
सनातन धर्म का आशय है -
सर्वे सन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।
विश्व के समस्त प्राणी सुखी हो जाएं। आमय का अर्थ है रोग – निरामय – स्वस्थ। समस्त प्राणी स्वस्थ रहें। समस्त प्राणी शुभ को ही देखें, शुभ का ही अनुभव करें। किसी भी प्राणी को कभी दुख न होवे।
मानव के रूप में हमने जन्म क्यों लिये? हम अभी तक ६४ लाख योनियों में जन्म लेते-लेते भटक रहे थे। अब हमें मानव जन्म का सौभाग्य मिला है भगवद्कृपा से। अब हमें प्रयास करना चाहिए कि आगे यह जन्म-मरण का सिलसिला न हो। इसी जन्म में भगवद्प्राप्ति हो। उनके दिव्य लोक पहुँच जाएं। उनके साथ सर्वदा के लिए वहीं रहें। उनके साथ जुड़ जाएं, जिसे सायुज्य कहते हैं।
क्योंकि इसी में आनन्द है। स्थायी रूप से इसी में आनन्द है। धरती का आनन्द क्षणिक है। धरती पर सुख और दुख साथ-साथ ही रहते हैं। धरती पर अगर सचमुच देखा जाए तो सुख है ही नहीं। दुख के निवारण को ही हम सुख सोचकर बैठते हैं। भूख दुख है। भूख का निवारण को हम सुख समझते हैं।
मानव द्वारा ही भगवद्प्राप्ति हो सकती है क्योंकि मानव के पास ही बुद्धि और विवेक हैं। मन सारे जानवरों में है। प्राण पेड पौधों में भी है। पर विवेक पर आधारित बुद्धि केवल मानव के पास ही है।
जप, तप, दान, परोपकार, पूजा, सेवा – ये सारे भगवद्प्राप्ति के साधन हैं। ये मानव ही कर सकता है।
इन साधनों में से सेवा किसको कहते हैं? मानव अगर अपने सुख के लिए प्रयास करेगा तो वह स्वार्थ है। मानव सबके सुख के लिए प्रयास करेगा तो वह सेवा है। पहला स्वार्थ है, तो यह परमार्थ है। सेवा एक बहुत ही श्रेष्ठ मनोभाव है, जो सबके हित में रहता है। समस्त प्राणियों के हित में रहता है। वह बहुत जल्द ही भगवान को पा लेता है।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।
– भगवद्गीता
सेवा के दो अंग हैं –
एक: किसी भी प्राणी को दुख मत पहुँचाओ।
दूसरा: समस्त प्राणियों को सुख देने का प्रयास करो।
यह जगत एक दर्पण जैसा है। दर्पण को देखकर मुस्कुराओ, दर्पण में जो आपका प्रतिबिंब है वह भी आपको देखकर मुस्कुराएगा। दर्पण को देखकर तेवर चढ़ाओ, वह भी आपके साथ वही करेगा।
जगत भी ऐसा ही है। सुख दो, सुख पाओ। दुख दो, दुख पाओ।
तन से, मन से, वाणी से – तीनों से।
मानव जन्म इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
केवल मनुष्य के पास निर्णय लेने की विवेकयुक्त बुद्धि है, जिससे वह धर्म और अधर्म में भेद कर सकता है। यही सामर्थ्य उसे भगवद्प्राप्ति योग्य बनाती है।
भगवान ने हमें मनुष्य क्यों बनाया?
८४ लाख योनियों के बाद यह अवसर मिला है ताकि हम आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ सकें। यह ईश्वर की कृपा का परिणाम है।
अन्य प्राणी भी तो जीते हैं, तो मनुष्य में क्या विशेषता है?
अन्य प्राणियों में केवल चेतना और मन है, पर विवेकयुक्त बुद्धि नहीं। यह विशेषता केवल मनुष्य में है।
सेवा और स्वार्थ में क्या भेद है?
स्वार्थ में व्यक्ति केवल अपने सुख के लिए प्रयत्न करता है, जबकि सेवा में वह सबके सुख का प्रयत्न करता है।
सबके लिए कार्य करने से क्या प्राप्त होता है?
जब व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है, तब उसके भीतर निर्मलता, सहानुभूति और अहंकार-रहित भाव उत्पन्न होते हैं, जो उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।
दूसरे लोग स्वार्थी हों तो क्या हमें भी वही करना चाहिए?
नहीं। संसार दर्पण की तरह है — यदि आप सेवा और प्रेम का व्यवहार करेंगे, तो वह लौटकर आपको ही मिलेगा।
क्या सेवा से परम लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है?
हां, जो व्यक्ति समस्त प्राणियों के कल्याण में रत रहता है, वह शीघ्र ही भगवद्प्राप्ति करता है।
सेवा करने से आत्मा कैसे ऊँचाई को प्राप्त होती है?
सेवा से चित्त शुद्ध होता है, मोह घटता है और परमात्मा से निकटता बढ़ती है।
दूसरे सेवा करें या न करें, हमें क्यों करनी चाहिए?
सेवा हमारा धर्म है। जब आप किसी को कष्ट से बचाते हैं, तो वह पुण्य सीधा आपकी आत्मा को ऊर्जावान बनाता है।
धर्ती का सुख अस्थायी क्यों है?
क्योंकि हर सुख किसी दुख की क्षणिक अनुपस्थिति है – जैसे भूख हटने पर भोजन सुखद लगता है, लेकिन यह फिर दोहराता है।
क्या इस संसार में सच्चा सुख नहीं है?
भौतिक सुख क्षणिक है। सच्चा सुख केवल परमात्मा से सम्बन्ध में है, जहाँ कोई परिवर्तन नहीं होता।
तो क्या जीवन में कुछ सार नहीं?
जीवन का सबसे बड़ा सार यही है कि हम इस दुर्लभ जन्म का उपयोग आत्मकल्याण के लिए करें।
सेवा के तीन साधन क्या हैं?
सेवा तन से – सहायता करके, मन से – शुभभावना रखकर, वाणी से – मधुर बोल बोलकर की जाती है।
क्या पूजा के बिना सेवा फलदायी होती है?
सेवा स्वयं एक पूजा है, यदि वह निःस्वार्थ हो। केवल विधि नहीं, भाव प्रधान होता है।
जो बड़े कार्य न कर सकें, वे क्या करें?
सेवा का स्वरूप छोटा हो सकता है – जैसे किसी की पीड़ा को न बढ़ाना, और छोटे-छोटे सुख देना भी महान सेवा है।
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