
बिधि, हरिहर, कवि, कोविद बानी, कहत साधु महिमा सकुचानी।
सो मोसे कही जात न कैसे, साकत मनिजन गुन जैसे॥
ब्रह्मा, विष्णु और शिव — तीनों ही ज्ञान के मूर्त स्वरूप हैं। ये जगत के समस्त ज्ञान के प्रसारक माने जाते हैं। फिर भी, जब बात साधुजनों की महिमा कहने की आती है, तो ये भी संकोच करते हैं।
पुराणों में हर बार व्यास जी कहते हैं — मैंने नारद से पूछा, नारद ने ब्रह्मा से, और ब्रह्मा ने समाधान दिया। विष्णु भगवान के पास भी देवता अपने संदेहों का निवारण मांगने जाते हैं। रामकथा के प्रवर्तक स्वयं शिवजी हैं। फिर भी, ये महाज्ञानियों से भी साधु महिमा पूर्ण रूप से वर्णित नहीं हो सकी।
क्यों नहीं हो सकी?
वर्णन के दो उपाय होते हैं — एक, जिस विषय का सत्य है उसे ठीक-ठीक बताना। दूसरा, किसी प्रसिद्ध वस्तु की उपमा देकर समझाना। लेकिन साधुजनों की महिमा न तो सीमित सत्य है, न किसी वस्तु से तुलना योग्य। यह तो आपार है। वाणी से इसका वर्णन नहीं हो सकता और उपमा देने को इस जगत में कोई समरूप वस्तु है ही नहीं।
उपमा तभी दी जाती है जब एक प्रसिद्ध वस्तु से एक अप्रसिद्ध को जोड़ा जा सके — जैसे, ‘उसका मुख चंद्रमा के समान है’, ‘वाणी वेद जैसी है’, ‘नेत्र कमल जैसे हैं’, ‘जल गंगा के समान है’, ‘धन कुबेर के जैसा है’। इन सबमें उपमा की वस्तु लोगों के अनुभव में है।
परंतु संतों की महिमा का कोई तुल्य नहीं है। अतः न उसका यथार्थ वर्णन हो सकता है, न उपमा दी जा सकती है।
कवि और कोविद, जो ज्ञान में निपुण हैं, जो कठिन विषयों को सरलता से समझा सकते हैं, जो अदृश्य को भी शब्दों में दृश्य बना देते हैं — वे भी इस महिमा को पूर्ण रूप से नहीं कह सकते। उनकी कल्पना विशाल है, पर साधु महिमा उससे भी परे है।
संतों की महिमा इतनी महान क्यों मानी गई है?
क्योंकि उनके गुणों की कोई सीमा नहीं है, न ही वे किसी तुलनीय वस्तु से मिलते हैं। त्रिदेव और महाकवि भी उन गुणों का संपूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।
अगर संतों की महिमा इतनी है, तो हम उसे जान कैसे सकते हैं?
उनकी सेवा, संगति और आचरण से ही अनुभव किया जा सकता है; वाणी उस भाव को पूरी तरह बाँध नहीं सकती।
क्या यह अतिशयोक्ति नहीं कि देवता भी संतों का वर्णन नहीं कर सकते?
नहीं, क्योंकि यह बात स्वयं संत-ग्रंथों और ऋषियों के अनुभव से निकली है, जिनके अनुसार संत महिमा की सीमा नहीं मापी जा सकती।
ज्ञान का वर्णन करने के दो साधन क्या हैं?
या तो सीधे यथार्थ को बताया जाए, या किसी प्रसिद्ध वस्तु की उपमा दी जाए ताकि समझने में आसानी हो।
क्या संतों के लिए इन दोनों साधनों का उपयोग हो सकता है?
नहीं, क्योंकि संतों की महिमा neither सीमित है और न ही उनके समान कोई दूसरी वस्तु मौजूद है जिससे तुलना की जा सके।
तो फिर संतों की महिमा को समझने का क्या उपाय है?
श्रद्धा, सेवा और स्वयं के अनुभव से; बाहरी शब्दों से नहीं, आंतरिक अनुभूति से ही यह जाना जा सकता है।
कवि और कोविद को संतों के वर्णन में कठिनाई क्यों होती है?
क्योंकि उनकी कल्पना और भाषा की शक्ति होते हुए भी, संतत्व की गहराई शब्दों में समा नहीं सकती।
तो क्या कवियों की कल्पना व्यर्थ है इस विषय में?
व्यर्थ नहीं, पर सीमित है — वे संकेत दे सकते हैं, लेकिन पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं कर सकते।
क्या यह तर्क स्वीकार्य है कि शब्द की सीमाएं होती हैं?
हाँ, क्योंकि भाषा किसी अनुभव को केवल संकेत दे सकती है; कुछ चीजें अनुभूति की परिधि में आती हैं, व्याख्या की नहीं।
Astrology
Bhagavad Gita
Bhagavatam
Bharat Matha
Devi
Devi Mahatmyam
Ganapathy
Garuda Puranam
Glory of Venkatesha
Hanuman
Kathopanishad
Mahabharatam
Mantra Shastra
Mystique
Practical Wisdom
Purana Stories
Radhe Radhe
Ramayana
Rare Topics
Rigveda Explained
Rituals
Sages and Saints
Shiva
Spiritual books
Sri Suktam
Story of Sri Yantra
Temples
Vedas
Vishnu Sahasranama
Yoga Vasishta