हमारे राष्ट्रगान का अर्थ

 

हमारा राष्ट्रगान जन गण मन के रचयिता गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर हैं ।
इस गीत का सबसे पहले प्रकाशन 'भारत भाग्य विधाता' नाम से तत्त्वबोधिनी पत्रिका में सन १९०५ में हुआ था ।
यह ब्रह्म समाज की पत्रिका थी और गुरुदेव इस पत्रिका के संपादक थे ।

जन गण मन का पहला सार्वजनिक आलापन २७ दिसंबर १९११ में कोलकाता में इन्डियन नेशनल कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में हुआ था ।
इसके तुरंत बाद १९१२ में गुरुदेव टैगोर की भांजी सरला देवी चौधुरानी ने इसे ब्रह्म समाज के एक समारोह में बिशन नारायण डार, अंबिका चरण मजुम्दार जैसे प्रमुख नेताओं के सामने छात्रों के एक गण के साथ प्रस्तुत किया था ।
गुरुदेव ने स्वयं इसे १९१९ में आंध्रप्रदेश के मदनपल्ली में छात्रों के सामने गाया था, जिसे सुनकर वे काफी उत्तेजित हो गये थे ।

इंदिरा देवी चौधुराणी ने 'गीत पञ्चशती' नाम से ५०० रवीन्द्र गीतों का संकलन किया था ।
इसमें जन गण मन को स्वदेश श्रेणी के अन्तर्गत रखा है ।

इस गीत में कुल मिलाकर पांच पद हैं ।
इनमें से पहले पद को भारतीय संविधान सभा ने २४ जनवरी १९५० को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया ।

आइए, अब राष्ट्रगान के अर्थ को समझते हैं ।

जनगणमन अधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता ।
जन गण के मन के अधिनायक, शासक और भारत के भाग्य के विधाता की जय हो ।
जन गण – सारे लोगों के मन का शासक कौन है ।
परमेश्वर – जिसे हम अन्तर्यामी कहते हैं ।
अन्दर से यम करनेवाले, नियंत्रण करनेवाले ।

यही परमेश्वर भारत के भविष्य के विधाता हैं, लिखनेवाले हैं ।
विधाता का अर्थ है ब्रह्माजी ।
ब्रह्माजी किसी के भी भविष्य को कैसे लिखते हैं ।
उनके कर्म को देखकर ।

अब हम सब भारतवासी एक साथ स्वदेश के लिये स्वतंत्रता के लिए प्रयास कर रहे हैं ।
इसी कर्म के ऊपर हमारा भविष्य आधारित है ।
इस कर्म को देखकर परमेश्वर हमारा भविष्य निर्धारित करेंगे ।

जन्मभूमि की उपमा कभी माता के साथ तो कभी पिता के साथ भी की जाती है ।
मातृभूमि जैसे पितृभूमि भी कहते हैं ।
माता और पिता — दोनों को देव रूप से मानना हमारी संस्कृति है ।
'मातृदेवो भव, पितृदेवो भव' ।

वेद में भी 'रोदसी' कहा गया है — भूमि माता है, तो स्वर्ग पिता, दोनों एक साथ जुड़े हैं ।
महात्मा गांधी ने भी कई जगहों पर 'पितृभूमि' शब्द का प्रयोग किया है ।
हमारी जन्मभूमि ही हमारे लिए परमेश्वर है, माता समान और पिता समान ।

आपका नाम सुनते ही, भारत इस शब्द को सुनते ही —
पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे ।

पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड, उत्कल, बंगाल — इन सब प्रांतों में रहने वालों के मन में ।
विन्ध्य और हिमाचल में रहनेवालों के मन में ।
यमुना और गंगा किनारे बसे हुए लोगों के मन में ।
आपका नाम सुनते ही — भारत का नाम सुनते ही — देशभक्ति और उत्साह की तरंगें उठती हैं ।

तव शुभ आशिष मागे ।
हम सब आपके आशीर्वाद मांगते हैं ।

गाहे तव जयगाथा ।
हम सब आपके, भारत-रूपी परमेश्वर की जयगाथाएं गाते हैं ।

जनगणमंगलदायक जय हे भारतभाग्यविधाता ।
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे ।।

आप ही सारे लोगों का मंगल करने वाले हैं ।
आप ही सारे भारतवासियों को सौभाग्य देने वाले हैं ।
आपकी सर्वदा जय हो ।

हमारे राष्ट्रगान में एक विशेष बात यह है कि
दुनिया के अन्य राष्ट्रगानों में ईश्वर के प्रति प्रार्थनाएं मिलेंगी,
पर हमारा राष्ट्रगान ऐसा है जिसमें हम देश को ही परमेश्वर मानकर स्तुति करते हैं ।
हमारे लिए देश सेवा ही ईश्वर सेवा है ।

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