
तुलसीदास जी पिछले पंक्तियों से कहे थे कि हमें विवेकपूर्वक अच्छे और बुरे गुणों की पहचान करके अच्छे गुणों का स्वीकार और बुरे गुणों का त्याग करना चाहिए। ऐसे करके मोक्ष के मार्ग में प्रवृत्त होंगे तो हम श्रीराम जी के शरण में जरूर प्राप्त होंगे।
दुख सुख पाप पुण्य दिन राती
साधु असाधु सुजाति कुजाती
दानव देव ऊच अरु नीचु
अमिय सजीवन माहुर मीचु
माया ब्रह्म जीव जगधीसा
लच्चि अलच्चि रंक अवनीसा
काशी मग सुरसरि क्रमनासा
मरु मारव महिदेव गवासा
सरग नरक अनुराग बिरागा
निगम आगम गुन दोष विभागा।
साधु जन और असाधु जनों का असली स्वरूप क्या है — इसका ज्ञान कराने के लिए तुलसीदास जी मनुष्यों के द्वारा जाने गए वस्तुओं से इनकी तुलना करके समझा रहे हैं।
असाधु जन दुख की तरह हैं, साधु जन सुख की तरह हैं। असाधु पाप के जैसे, साधु पुण्य के जैसे। पाप को करने से लोग कष्ट को पाते हैं — वैसे ही असाधु जनों से संबंध रखने से। पुण्य को करने से लोग सुख को पाते हैं — वैसे ही साधु जनों से संबंध रखने से।
साधु जन दिन के समान हैं — जो हम पर प्रकाश डालते हैं और हमारे भीतर के अज्ञान को दूर करते हैं। असाधु जन रात के समान हैं — जो हर विषय पर हमें अज्ञान रूपी अंधकार में ढकेल देते हैं।
दिन में शरीर में ऊर्जा रहती है — वैसे ही सत्संग से जीवन में गति आती है। रात में शरीर में आलस आता है — वैसे ही दुष्संग से जीवन में जड़ता आती है। दिन में यज्ञादि होते हैं — सतजन उनके प्रतिनिधि हैं। रात में राक्षस, पिशाच, प्रेत चलते हैं — दुष्टजन उनके प्रतिनिधि हैं।
साधु जन सुजाति — अर्थात् श्रेष्ठ कुल वाले। असाधु जन कुजाति — अर्थात् निकृष्ट विचार वाले। साधु देव जैसे — असाधु दानव जैसे। दोनों कश्यप के पुत्र हैं — देव यथोक्त धर्म से चलते हैं, असुर छल कपट से। यही फ़र्क है साधु और असाधु में।
साधु जन उच्च विचार वाले हैं, अमृत जैसे हैं — जीवनदायी। असाधु जन विष जैसे हैं — मरणदायी। असाधु जन माया जैसे हैं — बंधन में डालते हैं। साधु जन ब्रह्म जैसे हैं — मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। असाधु जन जीव जैसे हैं — संसार में बार-बार फँसाते हैं। साधु जन जगदीश के जैसे हैं — शरण देते हैं, परब्रह्म से मिलाते हैं।
साधु जन लक्ष्मी, असाधु जन दरिद्रता। साधु राजा जैसे, असाधु कृपण जैसे। साधु संग से ज्ञान, सुख, सद्गति मिलती है। असाधु संग से अज्ञान, दुख, अधोगति आती है। साधु जन काशी जैसे — मोक्षदायक। असाधु जन मगध जैसे — अधोगति देने वाले।
साधु जन गंगा जैसे — पापों को धोने वाले। असाधु जन कर्मनाशा जैसे — सत्कर्मों को नष्ट करने वाले। असाधु जन मरुभूमि जैसे — सूखे, प्यासे को पानी न दे पाने वाले। साधु जन मारव जैसे — वृक्ष, औषधियों से युक्त, छाँव देने वाले।
साधु जन सात्त्विक बुद्धिवाले। असाधु जन कसाई जैसे — कुबुद्धि वाले, स्वार्थ के लिए किसी को भी कुछ भी कर सकते हैं। वेदों ने इस प्रकार अच्छे-बुरे का विभाग स्पष्ट किया है — यही तुलसीदास जी का सन्देश है।
हमें सत्संग से जुड़ना चाहिए और दुष्संग से बचना चाहिए। अंततः अच्छे और बुरे दोनों भगवान में ही लीन होते हैं — परंतु अच्छे मार्ग से लीन होना ही श्रेष्ठ है।
आजकल कुछ नास्तिक कहते हैं कि बिल गेट्स ने लक्ष्मी पूजा नहीं की, फिर भी धनवान है। आइंस्टीन ने सरस्वती पूजा नहीं की, फिर भी बुद्धिमान है। तो क्या पूजा व्यर्थ है?
हमें क्या पता? संभव है उन्होंने पिछले जन्म में लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा की हो। भगवान जानते हैं — किसने कितना पुण्य और कितना पाप किया। उसी के अनुसार, वे समय आने पर सुख-दुख देते हैं।
इसलिए यदि आप सनातन धर्म को नहीं जानते, तो उस पर बात न करें। आपके कुतर्कों के उत्तर ग्रंथों में तर्कसंगत रूप में दिए गए हैं।
इसलिए आप भी अच्छे और बुरे को पहचानिए। सत्कर्म, पूजा, यज्ञ आदि करके अच्छे फलों को पाइए। सत्संग से जुड़े रहिए, दुष्संग का त्याग कीजिए। श्रीराम जी हमें अवश्य अपनी शरण में लेंगे।
अच्छे और बुरे के बीच भेद कैसे किया जा सकता है?
जैसे अंधेरे और उजाले का अंतर अनुभव से समझ में आता है, वैसे ही साधु और असाधु का अंतर व्यवहार और प्रभाव से समझा जा सकता है। विवेकपूर्वक देखने पर हर व्यक्ति के गुण और स्वभाव स्पष्ट हो जाते हैं।
अगर कोई सरल आदमी है तो वो कैसे जाने कि सामने वाला साधु है या असाधु?
उसके संग रहने पर क्या ज्ञान, शांति और सद्बुद्धि बढ़ती है या नहीं — यही कसौटी है। सुखद संग साधुता की पहचान है।
क्या सबको बाँटना सही है — यह साधु है, यह असाधु है?
बाँटना नहीं, पहचानना ज़रूरी है। यह भेदभाव नहीं, बल्कि आत्म-संरक्षण है। बिना पहचान के, हम दुष्संग में गिर सकते हैं।
सत्संग क्यों ज़रूरी है?
सत्संग से मन में शुभ प्रवृत्तियाँ जागती हैं, आत्मा में प्रकाश आता है, और जीवन का मार्ग स्पष्ट होता है। यह मोक्ष की दिशा में पहला कदम है।
क्या सत्संग का प्रभाव स्थायी होता है?
अगर बार-बार किया जाए, तो हाँ। जैसे बार-बार धूप में बैठने से शरीर में गर्मी आती है, वैसे ही सत्संग मन को बदलता है।
क्या अकेले साधना करना बेहतर नहीं?
अकेली साधना भी उपयोगी है, लेकिन बिना सत्संग के वह अक्सर भटक जाती है। सत्संग मार्गदर्शन और संरक्षण देता है।
असाधुजन का संग क्यों हानिकारक है?
असाधु संग से सोच दूषित होती है, उद्देश्य बिगड़ते हैं और धीरे-धीरे आत्मा अंधकार में गिरती है। उनका संग विष के समान है।
अगर कोई व्यक्ति मजबूरी में दुष्टों के बीच रह रहा है, तो क्या करे?
शारीरिक दूरी से अधिक ज़रूरी है मन की दूरी। सजग रहें, भीतर का विवेक बचाए रखे।
क्या हर असाधु व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए?
यदि सुधार की संभावना हो, तो सहारा देना चाहिए। लेकिन अगर उसका संग आत्मा को गिराता है, तो दूर रहना ही श्रेयस्कर है।
अगर अंत में सभी परमात्मा में लीन हो जाते हैं, तो फिर साधुता का क्या लाभ?
फर्क मार्ग का है। सज्जन सुखपूर्वक और सम्मानपूर्वक लीन होते हैं, दुष्ट दुःख और भय से। साधु मार्ग सुखद और तेजस्वी है।
क्या यह 'अंत में सब एक हो जाते हैं' विचार कर्म का विरोध करता है?
नहीं, यह परिणाम की एकता की बात है — मार्ग का महत्व तब भी बना रहता है। जैसे सब नदियाँ सागर में जाती हैं, पर कुछ रास्ते सुंदर हैं और कुछ कांटों से भरे।
क्या यह विचार लोगों को लापरवाह नहीं बना देगा?
केवल तभी जब विवेक न हो। ज्ञानी जानता है कि कैसे पहुँचना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कहाँ पहुँचना है।
पिछले जन्मों के कर्म वर्तमान जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं?
जैसे किसी खेत में बीज बोए जाते हैं और समय आने पर फल आते हैं, वैसे ही पूर्व जन्मों के कर्म हमारे वर्तमान में फल देते हैं — सुख, बुद्धि, धन आदि।
अगर हम नहीं जानते कि किसने क्या किया, तो फिर कैसे न्याय होगा?
भगवान जानते हैं — वही न्याय करते हैं। हमारा कार्य है अपना कर्म सुधारना, परिणाम की चिंता उनका विषय है।
क्या ये पुनर्जन्म और कर्म का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है?
जैसे गुरुत्वाकर्षण दिखता नहीं पर असर होता है, वैसे ही पुनर्जन्म का अनुभव ध्यान और स्मृति के स्तर पर होता है। कई मामलों में इसकी पुष्टि भी मिलती है।
पूजा और यज्ञ का क्या स्थान है अगर बुद्धिमान और धनवान बिना इसके भी सफल हैं?
सफलता केवल बाहरी चीज़ नहीं है। पूजा और यज्ञ जीवन को संतुलित, शांत और सार्थक बनाते हैं — केवल धन या ज्ञान से जीवन पूर्ण नहीं होता।
अगर कोई पूजा नहीं करता, फिर भी सुखी है तो क्या पूजा व्यर्थ है?
उसकी आज की स्थिति उसके बीते कर्मों का फल हो सकती है। पूजा अगले जीवन या गहरे स्तर पर प्रभाव डालती है।
क्या पूजा केवल परंपरा निभाना है या उसका गहरा अर्थ है?
पूजा आत्मा की ऊर्जा को परम शक्ति से जोड़ने का माध्यम है। यह केवल कर्मकांड नहीं, एक गहरी साधना है।
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