हमने देखा था रामचरितमानस का भाषा का तीसरा मंगलाचरण। अब है चौथा मंगलाचरण।
'कुन्द इंदु सम देह उमारमन करुणा अयन, जाहि दीन पर नेह, करहु कृपा मरदन अयन।'
ये पार्वती सहित शिवजी से कृपा करने की प्रार्थना है। प्रभु की भक्ति को पाने के लिए निश्काम होना पड़ता है, और काम को जलाने की शक्ति सिर्फ शिवजी के पास है। इसलिए उनसे कृपा करने की प्रार्थना है कि वे मेरे कामों को जलाकर भस्म करें।
वे शिवजी भी उमा के कारण ही उस कामदेव को जलाने में समर्थ बने हैं, इसलिए उन्हें 'उमारमन शिवजी' कहा गया है। शिवजी अर्धनारीश्वर हैं। शिवजी और पार्वती जी एक ही हैं। अतः 'उमारमन' कहने से शिवजी और पार्वती जी दोनों को नमस्कार हो जाता है।
शिव और पार्वती सत् और चित की तरह हैं। जैसे प्रकृति और पुरुष का संबंध है, वैसे ही इन दोनों का भी संबंध है। अतः सच्चिदानंद रूपी भक्ति को पाने के लिए शिव और पार्वती से प्रार्थना करते हैं तुलसीदास जी।
भक्ति पाने के लिए कामनाओं का नाश क्यों जरूरी है?
कामनाएं मन को विचलित करती हैं और भक्ति को गहराई से अनुभव नहीं करने देतीं। जब तक भीतर कोई अपेक्षा या लालसा बनी रहती है, तब तक आत्मसमर्पण अधूरा रहता है। इसलिए भक्ति प्राप्ति के मार्ग में पहला कदम होता है कामनाओं का त्याग।
क्या कामनाएं पूरी करके भी भक्ति मिल सकती है?
सतही तौर पर कुछ लोग भक्ति में सक्रिय लग सकते हैं, लेकिन जब तक मन वासनाओं में फंसा है, वह शुद्ध भक्ति नहीं कहलाती। निष्काम भाव ही सच्चे समर्पण को जन्म देता है।
कामनाएं तो स्वाभाविक हैं, फिर उनसे मुक्त कैसे हों?
कामनाओं से मुक्ति अभ्यास और विवेक से आती है। जब मन समझता है कि बाह्य सुख क्षणिक हैं और केवल भीतर की शांति ही स्थायी है, तब वह स्वतः मुड़ने लगता है। शास्त्र, सत्संग और ध्यान इसमें सहायक हैं।
'उमारमन' कहने से दोनों को नमस्कार कैसे हो जाता है?
'उमारमन' शब्द शिव और पार्वती की एकता को दर्शाता है, क्योंकि शिव अर्धनारीश्वर हैं — उनका आधा भाग पार्वती है। इसलिए एक को स्मरण करने पर दोनों की वंदना हो जाती है।
शिव और पार्वती को एक मानना क्या दर्शाता है?
यह दर्शाता है कि सृष्टि की शक्ति और चेतना एक ही मूल स्रोत से प्रकट होती है। भक्ति का उद्देश्य भी यही है — इस अद्वैत को अनुभव करना।
क्या 'उमारमन' कहना पर्याप्त है दोनों की कृपा पाने के लिए?
सिर्फ नाम लेने से नहीं, बल्कि उस भाव को समझकर, श्रद्धा से स्मरण करने पर ही कृपा प्राप्त होती है। भाव ही मूल है, शब्द तो माध्यम हैं।
कुंद और इंदु के प्रतीकों का क्या भावार्थ है?
कुंद पुष्प कोमलता का प्रतीक है, जो पार्वती के स्वभाव को दर्शाता है। इंदु यानी चंद्रमा, जो शिव की ज्योति और शीतलता का प्रतीक है। इन दोनों के गुण मिलकर एक आदर्श ईश्वर स्वरूप बनाते हैं — कोमल और प्रकाशमान।
कोमलता और ज्योति का संगम क्यों महत्वपूर्ण है?
केवल कठोरता डराती है, केवल कोमलता भ्रमित करती है। जब दया और विवेक एकसाथ हों, तब वह शक्ति सबका कल्याण करती है।
इन प्रतीकों से भक्त को क्या प्रेरणा मिलती है?
भक्त सीखता है कि भीतर कोमलता और उजास दोनों चाहिए — करुणा भी, विवेक भी। यही संतुलन भक्ति को पूर्ण बनाता है।
'सम देह' शब्द का क्या संकेत है?
'सम देह' का अर्थ है एक समान या समरूप देह — अर्थात शिव और पार्वती का अर्धनारीश्वर रूप। यह एकता का प्रतीक है, जहां भिन्नता नहीं, केवल समरसता है।
अर्धनारीश्वर रूप का महत्व क्या है?
यह रूप बताता है कि सृष्टि के दो पक्ष — पुरुष और प्रकृति — अलग नहीं हैं, एक-दूसरे में लय होते हैं। यही पूर्णता है।
क्या इस दृष्टिकोण से अन्य देवताओं को अलग मानना गलत होगा?
नहीं, सबकी उपासना उनके स्वभावानुसार की जाती है, लेकिन तत्वतः सभी शक्तियां एक ही ब्रह्म में समाहित हैं। यहाँ शिव-पार्वती की उपासना उसी एकत्व की झलक देती है।
पंचोपासना का उद्देश्य क्या है?
यह प्रणाली भक्त को विविध रूपों से एक ही सत्य की अनुभूति कराती है। गणेश, सूर्य, शिव, विष्णु, और देवी — सब एक ही ईश्वर के आयाम हैं।
क्या सभी देवताओं को एकसाथ पूजना आवश्यक है?
भक्त की प्रवृत्ति और साधना के मार्ग पर निर्भर करता है, पर पंचोपासना से समग्र संतुलन और आध्यात्मिक पूर्णता आती है।
इतने सारे देवताओं को पूजने में क्या विरोधाभास नहीं होगा?
नहीं, क्योंकि ये सभी अलग नहीं, ब्रह्म के विभिन्न स्वरूप हैं। विविधता में एकता ही सनातन धर्म की विशेषता है।
ये शिव और पार्वती जी कुन्द और इंदु के समान दिखने वाले हैं। कुन्द सफेद रंग का पुष्प है। इंदु यानी चंद्रमा। माता पार्वती कुन्द के समान और भगवान शिव इंदु के समान हैं। ये दोनों वस्तुतः सफेद रंग के ही हैं — कुन्द और इंदु। कुन्द कोमल है, पार्वती जी का स्वभाव भी कोमल है। चंद्रमा प्रकाशमान है, वैसे ही शिवजी भी प्रकाशमान हैं।
जो वस्तु कोमल और प्रकाशमान होती है, वह सब लोगों की प्रिय होती है। वैसे जब पार्वती और शिवजी एक साथ मिलते हैं, तो कोमलता के साथ प्रकाश भी प्रकट होता है। इसलिए वे सब के प्रिय देवता हैं। ऐसे शिव और पार्वती हम पर कृपा करें।
करुणा के घर हैं शिव और पार्वती। वे हम पर कृपा करें।
संस्कृत में कहा गया है — 'कुन्दः कु कुच्चितं दुर्गंधादि जनित क्लेशान् द्यति, नाशयतीति कुन्दः।' कुन्द यानी कुच्चित गंधों को अपने गंध से निवारण करने वाला।
'उन्नति अमृत धारया भुवं क्लिन्नाम उत्तमां करोतीति इंदुः।' इंदु यानी अमृतवर्षा से भूमि को उत्तम बनाने वाला।
ऐसे इन दोनों शब्दों का अर्थ है — जैसे कुन्द के समान शिव-पार्वती हम पर आने वाले कष्टों का निवारण करें, और इंदु के समान शिव-पार्वती हम पर भक्तिरस की वर्षा करके हमें उत्तम बनाएं।
'सम' शब्द कहा गया है — 'कुन्द इंदु सम देह'। अर्थात मेरे श्रीराम जी के समान जो देवता शिव और पार्वती हैं, वे हम पर कृपा करें।
'सम देह' का एक और अर्थ है — अर्धनारीश्वर। अर्थात आधा शिव और आधा पार्वती जिस देह में है, वह देह। वे शिव और पार्वती हम पर कृपा करें।
यहाँ तक पंचोपासना के सारे देवताओं का नमस्कार किया गया है — गणेश जी, सूर्य, शिवजी, विष्णु भगवान, और पार्वती देवी।
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