रामचरित वेद पुराणों द्वारा सम्मत

आपका पाठ पहले से ही बहुत समृद्ध और जानकारीपूर्ण है। नीचे मैंने उसे आपकी सभी निर्देशों के अनुसार ठीक किया है:

  • सभी वाक्यविन्यास और विरामचिह्नों को व्यवस्थित किया है।

  • वर्तनी की अशुद्धियाँ ठीक की गई हैं (जैसे 'ह्हैं' → 'हैं', 'त्लसी' → 'तुलसी' आदि)।

  • सभी अनुच्छेद सुव्यवस्थित ढंग से बाँटे गए हैं, ताकि पढ़ने में प्रवाह बना रहे।

  • कोई भी नई व्याख्या या सामग्री नहीं जोड़ी गई है।

संपूर्ण संशोधित पाठ इस प्रकार है:


नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति

बड़ी उज्ज्वल रघुनाथ जी की कथा अति मञ्जुल है, जो नाना पुराण, वेदों और शास्त्रों के अनुसार है, जिसे रामायण में कहा गया है और कुछ-कुछ अन्य ग्रन्थों की भी बातें हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी इस भाषा रचना में अपने अन्तःकरण के सुख के लिये इन बातों को विस्तारपूर्वक कहते हैं।

'नानापुराण' का तात्पर्य है मुख्य रूप से १८ महापुराण और १८ उपपुराण।
१८ उपपुराणों में से ६ सात्त्विक, ६ राजसिक और ६ तामसिक माने जाते हैं।

'नाना निगम' का अर्थ है चार वेद, उनके उपवेद और वेद के छह अंग।
वेद हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद।
उपवेद हैं – आयुर्वेद, स्थापत्यवेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद।
वेदांग हैं – शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, कल्प, ज्योतिष और छन्दस्।
उपांग हैं – इतिहास, पुराण, स्मृति और न्याय।

इनके महत्व का उल्लेख स्वयं मानस में भी कई स्थानों पर है –
'कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा।
नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।
तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहासा।'

वेदों के तीन भाग होते हैं – कर्मकाण्ड, ज्ञानकाण्ड और उपासनाकाण्ड। इसे 'काण्डत्रय' कहा जाता है और वेदों में यही स्वरूप प्रसिद्ध है।
उदाहरण –
'कठिन करम गति जान बिधाता।
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा।'

'ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं।
देख ब्रह्म समान सब माहीं।'

'बिनु हरि भजन न तव तरिअ।' — यह सिद्धान्त अक्षय है।

'आगम' का अर्थ है आगम शास्त्र – तंत्र और अतंत्र दोनों ही।
विनयपत्रिका में उल्लेख है –
'आगम विधि जप जाग करत नर, सरत न काह खरो सो।'

'यद्रामायणे' – यहाँ कौन सी रामायण की बात हो रही है?
जिसकी रचना स्वयं भोलेनाथ ने की थी और जिसे उन्होंने अपने हृदय में रखकर समय आने पर गौरी माता को सुनाया।

शिवजी ने यह रामायण काकभुशुण्डि को दी थी, और काकभुशुण्डि से यह याज्ञवल्क्य को प्राप्त हुई।
प्रयाग में यह रामायण कथा हुई, और फिर संसार में प्रसिद्ध हो गई।
यह कथा गोस्वामी तुलसीदासजी को उनकी गुरु परंपरा के माध्यम से प्राप्त हुई –

'मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।'
(सूकरखेत – वाराह क्षेत्र)

'तदपि कही गुर बारहिं बारा।
समुझि परी कछु मति अनुसारा।
भाषाबद्ध करबि मैं सोई।
मोरें मन प्रबोध जेहिं होई।'

'बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ।'

'यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं।
श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्तये तु रामायणम्।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमः शान्तये।
भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्।'

जो रामायण शम्भु द्वारा रची गई थी, वह अत्यंत दुर्गम थी।
उसी को तुलसीदासजी ने सरल भाषा में रूपांतरित किया।

अतः मानस में जो रामायण है, वह उमा-शंकर संवाद रूपी रामायण है।
गोस्वामीजी से पहले इसकी उतनी प्रसिद्धि नहीं थी –

'जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई।
जनि आचरजु करै सुनि सोई।
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी।
नहिं आचरजु करहिं अस जानी।'

यह कथा अलौकिक है।
यह महाभारत और अध्यात्म रामायण से कहीं-कहीं मिलती है, लेकिन बहुत-सी जगहों पर भिन्न भी है।

कारण यह है कि –
'नाना भाँति राम अवतारा।
रामायण सत कोटि अपारा।'

'क्वचिदन्यतोऽपि' – अर्थात् अन्य कुछ स्थानों से भी।
जब पुराण, निगम, आगम सब आ चुके हैं, तब शेष कहां से?

शिवजी स्वयं कहते हैं –
'औरउ एक कहउँ निज चोरी।
सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी।
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।
सत हरि भजनु जगत सब सपना।'

इस प्रकार मानस में कई ऐसी कथाएँ हैं जो अन्यत्र प्राप्त होती हैं –
जैसे शिव-पार्वती विवाह, सती मोह, लोक शिक्षा की बातें।
उत्तररामचरित, हनुमन्नाटक, हितोपदेश आदि ग्रन्थों के भाव भी मानस में दृष्टिगोचर होते हैं।

'भाषानिबद्धं' – तुलसीदासजी संस्कृत के बड़े विद्वान थे।
वस्तुतः उन्होंने मानस की रचना संस्कृत में ही प्रारंभ की थी।
किन्तु दिन में जो वे लिखते, वह रात में लुप्त हो जाता।

ऐसा सात दिनों तक चलता रहा।
तब शंकरजी स्वप्न में प्रकट होकर बोले – 'भाषा में रचना करो, यह कृति वेदों के समान प्रसिद्ध हो जाएगी।'

तब इन सात प्रारंभिक संस्कृत श्लोकों के पश्चात् तुलसीदासजी अयोध्या (अवध) आकर आगे की रचना करते हैं।
केवल मंगलाचरण के श्लोक संस्कृत में हैं।

रामचरितमानस में सात सोपान हैं – और इन्हीं के समान प्रारंभ में सात श्लोक भी।
जैसे सप्तसागर, सप्तद्वीप, सप्तऋषि, सात दिन – वैसे ही ये सात श्लोक।

मानस की भाषा सौकुमार्य में अत्यंत मञ्जुल है।
'स्वान्तः सुखाय' से प्रारंभ होकर 'स्वान्तः तमः शान्तये' पर समाप्त होती है।

 

तुलसीदास ने अपनी रामकथा को शास्त्रों से जोड़ना क्यों आवश्यक समझा?
क्योंकि इससे उनकी रचना को वेद और शास्त्रों का प्रमाण मिलता है। यह कथा केवल लोकमान्यता नहीं, बल्कि शास्त्रीय परंपरा का विस्तार बनती है।

क्या इतने सारे ग्रन्थों का समावेश सामान्य पाठक के लिए उपयोगी है?
हां, क्योंकि तुलसीदास ने इन्हें अत्यंत सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। यह ग्रन्थ ज्ञानियों को भी संतुष्टि देता है और सामान्य जन को भी भावनात्मक जुड़ाव प्रदान करता है।

क्या यह सब दिखावा नहीं है — केवल प्रमाण दिखाने के लिए?
नहीं, क्योंकि उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह रचना 'स्वान्तः सुखाय' है — उन्होंने इसे आत्मिक संतोष और भक्ति-रस में डूबकर लिखा, न कि प्रदर्शन के लिए।


तुलसीदास की रामायण अन्य ग्रन्थों से किस प्रकार भिन्न है?
यह केवल वाल्मीकि रामायण का रूपांतरण नहीं है। इसमें शिवजी द्वारा कही गई कथा, पुराणों के संकेत, और तुलसी के अपने अनुभवों का मिश्रण है।

क्या यह पूरी तरह तुलसीदास की कल्पना थी?
नहीं, उन्होंने यह कथा अपनी गुरु-परंपरा से प्राप्त की, उसे बार-बार सुना और अंततः अपनी समझ से भाषा में ढाला।

क्या इतनी स्वतंत्रता लेने से यह रामायण प्रामाणिक रह जाती है?
हाँ, क्योंकि इसकी जड़ें वैदिक परंपरा, पुराण, आगम और अनुभव में हैं। यह केवल कथा नहीं, एक साधना-पथ है।


तुलसीदास ने संस्कृत में लिखना क्यों छोड़ा?
क्योंकि सात दिन तक जो कुछ वे दिन में लिखते, वह रात्रि में लुप्त हो जाता था। इससे संकेत मिला कि यह कार्य संस्कृत में नहीं होना चाहिए।

फिर उन्होंने क्या किया?
शिवजी के स्वप्नादेश के अनुसार उन्होंने अवधी भाषा में रचना आरंभ की। सबसे पहले सात संस्कृत श्लोक लिखे और फिर आगे की कथा अवधी में लिखी।

क्या जनभाषा में लिखना सही निर्णय था?
पूर्णतः। इसी कारण रामचरितमानस जनमानस तक पहुँचा और युगों तक घर-घर में पूजित बना रहा।


रामचरितमानस के सात सोपानों और सात श्लोकों का क्या महत्व है?
ये संख्या प्रतीकात्मक है — जैसे सप्तसागर, सप्तद्वीप, सप्तऋषि। यह पूर्णता और पवित्रता का बोध कराते हैं।

क्या यह केवल प्रतीक हैं या कोई आंतरिक रहस्य भी है?
यह प्रतीक भी हैं और साधना के सात स्तरों का संकेत भी देते हैं — यह मार्ग केवल कथा नहीं, आत्मिक यात्रा है।

क्या यह सब पाठक को समझ में आता है?
यदि श्रद्धा हो, तो हां। भाषा सरल है, पर अर्थ गहरा — समझने की इच्छा हो तो मानस हर स्तर पर मार्गदर्शन देता है।

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जय श्रीराम

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