संत वाणी - १७

संत वाणी - १७

  • जो वास्तव में श्रद्धालु होता है, वह जीवन भर प्रभु के दर्शन न होने पर भी अपनी भक्ति में अडिग रहता है। वह भगवान से कभी मुँह नहीं मोड़ता, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि प्रभु कहीं गए नहीं हैं — बस हमारी परीक्षा ले रहे हैं।
  • यह संसार ऐसा है जैसे एक कुआँ। ऊपर से तो सब कुछ ठिक-ठाक लगता है, लेकिन ज़रा सा भी फिसलन हुआ तो भीतर गिरने का ख़तरा है। इसलिए विवेक, धैर्य और सजगता के बिना इस जीवन में टिके रहना बहुत कठिन है।
  • काम और धन का लोभ ही असली माया है। इनके पीछे भागने से आदमी अपना विवेक खो देता है। फिर वह अपने ही बनाए हुए बंधनों में फँसकर रह जाता है।
  • जिसके स्पर्श से, जिसके संग से, या जिसके जीवन को देखकर कई लोग सही राह पर चलने लगें, अच्छे काम करने लगें — तो समझो उसमें भगवान की कृपा और तेज़ विशेष रूप से काम कर रहा है। ऐसा व्यक्ति सिर्फ एक इंसान नहीं होता, वह प्रभु की प्रेरणा का माध्यम होता है।
  • जिसका मन खुद को सिर्फ एक सीमित प्राणी मानता है, वह बंधनों में बँधा रहता है। लेकिन जो अपने भीतर परमशक्ति को देखता है, वह खुद शिवस्वरूप हो जाता है।
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