वाभाविक नहीं?
    स्वाभाविक है, लेकिन सही नहीं। एक घटना से पूरे सिद्धांत को खारिज नहीं किया जा सकता। प्रयास का मूल्य दीर्घकाल में दिखता है। तत्काल परिणाम से अंतिम निष्कर्ष निकालना भूल है।

  • क्या सच में प्रयास से कुछ नहीं होता?
    ऐसा मानना तथ्यात्मक रूप से गलत है। इतिहास, अनुभव और दैनिक जीवन इसका खंडन करते हैं। प्रयास न हो तो कोई संभावना भी नहीं बनती। भाग्य बिना प्रयास निष्क्रिय रहता है।


  • बृहस्पति ने भाग्य और प्रयास में अंतर कैसे समझाया?
    उन्होंने कहा कि भाग्य पूर्व कर्मों का फल है। वह निश्चित है, पर समय अनिश्चित है। प्रयास वर्तमान कर्म है, जिसमें सहायता मिलती है। दोनों अलग स्रोतों से फल देते हैं।

  • क्यों कहा गया कि प्रयास में सहायता मिलती है?
    क्योंकि प्रयास से ही दिशा बनती है। जब दिशा बनती है, तब सहयोग, अवसर और समर्थन आते हैं। बिना प्रयास कोई सहायक तत्व सक्रिय नहीं होता। यही बात आशीर्वाद के रूप में कही गई है।

  • क्या यह कहने से जिम्मेदारी बाहर नहीं चली जाती?
    नहीं, क्योंकि जिम्मेदारी प्रयास की है। सहायता केवल पूरक है, विकल्प नहीं। असफलता पर प्रयास को दोष देना गलत है। प्रयास करना अनिवार्य बना रहता है।


  • कर्मफल को किसी की कृपा क्यों नहीं कहा गया?
    क्योंकि वह व्यक्ति के अपने कर्मों का परिणाम है। उसे किसी ने दिया नहीं, उसने अर्जित किया है। देर से मिलना भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसमें विशेष अनुग्रह मानना भ्रम है।

  • अगर अयोग्य व्यक्ति संपन्न दिखे तो कैसे समझें?
    उसे पूर्व कर्मों का परिणाम समझना चाहिए। वर्तमान योग्यता से उसका सीधा संबंध जरूरी नहीं। यह समझ ईर्ष्या और भ्रम दोनों को कम करती है। इससे न्यायबुद्धि संतुलित रहती है।

  • क्या इससे नैतिकता कमजोर नहीं होती?
    नहीं, बल्कि मजबूत होती है। यह बताता है कि हर फल का कारण होता है। दिखावे से निर्णय नहीं करना चाहिए। इससे व्यक्ति अपने कर्म पर ध्यान देता है।


  • लक्ष्मी को परिश्रम से क्यों जोडा गया है?
    क्योंकि संपन्नता सक्रियता की ओर आकर्षित होती है। जो प्रयास करता है, वही अवसर पहचानता है। परिश्रम दृष्टि खोलता है। इसी को लक्ष्मी की दृष्टि कहा गया है।

  • क्या केवल मेहनत करने से सफलता मिलती है?
    मेहनत आवश्यक शर्त है, गारंटी नहीं। लेकिन बिना मेहनत सफलता असंभव है। मेहनत संभावना बनाती है। वही संभावना फल में बदलती है।

  • क्या यह भाग्य को पूरी तरह नकारता है?
    नहीं, भाग्य को स्थान दिया गया है, पर सर्वोपरि नहीं। भाग्य निष्क्रिय है, प्रयास सक्रिय। सक्रिय तत्व को प्राथमिकता दी गई है। यही व्यावहारिक संतुलन है।

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देवी भागवत

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