गुरु द्वारा शिष्य के पांच संस्कार किये जाते हैं

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गुरु द्वारा शिष्य के पांच संस्कार किये जाते हैं

तुलसीदास जी अपने तीनों गुरुओं के चरण स्पर्श कर रहे हैं। यहाँ पर तुलसीदास जी कहना चाहते हैं कि गुरु हमारे जीवन में भगवान राम के समान हैं। जैसे राम जी का अवतार रावण के विनाश के लिए हुआ, वैसे ही गुरु का अवतार महामोह के विनाश के लिए हुआ है। जैसे राम जी ने बाण से रावण को मारा, वैसे गुरु भी अपने वचन रूपी बाण से महामोह को मारते हैं। गुरु ही भगवान हैं — 'गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णुर, गुरुर देवो महेश्वरः, गुरु एव परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।'

तुलसीदास जी के प्रत्यक्ष गुरु हैं नरहरिदास जी। 'कृपा सिंधु नर रूप हरी' — इस शब्द से विष्णु भगवान के नरसिंह अवतार के समान मेरे गुरु को प्रणाम, ऐसे मान सकते हैं। 'नर' यानी मनुष्य, 'हरी' यानी सिंह, 'नरहरी' यानी नरसिंह। जैसे नरसिंह ने हिरण्यकशिपु के शरीर का भेदन किया था, वैसे ये गुरु 'महा मोह', यानी ईश्वर के विषय में विद्यमान संदेहों का भेदन करते हैं।

ये गुरु, पंच संस्कार विशिष्ट हैं — नाम, माला, उर्ध्वपुंड्र, मुद्रा और मंत्र। सिंह को पंचानन भी कहते हैं क्योंकि वो अजा के चार खुरों को अपने चार हाथों से और उसके मुख को अपने मुख से पकड़कर विनाश करता है।

अजा यहाँ पर क्या है? अजा मात्र बकरी नहीं। अजा यानी त्रिगुणात्मक प्रकृति, जो वेद में कहा गया है —
'अजा एकपाद कनलोहित शुक्लकृष्णां बह्वीं प्रजाः जनयन्तीं सरूपाम्।'
इस अजा के भी पाँच अंग होते हैं — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। इन पाँचों को शेर जैसे अपने गुरु, पंच संस्कारों से निवारण करते हैं।

गुरु ये कैसे करते हैं?

शब्द कानों से ग्रहण किया जाता है — शिष्य के कानों में मंत्र देकर, बाहरी मायावादी शब्दों से उसकी सुरक्षा करते हैं।

स्पर्श का अनुभव त्वचा से होता है — शिष्य की त्वचा पर धनु आदि चिन्ह देकर उसे रोकते हैं।

रूप का ग्रहण नेत्रों से होता है — नेत्र के पास विद्यमान माथे पर पुंड्र लगाकर, नेत्रों से होने वाली माया को रोकते हैं।

रस का जीभ से ग्रहण होने के बाद वह गले में जाता है — इसलिए शिष्य को गले में माला पहनाकर, रस से होने वाली माया को रोकते हैं।

इस जगत में हमारा संबंध भी गंध के समान सर्वत्र फैला हुआ है — माता, पिता, भाई, रिश्तेदार आदि। हम उन्हें पहचानते कैसे हैं? उनके नाम से। उनसे आने वाली माया को रोकने के लिए, भगवान के नाम के पीछे 'दास' लगाकर गुरु शिष्य को एक नाम दे देता है — जैसे तुलसीदास, सूरदास आदि। इसके कारण भगवान से हमारा संबंध ज़्यादा होता है और माया से कम हो जाता है।

ऐसे सिंह के समान अज्ञान को मिटाकर ज्ञान को देने वाले गुरु को मेरा नमस्कार।

 

गुरु को भगवान के समकक्ष क्यों माना गया है?
क्योंकि गुरु ही जीवन में अज्ञान के अंधकार को काटने वाले और सत्य के प्रकाश तक पहुँचाने वाले होते हैं। उनका कार्य केवल शिक्षा नहीं, बल्कि शिष्य का आत्मपरिवर्तन है।

गुरु और ईश्वर में क्या अंतर है?
ईश्वर सर्वत्र हैं, परंतु गुरु उनका सजीव प्रतिनिधि बनकर सामने खड़े होते हैं और शिष्य को पकड़कर रास्ता दिखाते हैं।

क्या बिना गुरु के राम की भक्ति संभव है?
संभावना कम है, क्योंकि बिना मार्गदर्शक के मन भ्रम में पड़ा रहता है और मायाजाल से मुक्त नहीं हो पाता।

'नर रूप हरी' शब्द का अर्थ क्या है?
इसका तात्पर्य है कि गुरु मानव रूप में होते हुए भी सिंह के समान अज्ञान का नाश करते हैं। यह उपमा नरसिंह के रूप में अज्ञान-विनाशक स्वरूप को प्रकट करती है।

तुलसीदास जी नरहरिदास जी को नरसिंह क्यों मानते हैं?
क्योंकि उन्होंने ही उनके भीतर रामकथा का बीज बोया और अज्ञान का भेदन किया।

क्या गुरु का कार्य केवल उपदेश देना है?
नहीं, गुरु का कार्य शिष्य की संपूर्ण आंतरिक संरचना को बदलना है — विचार, व्यवहार, और अनुभूति के स्तर पर।

पंचसंस्कारों का उद्देश्य क्या है?
इनका उद्देश्य इंद्रियों को संयम में रखना और शिष्य को भौतिक माया से काटकर आध्यात्मिक मार्ग पर लाना है।

हर शिष्य को ये पंचसंस्कार क्यों दिए जाते हैं?
क्योंकि प्रत्येक इंद्रिय से अज्ञान प्रवेश करता है, और इन्हीं के द्वारा माया का मोह उत्पन्न होता है। संस्कार उन्हें नियंत्रित करते हैं।

क्या केवल उपदेश से ही माया से मुक्ति मिल जाती है?
नहीं, व्यवहारिक उपाय भी आवश्यक हैं। पंचसंस्कार जैसे संकेतक शरीर पर अंकित करके माया के प्रभाव को रोका जाता है।

नामकरण में 'दास' जोड़ने का अर्थ क्या है?
यह नाम माया से संबंध को काटकर ईश्वर से जोड़ने वाला होता है।

क्या नाम बदलने से ही अंतर आता है?
हाँ, नाम पहचान का माध्यम होता है। जैसे ही 'दास' जुड़ता है, व्यक्ति का परिचय बदल जाता है — वह अब भगवान का सेवक बनता है।

क्या यह केवल प्रतीकात्मक है या व्यवहारिक भी?
यह व्यवहारिक प्रभाव डालता है, क्योंकि यह मानसिक पहचान और सामाजिक दृष्टिकोण दोनों को बदल देता है।

गुरु को शेर के समान क्यों बताया गया है?
क्योंकि वह अज्ञान रूपी अजा के पाँच अंगों को पकड़कर नष्ट करता है और शुद्ध ज्ञान देता है।

क्या यह हिंसक प्रतीक नहीं है?
नहीं, यह प्रतीक अज्ञान के संहार का है — शेर भय का नहीं, विवेक का प्रतीक है।

क्या ज्ञान बिना संहार के संभव है?
नहीं, जब तक पुराना भ्रम नहीं मिटता, नया सत्य स्थापित नहीं होता। गुरु पहले भ्रम को हटाते हैं, तभी आत्मज्ञान होता है।

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जय श्रीराम

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