श्रूयतां धर्मसर्वस्वम्

श्रूयतां धर्मसर्वस्वम्

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।।

धर्म का एक ही प्रमुख सार है । उसे सुनो और जीवन में हमेशा उस का पालन करो । जैसा आचरण स्वयं को अच्छा न लगता हो वैसा आचरण दूसरों के साथ मत करो ।

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