अनुसृत्य सतां वर्त्म

अनुसृत्य सतां वर्त्म

अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलसंसदम् ।
अनुसृत्य सतां वर्त्म यदल्पमपि तद्बहु ।।

दूसरों को पीड़ा पहुँचाए बिना, दुष्टों की संगति किए बिना और सज्जनों द्वारा प्रदर्शित मार्ग का अनुसरण करते हुए जो सूक्ष्म उपलब्धि भी प्राप्त की जाती है, वह वास्तव में बहुत बड़ी और मूल्यवान होती है।

वर्तमान युग में सफलता को केवल भौतिक पैमानों, जैसे धन, पद और ऐश्वर्य से मापा जाता है। किंतु भारतीय नीति शास्त्र हमें स्मरण कराता है कि उपलब्धि की मात्रा से अधिक उसके 'साधन' महत्वपूर्ण हैं। यदि सफलता अनैतिक मार्ग से प्राप्त की गई हो, तो वह पतन का कारण बनती है। यह श्लोक मानवीय उत्कर्ष के लिए तीन शाश्वत सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है।

इस श्लोक में श्रेष्ठ जीवन के तीन अनिवार्य पक्ष बताए गए हैं:

  1. संवेदनशीलता (अकृत्वा परसन्तापम):

हमारे किसी भी निर्णय या कार्य से किसी अन्य प्राणी को मानसिक अथवा शारीरिक संताप नहीं होना चाहिए। यदि हमारी उन्नति की नींव में दूसरों की वेदना सम्मिलित है, तो वह प्रगति अनैतिक है। वास्तविक उत्थान वही है, जो सर्वहितकारी हो और जिसमें किसी का अहित न छिपा हो।

  1. कुसंगति का निषेध (अगत्वा खलसंसदम्):

'खलसंसद' अर्थात दुर्जनों की सभा या दुष्टों का साथ। कई बार व्यक्ति त्वरित लाभ के लोभ में अनुचित व्यक्तियों की सहायता ले लेता है। नीति कहती है कि कुमार्गियों के साथ जुड़कर प्राप्त किया गया वैभव अंततः अपमान का ही कारण बनता है। आत्म-सम्मान की रक्षा हेतु मर्यादाहीन लोगों से दूरी बनाना अनिवार्य है।

  1. आदर्शों का अनुसरण (अनुसृत्य सतां वर्त्म):

विवेकशील और चरित्रवान महापुरुषों ने जिस मर्यादा का पालन किया है, वही 'सन्मार्ग' है। सत्य, निष्ठा और कठिन परिश्रम का यह मार्ग यद्यपि लंबा प्रतीत हो सकता है, परंतु यही भविष्य को सुरक्षित और उज्जवल बनाता है।

श्लोक का अंतिम चरण— 'यदल्पमपि तद्बहु'—जीवन का महानतम दर्शन है। अनैतिक रूप से अर्जित विशाल संपदा की तुलना में धर्म पूर्वक प्राप्त किया गया 'अल्प' (थोड़ा) भी अधिक सुखदायी होता है। जब मनुष्य सन्मार्ग पर चलता है, तो उसे आत्मिक संतोष और निर्भयता प्राप्त होती है। नैतिकता के साथ प्राप्त की गई सूक्ष्म सफलता भी व्यक्ति के चरित्र को सुदृढ़ करती है और समाज में उसे 

सच्ची सिद्धि वह नहीं है जिसे संसार विशाल कहे, अपितु वह है जिसे प्राप्त करते समय आपकी अंतरात्मा शुद्ध और प्रसन्न रहे। यदि आप परपीड़ा से मुक्त रहकर और मर्यादा का उल्लंघन किए बिना न्यूनतम भी अर्जित करते हैं, तो मान लीजिए कि आपने वह सब कुछ प्राप्त कर लिया है जो वास्तव में श्रेष्ठ है।

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