
सुभाषित -
उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः ।
तथैव ज्ञानकर्माभ्यां जायते परमं पदम् ।।
अर्थ -
जिस प्रकार एक पक्षी अपने दोनों पंखों से ही आकाश पर पहुंच पाता है वैसे ही मनुष्य अपना ज्ञानरूपी और कर्मरूपी दोनों पंखों से ही परम पद को प्राप्त कर सकता है ।
कथा -
एक छोटा सा गाँव था। वहाँ आरव नाम का एक लड़का रहता था। उसका सपना था ऊँचा उठना, कुछ बड़ा करना।
आरव बहुत पढ़ता था। शास्त्र, ज्ञान, सिद्धांत — सब समझता था। गाँव के लोग कहते, ‘यह लड़का बहुत ज्ञानी है।’
लेकिन एक समस्या थी। वह केवल सोचता था, करता कुछ नहीं था।
समय बीतता गया। उसके साथ के कई लोग आगे निकल गए। किसी ने व्यापार शुरू किया, किसी ने खेती में नया प्रयोग किया। आरव अब भी योजना ही बनाता रहा।
एक दिन वह जंगल में घूम रहा था। उसने एक पक्षी को देखा। पक्षी उड़ने की कोशिश कर रहा था, पर बार-बार गिर रहा था।
आरव ने ध्यान से देखा। उस पक्षी का एक पंख कमजोर था।
वह सोचने लगा — ‘एक पंख से उड़ान कैसे संभव है?’
तभी उसके भीतर कुछ बदल गया।
उसे अपने जीवन का उत्तर मिल गया।
‘मेरे पास ज्ञान है, पर कर्म नहीं। मैं भी उसी पक्षी की तरह हूँ।’
उस दिन से आरव ने केवल सोचना नहीं, करना शुरू किया।
छोटे-छोटे कदम उठाए। जो सीखा था, उसे जीवन में उतारा।
धीरे-धीरे उसका जीवन बदलने लगा।
लोग अब केवल उसकी बातें नहीं, उसके परिणाम भी देखने लगे।
कुछ सालों बाद वही आरव गाँव का सबसे सफल और सम्मानित व्यक्ति बन गया।
उसने समझ लिया था —
केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं।
केवल कर्म भी पर्याप्त नहीं।
दोनों साथ हों, तभी ऊँचाई मिलती है।
जैसे पक्षी दोनों पंखों से उड़ता है,
वैसे ही जीवन में सफलता ज्ञान और कर्म — दोनों से मिलती है।
Astrology
Bhagavad Gita
Bhagavatam
Bharat Matha
Devi
Devi Mahatmyam
Ganapathy
Garuda Puranam
Glory of Venkatesha
Hanuman
Kathopanishad
Mahabharatam
Mantra Shastra
Mystique
Practical Wisdom
Purana Stories
Radhe Radhe
Ramayana
Rare Topics
Rigveda Explained
Rituals
Sages and Saints
Shiva
Spiritual books
Sri Suktam
Story of Sri Yantra
Temples
Vedas
Vishnu Sahasranama
Yoga Vasishta