कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अरुणाचल से गुजरात तक फैला हुआ है हमारा देश।
हमारी अपनी भारतमाता।
यह हमारे लिए धर्म भूमि है, कर्म भूमि है।
हमारे ग्रंथों के अनुसार, विश्व भर में भारतवर्ष ही एक कर्म भूमि है, बाकी सब भोग भूमि है।
'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि'।
लंकेश का वध करने के बाद रामजी से पूछा गया - लंका में सब कुछ है, समृद्ध है लंका, वहां का हर घर सोने से बना हुआ है। आप यहीं रहकर क्यों नहीं राज करते?
रामजी ने कहा, सब कुछ है यहां, पर यह मेरी जन्मभूमि के समान नहीं है। कोई भी महिला चाहे जितनी भी अच्छी हो, मां के समान नहीं हो सकती न।
इसीलिए रामजी ने कहा – स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं मां और जन्मभूमि।
विश्व कल्याण का हर वेद मंत्र इसी भूमि में प्रकट हुआ।
ऋषि-मुनियों ने यहीं तपस्या की।
उन्होंने सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञान – इनका निर्णय इसी भारतवर्ष में किया।
जीवन और मरण के रहस्यों की व्याख्या ऋषि-मुनियों ने यहीं की।
भारत माता की अखंडता के कई दृष्टांत हैं।
हमारे चार धाम – रामेश्वरम, बद्रीनाथ, पुरी और द्वारका को देखिए।
देश के चारों दिशाओं में।
सप्त मोक्ष पुरियों को देखिए – अयोध्या, मथुरा, हरद्वार, काशी, कांची, उज्जैन, द्वारका।
कोई उत्तर में, कोई दक्षिण में, कोई पश्चिम में।
यह कोई नूतन आशय नहीं है।
हजारों साल पहले लिखे हुए सनातन धर्म के ग्रंथों में इनका उल्लेख है, पृथक-पृथक नहीं, एक ही साथ –
चार धाम, सप्त मोक्ष पुरी।
भारत सर्वदा अखंड रहा है, यही दिखाता है न यह।
संपूर्ण भारतवर्ष के लिए वेद – चारों वेद: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
संपूर्ण भारतवर्ष में इनका ही अध्ययन और पाठ होता है।
इतिहास और पुराण – जो कश्मीर में हैं, वही केरल और तमिलनाडु में भी हैं।
वही असम में और राजस्थान में हैं।
तमिलनाडु में जो कम्ब रामायण है, असम में जो सप्तकांड रामायण है, उत्तर में जो रामचरितमानस है,
और गुजरात में जो गिरधर रामायण है – रामजी ही तो हैं सब में।
वृन्दावन से लेकर श्रीरंगम तक, गुरुवायूर तक उसी एक कन्हैया की ही पूजा होती है।
द्वारका धाम में, पुरी जगन्नाथ में।
हमारे अद्वैत सिद्धांत के आचार्य बैठे हैं – उत्तर, पूरब, दक्षिण और पश्चिम में।
भारत की अखंडता को जानकर ही शंकराचार्य जी ने इन चार दिशाओं, चारों कोनों में मठों की स्थापना की, अपने गांव में तो नहीं किया।
अपनी दिग्विजय यात्रा में उन्होंने जिस संपूर्ण भूमि में विद्वानों के साथ वाद-विवाद किया, भारतवर्ष ही तो है वह।
कहां-कहां गये आचार्यजी?
अजमेर, बद्रीनाथ, अयोध्या, काठमांडू, कामाख्या, पुरी, सिंहाचल, शृंगेरी, तिरुवनंतपुरम, नासिक, तुलजापुर, सोमनाथ, उज्जैन, तिरुपति, हम्पी।
तभी तो उनका पर्यटन संपूर्ण भारत का हुआ और वे सर्वज्ञ पीठ पर चढ़े।
ऋषि-मुनि सार्वभौमिक हैं।
उन्होंने इस कर्मभूमि में कहां-कहां तपस्या की?
कोई हिमालय में,
कोई सह्याद्री में,
कोई चित्रकूट में।
क्योंकि हमारा देश अखंड ही रहा है,
और अखंड ही रहेगा।
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