
रामचरितमानस के भाषा का यह पाँचवाँ मंगलाचरण है। चौथे मंगलाचरण तक हमने पंचोपासना के देवताओं का वंदन देखा था। अब पाँचवें मंगलाचरण में गुरु का वंदन है। हमारे भारतीय परंपरा में गुरु को भी देवता के समान श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए इस मंगलाचरण से अपने गुरु का वंदन कर रहे हैं तुलसीदास जी।
वंदवु गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरी।
महा मोह तमपुञ्ज जासु वचन रविकर निकर॥
गुरु के चरणों में मेरा नमस्कार। वे गुरु कृपा के समुद्र हैं। वे नर मनुष्य होते हुए भी हरि भगवान के समान हैं, नर हरि। वे भगवान ही हैं। वे सूर्य जैसे अपने किरणों से अंधकार का विनाश करते हैं, वैसे ही अज्ञान रूपी अंधकार का अपने वाणी से विनाश करते हैं। उस गुरु के चरणों में नमस्कार।
गोस्वामी तुलसीदास जी के तीन गुरु हैं। पहले गुरु हैं स्वयं भगवान शिवशंकर जी। उन्होंने ही सर्वप्रथम पार्वती जी को राम कथा का उपदेश दिया था, इसलिए वे इनके आदि गुरु हैं। उनके दूसरे गुरु हैं अनंत श्री नरहरी दास जी। इन्होंने ही तुलसीदास जी को राम जी का पवित्र चरित्र बताया था, जो आज तुलसीदास जी के रामचरितमानस लिखने का कारण बना है। तुलसीदास जी 'नर रूप हरी' इस वाक्य से उनको ही सूचित करते हैं — नरहरी दास जी, नर रूप हरी। इसके साथ वे उनको प्रणाम भी करते हैं।
तुलसीदास जी का तीसरा गुरु है स्वयं रामचरितमानस, क्योंकि गुरु का काम होता है अज्ञान को मिटाकर ज्ञान के रास्ते में ले जाना। श्री रामचरितमानस भी यही काम करता है। इसके केवल पारायण करने से ही अज्ञान का दूरिकरण होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है। अर्थ को जानने से राम जी के चरणों में स्थान मिल जाता है। इसलिए यह इनका तीसरा गुरु है।
रामचरितमानस इस संसार सागर को जो पार करना चाहता है, उसके लिए रामचरितमानस एक दृढ़ नाव की तरह है, जो उसे सुरक्षित, कठिनाइयों के बिना, निश्चित तौर से उस पार पहुँचा सकता है। यहाँ पर 'कृपा सिंधु' शब्द से गुरु के मन की विशेषता, 'नर रूप हरी' इस शब्द से गुरु के शरीर की विशेषता और 'रविकर निकर' से उनकी वाणी की विशेषता का वर्णन है। अर्थात, जो मेरे गुरु मन, शरीर और वाणी से पवित्र हैं, उनको मैं अपने मन, शरीर और वाणी से नमस्कार करता हूँ।
यहाँ पर 'कृपा सिंधु' शब्द से मनो रूपी शिव जी को कहा गया है, क्योंकि उनकी कृपा से ही आज यह रामचरितमानस है। वे ही सबके मन में आकर रामचरितमानस को पढ़ने की इच्छा जगाते हैं। इस कारण से वे ही लोगों को मोक्ष भी दिलवाते हैं। 'नर' शब्द से उस गुरु को कहा गया है जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तुलसीदास जी को राम कथा पढ़ाई। उन्होंने ही रामचरितमानस की रचना करने के लिए प्रेरणा दी। वे हैं इनके गुरु जी अनंत श्री नरहरी दास जी।
और 'वचन' शब्द से — 'जासु वचन रविकर निकर' — वचन से रामचरितमानस को कहा गया है। यह रामचरितमानस शिव जी जैसे ध्यानगम्य देवता नहीं है और नरहरी दास जी जैसे प्रत्यक्ष गुरु भी नहीं है, फिर भी यह गुरु का काम करता है। इस रामचरितमानस को पढ़ने से ही वह ईश्वर के बारे में विद्यमान संदेहों को दूर कर देता है और जीवन में सही मार्ग दिखा देता है। इसलिए इन तीनों गुरुओं — शिव जी, नरहरी दास जी और रामचरितमानस — को मैं अपने मन, शरीर और वाणी से नमस्कार करता हूँ।
गुरु को देवता के समान क्यों कहा गया है?
गुरु को देवता के समान इसलिए माना गया है क्योंकि वे मनुष्य रूप में होकर भी कृपा के सागर हैं और अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करते हैं। उनकी कृपा से ही जीवन में ज्ञान और मोक्ष की दिशा मिलती है।
गुरु की कृपा को सागर क्यों कहा गया है?
क्योंकि वह अनंत और गहराई वाली होती है, जिसमें शिष्य के सभी दोष और अज्ञान बह जाते हैं। जैसे सागर सब नदियों को समा लेता है, वैसे ही गुरु का हृदय सबका कल्याण करता है।
क्या बिना गुरु के भी ज्ञान प्राप्त हो सकता है?
नहीं, क्योंकि गुरु ही वह माध्यम हैं जो अंधकार से प्रकाश तक पहुँचाते हैं। बिना गुरु के, मार्ग अस्पष्ट रहता है और साधक भ्रमित होता है।
शिव जी को तुलसीदास जी का प्रथम गुरु क्यों कहा गया है?
क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले पार्वती जी को रामकथा सुनाई थी। वही कथा आगे तुलसीदास जी तक पहुँची और उनके भक्ति मार्ग की नींव बनी।
शिव गुरु के रूप में क्या प्रतीक हैं?
शिव ज्ञान, कृपा और त्याग के प्रतीक हैं। वे न केवल उपदेशक हैं बल्कि रामभक्ति की जड़ हैं।
यदि शिव जी गुरु हैं तो क्या राम उनसे अलग हैं?
नहीं, शिव और राम एक ही सत्य के दो रूप हैं — एक भक्ति का स्रोत, दूसरा भक्ति का लक्ष्य। तुलसीदास जी दोनों को एक ही दिव्यता में देखते हैं।
नरहरि दास जी का योगदान क्या था?
उन्होंने तुलसीदास जी को राम के दिव्य चरित्र का ज्ञान दिया और मानस रचना की प्रेरणा दी। वे ही 'नर रूप हरी' शब्द के सूचक हैं।
गुरु का प्रत्यक्ष होना क्यों आवश्यक है?
क्योंकि प्रत्यक्ष गुरु शिष्य को व्यवहारिक रूप में मार्ग दिखाता है। वे केवल ज्ञान नहीं देते, जीवन का अनुशासन भी सिखाते हैं।
क्या शास्त्र ही पर्याप्त गुरु हैं?
शास्त्र मार्ग बताते हैं, परंतु उनका अर्थ जीवंत रूप से समझाने वाला गुरु ही होता है। गुरु बिना शास्त्र मृत है, और शास्त्र बिना गुरु अंधा है।
रामचरितमानस को गुरु क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह स्वयं में ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का मार्गदर्शक है। इसके पाठ से अज्ञान मिटता है और रामभक्ति का प्रकाश फैलता है।
क्या केवल पारायण से ज्ञान प्राप्त होता है?
हाँ, यदि श्रद्धा और एकाग्रता से किया जाए तो मानस स्वयं ज्ञान का द्वार खोलता है। उसके अर्थ को समझना साधक के भीतर गहरी शांति जगाता है।
कैसे एक ग्रंथ गुरु बन सकता है?
जब किसी ग्रंथ के शब्द शिष्य के भीतर परिवर्तन लाते हैं, तब वह ग्रंथ जीवंत गुरु बन जाता है। मानस ऐसा ही जीवंत ग्रंथ है।
'कृपा सिंधु', 'नर रूप हरी' और 'रविकर निकर' का क्या अर्थ है?
ये तीनों गुरु के मन, शरीर और वाणी की पवित्रता, दिव्यता और तेजस्विता को दर्शाते हैं। तुलसीदास जी गुरु की पूर्णता को तीनों स्तरों पर नमन करते हैं।
गुरु के तीन गुणों में क्या संबंध है?
मन की कृपा से वाणी मधुर होती है और शरीर से कर्म पवित्र होते हैं। जब तीनों एक साथ हों तो गुरु का प्रभाव दिव्य बनता है।
क्या हर व्यक्ति में ये तीन गुण हो सकते हैं?
हाँ, यदि व्यक्ति आत्मसंयम, भक्ति और करुणा का अभ्यास करे तो धीरे-धीरे उसमें भी गुरुत्व जागृत होता है।
रामचरितमानस को नाव क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह संसार रूपी सागर से पार कराने वाली स्थिर नाव है। जो इस पर सवार होता है, वह सुरक्षित रूप से मोक्ष तट तक पहुँचता है।
यह नाव किस शक्ति से चलती है?
भक्ति और श्रद्धा की शक्ति से। जैसे नाव को चलाने के लिए जल और पतवार चाहिए, वैसे ही मानस को चलाने के लिए श्रद्धा और जप आवश्यक हैं।
अगर कोई व्यक्ति इस नाव पर न बैठे तो क्या होगा?
वह संसार सागर में भटकता रहेगा, क्योंकि भक्ति ही एकमात्र साधन है जो जीवन को दिशा और मुक्ति देती है।
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