श्री रामचरित मानस द्वारा विघ्न निवारण का उपाय

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श्री रामचरित मानस द्वारा विघ्न निवारण का उपाय

श्री रामचरित मानस द्वारा समस्त विघ्नों के विनाश के लिये एक उपाय है।

संपूर्ण रामचरितमानस के हर एक पद्य के आगे और पीछे —
'सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही' —
इसका पाठ करके मानस का पाठ कीजिये।

पहले इसका पाठ करके फिर एक पद्य, चाहे चौपाई हो या दोहा।
पद्य के अन्त में फिर से इसका पाठ।
उसके आगे इसी प्रकार से दूसरा पद्य।
इस प्रकार संपूर्ण मानस का पाठ कीजिये।
इसे कहते हैं संपुटित पाठ।

एक और तरीका है जिसे 'संपुटवल्ली' कहते हैं।
अगर विघ्न बहुत ही उद्दण्ड हो तो इसका प्रयोग करना चाहिये।
हर एक पद्य के आगे और पीछे दो-दो बार पाठ —
'सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही' —
इसका दो-दो बार पाठ।

इसका अर्थ है — जिसको श्रीरामजी कृपा दृष्टि से देखते हैं, कोई भी विघ्न उसको बाधक नहीं होता।

श्रद्धा और भक्ति के साथ इस अनुष्ठान को करके श्रीरामजी की परम कृपा का पात्र बनकर अपने जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लायें।

 

संपुटित पाठ किस प्रकार का होता है?
यह वह विधि है जिसमें प्रत्येक चौपाई या दोहे के पहले और बाद में एक विशिष्ट श्लोक पढ़ा जाता है जो पाठ को रक्षात्मक बल देता है।

इस विधि से क्या लाभ होता है?
यह पाठ मन को स्थिर करता है, विश्वास बढ़ाता है, और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है। यह मानसिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक विघ्नों को दूर करने में सहायक होता है।

क्या इतना पढ़ना बोझिल नहीं हो जाएगा?
नहीं। जब उद्देश्य स्पष्ट होता है और श्रद्धा होती है, तब यह पाठ साधना बन जाता है, बोझ नहीं। यह नियम साधक के मन को और अधिक एकाग्र करता है।


संपुटवल्ली पाठ कब करना चाहिए?
जब विघ्न अत्यंत उग्र, बार-बार आने वाले या हटने में कठिन हों, तब यह विशेष विधि अपनाई जाती है जिसमें श्लोक दो-दो बार पढ़ा जाता है।

इसकी शक्ति सामान्य पाठ से अधिक कैसे मानी जाती है?
क्योंकि यह बार-बार स्मरण कराके भीतर विश्वास को सुदृढ़ करता है। दोहराव से भाव अधिक गहराता है और मन में दृढ़ निष्कल्प जागता है।

क्या यह मात्र अंधविश्वास नहीं है?
नहीं। यह परंपरा में सिद्ध की गई विधि है, और अनेक साधकों ने इसके लाभ का अनुभव किया है। मन की एकाग्रता और श्रद्धा से ही फल मिलता है — यह आंतरिक विज्ञान है।


यह श्लोक इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है?
क्योंकि यह श्रीराम की कृपा-दृष्टि का स्मरण कराता है — जिससे कोई भी विघ्न टिक नहीं सकता। यह शरणागति का मूल भाव है।

क्या मात्र एक पंक्ति इतनी प्रभावी हो सकती है?
हां। जब वह पंक्ति श्रद्धा से जुड़ी हो और बार-बार दोहराई जाए, तो वह मंत्र बन जाती है। यह वैसा ही है जैसे दीपक का एक छोटा प्रकाश गहरा अंधकार मिटा सकता है।

अगर पाठ करने वाला पापी है, तब भी यह काम करेगा?
अगर मन में पछतावा और शुद्धि का भाव है, तो हाँ। श्रीराम का स्मरण हर एक को शरण देता है — पूर्व जीवन चाहे जैसा भी हो।

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जय श्रीराम

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