गुणायन्ते दोषा: सुजनवदने

गुणायन्ते दोषा: सुजनवदने

गुणायन्ते दोषा: सुजनवदने दुर्जनमुखे
गुणा दोषायन्ते तदिदमपि नो विस्मयपदम् ।
महामेघं क्षारं पिबति कुरुते वारि मधुरं
फणिः क्षीरं पीत्वा वमति गरलं दुःसहतरम् ।।

जिस प्रकार मेघ समुद्र के खारे पानी को ग्रहण कर के मीठा पानी बरसाता है उसी प्रकार सज्जन किसी में विद्यमान दोषों को गुणों में बदल देते हैं । जिस प्रकार सांप दूध पीकर भी विष बाहर निकालता है वैसे ही दुर्जन किसी के गुणों को भी दोषों में बदल देते हैं ।

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