अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयम्

अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति|

क्षयतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्|

 

हे सरस्वती मां, आप के पास जो विद्यरूपी धनकोष है ये बडा अजीब है| धन को दूसरों को देंगे तो खर्च होता है और बचाने पर बढता है| पर विद्या को दूसरों को देने पर ये बढता है और दूसरों को न देते हुए सिर्फ अपने पास रखने पर नष्ट हो जाता है|

 

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