विद्या मित्रं प्रवासेषु

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च |
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ||

 

यात्रा के समय सब से अच्छा दोस्त विद्या ही होता है | घर में पत्नी ही सब से अच्छा दोस्त होता है | जब शरीर में रोग आ जाता है तो औषधि ही सब से अच्छा दोस्त होता है | मृत्यु के बाद तो सब से अच्छा दोस्त, जीवित रहते समय किया हुआ धर्म कार्य ही होता है |

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शिव जी को अद्वितीय क्यों कहते हैं?

क्यों कि शिव जी ही ब्रह्मा के रूप में सृष्टि, विष्णु के रूप में पालन और रुद्र के रूप में संहार करते हैं।

देवकार्य से पूर्व पितरों को तृप्त करें

देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते । देवताभ्यो हि पूर्वं पितॄणामाप्यायनं वरम्॥ (हेमाद्रिमें वायु तथा ब्रह्मवैवर्तका वचन) - देवकार्य की अपेक्षा पितृकार्य की विशेषता मानी गयी है। अतः देवकार्य से पूर्व पितरों को तृप्त करना चाहिये।

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