
हम साधना क्यों करते हैं?
भगवत प्राप्ति के लिए।
क्या है भगवत प्राप्ति?
आप जिस भी देवता की साधना करते हो बिलकुल उनके जैसे हो जाना।
आपने नाग बाबाओं को देखा होगा जो शंकर जी के उपासक हैं।
वे उनके जैसे ही जटा धारण करते हैं।
सारे शरीर मे भस्म लगाते हैं।
यह तो तन से; तन से, मन से, बुद्धि से जब आप पूर्ण रूप से आपके इष्ट देवता जैसे हो जाओगे तो आपकी साधना सफल हो गयी, सिद्ध हो गयी।
यही साधना का उद्देश्य है।
यह भववत स्वरूप आपके अन्दर पहले से ही विद्यमान है।
बस वह वासनाएं, कामनाएं, अज्ञान, अहंकार, मुझे सर्वदा सुख ही सुख मिलते रहें, मुझे मान सम्मान मिलें इन विचारों से, इन सबसे वह भगवत स्वरूप छादित हो जाता है।
यह अंगार के ऊपर जैसे राख जम जाती है, या दर्पण के ऊपर मैल जम जाता है उस प्रकार है।
इस राख को हटाना, इस मैल को साफ करना, यही साधना है।
साधना के हर अंग, हर तरह की साधना इसी के लिए है।
जब मैल निकल जाएगा तो भववत स्वरूप स्वयं प्रकाशित हो जाएगा।
आपके तन में, मन में बुद्धि में भगवान के असीम गुण प्रकाशित होने लगेंगे।
अपके द्वारा ये प्रवृत्त होने लगेंगे।
उसके बाद आप सिर्फ वे ही कार्य करेंगे जो भगवत हित में हो, जो भगवान चाहते हैं।
भगवान गीता मे कहते हैं न?
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः।
ये मेरे ही काम को करेंगे, जो मैं चाहता हूं।
इसलिए स्नान, संयम, पूजा, पाठ, सत्संग, सेवा ये सब हर साधना पद्धति के अन्तर्गत हैं।
इन सबसे चित्त शुद्धि की प्राप्ति होती है।
ध्यान करने से, भगवत स्मरण करने से भववत प्राप्ति की ओर यह आन्तरिक प्रयाण और भी शीघ्र हो जाता है।
साधना सिद्ध हो जाने पर सारा जगत भगवान के ही लीला स्वरूप मे दिखाई देने लगेगा।
भगवान ही हर प्राणी के अन्दर हर वस्तु के अन्दर रहकर उनका नियंत्रण करके वे जो चाहते हैं वही करा रहे हैं, ऐसे दिखाई देगा।
हर प्राणी के अन्दर से हर वस्तु के अन्दर से एक ही सूत जा रहा है और वह सूत इन सबको एक सुन्दर हार जैसे समाकर रखा है, ऐसे दिखाई देगा।
जो कुछ भी हो रहा भगवान के हित के अनुसार ही हो रहा है, ऐसे समझ में आएगा।
यही साधना की सिद्धि है।
क्या साधना केवल पूजा-पाठ करना है?
नहीं, साधना का मतलब है अपने जीवन को ऐसे ढालना कि तन, मन, बुद्धि से हम अपने आराध्य के जैसे बन जाएं। यह केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक गहरा आंतरिक रूपांतरण है।
मैं भगवान को कैसे जानूं?
जब आप लगातार साधना करते हैं, भीतर की वासनाएं घटती हैं और भगवत स्वरूप धीरे-धीरे प्रकट होता है। उसी से वास्तविक पहचान होती है।
अगर पूजा-पाठ करने पर भी जीवन में कष्ट है तो क्या साधना विफल है?
साधना का मापदंड सुख-दुख नहीं है, बल्कि चित्त की शुद्धता है। कष्ट आ सकते हैं, पर प्रतिक्रिया में परिवर्तन ही सिद्धि का लक्षण है।
साधना में 'वासनाएं' क्यों बाधा हैं?
'वासना' का मतलब है — मन की गहरी इच्छाएं और आदतें। ये मन को इधर-उधर भटकाती हैं और भीतर छिपे भगवत स्वरूप को ढँक देती हैं।
क्या इच्छाओं को पूरी तरह छोड़ना जरूरी है?
नहीं, इच्छाएं छोड़ने की ज़रूरत नहीं, उन्हें शुद्ध करना जरूरी है। जब इच्छाएं भगवान की ओर मुड़ती हैं, वही साधना बनती है।
क्या वासना रहित जीवन संभव है?
हां, जब बार-बार आत्मचिंतन, सेवा और भक्ति होती है, तो वासनाएं कमजोर पड़ती हैं और अंततः लुप्त हो जाती हैं।
साधना का फल क्या है?
जब साधना सिद्ध होती है, तो हमें संसार भगवान की लीला लगता है। हर घटना, हर वस्तु में वही चेतना झलकती है।
क्या भगवान सच में हर जगह हैं?
हां, पर जब तक मन शुद्ध नहीं होता, तब तक यह ज्ञान केवल किताबों में होता है। साधना से यह प्रत्यक्ष अनुभव बनता है।
अगर भगवान हर जगह हैं, तो फिर मंदिर क्यों जाएं?
मंदिर और पूजा चित्त को एकाग्र करने के साधन हैं। वहां से शुरू होकर यह अनुभूति पूरे जीवन में फैलती है।
क्या सेवा, स्नान, जप आदि जरूरी हैं?
हां, ये सब साधना के अंग हैं, जिनसे चित्त शुद्ध होता है और मन भगवत स्मरण की ओर झुकता है।
क्या ध्यान सबसे तेज़ साधन है?
ध्यान अकेले काफी नहीं। वह तभी प्रभावी होता है जब मन पहले से शुद्ध हो, इसलिए अन्य साधन पहले जरूरी होते हैं।
अगर सिर्फ भगवान की इच्छा से सब होता है, तो मैं क्यों साधना करूं?
भगवान की कृपा तभी जाग्रत होती है जब हम पात्र बनते हैं। साधना वही पात्रता प्रदान करती है।
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