सन्तों की महिमा के प्रसंग में स्कन्दपुराण की एक कथा

0:00 0:00

सन्तों की महिमा के प्रसंग में स्कन्दपुराण की एक कथा

इस पंक्ति से तुलसीदास जी स्कन्दपुराण में बताए गए एक कथा को भी ध्वनित करते हैं।

एक बार सभी देवता संतों के बारे में पूर्णतया जानने के लिए एकत्रित हुए। उन्होंने संतों की महिमा के विषय में बोलने के लिए ब्रह्मा जी को नियुक्त किया। ब्रह्मा जी बहुत युगों तक कहते रहे, फिर भी वह समाप्त नहीं हुई।

तब सभी ने इस कार्य के लिए शिव जी को नियुक्त किया। शिव जी भी बहुत युगों तक कहते रहे, फिर उन्होंने विराम स्वीकार कर लिया। फिर कार्तिकेय ने भी बहुत युगों तक कहा और रुक गए। तब भी संतों की महिमा समाप्त नहीं हुई।

आख़िर में सभी देवताओं ने शेष जी से प्रार्थना की। उनके पास सहस्र मुख हैं, इसलिए सबने सोचा कि वे यह कार्य कर पाएंगे। शेष जी लगातार एक कल्प तक संतों की महिमा कहते रहे। तब भी उसका अंत नहीं हुआ।

शेष जी ने कहा – 'संतों की महिमा मेरे नेत्रों के सामने एक पर्वत की तरह खड़ी है, और एक कल्प में मैंने तुम सबको केवल एक छोटे से पत्थर के बराबर ही बता पाया हूँ। मैं इसे पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाया। इसलिए अब मैं पाताल में जाकर सिर झुकाकर रहूंगा।'

अब तुलसीदास जी कहते हैं – जिस विषय को ब्रह्मा जी और शिव जी भी पूर्णतया व्यक्त नहीं कर सके, उस विषय को कहने की कोशिश करने की बात भी मैं कैसे सोच सकता हूँ?

साधुजन सभी भूतों का — मनुष्यों से लेकर पशु, पक्षी, कीटों तक — हित सोचते हैं। उनका मन अत्यंत आर्द्र होता है। वे दूसरों को सुख देने के लिए अपना सुख छोड़ देते हैं। वे दूसरों को दुःख से निकालने के लिए स्वयं दुःख के सागर में उतर जाते हैं।

इनकी महिमा का वर्णन करने के लिए मैं ज़रा-सा भी योग्य नहीं हूँ। यदि मैं यह प्रयास करूं तो यह ऐसा लगेगा जैसे कांच की गुड़िया बेचने वाला व्यापारी मोतियों को परखने चला हो।

जब शिव जी और ब्रह्मा जी भी संतों की महिमा को पूरी तरह नहीं कह सके, तो मैं कैसे कह सकूंगा?

 

संतों की महिमा इतनी व्यापक क्यों मानी गई है?
क्योंकि उनके गुणों की सीमा नहीं है — ब्रह्मा, शिव और शेषनाग जैसे महादेवता भी उसे संपूर्ण रूप से नहीं कह पाए। संतों का कार्य और प्रभाव समय, भाषा और वर्णन की सीमाओं से परे होता है।

क्या किसी मनुष्य के लिए भी यह महिमा समझना संभव है?
यह प्रयास किया जा सकता है, लेकिन संपूर्णता में नहीं समझा जा सकता। केवल अनुभव और श्रद्धा से हम उसकी झलक पा सकते हैं।

अगर देवताओं से भी यह नहीं हुआ, तो कोई क्यों प्रयास करे?
क्योंकि प्रयास अपने आप में साधना है। पूर्णता भले न मिले, लेकिन दिशा और श्रद्धा सही हो तो उससे प्रेरणा और आशीर्वाद अवश्य मिलता है।


शेषनाग ने संतों की महिमा को पर्वत क्यों कहा?
क्योंकि उनके सामने वह विषय इतना विशाल था कि उसे मापना या कहना उनके लिए असंभव हो गया।

क्या सहस्र मुख होने पर भी वर्णन असंभव है?
हाँ, क्योंकि यह विषय संख्या या वाणी की सीमा से परे है — वह अनुभव और भाव का विषय है, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।

क्या यह अतिशयोक्ति नहीं लगती?
नहीं, यह प्रतीकात्मक भाषा है जो उस गहराई को दर्शाती है जो संतों के जीवन और त्याग में छिपी है। गहन अनुभूति के लिए कभी-कभी भाषा को भी सीमाओं से मुक्त करना पड़ता है।


तुलसीदास जी ने स्वयं को संतों की महिमा के लिए अयोग्य क्यों कहा?
क्योंकि उन्होंने समझा कि जहाँ देवता असफल हुए, वहाँ एक साधारण कवि का प्रयास भी तुच्छ होगा।

क्या यह विनम्रता थी या आत्मबोध?
दोनों का समन्वय था। विनम्रता भाव में थी और आत्मबोध यह समझ में कि यह विषय उनके सामर्थ्य से बड़ा है।

तो फिर उन्होंने लिखना क्यों शुरू किया?
क्योंकि श्रद्धा और भक्ति से प्रेरित होकर वे यह जानते थे कि जितना कह सकें, उतना ही भी महत्त्वपूर्ण होगा। सीमित प्रयास भी पवित्र होता है यदि भाव शुद्ध हो।


संत दूसरों के दुःख में क्यों डूबते हैं?
क्योंकि उनका स्वभाव ही करुणा है। वे परहित में ही अपना आत्मिक सुख अनुभव करते हैं।

क्या यह व्यवहारिक दृष्टि से उचित है?
हाँ, क्योंकि समाज को संतुलन और सहानुभूति की आवश्यकता होती है। संत वह शक्ति हैं जो सबके दुःख को बाँटते हैं और मनुष्यता को ऊँचाई देते हैं।

क्या वे अपने जीवन को अनावश्यक रूप से कष्टमय नहीं बनाते?
नहीं, क्योंकि उनके लिए यह कष्ट नहीं, तपस्या है। जिस प्रकार माँ अपने बच्चे के लिए सब सहती है, संत भी सबके लिए वैसी ही भावना रखते हैं।


संतों की तुलना मोतियों से क्यों की गई है?
क्योंकि वे दुर्लभ, अमूल्य और भीतर से चमकते हैं। उनके गुण बाहरी दिखावे में नहीं, आंतरिक दिव्यता में छिपे होते हैं।

तो आम लोग उन्हें कैसे पहचानें?
श्रद्धा, सेवा और सत्य के प्रति उनके समर्पण से। वे दिखावे से नहीं, आचरण से पहचाने जाते हैं।

क्या यह तुलना प्रतीकात्मक नहीं है?
है, लेकिन अत्यंत उपयुक्त। जैसे मोती समुद्र की गहराई में मिलते हैं, वैसे ही संत समाज की भीतरी पीड़ा को समझते हुए उभरते हैं।

हिन्दी

हिन्दी

जय श्रीराम

Click on any topic to open

0

Copyright © 2026 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |
Vedahdara - Personalize

We use cookies