पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्|
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते|

पृथ्वी पर यदि कोई सच्चे रत्न हैं, तो वे तीन ही हैं — जल, अन्न और सुभाषित वचन।
हां, वही जल जो जीवन को प्रवाह देता है, वही अन्न जो जीवन को पोषण देता है,
और वही सुभाषित — सद्विचारों से भरे वचन — जो जीवन को दिशा देते हैं।
यह तीनों न तो खदानों में मिलते हैं, न बाज़ार में बिकते हैं।
ये रत्न तो जीवन के मूलाधार हैं — शरीर, पेट और आत्मा — तीनों को तृप्त करते हैं।

परंतु कैसा दुर्भाग्य!
मूढ़ लोग, अज्ञानवश, इन रत्नों को नहीं पहचानते।
वे तो पत्थरों के टुकड़ों — हीरे, मोती, माणिक्य — को ही 'रत्न' कह बैठते हैं।
जो जल की एक बूँद का मूल्य नहीं जानता,
जो एक सच्चे वचन से ऊपर सोने की चमक को रखता है —
वो रत्नों का अधिकारी नहीं, केवल एक लोभी आत्मा है।

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